राग देवगंधारी - बाणी शब्द, Raag Devgandhari - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू रामदास जी -- SGGS 527) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला ४ घरु १ ॥
सेवक जन बने ठाकुर लिव लागे ॥ जो तुमरा जसु कहते गुरमति तिन मुख भाग सभागे ॥१॥ रहाउ ॥

टूटे माइआ के बंधन फाहे हरि राम नाम लिव लागे ॥ हमरा मनु मोहिओ गुर मोहनि हम बिसम भई मुखि लागे ॥१॥

सगली रैणि सोई अंधिआरी गुर किंचत किरपा जागे ॥ जन नानक के प्रभ सुंदर सुआमी मोहि तुम सरि अवरु न लागे ॥२॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 527) देवगंधारी ॥
मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली ॥ हरि के संत बतावहु मारगु हम पीछै लागि चली ॥१॥ रहाउ ॥

प्रिअ के बचन सुखाने हीअरै इह चाल बनी है भली ॥ लटुरी मधुरी ठाकुर भाई ओह सुंदरि हरि ढुलि मिली ॥१॥

एको प्रिउ सखीआ सभ प्रिअ की जो भावै पिर सा भली ॥ नानकु गरीबु किआ करै बिचारा हरि भावै तितु राहि चली ॥२॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 527) देवगंधारी ॥
मेरे मन मुखि हरि हरि हरि बोलीऐ ॥ गुरमुखि रंगि चलूलै राती हरि प्रेम भीनी चोलीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हउ फिरउ दिवानी आवल बावल तिसु कारणि हरि ढोलीऐ ॥ कोई मेलै मेरा प्रीतमु पिआरा हम तिस की गुल गोलीऐ ॥१॥

सतिगुरु पुरखु मनावहु अपुना हरि अम्रितु पी झोलीऐ ॥ गुर प्रसादि जन नानक पाइआ हरि लाधा देह टोलीऐ ॥२॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 527) देवगंधारी ॥
अब हम चली ठाकुर पहि हारि ॥ जब हम सरणि प्रभू की आई राखु प्रभू भावै मारि ॥१॥ रहाउ ॥

लोकन की चतुराई उपमा ते बैसंतरि जारि ॥ कोई भला कहउ भावै बुरा कहउ हम तनु दीओ है ढारि ॥१॥

जो आवत सरणि ठाकुर प्रभु तुमरी तिसु राखहु किरपा धारि ॥ जन नानक सरणि तुमारी हरि जीउ राखहु लाज मुरारि ॥२॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 528) देवगंधारी ॥
हरि गुण गावै हउ तिसु बलिहारी ॥ देखि देखि जीवा साध गुर दरसनु जिसु हिरदै नामु मुरारी ॥१॥ रहाउ ॥

तुम पवित्र पावन पुरख प्रभ सुआमी हम किउ करि मिलह जूठारी ॥ हमरै जीइ होरु मुखि होरु होत है हम करमहीण कूड़िआरी ॥१॥

हमरी मुद्र नामु हरि सुआमी रिद अंतरि दुसट दुसटारी ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरणि तुम्हारी ॥२॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 528) देवगंधारी ॥
हरि के नाम बिना सुंदरि है नकटी ॥ जिउ बेसुआ के घरि पूतु जमतु है तिसु नामु परिओ है ध्रकटी ॥१॥ रहाउ ॥

जिन कै हिरदै नाहि हरि सुआमी ते बिगड़ रूप बेरकटी ॥ जिउ निगुरा बहु बाता जाणै ओहु हरि दरगह है भ्रसटी ॥१॥

जिन कउ दइआलु होआ मेरा सुआमी तिना साध जना पग चकटी ॥ नानक पतित पवित मिलि संगति गुर सतिगुर पाछै छुकटी ॥२॥६॥ छका १

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 528) देवगंधारी महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥ प्रभु होइ क्रिपालु कमलु परगासे सदा सदा हरि धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि एको बाहरि एको सभ महि एकु समाईऐ ॥ घटि अवघटि रविआ सभ ठाई हरि पूरन ब्रहमु दिखाईऐ ॥१॥

