Pt 10 - राग गउड़ी - बाणी शब्द, Part 10 - Raag Gauri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 308) मः ४ ॥
जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥ डरीऐ तां जे किछु आप दू कीचै सभु करता आपणी कला वधाए ॥ देखहु भाई एहु अखाड़ा हरि प्रीतम सचे का जिनि आपणै जोरि सभि आणि निवाए ॥ आपणिआ भगता की रख करे हरि सुआमी निंदका दुसटा के मुह काले कराए ॥ सतिगुर की वडिआई नित चड़ै सवाई हरि कीरति भगति नित आपि कराए ॥ अनदिनु नामु जपहु गुरसिखहु हरि करता सतिगुरु घरी वसाए ॥ सतिगुर की बाणी सति सति करि जाणहु गुरसिखहु हरि करता आपि मुहहु कढाए ॥ गुरसिखा के मुह उजले करे हरि पिआरा गुर का जैकारु संसारि सभतु कराए ॥ जनु नानकु हरि का दासु है हरि दासन की हरि पैज रखाए ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 308) पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥ सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे ॥ सचु सेवहि सचु वणंजि लैहि गुण कथह निरारे ॥ सेवक भाइ से जन मिले गुर सबदि सवारे ॥ तू सचा साहिबु अलखु है गुर सबदि लखारे ॥१४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 308) सलोक मः ४ ॥
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥ ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥ जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥ नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥ करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥ गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥ भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥ जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 308) मः ४ ॥
होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥ कोई जाइ मिलै तिन निंदका मुह फिके थुक थुक मुहि पाही ॥ जो सतिगुरि फिटके से सभ जगति फिटके नित भ्मभल भूसे खाही ॥ जिन गुरु गोपिआ आपणा से लैदे ढहा फिराही ॥ तिन की भुख कदे न उतरै नित भुखा भुख कूकाही ॥ ओना दा आखिआ को ना सुणै नित हउले हउलि मराही ॥ सतिगुर की वडिआई वेखि न सकनी ओना अगै पिछै थाउ नाही ॥ जो सतिगुरि मारे तिन जाइ मिलहि रहदी खुहदी सभ पति गवाही ॥ ओइ अगै कुसटी गुर के फिटके जि ओसु मिलै तिसु कुसटु उठाही ॥ हरि तिन का दरसनु ना करहु जो दूजै भाइ चितु लाही ॥ धुरि करतै आपि लिखि पाइआ तिसु नालि किहु चारा नाही ॥ जन नानक नामु अराधि तू तिसु अपड़ि को न सकाही ॥ नावै की वडिआई वडी है नित सवाई चड़ै चड़ाही ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 309) मः ४ ॥
जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥ तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥ तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥ गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥ जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 309) पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥ गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥ नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥ विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥ से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥१५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 309) सलोक मः ४ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥ नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ ॥ कूक पुकार को न सुणे ओहु अउखा होइ होइ रोइआ ॥ ओनि हलतु पलतु सभु गवाइआ लाहा मूलु सभु खोइआ ॥ ओहु तेली संदा बलदु करि नित भलके उठि प्रभि जोइआ ॥ हरि वेखै सुणै नित सभु किछु तिदू किछु गुझा न होइआ ॥ जैसा बीजे सो लुणै जेहा पुरबि किनै बोइआ ॥ जिसु क्रिपा करे प्रभु आपणी तिसु सतिगुर के चरण धोइआ ॥ गुर सतिगुर पिछै तरि गइआ जिउ लोहा काठ संगोइआ ॥ जन नानक नामु धिआइ तू जपि हरि हरि नामि सुखु होइआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 309) मः ४ ॥
वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥ अंतर जोति प्रगासीआ नानक नामि समाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 309) पउड़ी ॥
इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥ गुहज रतन विचि लुकि रहे कोई गुरमुखि सेवकु कढै खोति ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ तां इकु रविआ इको ओति पोति ॥ इकु देखिआ इकु मंनिआ इको सुणिआ स्रवण सरोति ॥ जन नानक नामु सलाहि तू सचु सचे सेवा तेरी होति ॥१६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) सलोक मः ४ ॥
सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥ हरि दरगहि ते मुख उजले तिन कउ सभि देखण जाहि ॥ जिन निरभउ नामु धिआइआ तिन कउ भउ कोई नाहि ॥ हरि उतमु तिनी सरेविआ जिन कउ धुरि लिखिआ आहि ॥ ते हरि दरगहि पैनाईअहि जिन हरि वुठा मन माहि ॥ ओइ आपि तरे सभ कुट्मब सिउ तिन पिछै सभु जगतु छडाहि ॥ जन नानक कउ हरि मेलि जन तिन वेखि वेखि हम जीवाहि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) मः ४ ॥
सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥ से जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ ॥ धनु धंनु पिता धनु धंनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥ धनु धंनु गुरू जिनि नामु अराधिआ आपि तरिआ जिनी डिठा तिना लए छडाइ ॥ हरि सतिगुरु मेलहु दइआ करि जनु नानकु धोवै पाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) पउड़ी ॥
सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सचु सचा सतिगुरु पुरखु है जिनि कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥ जा डिठा पूरा सतिगुरू तां अंदरहु मनु साधारिआ ॥ बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमि वारिआ ॥ गुरमुखि जिता मनमुखि हारिआ ॥१७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) सलोक मः ४ ॥
करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥ सो करे जि सतिगुर भावसी गुरु पूरा घरी वसाइसी ॥ जिन अंदरि नामु निधानु है तिन का भउ सभु गवाइसी ॥ जिन रखण कउ हरि आपि होइ होर केती झखि झखि जाइसी ॥ जन नानक नामु धिआइ तू हरि हलति पलति छोडाइसी ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) मः ४ ॥
गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥ हरि राखहु पैज सतिगुरू की नित चड़ै सवाई ॥ गुर सतिगुर कै मनि पारब्रहमु है पारब्रहमु छडाई ॥ गुर सतिगुर ताणु दीबाणु हरि तिनि सभ आणि निवाई ॥ जिनी डिठा मेरा सतिगुरु भाउ करि तिन के सभि पाप गवाई ॥ हरि दरगह ते मुख उजले बहु सोभा पाई ॥ जनु नानकु मंगै धूड़ि तिन जो गुर के सिख मेरे भाई ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 310) पउड़ी ॥
हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाई ॥ सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥ इहु हरि रसु सेई जाणदे जिउ गूंगै मिठिआई खाई ॥ गुरि पूरै हरि प्रभु सेविआ मनि वजी वाधाई ॥१८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 311) सलोक मः ४ ॥
जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥ हरि जाणहि सेई बिरहु हउ तिन विटहु सद घुमि घोलीआ ॥ हरि मेलहु सजणु पुरखु मेरा सिरु तिन विटहु तल रोलीआ ॥ जो सिख गुर कार कमावहि हउ गुलमु तिना का गोलीआ ॥ हरि रंगि चलूलै जो रते तिन भिनी हरि रंगि चोलीआ ॥ करि किरपा नानक मेलि गुर पहि सिरु वेचिआ मोलीआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 311) मः ४ ॥
अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥ गुरमुखि गुण वेहाझीअहि मलु हउमै कढै धोइ ॥ सचु वणंजहि रंग सिउ सचु सउदा होइ ॥ तोटा मूलि न आवई लाहा हरि भावै सोइ ॥ नानक तिन सचु वणंजिआ जिना धुरि लिखिआ परापति होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 311) पउड़ी ॥
सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥ सचु सेवी सचु मनि वसै सचु सचा हरि रखवाले ॥ सचु सचा जिनी अराधिआ से जाइ रले सच नाले ॥ सचु सचा जिनी न सेविआ से मनमुख मूड़ बेताले ॥ ओह आलु पतालु मुहहु बोलदे जिउ पीतै मदि मतवाले ॥१९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 311) सलोक महला ३ ॥
गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥ भाणै चलै सतिगुरू कै ऐसा सीगारु करेइ ॥ सचा सबदु भतारु है सदा सदा रावेइ ॥ जिउ उबली मजीठै रंगु गहगहा तिउ सचे नो जीउ देइ ॥ रंगि चलूलै अति रती सचे सिउ लगा नेहु ॥ कूड़ु ठगी गुझी ना रहै कूड़ु मुलमा पलेटि धरेहु ॥ कूड़ी करनि वडाईआ कूड़े सिउ लगा नेहु ॥ नानक सचा आपि है आपे नदरि करेइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 311) मः ४ ॥
सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥ ओइ पुरख प्राणी धंनि जन हहि उपदेसु करहि परउपकारिआ ॥ हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ ॥ गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ ॥ तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ ॥ तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ ॥ कोई विछुड़ि जाइ सतिगुरू पासहु तिसु काला मुहु जमि मारिआ ॥ तिसु अगै पिछै ढोई नाही गुरसिखी मनि वीचारिआ ॥ सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥ जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 312) महला ३ ॥
हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥ सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥ नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 312) पउड़ी ॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥ जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥ धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अम्रितु पिजै ॥ सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥ धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥२०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 312) सलोक मः ४ ॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥ जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥ गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥ ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥ ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥ जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥ हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥ जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 312) मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु अगमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥ सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥ सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥ जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥ एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 312) पउड़ी ॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥ से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥ जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥ जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥२१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 312) सलोकु मः ४ ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥ जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥ करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥ तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥ सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥ नानक ते मुख उजले जि नित उठि समालेनि ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) मः ४ ॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥ भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥ धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥ वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥ जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) पउड़ी ॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥ जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥ सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥ सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥ सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥२२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) सलोक मः ४ ॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥ बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) मः ४ ॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥ सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥ जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥ नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) पउड़ी ॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥ सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥ सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥२३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 313) सलोक मः ४ ॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥ विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 313) मः ३ ॥
माइआधारी अति अंना बोला ॥ सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥ गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥ हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥ जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥ नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥ तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥ सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥ सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥२४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 314) सलोकु मः ४ ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥ किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥ मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥ जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 314) मः ३ ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥ सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥ सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥ आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥ जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसमल भंने ॥ उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥ जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥ इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥२५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 314) सलोकु मः ३ ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥ हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥ ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥ सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥ सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥ नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 314) मः ३ ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥ अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥ कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥ किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥ अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥ मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥ ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥ ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥ विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥ कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) सलोक मः ५ ॥
रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥ संत सहाई नानका वरतै सभ जाहरु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) मः ५ ॥
मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥ तिंनै मारे नानका जि करण कारण समरथु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) पउड़ी ५ ॥
लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥ तकहि नारि पराईआ लुकि अंदरि ठाणी ॥ संन्ही देन्हि विखम थाइ मिठा मदु माणी ॥ करमी आपो आपणी आपे पछुताणी ॥ अजराईलु फरेसता तिल पीड़े घाणी ॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) सलोक मः ५ ॥
सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥ दूजा सेवनि नानका से पचि पचि मुए अजाण ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) मः ५ ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥ राम नामु धनु वखरो नानक सदा धिआइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) पउड़ी ५ ॥
नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥ करदा पाप अमितिआ नित विसो चखै ॥ निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥ सचै साहिब मारिआ कउणु तिस नो रखै ॥ नानक तिसु सरणागती जो पुरखु अलखै ॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) सलोक मः ५ ॥
नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥ तिनि प्रभि मारे नानका होइ होइ मुए हरामु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) मः ५ ॥
अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥ आपि भुलाए नानका पचि पचि जोनी पाहि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 315) पउड़ी ५ ॥
तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥ सभि अंदेसे मिटि गए जम का भउ छुटु ॥ काम क्रोध बुरिआईआं संगि साधू तुटु ॥ विणु सचे दूजा सेवदे हुइ मरसनि बुटु ॥ नानक कउ गुरि बखसिआ नामै संगि जुटु ॥२९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 315) सलोक मः ४ ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥ अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥ पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥ जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥ भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥ सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥ महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥ बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥ अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥ हरि अंदरला पापु पंचा नो उघा करि वेखालिआ ॥ धरम राइ जमकंकरा नो आखि छडिआ एसु तपे नो तिथै खड़ि पाइहु जिथै महा महां हतिआरिआ ॥ फिरि एसु तपे दै मुहि कोई लगहु नाही एहु सतिगुरि है फिटकारिआ ॥ हरि कै दरि वरतिआ सु नानकि आखि सुणाइआ ॥ सो बूझै जु दयि सवारिआ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 316) मः ४ ॥
हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥ हरि कीरतनु भगत नित गांवदे हरि नामु सुखदाई ॥ हरि भगतां नो नित नावै दी वडिआई बखसीअनु नित चड़ै सवाई ॥ हरि भगतां नो थिरु घरी बहालिअनु अपणी पैज रखाई ॥ निंदकां पासहु हरि लेखा मंगसी बहु देइ सजाई ॥ जेहा निंदक अपणै जीइ कमावदे तेहो फलु पाई ॥ अंदरि कमाणा सरपर उघड़ै भावै कोई बहि धरती विचि कमाई ॥ जन नानकु देखि विगसिआ हरि की वडिआई ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 316) पउड़ी मः ५ ॥
भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ ॥ गुमानु करहि मूड़ गुमानीआ विसु खाधी मरीऐ ॥ आइ लगे नी दिह थोड़ड़े जिउ पका खेतु लुणीऐ ॥ जेहे करम कमावदे तेवेहो भणीऐ ॥ जन नानक का खसमु वडा है सभना दा धणीऐ ॥३०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 316) सलोक मः ४ ॥
मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥ झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करहि वीचारु ॥ सुधि मति करतै सभ हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥ दितै कितै न संतोखीअहि अंतरि तिसना बहु अगिआनु अंध्यारु ॥ नानक मनमुखा नालो तुटी भली जिन माइआ मोह पिआरु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 316) मः ४ ॥
जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन्हा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥ ओहु आवै जाइ भवाईऐ सुपनै सुखु न कोइ ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु उचरै कूड़ि लगिआ कूड़ु होइ ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है दुखि बिनसै दुखु रोइ ॥ नानक धातु लिवै जोड़ु न आवई जे लोचै सभु कोइ ॥ जिन कउ पोतै पुंनु पइआ तिना गुर सबदी सुखु होइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 316) पउड़ी मः ५ ॥
नानक वीचारहि संत मुनि जनां चारि वेद कहंदे ॥ भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥ परगट पाहारै जापदे सभि लोक सुणंदे ॥ सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥ ओइ लोचनि ओना गुणा नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥ ओइ वेचारे किआ करहि जां भाग धुरि मंदे ॥ जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥ वैरु करनि निरवैर नालि धरमि निआइ पचंदे ॥ जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥ पेडु मुंढाहू कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 317) सलोक मः ५ ॥
गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥ प्रभु सदा समालहि मित्र तू दुखु सबाइआ लथु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 317) मः ५ ॥
खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥ नानकु मांगै नामु हरि करि किरपा संजोगु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 317) पउड़ी ॥
जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥ चबे तता लोह सारु विचि संघै पलते ॥ घति गलावां चालिआ तिनि दूति अमल ते ॥ काई आस न पुंनीआ नित पर मलु हिरते ॥ कीआ न जाणै अकिरतघण विचि जोनी फिरते ॥ सभे धिरां निखुटीअसु हिरि लईअसु धर ते ॥ विझण कलह न देवदा तां लइआ करते ॥ जो जो करते अहमेउ झड़ि धरती पड़ते ॥३२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 317) सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥ हरि गुण गावै हिरदै हारु परोइ ॥ पवितु पावनु परम बीचारी ॥ जि ओसु मिलै तिसु पारि उतारी ॥ अंतरि हरि नामु बासना समाणी ॥ हरि दरि सोभा महा उतम बाणी ॥ जि पुरखु सुणै सु होइ निहालु ॥ नानक सतिगुर मिलिऐ पाइआ नामु धनु मालु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 317) मः ४ ॥
सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥ गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥ सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥ विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥ गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥ जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥ ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥ जि विणु सतिगुर के मनु मंने कमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 317) पउड़ी ॥
तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥ जिसु तूं मेलहि सो तुधु मिलै तूं आपे बखसि लैहि लेखा छडे ॥ जिस नो तूं आपि मिलाइदा सो सतिगुरु सेवे मनु गड गडे ॥ तूं सचा साहिबु सचु तू सभु जीउ पिंडु चमु तेरा हडे ॥ जिउ भावै तिउ रखु तूं सचिआ नानक मनि आस तेरी वड वडे ॥३३॥१॥ सुधु ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) गउड़ी की वार महला ५ राइ कमालदी मोजदी की वार की धुनि उपरि गावणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ५ ॥
हरि हरि नामु जो जनु जपै सो आइआ परवाणु ॥ तिसु जन कै बलिहारणै जिनि भजिआ प्रभु निरबाणु ॥ जनम मरन दुखु कटिआ हरि भेटिआ पुरखु सुजाणु ॥ संत संगि सागरु तरे जन नानक सचा ताणु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) मः ५ ॥
भलके उठि पराहुणा मेरै घरि आवउ ॥ पाउ पखाला तिस के मनि तनि नित भावउ ॥ नामु सुणे नामु संग्रहै नामे लिव लावउ ॥ ग्रिहु धनु सभु पवित्रु होइ हरि के गुण गावउ ॥ हरि नाम वापारी नानका वडभागी पावउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) पउड़ी ॥
जो तुधु भावै सो भला सचु तेरा भाणा ॥ तू सभ महि एकु वरतदा सभ माहि समाणा ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ जीअ अंदरि जाणा ॥ साधसंगि मिलि पाईऐ मनि सचे भाणा ॥ नानक प्रभ सरणागती सद सद कुरबाणा ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) सलोक मः ५ ॥
चेता ई तां चेति साहिबु सचा सो धणी ॥ नानक सतिगुरु सेवि चड़ि बोहिथि भउजलु पारि पउ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) मः ५ ॥
वाऊ संदे कपड़े पहिरहि गरबि गवार ॥ नानक नालि न चलनी जलि बलि होए छारु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) पउड़ी ॥
सेई उबरे जगै विचि जो सचै रखे ॥ मुहि डिठै तिन कै जीवीऐ हरि अम्रितु चखे ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु संगि साधा भखे ॥ करि किरपा प्रभि आपणी हरि आपि परखे ॥ नानक चलत न जापनी को सकै न लखे ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) सलोक मः ५ ॥
नानक सोई दिनसु सुहावड़ा जितु प्रभु आवै चिति ॥ जितु दिनि विसरै पारब्रहमु फिटु भलेरी रुति ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) मः ५ ॥
नानक मित्राई तिसु सिउ सभ किछु जिस कै हाथि ॥ कुमित्रा सेई कांढीअहि इक विख न चलहि साथि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) पउड़ी ॥
अम्रितु नामु निधानु है मिलि पीवहु भाई ॥ जिसु सिमरत सुखु पाईऐ सभ तिखा बुझाई ॥ करि सेवा पारब्रहम गुर भुख रहै न काई ॥ सगल मनोरथ पुंनिआ अमरा पदु पाई ॥ तुधु जेवडु तूहै पारब्रहम नानक सरणाई ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 318) सलोक मः ५ ॥
डिठड़ो हभ ठाइ ऊण न काई जाइ ॥ नानक लधा तिन सुआउ जिना सतिगुरु भेटिआ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 319) मः ५ ॥
दामनी चमतकार तिउ वरतारा जग खे ॥ वथु सुहावी साइ नानक नाउ जपंदो तिसु धणी ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 319) पउड़ी ॥
सिम्रिति सासत्र सोधि सभि किनै कीम न जाणी ॥ जो जनु भेटै साधसंगि सो हरि रंगु माणी ॥ सचु नामु करता पुरखु एह रतना खाणी ॥ मसतकि होवै लिखिआ हरि सिमरि पराणी ॥ तोसा दिचै सचु नामु नानक मिहमाणी ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 319) सलोक मः ५ ॥
अंतरि चिंता नैणी सुखी मूलि न उतरै भुख ॥ नानक सचे नाम बिनु किसै न लथो दुखु ॥१॥


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