Pt 3 - राग धनासरी - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Dhanasri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 684) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनासरी महला ९ ॥
काहे रे बन खोजन जाई ॥ सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥१॥ रहाउ ॥

पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई ॥ तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहु भाई ॥१॥

बाहरि भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआनु बताई ॥ जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 684) धनासरी महला ९ ॥
साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥ राम नाम का सिमरनु छोडिआ माइआ हाथि बिकाना ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता भाई सुत बनिता ता कै रसि लपटाना ॥ जोबनु धनु प्रभता कै मद मै अहिनिसि रहै दिवाना ॥१॥

दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ मनु न लगाना ॥ जन नानक कोटन मै किनहू गुरमुखि होइ पछाना ॥२॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 685) धनासरी महला ९ ॥
तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥ लोभ मोह माइआ ममता फुनि जिह घटि माहि पछानउ ॥१॥ रहाउ ॥

पर निंदा उसतति नह जा कै कंचन लोह समानो ॥ हरख सोग ते रहै अतीता जोगी ताहि बखानो ॥१॥

चंचल मनु दह दिसि कउ धावत अचल जाहि ठहरानो ॥ कहु नानक इह बिधि को जो नरु मुकति ताहि तुम मानो ॥२॥३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 685) धनासरी महला ९ ॥
अब मै कउनु उपाउ करउ ॥ जिह बिधि मन को संसा चूकै भउ निधि पारि परउ ॥१॥ रहाउ ॥

जनमु पाइ कछु भलो न कीनो ता ते अधिक डरउ ॥ मन बच क्रम हरि गुन नही गाए यह जीअ सोच धरउ ॥१॥

गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ ॥ कहु नानक प्रभ बिरदु पछानउ तब हउ पतित तरउ ॥२॥४॥९॥९॥१३॥५८॥४॥९३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 685) धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥ अम्रितु संत चुगहि नही दूरे ॥ हरि रसु चोग चुगहि प्रभ भावै ॥ सरवर महि हंसु प्रानपति पावै ॥१॥

किआ बगु बपुड़ा छपड़ी नाइ ॥ कीचड़ि डूबै मैलु न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

रखि रखि चरन धरे वीचारी ॥ दुबिधा छोडि भए निरंकारी ॥ मुकति पदारथु हरि रस चाखे ॥ आवण जाण रहे गुरि राखे ॥२॥

सरवर हंसा छोडि न जाइ ॥ प्रेम भगति करि सहजि समाइ ॥ सरवर महि हंसु हंस महि सागरु ॥ अकथ कथा गुर बचनी आदरु ॥३॥

सुंन मंडल इकु जोगी बैसे ॥ नारि न पुरखु कहहु कोऊ कैसे ॥ त्रिभवण जोति रहे लिव लाई ॥ सुरि नर नाथ सचे सरणाई ॥४॥

आनंद मूलु अनाथ अधारी ॥ गुरमुखि भगति सहजि बीचारी ॥ भगति वछल भै काटणहारे ॥ हउमै मारि मिले पगु धारे ॥५॥

अनिक जतन करि कालु संताए ॥ मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥ जनमु पदारथु दुबिधा खोवै ॥ आपु न चीनसि भ्रमि भ्रमि रोवै ॥६॥

कहतउ पड़तउ सुणतउ एक ॥ धीरज धरमु धरणीधर टेक ॥ जतु सतु संजमु रिदै समाए ॥ चउथे पद कउ जे मनु पतीआए ॥७॥

साचे निरमल मैलु न लागै ॥ गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥ सूरति मूरति आदि अनूपु ॥ नानकु जाचै साचु सरूपु ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 686) धनासरी महला १ ॥
सहजि मिलै मिलिआ परवाणु ॥ ना तिसु मरणु न आवणु जाणु ॥ ठाकुर महि दासु दास महि सोइ ॥ जह देखा तह अवरु न कोइ ॥१॥