उसतति करहि सेवक मुनि केते तेरा अंतु न कतहू पाईऐ ॥ सुखदाते दुख भंजन सुआमी जन नानक सद बलि जाईऐ ॥२॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 528) देवगंधारी ॥
माई होनहार सो होईऐ ॥ राचि रहिओ रचना प्रभु अपनी कहा लाभु कहा खोईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कह फूलहि आनंद बिखै सोग कब हसनो कब रोईऐ ॥ कबहू मैलु भरे अभिमानी कब साधू संगि धोईऐ ॥१॥

कोइ न मेटै प्रभ का कीआ दूसर नाही अलोईऐ ॥ कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिह प्रसादि सुखि सोईऐ ॥२॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी ॥
माई सुनत सोच भै डरत ॥ मेर तेर तजउ अभिमाना सरनि सुआमी की परत ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो कहै सोई भल मानउ नाहि न का बोल करत ॥ निमख न बिसरउ हीए मोरे ते बिसरत जाई हउ मरत ॥१॥

सुखदाई पूरन प्रभु करता मेरी बहुतु इआनप जरत ॥ निरगुनि करूपि कुलहीण नानक हउ अनद रूप सुआमी भरत ॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी ॥
मन हरि कीरति करि सदहूं ॥ गावत सुनत जपत उधारै बरन अबरना सभहूं ॥१॥ रहाउ ॥

जह ते उपजिओ तही समाइओ इह बिधि जानी तबहूं ॥ जहा जहा इह देही धारी रहनु न पाइओ कबहूं ॥१॥

सुखु आइओ भै भरम बिनासे क्रिपाल हूए प्रभ जबहू ॥ कहु नानक मेरे पूरे मनोरथ साधसंगि तजि लबहूं ॥२॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी ॥
मन जिउ अपुने प्रभ भावउ ॥ नीचहु नीचु नीचु अति नान्हा होइ गरीबु बुलावउ ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक अड्मबर माइआ के बिरथे ता सिउ प्रीति घटावउ ॥ जिउ अपुनो सुआमी सुखु मानै ता महि सोभा पावउ ॥१॥

दासन दास रेणु दासन की जन की टहल कमावउ ॥ सरब सूख बडिआई नानक जीवउ मुखहु बुलावउ ॥२॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी ॥
प्रभ जी तउ प्रसादि भ्रमु डारिओ ॥ तुमरी क्रिपा ते सभु को अपना मन महि इहै बीचारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि पराध मिटे तेरी सेवा दरसनि दूखु उतारिओ ॥ नामु जपत महा सुखु पाइओ चिंता रोगु बिदारिओ ॥१॥

कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिसारिओ ॥ माइआ बंध काटे किरपा निधि नानक आपि उधारिओ ॥२॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी ॥
मन सगल सिआनप रही ॥ करन करावनहार सुआमी नानक ओट गही ॥१॥ रहाउ ॥

आपु मेटि पए सरणाई इह मति साधू कही ॥ प्रभ की आगिआ मानि सुखु पाइआ भरमु अधेरा लही ॥१॥

जान प्रबीन सुआमी प्रभ मेरे सरणि तुमारी अही ॥ खिन महि थापि उथापनहारे कुदरति कीम न पही ॥२॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 529) देवगंधारी महला ५ ॥
हरि प्रान प्रभू सुखदाते ॥ गुर प्रसादि काहू जाते ॥१॥ रहाउ ॥

संत तुमारे तुमरे प्रीतम तिन कउ काल न खाते ॥ रंगि तुमारै लाल भए है राम नाम रसि माते ॥१॥

महा किलबिख कोटि दोख रोगा प्रभ द्रिसटि तुहारी हाते ॥ सोवत जागि हरि हरि हरि गाइआ नानक गुर चरन पराते ॥२॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 530) देवगंधारी ५ ॥
सो प्रभु जत कत पेखिओ नैणी ॥ सुखदाई जीअन को दाता अम्रितु जा की बैणी ॥१॥ रहाउ ॥

अगिआनु अधेरा संती काटिआ जीअ दानु गुर दैणी ॥ करि किरपा करि लीनो अपुना जलते सीतल होणी ॥१॥

करमु धरमु किछु उपजि न आइओ नह उपजी निरमल करणी ॥ छाडि सिआनप संजम नानक लागो गुर की चरणी ॥२॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 530) देवगंधारी ५ ॥
हरि राम नामु जपि लाहा ॥ गति पावहि सुख सहज अनंदा काटे जम के फाहा ॥१॥ रहाउ ॥

