Pt 9 - राग गउड़ी - बाणी शब्द, Part 9 - Raag Gauri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 296) थिती गउड़ी महला ५ ॥
सलोकु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥ अनिक भांति होइ पसरिआ नानक एकंकारु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 296) पउड़ी ॥
एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥ गुण गोबिंद गुपाल प्रभ सरनि परउ हरि राइ ॥ ता की आस कलिआण सुख जा ते सभु कछु होइ ॥ चारि कुंट दह दिसि भ्रमिओ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ बेद पुरान सिम्रिति सुने बहु बिधि करउ बीचारु ॥ पतित उधारन भै हरन सुख सागर निरंकार ॥ दाता भुगता देनहारु तिसु बिनु अवरु न जाइ ॥ जो चाहहि सोई मिलै नानक हरि गुन गाइ ॥१॥

गोबिंद जसु गाईऐ हरि नीत ॥ मिलि भजीऐ साधसंगि मेरे मीत ॥१॥ रहाउ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 296) सलोकु ॥
करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥ भ्रमु कटीऐ नानक साधसंगि दुतीआ भाउ मिटाइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 296) पउड़ी ॥
दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥ राम रतनु मनि तनि बसै तजि कामु क्रोधु लोभु मीत ॥ मरणु मिटै जीवनु मिलै बिनसहि सगल कलेस ॥ आपु तजहु गोबिंद भजहु भाउ भगति परवेस ॥ लाभु मिलै तोटा हिरै हरि दरगह पतिवंत ॥ राम नाम धनु संचवै साच साह भगवंत ॥ ऊठत बैठत हरि भजहु साधू संगि परीति ॥ नानक दुरमति छुटि गई पारब्रहम बसे चीति ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) सलोकु ॥
तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥ नानक संत निरमल भए जिन मनि वसिआ सोइ ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) पउड़ी ॥
त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥ नरक सुरग भ्रमतउ घणो सदा संघारै मीचु ॥ हरख सोग सहसा संसारु हउ हउ करत बिहाइ ॥ जिनि कीए तिसहि न जाणनी चितवहि अनिक उपाइ ॥ आधि बिआधि उपाधि रस कबहु न तूटै ताप ॥ पारब्रहम पूरन धनी नह बूझै परताप ॥ मोह भरम बूडत घणो महा नरक महि वास ॥ करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक तेरी आस ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) सलोकु ॥
चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥ चारि पदारथ असट सिधि भजु नानक हरि नामु ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) पउड़ी ॥
चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥ सरब खेम कलिआण निधि राम नामु जपि सारु ॥ नरक निवारै दुख हरै तूटहि अनिक कलेस ॥ मीचु हुटै जम ते छुटै हरि कीरतन परवेस ॥ भउ बिनसै अम्रितु रसै रंगि रते निरंकार ॥ दुख दारिद अपवित्रता नासहि नाम अधार ॥ सुरि नर मुनि जन खोजते सुख सागर गोपाल ॥ मनु निरमलु मुखु ऊजला होइ नानक साध रवाल ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) सलोकु ॥
पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥ साधसंगि होइ निरमला नानक प्रभ कै रंगि ॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) पउड़ी ॥
पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥ कुसम बास बहु रंगु घणो सभ मिथिआ बलबंचु ॥ नह जापै नह बूझीऐ नह कछु करत बीचारु ॥ सुआद मोह रस बेधिओ अगिआनि रचिओ संसारु ॥ जनम मरण बहु जोनि भ्रमण कीने करम अनेक ॥ रचनहारु नह सिमरिओ मनि न बीचारि बिबेक ॥ भाउ भगति भगवान संगि माइआ लिपत न रंच ॥ नानक बिरले पाईअहि जो न रचहि परपंच ॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) सलोकु ॥
खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥ भगत सोहहि गुण गावते नानक प्रभ कै दुआर ॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 297) पउड़ी ॥
खसटमि खट सासत्र कहहि सिम्रिति कथहि अनेक ॥ ऊतमु ऊचौ पारब्रहमु गुण अंतु न जाणहि सेख ॥ नारद मुनि जन सुक बिआस जसु गावत गोबिंद ॥ रस गीधे हरि सिउ बीधे भगत रचे भगवंत ॥ मोह मान भ्रमु बिनसिओ पाई सरनि दइआल ॥ चरन कमल मनि तनि बसे दरसनु देखि निहाल ॥ लाभु मिलै तोटा हिरै साधसंगि लिव लाइ ॥ खाटि खजाना गुण निधि हरे नानक नामु धिआइ ॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) सलोकु ॥
संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥ नानक मनु संतोखीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) पउड़ी ॥
सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥ संतसंगति महि पाईऐ अंतु न पारावार ॥ आपु तजहु गोबिंद भजहु सरनि परहु हरि राइ ॥ दूख हरै भवजलु तरै मन चिंदिआ फलु पाइ ॥ आठ पहर मनि हरि जपै सफलु जनमु परवाणु ॥ अंतरि बाहरि सदा संगि करनैहारु पछाणु ॥ सो साजनु सो सखा मीतु जो हरि की मति देइ ॥ नानक तिसु बलिहारणै हरि हरि नामु जपेइ ॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) सलोकु ॥
आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥ जमकंकरु जोहि न सकई नानक प्रभू दइआल ॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) पउड़ी ॥
असटमी असट सिधि नव निधि ॥ सगल पदारथ पूरन बुधि ॥ कवल प्रगास सदा आनंद ॥ निरमल रीति निरोधर मंत ॥ सगल धरम पवित्र इसनानु ॥ सभ महि ऊच बिसेख गिआनु ॥ हरि हरि भजनु पूरे गुर संगि ॥ जपि तरीऐ नानक नाम हरि रंगि ॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) सलोकु ॥
नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥ नानक नामि बिसारिऐ नरक सुरग अवतार ॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) पउड़ी ॥
नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥ हरि नामु न जपहि करत बिपरीति ॥ पर त्रिअ रमहि बकहि साध निंद ॥ करन न सुनही हरि जसु बिंद ॥ हिरहि पर दरबु उदर कै ताई ॥ अगनि न निवरै त्रिसना न बुझाई ॥ हरि सेवा बिनु एह फल लागे ॥ नानक प्रभ बिसरत मरि जमहि अभागे ॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) सलोकु ॥
दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥ मनु बसि आवै नानका जे पूरन किरपा होइ ॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 298) पउड़ी ॥
दसमी दस दुआर बसि कीने ॥ मनि संतोखु नाम जपि लीने ॥ करनी सुनीऐ जसु गोपाल ॥ नैनी पेखत साध दइआल ॥ रसना गुन गावै बेअंत ॥ मन महि चितवै पूरन भगवंत ॥ हसत चरन संत टहल कमाईऐ ॥ नानक इहु संजमु प्रभ किरपा पाईऐ ॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) सलोकु ॥
एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥ गुण गोबिंद न जाणीऐ नानक सभु बिसमादु ॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) पउड़ी ॥
एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥ इंद्री बसि करि सुणहु हरि नामु ॥ मनि संतोखु सरब जीअ दइआ ॥ इन बिधि बरतु स्मपूरन भइआ ॥ धावत मनु राखै इक ठाइ ॥ मनु तनु सुधु जपत हरि नाइ ॥ सभ महि पूरि रहे पारब्रहम ॥ नानक हरि कीरतनु करि अटल एहु धरम ॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) सलोकु ॥
दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥ नानक प्रभ सिउ मिलि रहे बिनसे सगल जंजाल ॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) पउड़ी ॥
दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥ हरि की भगति करहु तजि मानु ॥ हरि अम्रित पान करहु साधसंगि ॥ मन त्रिपतासै कीरतन प्रभ रंगि ॥ कोमल बाणी सभ कउ संतोखै ॥ पंच भू आतमा हरि नाम रसि पोखै ॥ गुर पूरे ते एह निहचउ पाईऐ ॥ नानक राम रमत फिरि जोनि न आईऐ ॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) सलोकु ॥
तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥ पतित उधारणु मनि बसै नानक छूटै नाम ॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) पउड़ी ॥
त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥ आवत जात नरक अवतार ॥ हरि हरि भजनु न मन महि आइओ ॥ सुख सागर प्रभु निमख न गाइओ ॥ हरख सोग का देह करि बाधिओ ॥ दीरघ रोगु माइआ आसाधिओ ॥ दिनहि बिकार करत स्रमु पाइओ ॥ नैनी नीद सुपन बरड़ाइओ ॥ हरि बिसरत होवत एह हाल ॥ सरनि नानक प्रभ पुरख दइआल ॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) सलोकु ॥
चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥ नानक ऊन न देखीऐ पूरन ता के काम ॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) पउड़ी ॥
चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥ सगल भवन पूरन परताप ॥ दसे दिसा रविआ प्रभु एकु ॥ धरनि अकास सभ महि प्रभ पेखु ॥ जल थल बन परबत पाताल ॥ परमेस्वर तह बसहि दइआल ॥ सूखम असथूल सगल भगवान ॥ नानक गुरमुखि ब्रहमु पछान ॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) सलोकु ॥
आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥ संत प्रसादी भै मिटे नानक बिनसी चिंद ॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 299) पउड़ी ॥
अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥ मनु तनु सीतलु सांति सहज लागा प्रभ की सेव ॥ टूटे बंधन बहु बिकार सफल पूरन ता के काम ॥ दुरमति मिटी हउमै छुटी सिमरत हरि को नाम ॥ सरनि गही पारब्रहम की मिटिआ आवा गवन ॥ आपि तरिआ कुट्मब सिउ गुण गुबिंद प्रभ रवन ॥ हरि की टहल कमावणी जपीऐ प्रभ का नामु ॥ गुर पूरे ते पाइआ नानक सुख बिस्रामु ॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 300) सलोकु ॥
पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥ दिनु दिनु चड़ै सवाइआ नानक होत न घाटि ॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 300) पउड़ी ॥
पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥ जीअ जंत दइआल पुरखु सभ ऊपरि जा का हथु ॥ गुण निधान गोबिंद गुर कीआ जा का होइ ॥ अंतरजामी प्रभु सुजानु अलख निरंजन सोइ ॥ पारब्रहमु परमेसरो सभ बिधि जानणहार ॥ संत सहाई सरनि जोगु आठ पहर नमसकार ॥ अकथ कथा नह बूझीऐ सिमरहु हरि के चरन ॥ पतित उधारन अनाथ नाथ नानक प्रभ की सरन ॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 300) सलोकु ॥
दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥ मनि चिंदे फल पाइआ नानक हरि गुन गाइ ॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 300) पउड़ी ॥
कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥ को उपदेसै को द्रिड़ै तिस का होइ उधारु ॥ किलबिख काटै होइ निरमला जनम जनम मलु जाइ ॥ हलति पलति मुखु ऊजला नह पोहै तिसु माइ ॥ सो सुरता सो बैसनो सो गिआनी धनवंतु ॥ सो सूरा कुलवंतु सोइ जिनि भजिआ भगवंतु ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु बैसु उधरै सिमरि चंडाल ॥ जिनि जानिओ प्रभु आपना नानक तिसहि रवाल ॥१७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 300) गउड़ी की वार महला ४ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥ एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥ सतिगुर विचि अम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥ नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 300) मः ४ ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥ लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥ हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अम्रितु हरि उर धारि ॥ सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥ नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥ तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥ तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥ गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥ वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) सलोक मः ४ ॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥ मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥ जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥ जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) मः ४ ॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥ नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) पउड़ी ॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥ जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥ तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥ तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥ सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) सलोक मः ४ ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥ नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) मः ४ ॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥ जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) पउड़ी ॥
तू करता पुरखु अगमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥ तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥ तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥ तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) सलोक मः ४ ॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरम का अठे पहर लगंनि ॥ जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) मः ४ ॥
जिन अंदरि प्रीति पिरम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥ नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 301) पउड़ी ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥ तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥ तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥ तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥ सभि जीअ तेरे तू सभस दा तू सभ छडाही ॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) सलोक मः ४ ॥
सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥ गुरि तुठै सजणु मेलिआ जन नानक सुखि सवंनि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) मः ४ ॥
सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥ सतिगुरु अंदरहु निरवैरु है सभु देखै ब्रहमु इकु सोइ ॥ निरवैरा नालि जि वैरु चलाइदे तिन विचहु तिसटिआ न कोइ ॥ सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥ सतिगुर नो जेहा को इछदा तेहा फलु पाए कोइ ॥ नानक करता सभु किछु जाणदा जिदू किछु गुझा न होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) पउड़ी ॥
जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥ जिसु साहिब भावै तिसु बखसि लए सो साहिब मनि भाणी ॥ जे को ओस दी रीस करे सो मूड़ अजाणी ॥ जिस नो सतिगुरु मेले सु गुण रवै गुण आखि वखाणी ॥ नानक सचा सचु है बुझि सचि समाणी ॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) सलोक मः ४ ॥
हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥ जिन जपिआ इक मनि इक चिति तिन लथा हउमै भारु ॥ जिन गुरमुखि हरि आराधिआ तिन संत जना जैकारु ॥ कोई निंदा करे पूरे सतिगुरू की तिस नो फिटु फिटु कहै सभु संसारु ॥ सतिगुर विचि आपि वरतदा हरि आपे रखणहारु ॥ धनु धंनु गुरू गुण गावदा तिस नो सदा सदा नमसकारु ॥ जन नानक तिन कउ वारिआ जिन जपिआ सिरजणहारु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) मः ४ ॥
आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥ विचि आपे जंत उपाइअनु मुखि आपे देइ गिरासु ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे ही गुणतासु ॥ जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख कटे तासु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥ जो तुधु सचु सलाहदे तिन जम कंकरु नेड़ि न आवै ॥ तिन के मुख दरि उजले जिन हरि हिरदै सचा भावै ॥ कूड़िआर पिछाहा सटीअनि कूड़ु हिरदै कपटु महा दुखु पावै ॥ मुह काले कूड़िआरीआ कूड़िआर कूड़ो होइ जावै ॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 302) सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥ गुरसिखी अम्रितु बीजिआ तिन अम्रित फलु हरि पाए ॥ ओना हलति पलति मुख उजले ओइ हरि दरगह सची पैनाए ॥ इकन्हा अंदरि खोटु नित खोटु कमावहि ओहु जेहा बीजे तेहा फलु खाए ॥ जा सतिगुरु सराफु नदरि करि देखै सुआवगीर सभि उघड़ि आए ॥ ओइ जेहा चितवहि नित तेहा पाइनि ओइ तेहो जेहे दयि वजाए ॥ नानक दुही सिरी खसमु आपे वरतै नित करि करि देखै चलत सबाए ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 303) मः ४ ॥
इकु मनु इकु वरतदा जितु लगै सो थाइ पाइ ॥ कोई गला करे घनेरीआ जि घरि वथु होवै साई खाइ ॥ बिनु सतिगुर सोझी ना पवै अहंकारु न विचहु जाइ ॥ अहंकारीआ नो दुख भुख है हथु तडहि घरि घरि मंगाइ ॥ कूड़ु ठगी गुझी ना रहै मुलमा पाजु लहि जाइ ॥ जिसु होवै पूरबि लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ ॥ जिउ लोहा पारसि भेटीऐ मिलि संगति सुवरनु होइ जाइ ॥ जन नानक के प्रभ तू धणी जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 303) पउड़ी ॥
जिन हरि हिरदै सेविआ तिन हरि आपि मिलाए ॥ गुण की साझि तिन सिउ करी सभि अवगण सबदि जलाए ॥ अउगण विकणि पलरी जिसु देहि सु सचे पाए ॥ बलिहारी गुर आपणे जिनि अउगण मेटि गुण परगटीआए ॥ वडी वडिआई वडे की गुरमुखि आलाए ॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 303) सलोक मः ४ ॥
सतिगुर विचि वडी वडिआई जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआवै ॥ हरि हरि नामु रमत सुच संजमु हरि नामे ही त्रिपतावै ॥ हरि नामु ताणु हरि नामु दीबाणु हरि नामो रख करावै ॥ जो चितु लाइ पूजे गुर मूरति सो मन इछे फल पावै ॥ जो निंदा करे सतिगुर पूरे की तिसु करता मार दिवावै ॥ फेरि ओह वेला ओसु हथि न आवै ओहु आपणा बीजिआ आपे खावै ॥ नरकि घोरि मुहि कालै खड़िआ जिउ तसकरु पाइ गलावै ॥ फिरि सतिगुर की सरणी पवै ता उबरै जा हरि हरि नामु धिआवै ॥ हरि बाता आखि सुणाए नानकु हरि करते एवै भावै ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 303) मः ४ ॥