गुरमुखि भगति सहज घरु पाईऐ ॥ बिनु गुर भेटे मरि आईऐ जाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

सो गुरु करउ जि साचु द्रिड़ावै ॥ अकथु कथावै सबदि मिलावै ॥ हरि के लोग अवर नही कारा ॥ साचउ ठाकुरु साचु पिआरा ॥२॥

तन महि मनूआ मन महि साचा ॥ सो साचा मिलि साचे राचा ॥ सेवकु प्रभ कै लागै पाइ ॥ सतिगुरु पूरा मिलै मिलाइ ॥३॥

आपि दिखावै आपे देखै ॥ हठि न पतीजै ना बहु भेखै ॥ घड़ि भाडे जिनि अम्रितु पाइआ ॥ प्रेम भगति प्रभि मनु पतीआइआ ॥४॥

पड़ि पड़ि भूलहि चोटा खाहि ॥ बहुतु सिआणप आवहि जाहि ॥ नामु जपै भउ भोजनु खाइ ॥ गुरमुखि सेवक रहे समाइ ॥५॥

पूजि सिला तीरथ बन वासा ॥ भरमत डोलत भए उदासा ॥ मनि मैलै सूचा किउ होइ ॥ साचि मिलै पावै पति सोइ ॥६॥

आचारा वीचारु सरीरि ॥ आदि जुगादि सहजि मनु धीरि ॥ पल पंकज महि कोटि उधारे ॥ करि किरपा गुरु मेलि पिआरे ॥७॥

किसु आगै प्रभ तुधु सालाही ॥ तुधु बिनु दूजा मै को नाही ॥ जिउ तुधु भावै तिउ राखु रजाइ ॥ नानक सहजि भाइ गुण गाइ ॥८॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 686) धनासरी महला ५ घरु ६ असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो जो जूनी आइओ तिह तिह उरझाइओ माणस जनमु संजोगि पाइआ ॥ ताकी है ओट साध राखहु दे करि हाथ करि किरपा मेलहु हरि राइआ ॥१॥

अनिक जनम भ्रमि थिति नही पाई ॥ करउ सेवा गुर लागउ चरन गोविंद जी का मारगु देहु जी बताई ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक उपाव करउ माइआ कउ बचिति धरउ मेरी मेरी करत सद ही विहावै ॥ कोई ऐसो रे भेटै संतु मेरी लाहै सगल चिंत ठाकुर सिउ मेरा रंगु लावै ॥२॥

पड़े रे सगल बेद नह चूकै मन भेद इकु खिनु न धीरहि मेरे घर के पंचा ॥ कोई ऐसो रे भगतु जु माइआ ते रहतु इकु अम्रित नामु मेरै रिदै सिंचा ॥३॥

जेते रे तीरथ नाए अह्मबुधि मैलु लाए घर को ठाकुरु इकु तिलु न मानै ॥ कदि पावउ साधसंगु हरि हरि सदा आनंदु गिआन अंजनि मेरा मनु इसनानै ॥४॥

सगल अस्रम कीने मनूआ नह पतीने बिबेकहीन देही धोए ॥ कोई पाईऐ रे पुरखु बिधाता पारब्रहम कै रंगि राता मेरे मन की दुरमति मलु खोए ॥५॥

करम धरम जुगता निमख न हेतु करता गरबि गरबि पड़ै कही न लेखै ॥ जिसु भेटीऐ सफल मूरति करै सदा कीरति गुर परसादि कोऊ नेत्रहु पेखै ॥६॥

मनहठि जो कमावै तिलु न लेखै पावै बगुल जिउ धिआनु लावै माइआ रे धारी ॥ कोई ऐसो रे सुखह दाई प्रभ की कथा सुनाई तिसु भेटे गति होइ हमारी ॥७॥

सुप्रसंन गोपाल राइ काटै रे बंधन माइ गुर कै सबदि मेरा मनु राता ॥ सदा सदा आनंदु भेटिओ निरभै गोबिंदु सुख नानक लाधे हरि चरन पराता ॥८॥