खोजत खोजत खोजि बीचारिओ हरि संत जना पहि आहा ॥ तिन्हा परापति एहु निधाना जिन्ह कै करमि लिखाहा ॥१॥

से बडभागी से पतिवंते सेई पूरे साहा ॥ सुंदर सुघड़ सरूप ते नानक जिन्ह हरि हरि नामु विसाहा ॥२॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 530) देवगंधारी ५ ॥
मन कह अहंकारि अफारा ॥ दुरगंध अपवित्र अपावन भीतरि जो दीसै सो छारा ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि कीआ तिसु सिमरि परानी जीउ प्रान जिनि धारा ॥ तिसहि तिआगि अवर लपटावहि मरि जनमहि मुगध गवारा ॥१॥

अंध गुंग पिंगुल मति हीना प्रभ राखहु राखनहारा ॥ करन करावनहार समरथा किआ नानक जंत बिचारा ॥२॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 530) देवगंधारी ५ ॥
सो प्रभु नेरै हू ते नेरै ॥ सिमरि धिआइ गाइ गुन गोबिंद दिनु रैनि साझ सवेरै ॥१॥ रहाउ ॥

उधरु देह दुलभ साधू संगि हरि हरि नामु जपेरै ॥ घरी न मुहतु न चसा बिल्मबहु कालु नितहि नित हेरै ॥१॥

अंध बिला ते काढहु करते किआ नाही घरि तेरै ॥ नामु अधारु दीजै नानक कउ आनद सूख घनेरै ॥२॥१२॥ छके २ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 530) देवगंधारी ५ ॥
मन गुर मिलि नामु अराधिओ ॥ सूख सहज आनंद मंगल रस जीवन का मूलु बाधिओ ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा अपुना दासु कीनो काटे माइआ फाधिओ ॥ भाउ भगति गाइ गुण गोबिद जम का मारगु साधिओ ॥१॥

भइओ अनुग्रहु मिटिओ मोरचा अमोल पदारथु लाधिओ ॥ बलिहारै नानक लख बेरा मेरे ठाकुर अगम अगाधिओ ॥२॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी ५ ॥
माई जो प्रभ के गुन गावै ॥ सफल आइआ जीवन फलु ता को पारब्रहम लिव लावै ॥१॥ रहाउ ॥

सुंदरु सुघड़ु सूरु सो बेता जो साधू संगु पावै ॥ नामु उचारु करे हरि रसना बहुड़ि न जोनी धावै ॥१॥

पूरन ब्रहमु रविआ मन तन महि आन न द्रिसटी आवै ॥ नरक रोग नही होवत जन संगि नानक जिसु लड़ि लावै ॥२॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी ५ ॥
चंचलु सुपनै ही उरझाइओ ॥ इतनी न बूझै कबहू चलना बिकल भइओ संगि माइओ ॥१॥ रहाउ ॥

कुसम रंग संग रसि रचिआ बिखिआ एक उपाइओ ॥ लोभ सुनै मनि सुखु करि मानै बेगि तहा उठि धाइओ ॥१॥

फिरत फिरत बहुतु स्रमु पाइओ संत दुआरै आइओ ॥ करी क्रिपा पारब्रहमि सुआमी नानक लीओ समाइओ ॥२॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी ५ ॥
सरब सुखा गुर चरना ॥ कलिमल डारन मनहि सधारन इह आसर मोहि तरना ॥१॥ रहाउ ॥

पूजा अरचा सेवा बंदन इहै टहल मोहि करना ॥ बिगसै मनु होवै परगासा बहुरि न गरभै परना ॥१॥

सफल मूरति परसउ संतन की इहै धिआना धरना ॥ भइओ क्रिपालु ठाकुरु नानक कउ परिओ साध की सरना ॥२॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी महला ५ ॥
अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥ चारि पदारथ अनद मंगल निधि सूख सहज सिधि लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मानु तिआगि हरि चरनी लागउ तिसु प्रभ अंचलु गहीऐ ॥ आंच न लागै अगनि सागर ते सरनि सुआमी की अहीऐ ॥१॥