पूरे गुर का हुकमु न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ॥ ओसु अंदरि कूड़ु कूड़ो करि बुझै अणहोदे झगड़े दयि ओस दै गलि पाइआ ॥ ओहु गल फरोसी करे बहुतेरी ओस दा बोलिआ किसै न भाइआ ॥ ओहु घरि घरि हंढै जिउ रंन दोहागणि ओसु नालि मुहु जोड़े ओसु भी लछणु लाइआ ॥ गुरमुखि होइ सु अलिपतो वरतै ओस दा पासु छडि गुर पासि बहि जाइआ ॥ जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥ पहिला आगमु निगमु नानकु आखि सुणाए पूरे गुर का बचनु उपरि आइआ ॥ गुरसिखा वडिआई भावै गुर पूरे की मनमुखा ओह वेला हथि न आइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 304) पउड़ी ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥ सो सतिगुरु जि सचु धिआइदा सचु सचा सतिगुरु इके ॥ सोई सतिगुरु पुरखु है जिनि पंजे दूत कीते वसि छिके ॥ जि बिनु सतिगुर सेवे आपु गणाइदे तिन अंदरि कूड़ु फिटु फिटु मुह फिके ॥ ओइ बोले किसै न भावनी मुह काले सतिगुर ते चुके ॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 304) सलोक मः ४ ॥
हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥ गुरमुखि बखसि जमाईअनु मनमुखी मूलु गवाइआ ॥ सभु को बीजे आपणे भले नो हरि भावै सो खेतु जमाइआ ॥ गुरसिखी हरि अम्रितु बीजिआ हरि अम्रित नामु फलु अम्रितु पाइआ ॥ जमु चूहा किरस नित कुरकदा हरि करतै मारि कढाइआ ॥ किरसाणी जमी भाउ करि हरि बोहल बखस जमाइआ ॥ तिन का काड़ा अंदेसा सभु लाहिओनु जिनी सतिगुरु पुरखु धिआइआ ॥ जन नानक नामु अराधिआ आपि तरिआ सभु जगतु तराइआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 304) मः ४ ॥
सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥ राती ऊघै दबिआ नवे सोत सभि ढिला ॥ मनमुखा दै सिरि जोरा अमरु है नित देवहि भला ॥ जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला ॥ कामि विआपे कुसुध नर से जोरा पुछि चला ॥ सतिगुर कै आखिऐ जो चलै सो सति पुरखु भल भला ॥ जोरा पुरख सभि आपि उपाइअनु हरि खेल सभि खिला ॥ सभ तेरी बणत बणावणी नानक भल भला ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 304) पउड़ी ॥
तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥ से वडभागी जि तुधु धिआइदे जिन सतिगुरु मिलीऐ ॥ सतिगुर की बाणी सति सरूपु है गुरबाणी बणीऐ ॥ सतिगुर की रीसै होरि कचु पिचु बोलदे से कूड़िआर कूड़े झड़ि पड़ीऐ ॥ ओन्हा अंदरि होरु मुखि होरु है बिखु माइआ नो झखि मरदे कड़ीऐ ॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 304) सलोक मः ४ ॥
सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥ जिन अंदरि कपटु विकारु झूठु ओइ आपे सचै वखि कढे जजमाले ॥ सचिआर सिख बहि सतिगुर पासि घालनि कूड़िआर न लभनी कितै थाइ भाले ॥ जिना सतिगुर का आखिआ सुखावै नाही तिना मुह भलेरे फिरहि दयि गाले ॥ जिन अंदरि प्रीति नही हरि केरी से किचरकु वेराईअनि मनमुख बेताले ॥ सतिगुर नो मिलै सु आपणा मनु थाइ रखै ओहु आपि वरतै आपणी वथु नाले ॥ जन नानक इकना गुरु मेलि सुखु देवै इकि आपे वखि कढै ठगवाले ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 305) मः ४ ॥
जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥ तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि प्रभु अंगु करि बैठा पासि ॥ जां करता वलि ता सभु को वलि सभि दरसनु देखि करहि साबासि ॥ साहु पातिसाहु सभु हरि का कीआ सभि जन कउ आइ करहि रहरासि ॥ गुर पूरे की वडी वडिआई हरि वडा सेवि अतुलु सुखु पाइआ ॥ गुरि पूरै दानु दीआ हरि निहचलु नित बखसे चड़ै सवाइआ ॥ कोई निंदकु वडिआई देखि न सकै सो करतै आपि पचाइआ ॥ जनु नानकु गुण बोलै करते के भगता नो सदा रखदा आइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 305) पउड़ी ॥
तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥ तुधु जेवडु मै होरु को दिसि न आवई तूहैं सुघड़ु मेरै मनि भाणा ॥ मोहु कुट्मबु दिसि आवदा सभु चलणहारा आवण जाणा ॥ जो बिनु सचे होरतु चितु लाइदे से कूड़िआर कूड़ा तिन माणा ॥ नानक सचु धिआइ तू बिनु सचे पचि पचि मुए अजाणा ॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 305) सलोक मः ४ ॥
अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कमि न आवै ॥ अध विचि फिरै मनमुखु वेचारा गली किउ सुखु पावै ॥ जिसु अंदरि प्रीति नही सतिगुर की सु कूड़ी आवै कूड़ी जावै ॥ जे क्रिपा करे मेरा हरि प्रभु करता तां सतिगुरु पारब्रहमु नदरी आवै ॥ ता अपिउ पीवै सबदु गुर केरा सभु काड़ा अंदेसा भरमु चुकावै ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती जन नानक अनदिनु हरि गुण गावै ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 305) मः ४ ॥
गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥ उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अम्रित सरि नावै ॥ उपदेसि गुरू हरि हरि जपु जापै सभि किलविख पाप दोख लहि जावै ॥ फिरि चड़ै दिवसु गुरबाणी गावै बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवै ॥ जो सासि गिरासि धिआए मेरा हरि हरि सो गुरसिखु गुरू मनि भावै ॥ जिस नो दइआलु होवै मेरा सुआमी तिसु गुरसिख गुरू उपदेसु सुणावै ॥ जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 306) पउड़ी ॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥ जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥ तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥ जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जमे कोड़्हे ॥ ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥ मनि खोटे दयि विछोड़े ॥११॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 306) सलोक मः ४ ॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥ पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥ पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥ तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥ अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजीं फिरि आणि घरि पाइआ ॥ हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥ धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥ जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥ एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 306) मः ४ ॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥ जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥ जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥ नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 306) पउड़ी ॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥ भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥ प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥ सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥ ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥ ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥ जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥ वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥ जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥ पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 306) सलोक मः ४ ॥
अंतरि हरि गुरू धिआइदा वडी वडिआई ॥ तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥ सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोकाई ॥ निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥ जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥ जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 307) मः ४ ॥
सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥ नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥ नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥ किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥ निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥ ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥ जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥ जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥ जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 307) पउड़ी ॥
तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥ जो तुधु सचु धिआइदे सचु सेवनि सचे तेरा माणु ॥ ओना अंदरि सचु मुख उजले सचु बोलनि सचे तेरा ताणु ॥ से भगत जिनी गुरमुखि सालाहिआ सचु सबदु नीसाणु ॥ सचु जि सचे सेवदे तिन वारी सद कुरबाणु ॥१३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 307) सलोक मः ४ ॥
धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥ जे मेलण नो बहुतेरा लोचीऐ न देई मिलण करतारे ॥ सतसंगति ढोई ना लहनि विचि संगति गुरि वीचारे ॥ कोई जाइ मिलै हुणि ओना नो तिसु मारे जमु जंदारे ॥ गुरि बाबै फिटके से फिटे गुरि अंगदि कीते कूड़िआरे ॥ गुरि तीजी पीड़ी वीचारिआ किआ हथि एना वेचारे ॥ गुरु चउथी पीड़ी टिकिआ तिनि निंदक दुसट सभि तारे ॥ कोई पुतु सिखु सेवा करे सतिगुरू की तिसु कारज सभि सवारे ॥ जो इछै सो फलु पाइसी पुतु धनु लखमी खड़ि मेले हरि निसतारे ॥ सभि निधान सतिगुरू विचि जिसु अंदरि हरि उर धारे ॥ सो पाए पूरा सतिगुरू जिसु लिखिआ लिखतु लिलारे ॥ जनु नानकु मागै धूड़ि तिन जो गुरसिख मित पिआरे ॥१॥


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