सफल सफल भई सफल जात्रा ॥ आवण जाण रहे मिले साधा ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 687) धनासरी महला १ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तीरथि नावण जाउ तीरथु नामु है ॥ तीरथु सबद बीचारु अंतरि गिआनु है ॥ गुर गिआनु साचा थानु तीरथु दस पुरब सदा दसाहरा ॥ हउ नामु हरि का सदा जाचउ देहु प्रभ धरणीधरा ॥ संसारु रोगी नामु दारू मैलु लागै सच बिना ॥ गुर वाकु निरमलु सदा चानणु नित साचु तीरथु मजना ॥१॥

साचि न लागै मैलु किआ मलु धोईऐ ॥ गुणहि हारु परोइ किस कउ रोईऐ ॥ वीचारि मारै तरै तारै उलटि जोनि न आवए ॥ आपि पारसु परम धिआनी साचु साचे भावए ॥ आनंदु अनदिनु हरखु साचा दूख किलविख परहरे ॥ सचु नामु पाइआ गुरि दिखाइआ मैलु नाही सच मने ॥२॥

संगति मीत मिलापु पूरा नावणो ॥ गावै गावणहारु सबदि सुहावणो ॥ सालाहि साचे मंनि सतिगुरु पुंन दान दइआ मते ॥ पिर संगि भावै सहजि नावै बेणी त संगमु सत सते ॥ आराधि एकंकारु साचा नित देइ चड़ै सवाइआ ॥ गति संगि मीता संतसंगति करि नदरि मेलि मिलाइआ ॥३॥

कहणु कहै सभु कोइ केवडु आखीऐ ॥ हउ मूरखु नीचु अजाणु समझा साखीऐ ॥ सचु गुर की साखी अम्रित भाखी तितु मनु मानिआ मेरा ॥ कूचु करहि आवहि बिखु लादे सबदि सचै गुरु मेरा ॥ आखणि तोटि न भगति भंडारी भरिपुरि रहिआ सोई ॥ नानक साचु कहै बेनंती मनु मांजै सचु सोई ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 688) धनासरी महला १ ॥
जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥ साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥ गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥ परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥ आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥ नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥१॥

तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥ गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥ आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥ नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥२॥

तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥ एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥ दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥ नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥ हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥ नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥३॥

भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥ बोलहि अम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥ रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥ पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥ अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥ नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥४॥

भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥ सतिगुर पूछउ जाइ नामु धिआइसा जीउ ॥ सचु नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥ दीना नाथु दइआलु निरंजनु अनदिनु नामु वखाणा ॥ करणी कार धुरहु फुरमाई आपि मुआ मनु मारी ॥ नानक नामु महा रसु मीठा त्रिसना नामि निवारी ॥५॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 689) धनासरी छंत महला १ ॥
पिर संगि मूठड़ीए खबरि न पाईआ जीउ ॥ मसतकि लिखिअड़ा लेखु पुरबि कमाइआ जीउ ॥ लेखु न मिटई पुरबि कमाइआ किआ जाणा किआ होसी ॥ गुणी अचारि नही रंगि राती अवगुण बहि बहि रोसी ॥ धनु जोबनु आक की छाइआ बिरधि भए दिन पुंनिआ ॥ नानक नाम बिना दोहागणि छूटी झूठि विछुंनिआ ॥१॥

बूडी घरु घालिओ गुर कै भाइ चलो ॥ साचा नामु धिआइ पावहि सुखि महलो ॥ हरि नामु धिआए ता सुखु पाए पेईअड़ै दिन चारे ॥ निज घरि जाइ बहै सचु पाए अनदिनु नालि पिआरे ॥ विणु भगती घरि वासु न होवी सुणिअहु लोक सबाए ॥ नानक सरसी ता पिरु पाए राती साचै नाए ॥२॥