कोटि पराध महा अक्रितघन बहुरि बहुरि प्रभ सहीऐ ॥ करुणा मै पूरन परमेसुर नानक तिसु सरनहीऐ ॥२॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी ५ ॥
गुर के चरन रिदै परवेसा ॥ रोग सोग सभि दूख बिनासे उतरे सगल कलेसा ॥१॥ रहाउ ॥

जनम जनम के किलबिख नासहि कोटि मजन इसनाना ॥ नामु निधानु गावत गुण गोबिंद लागो सहजि धिआना ॥१॥

करि किरपा अपुना दासु कीनो बंधन तोरि निरारे ॥ जपि जपि नामु जीवा तेरी बाणी नानक दास बलिहारे ॥२॥१८॥ छके ३ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 531) देवगंधारी महला ५ ॥
माई प्रभ के चरन निहारउ ॥ करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे मन ते कबहु न डारउ ॥१॥ रहाउ ॥

साधू धूरि लाई मुखि मसतकि काम क्रोध बिखु जारउ ॥ सभ ते नीचु आतम करि मानउ मन महि इहु सुखु धारउ ॥१॥

गुन गावह ठाकुर अबिनासी कलमल सगले झारउ ॥ नाम निधानु नानक दानु पावउ कंठि लाइ उरि धारउ ॥२॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 532) देवगंधारी महला ५ ॥
प्रभ जीउ पेखउ दरसु तुमारा ॥ सुंदर धिआनु धारु दिनु रैनी जीअ प्रान ते पिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

सासत्र बेद पुरान अविलोके सिम्रिति ततु बीचारा ॥ दीना नाथ प्रानपति पूरन भवजल उधरनहारा ॥१॥

आदि जुगादि भगत जन सेवक ता की बिखै अधारा ॥ तिन जन की धूरि बाछै नित नानकु परमेसरु देवनहारा ॥२॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 532) देवगंधारी महला ५ ॥
तेरा जनु राम रसाइणि माता ॥ प्रेम रसा निधि जा कउ उपजी छोडि न कतहू जाता ॥१॥ रहाउ ॥

बैठत हरि हरि सोवत हरि हरि हरि रसु भोजनु खाता ॥ अठसठि तीरथ मजनु कीनो साधू धूरी नाता ॥१॥

सफलु जनमु हरि जन का उपजिआ जिनि कीनो सउतु बिधाता ॥ सगल समूह लै उधरे नानक पूरन ब्रहमु पछाता ॥२॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 532) देवगंधारी महला ५ ॥
माई गुर बिनु गिआनु न पाईऐ ॥ अनिक प्रकार फिरत बिललाते मिलत नही गोसाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मोह रोग सोग तनु बाधिओ बहु जोनी भरमाईऐ ॥ टिकनु न पावै बिनु सतसंगति किसु आगै जाइ रूआईऐ ॥१॥

करै अनुग्रहु सुआमी मेरा साध चरन चितु लाईऐ ॥ संकट घोर कटे खिन भीतरि नानक हरि दरसि समाईऐ ॥२॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 532) देवगंधारी महला ५ ॥
ठाकुर होए आपि दइआल ॥ भई कलिआण अनंद रूप होई है उबरे बाल गुपाल ॥ रहाउ ॥

दुइ कर जोड़ि करी बेनंती पारब्रहमु मनि धिआइआ ॥ हाथु देइ राखे परमेसुरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥१॥

वर नारी मिलि मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥ कहु नानक जन कउ बलि जाईऐ जो सभना करे उधारु ॥२॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 533) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवगंधारी महला ५ ॥
अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥ भए क्रिपाल दइआल दुख भंजन मेरा सगल अंदेसरा गइआ ॥ रहाउ ॥

हम पापी पाखंडी लोभी हमरा गुनु अवगुनु सभु सहिआ ॥ करु मसतकि धारि साजि निवाजे मुए दुसट जो खइआ ॥१॥

परउपकारी सरब सधारी सफल दरसन सहजइआ ॥ कहु नानक निरगुण कउ दाता चरण कमल उर धरिआ ॥२॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 533) देवगंधारी महला ५ ॥
अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥ सरनि आइओ राखनहारे ॥ रहाउ ॥