पिरु धन भावै ता पिर भावै नारी जीउ ॥ रंगि प्रीतम राती गुर कै सबदि वीचारी जीउ ॥ गुर सबदि वीचारी नाह पिआरी निवि निवि भगति करेई ॥ माइआ मोहु जलाए प्रीतमु रस महि रंगु करेई ॥ प्रभ साचे सेती रंगि रंगेती लाल भई मनु मारी ॥ नानक साचि वसी सोहागणि पिर सिउ प्रीति पिआरी ॥३॥

पिर घरि सोहै नारि जे पिर भावए जीउ ॥ झूठे वैण चवे कामि न आवए जीउ ॥ झूठु अलावै कामि न आवै ना पिरु देखै नैणी ॥ अवगुणिआरी कंति विसारी छूटी विधण रैणी ॥ गुर सबदु न मानै फाही फाथी सा धन महलु न पाए ॥ नानक आपे आपु पछाणै गुरमुखि सहजि समाए ॥४॥

धन सोहागणि नारि जिनि पिरु जाणिआ जीउ ॥ नाम बिना कूड़िआरि कूड़ु कमाणिआ जीउ ॥ हरि भगति सुहावी साचे भावी भाइ भगति प्रभ राती ॥ पिरु रलीआला जोबनि बाला तिसु रावे रंगि राती ॥ गुर सबदि विगासी सहु रावासी फलु पाइआ गुणकारी ॥ नानक साचु मिलै वडिआई पिर घरि सोहै नारी ॥५॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 690) धनासरी छंत महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥ सतिगुरु मिलै सुभाइ सहजि गुण गाईऐ जीउ ॥ गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥ अहंकारु हउमै तजै माइआ सहजि नामि समावए ॥ आपि करता करे सोई आपि देइ त पाईऐ ॥ हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥१॥

अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै जीउ ॥ हउ तिसु सेवी दिनु राति मै कदे न वीसरै जीउ ॥ कदे न विसारी अनदिनु सम्हारी जा नामु लई ता जीवा ॥ स्रवणी सुणी त इहु मनु त्रिपतै गुरमुखि अम्रितु पीवा ॥ नदरि करे ता सतिगुरु मेले अनदिनु बिबेक बुधि बिचरै ॥ अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै ॥२॥

सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥ अनदिनु रहै लिव लाइ त सहजि समावए जीउ ॥ सहजि समावै ता हरि मनि भावै सदा अतीतु बैरागी ॥ हलति पलति सोभा जग अंतरि राम नामि लिव लागी ॥ हरख सोग दुहा ते मुकता जो प्रभु करे सु भावए ॥ सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥३॥

दूजै भाइ दुखु होइ मनमुख जमि जोहिआ जीउ ॥ हाइ हाइ करे दिनु राति माइआ दुखि मोहिआ जीउ ॥ माइआ दुखि मोहिआ हउमै रोहिआ मेरी मेरी करत विहावए ॥ जो प्रभु देइ तिसु चेतै नाही अंति गइआ पछुतावए ॥ बिनु नावै को साथि न चालै पुत्र कलत्र माइआ धोहिआ ॥ दूजै भाइ दुखु होइ मनमुखि जमि जोहिआ जीउ ॥४॥

करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पाइआ जीउ ॥ सदा रहै कर जोड़ि प्रभु मनि भाइआ जीउ ॥ प्रभु मनि भावै ता हुकमि समावै हुकमु मंनि सुखु पाइआ ॥ अनदिनु जपत रहै दिनु राती सहजे नामु धिआइआ ॥ नामो नामु मिली वडिआई नानक नामु मनि भावए ॥ करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पावए जीउ ॥५॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 691) धनासरी महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर दीन दइआल जिसु संगि हरि गावीऐ जीउ ॥ अम्रितु हरि का नामु साधसंगि रावीऐ जीउ ॥ भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥ धुरि करमु लिखिआ साचु सिखिआ कटी जम की फासए ॥ भै भरम नाठे छुटी गाठे जम पंथि मूलि न आवीऐ ॥ बिनवंति नानक धारि किरपा सदा हरि गुण गावीऐ ॥१॥

निधरिआ धर एकु नामु निरंजनो जीउ ॥ तू दाता दातारु सरब दुख भंजनो जीउ ॥ दुख हरत करता सुखह सुआमी सरणि साधू आइआ ॥ संसारु सागरु महा बिखड़ा पल एक माहि तराइआ ॥ पूरि रहिआ सरब थाई गुर गिआनु नेत्री अंजनो ॥ बिनवंति नानक सदा सिमरी सरब दुख भै भंजनो ॥२॥

आपि लीए लड़ि लाइ किरपा धारीआ जीउ ॥ मोहि निरगुणु नीचु अनाथु प्रभ अगम अपारीआ जीउ ॥ दइआल सदा क्रिपाल सुआमी नीच थापणहारिआ ॥ जीअ जंत सभि वसि तेरै सगल तेरी सारिआ ॥ आपि करता आपि भुगता आपि सगल बीचारीआ ॥ बिनवंत नानक गुण गाइ जीवा हरि जपु जपउ बनवारीआ ॥३॥

तेरा दरसु अपारु नामु अमोलई जीउ ॥ निति जपहि तेरे दास पुरख अतोलई जीउ ॥ संत रसन वूठा आपि तूठा हरि रसहि सेई मातिआ ॥ गुर चरन लागे महा भागे सदा अनदिनु जागिआ ॥ सद सदा सिम्रतब्य सुआमी सासि सासि गुण बोलई ॥ बिनवंति नानक धूरि साधू नामु प्रभू अमोलई ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 691) रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥१॥

संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥१॥ रहाउ ॥

हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥ सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥२॥

चारि बेद अरु सिम्रिति पुरानां ॥ कमलापति कवला नही जानां ॥३॥

कहि कबीर सो भरमै नाही ॥ पग लगि राम रहै सरनांही ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 692) दिन ते पहर पहर ते घरीआं आव घटै तनु छीजै ॥ कालु अहेरी फिरै बधिक जिउ कहहु कवन बिधि कीजै ॥१॥

सो दिनु आवन लागा ॥ मात पिता भाई सुत बनिता कहहु कोऊ है का का ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु जोति काइआ महि बरतै आपा पसू न बूझै ॥ लालच करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥२॥

कहत कबीर सुनहु रे प्रानी छोडहु मन के भरमा ॥ केवल नामु जपहु रे प्रानी परहु एक की सरनां ॥३॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 692) जो जनु भाउ भगति कछु जानै ता कउ अचरजु काहो ॥ जिउ जलु जल महि पैसि न निकसै तिउ ढुरि मिलिओ जुलाहो ॥१॥

हरि के लोगा मै तउ मति का भोरा ॥ जउ तनु कासी तजहि कबीरा रमईऐ कहा निहोरा ॥१॥ रहाउ ॥

कहतु कबीरु सुनहु रे लोई भरमि न भूलहु कोई ॥ किआ कासी किआ ऊखरु मगहरु रामु रिदै जउ होई ॥२॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 692) इंद्र लोक सिव लोकहि जैबो ॥ ओछे तप करि बाहुरि ऐबो ॥१॥

किआ मांगउ किछु थिरु नाही ॥ राम नाम रखु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

सोभा राज बिभै बडिआई ॥ अंति न काहू संग सहाई ॥२॥

पुत्र कलत्र लछमी माइआ ॥ इन ते कहु कवनै सुखु पाइआ ॥३॥

कहत कबीर अवर नही कामा ॥ हमरै मन धन राम को नामा ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 692) राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥ राम नाम सिमरन बिनु बूडते अधिकाई ॥१॥ रहाउ ॥