सरब पाख राखु मुरारे ॥ आगै पाछै अंती वारे ॥१॥

जब चितवउ तब तुहारे ॥ उन सम्हारि मेरा मनु सधारे ॥२॥

सुनि गावउ गुर बचनारे ॥ बलि बलि जाउ साध दरसारे ॥३॥

मन महि राखउ एक असारे ॥ नानक प्रभ मेरे करनैहारे ॥४॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 533) देवगंधारी महला ५ ॥
प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥ क्रिपा निधान दइआल मोहि दीजै करि संतन का चेरा ॥ रहाउ ॥

प्रातहकाल लागउ जन चरनी निस बासुर दरसु पावउ ॥ तनु मनु अरपि करउ जन सेवा रसना हरि गुन गावउ ॥१॥

सासि सासि सिमरउ प्रभु अपुना संतसंगि नित रहीऐ ॥ एकु अधारु नामु धनु मोरा अनदु नानक इहु लहीऐ ॥२॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 533) रागु देवगंधारी महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मीता ऐसे हरि जीउ पाए ॥ छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥१॥ रहाउ ॥

मिलिओ मनोहरु सरब सुखैना तिआगि न कतहू जाए ॥ अनिक अनिक भाति बहु पेखे प्रिअ रोम न समसरि लाए ॥१॥

मंदरि भागु सोभ दुआरै अनहत रुणु झुणु लाए ॥ कहु नानक सदा रंगु माणे ग्रिह प्रिअ थीते सद थाए ॥२॥१॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 533) देवगंधारी ५ ॥
दरसन नाम कउ मनु आछै ॥ भ्रमि आइओ है सगल थान रे आहि परिओ संत पाछै ॥१॥ रहाउ ॥

किसु हउ सेवी किसु आराधी जो दिसटै सो गाछै ॥ साधसंगति की सरनी परीऐ चरण रेनु मनु बाछै ॥१॥

जुगति न जाना गुनु नही कोई महा दुतरु माइ आछै ॥ आइ पइओ नानक गुर चरनी तउ उतरी सगल दुराछै ॥२॥२॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 534) देवगंधारी ५ ॥
अम्रिता प्रिअ बचन तुहारे ॥ अति सुंदर मनमोहन पिआरे सभहू मधि निरारे ॥१॥ रहाउ ॥

राजु न चाहउ मुकति न चाहउ मनि प्रीति चरन कमलारे ॥ ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा मोहि ठाकुर ही दरसारे ॥१॥

दीनु दुआरै आइओ ठाकुर सरनि परिओ संत हारे ॥ कहु नानक प्रभ मिले मनोहर मनु सीतल बिगसारे ॥२॥३॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 534) देवगंधारी महला ५ ॥
हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥ दीन दइआल भए प्रभ अपने बहुड़ि जनमि नही मारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगमि गुण गावह हरि के रतन जनमु नही हारिओ ॥ प्रभ गुन गाइ बिखै बनु तरिआ कुलह समूह उधारिओ ॥१॥

चरन कमल बसिआ रिद भीतरि सासि गिरासि उचारिओ ॥ नानक ओट गही जगदीसुर पुनह पुनह बलिहारिओ ॥२॥४॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 534) रागु देवगंधारी महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥१॥ रहाउ ॥

कथन सुनावन गीत नीके गावन मन महि धरते गार ॥१॥

अति सुंदर बहु चतुर सिआने बिदिआ रसना चार ॥२॥

मान मोह मेर तेर बिबरजित एहु मारगु खंडे धार ॥३॥

कहु नानक तिनि भवजलु तरीअले प्रभ किरपा संत संगार ॥४॥१॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 534) रागु देवगंधारी महला ५ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥ आन न समसरि कोऊ लागै ढूढि रहे हम मूचा ॥१॥ रहाउ ॥

बहु बेअंतु अति बडो गाहरो थाह नही अगहूचा ॥ तोलि न तुलीऐ मोलि न मुलीऐ कत पाईऐ मन रूचा ॥१॥

खोज असंखा अनिक तपंथा बिनु गुर नही पहूचा ॥ कहु नानक किरपा करी ठाकुर मिलि साधू रस भूंचा ॥२॥१॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 535) देवगंधारी महला ५ ॥
मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥ खंड दीप सभ भीतरि रविआ पूरि रहिओ सभ लोऊ ॥१॥ रहाउ ॥