बनिता सुत देह ग्रेह स्मपति सुखदाई ॥ इन्ह मै कछु नाहि तेरो काल अवध आई ॥१॥

अजामल गज गनिका पतित करम कीने ॥ तेऊ उतरि पारि परे राम नाम लीने ॥२॥

सूकर कूकर जोनि भ्रमे तऊ लाज न आई ॥ राम नाम छाडि अम्रित काहे बिखु खाई ॥३॥

तजि भरम करम बिधि निखेध राम नामु लेही ॥ गुर प्रसादि जन कबीर रामु करि सनेही ॥४॥५॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 692) धनासरी बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गहरी करि कै नीव खुदाई ऊपरि मंडप छाए ॥ मारकंडे ते को अधिकाई जिनि त्रिण धरि मूंड बलाए ॥१॥

हमरो करता रामु सनेही ॥ काहे रे नर गरबु करत हहु बिनसि जाइ झूठी देही ॥१॥ रहाउ ॥

मेरी मेरी कैरउ करते दुरजोधन से भाई ॥ बारह जोजन छत्रु चलै था देही गिरझन खाई ॥२॥

सरब सोइन की लंका होती रावन से अधिकाई ॥ कहा भइओ दरि बांधे हाथी खिन महि भई पराई ॥३॥

दुरबासा सिउ करत ठगउरी जादव ए फल पाए ॥ क्रिपा करी जन अपुने ऊपर नामदेउ हरि गुन गाए ॥४॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 693) दस बैरागनि मोहि बसि कीन्ही पंचहु का मिट नावउ ॥ सतरि दोइ भरे अम्रित सरि बिखु कउ मारि कढावउ ॥१॥

पाछै बहुरि न आवनु पावउ ॥ अम्रित बाणी घट ते उचरउ आतम कउ समझावउ ॥१॥ रहाउ ॥

बजर कुठारु मोहि है छीनां करि मिंनति लगि पावउ ॥ संतन के हम उलटे सेवक भगतन ते डरपावउ ॥२॥

इह संसार ते तब ही छूटउ जउ माइआ नह लपटावउ ॥ माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसनु पावउ ॥३॥

इतु करि भगति करहि जो जन तिन भउ सगल चुकाईऐ ॥ कहत नामदेउ बाहरि किआ भरमहु इह संजम हरि पाईऐ ॥४॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 693) मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥ जिउ कुरंक निसि नादु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥१॥

तेरा नामु रूड़ो रूपु रूड़ो अति रंग रूड़ो मेरो रामईआ ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ धरणी कउ इंद्रु बालहा कुसम बासु जैसे भवरला ॥ जिउ कोकिल कउ अ्मबु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥२॥

चकवी कउ जैसे सूरु बालहा मान सरोवर हंसुला ॥ जिउ तरुणी कउ कंतु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥३॥

बारिक कउ जैसे खीरु बालहा चात्रिक मुख जैसे जलधरा ॥ मछुली कउ जैसे नीरु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ ॥४॥

साधिक सिध सगल मुनि चाहहि बिरले काहू डीठुला ॥ सगल भवण तेरो नामु बालहा तिउ नामे मनि बीठुला ॥५॥३॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 693) पहिल पुरीए पुंडरक वना ॥ ता चे हंसा सगले जनां ॥ क्रिस्ना ते जानऊ हरि हरि नाचंती नाचना ॥१॥

पहिल पुरसाबिरा ॥ अथोन पुरसादमरा ॥ असगा अस उसगा ॥ हरि का बागरा नाचै पिंधी महि सागरा ॥१॥ रहाउ ॥

नाचंती गोपी जंना ॥ नईआ ते बैरे कंना ॥ तरकु न चा ॥ भ्रमीआ चा ॥ केसवा बचउनी अईए मईए एक आन जीउ ॥२॥