अगम अगमा कवन महिमा मनु जीवै सुनि सोऊ ॥ चारि आसरम चारि बरंना मुकति भए सेवतोऊ ॥१॥

गुरि सबदु द्रिड़ाइआ परम पदु पाइआ दुतीअ गए सुख होऊ ॥ कहु नानक भव सागरु तरिआ हरि निधि पाई सहजोऊ ॥२॥२॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 535) रागु देवगंधारी महला ५ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकै रे हरि एकै जान ॥ एकै रे गुरमुखि जान ॥१॥ रहाउ ॥

काहे भ्रमत हउ तुम भ्रमहु न भाई रविआ रे रविआ स्रब थान ॥१॥

जिउ बैसंतरु कासट मझारि बिनु संजम नही कारज सारि ॥ बिनु गुर न पावैगो हरि जी को दुआर ॥ मिलि संगति तजि अभिमान कहु नानक पाए है परम निधान ॥२॥१॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 535) देवगंधारी ५ ॥
जानी न जाई ता की गाति ॥१॥ रहाउ ॥

कह पेखारउ हउ करि चतुराई बिसमन बिसमे कहन कहाति ॥१॥

गण गंधरब सिध अरु साधिक ॥ सुरि नर देव ब्रहम ब्रहमादिक ॥ चतुर बेद उचरत दिनु राति ॥ अगम अगम ठाकुरु आगाधि ॥ गुन बेअंत बेअंत भनु नानक कहनु न जाई परै पराति ॥२॥२॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 535) देवगंधारी महला ५ ॥
धिआए गाए करनैहार ॥ भउ नाही सुख सहज अनंदा अनिक ओही रे एक समार ॥१॥ रहाउ ॥

सफल मूरति गुरु मेरै माथै ॥ जत कत पेखउ तत तत साथै ॥ चरन कमल मेरे प्रान अधार ॥१॥

समरथ अथाह बडा प्रभु मेरा ॥ घट घट अंतरि साहिबु नेरा ॥ ता की सरनि आसर प्रभ नानक जा का अंतु न पारावार ॥२॥३॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 535) देवगंधारी महला ५ ॥
उलटी रे मन उलटी रे ॥ साकत सिउ करि उलटी रे ॥ झूठै की रे झूठु परीति छुटकी रे मन छुटकी रे साकत संगि न छुटकी रे ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ काजर भरि मंदरु राखिओ जो पैसै कालूखी रे ॥ दूरहु ही ते भागि गइओ है जिसु गुर मिलि छुटकी त्रिकुटी रे ॥१॥

मागउ दानु क्रिपाल क्रिपा निधि मेरा मुखु साकत संगि न जुटसी रे ॥ जन नानक दास दास को करीअहु मेरा मूंडु साध पगा हेठि रुलसी रे ॥२॥४॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 536) रागु देवगंधारी महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥ गावन भावन संतन तोरै चरन उवा कै पाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जासन बासन सहज केल करुणा मै एक अनंत अनूपै ठाउ ॥१॥

रिधि सिधि निधि कर तल जगजीवन स्रब नाथ अनेकै नाउ ॥ दइआ मइआ किरपा नानक कउ सुनि सुनि जसु जीवाउ ॥२॥१॥३८॥६॥४४॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 536) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला ९ ॥
यह मनु नैक न कहिओ करै ॥ सीख सिखाइ रहिओ अपनी सी दुरमति ते न टरै ॥१॥ रहाउ ॥

मदि माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै ॥ करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ॥१॥

सुआन पूछ जिउ होइ न सूधो कहिओ न कान धरै ॥ कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते काजु सरै ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 536) देवगंधारी महला ९ ॥
सभ किछु जीवत को बिवहार ॥ मात पिता भाई सुत बंधप अरु फुनि ग्रिह की नारि ॥१॥ रहाउ ॥

तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेति पुकारि ॥ आध घरी कोऊ नहि राखै घर ते देत निकारि ॥१॥

म्रिग त्रिसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदै बिचारि ॥ कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते होत उधार ॥२॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 536) देवगंधारी महला ९ ॥
जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥ अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत ॥१॥ रहाउ ॥

मेरउ मेरउ सभै कहत है हित सिउ बाधिओ चीत ॥ अंति कालि संगी नह कोऊ इह अचरज है रीति ॥१॥

मन मूरख अजहू नह समझत सिख दै हारिओ नीत ॥ नानक भउजलु पारि परै जउ गावै प्रभ के गीत ॥२॥३॥६॥३८॥४७॥


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