पिंधी उभकले संसारा ॥ भ्रमि भ्रमि आए तुम चे दुआरा ॥ तू कुनु रे ॥ मै जी ॥ नामा ॥ हो जी ॥ आला ते निवारणा जम कारणा ॥३॥४॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 694) पतित पावन माधउ बिरदु तेरा ॥ धंनि ते वै मुनि जन जिन धिआइओ हरि प्रभु मेरा ॥१॥

मेरै माथै लागी ले धूरि गोबिंद चरनन की ॥ सुरि नर मुनि जन तिनहू ते दूरि ॥१॥ रहाउ ॥

दीन का दइआलु माधौ गरब परहारी ॥ चरन सरन नामा बलि तिहारी ॥२॥५॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 694) धनासरी भगत रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै ॥ बचनी तोर मोर मनु मानै जन कउ पूरनु दीजै ॥१॥

हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥

बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 694) चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥ मनु सु मधुकरु करउ चरन हिरदे धरउ रसन अम्रित राम नाम भाखउ ॥१॥

मेरी प्रीति गोबिंद सिउ जिनि घटै ॥ मै तउ मोलि महगी लई जीअ सटै ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति बिना भाउ नही ऊपजै भाव बिनु भगति नही होइ तेरी ॥ कहै रविदासु इक बेनती हरि सिउ पैज राखहु राजा राम मेरी ॥२॥२॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 694) नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥ हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ॥१॥ रहाउ ॥

नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥ नामु तेरा अ्मभुला नामु तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥१॥

नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥ नाम तेरे की जोति लगाई भइओ उजिआरो भवन सगलारे ॥२॥

नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जूठारे ॥ तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोलारे ॥३॥

दस अठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे ॥ कहै रविदासु नामु तेरो आरती सति नामु है हरि भोग तुहारे ॥४॥३॥

(भक्त त्रिलोचन जी -- SGGS 695) धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥ दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥१॥ रहाउ ॥

संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥ कुल जन मधे मिल्यिो सारग पान रे ॥ करम करि कलंकु मफीटसि री ॥१॥

बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥ करम करि अरुण पिंगुला री ॥२॥

अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥ करम करि कपालु मफीटसि री ॥३॥

अम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥ करम करि खारु मफीटसि री ॥४॥

दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥ करम करि कछउटी मफीटसि री ॥५॥

पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥ बदति त्रिलोचन राम जी ॥६॥१॥

(भक्त सैणु जी -- SGGS 695) स्री सैणु ॥
धूप दीप घ्रित साजि आरती ॥ वारने जाउ कमला पती ॥१॥

मंगला हरि मंगला ॥ नित मंगलु राजा राम राइ को ॥१॥ रहाउ ॥

ऊतमु दीअरा निरमल बाती ॥ तुहीं निरंजनु कमला पाती ॥२॥

रामा भगति रामानंदु जानै ॥ पूरन परमानंदु बखानै ॥३॥

मदन मूरति भै तारि गोबिंदे ॥ सैनु भणै भजु परमानंदे ॥४॥२॥

(भक्त पीपा जी -- SGGS 695) पीपा ॥
कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥ काइअउ धूप दीप नईबेदा काइअउ पूजउ पाती ॥१॥

काइआ बहु खंड खोजते नव निधि पाई ॥ ना कछु आइबो ना कछु जाइबो राम की दुहाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो ब्रहमंडे सोई पिंडे जो खोजै सो पावै ॥ पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै ॥२॥३॥

(भक्त धंना जी -- SGGS 695) धंना ॥
गोपाल तेरा आरता ॥ जो जन तुमरी भगति करंते तिन के काज सवारता ॥१॥ रहाउ ॥

दालि सीधा मागउ घीउ ॥ हमरा खुसी करै नित जीउ ॥ पन्हीआ छादनु नीका ॥ अनाजु मगउ सत सी का ॥१॥

गऊ भैस मगउ लावेरी ॥ इक ताजनि तुरी चंगेरी ॥ घर की गीहनि चंगी ॥ जनु धंना लेवै मंगी ॥२॥४॥


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