Pt 5 - राग बिलावलु - बाणी शब्द, Part 5 - Raag Bilaval - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू रामदास जी -- SGGS 845) बिलावलु महला ४ सलोकु ॥
हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥ गुरि पूरै वेखालिआ नानक हरि लिव लागु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 845) छंत ॥
मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥ गुरमति आपु मिटाइआ हरि हरि लिव लागे राम ॥ अंतरि कमलु परगासिआ गुर गिआनी जागे राम ॥ जन नानक हरि प्रभु पाइआ पूरै वडभागे राम ॥१॥

हरि प्रभु हरि मनि भाइआ हरि नामि वधाई राम ॥ गुरि पूरै प्रभु पाइआ हरि हरि लिव लाई राम ॥ अगिआनु अंधेरा कटिआ जोति परगटिआई राम ॥ जन नानक नामु अधारु है हरि नामि समाई राम ॥२॥

धन हरि प्रभि पिआरै रावीआ जां हरि प्रभ भाई राम ॥ अखी प्रेम कसाईआ जिउ बिलक मसाई राम ॥ गुरि पूरै हरि मेलिआ हरि रसि आघाई राम ॥ जन नानक नामि विगसिआ हरि हरि लिव लाई राम ॥३॥

हम मूरख मुगध मिलाइआ हरि किरपा धारी राम ॥ धनु धंनु गुरू साबासि है जिनि हउमै मारी राम ॥ जिन्ह वडभागीआ वडभागु है हरि हरि उर धारी राम ॥ जन नानक नामु सलाहि तू नामे बलिहारी राम ॥४॥२॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 845) बिलावलु महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥ अबिनासी वरु सुणिआ मनि उपजिआ चाइआ राम ॥ मनि प्रीति लागै वडै भागै कब मिलीऐ पूरन पते ॥ सहजे समाईऐ गोविंदु पाईऐ देहु सखीए मोहि मते ॥ दिनु रैणि ठाढी करउ सेवा प्रभु कवन जुगती पाइआ ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा लैहु मोहि लड़ि लाइआ ॥१॥

भइआ समाहड़ा हरि रतनु विसाहा राम ॥ खोजी खोजि लधा हरि संतन पाहा राम ॥ मिले संत पिआरे दइआ धारे कथहि अकथ बीचारो ॥ इक चिति इक मनि धिआइ सुआमी लाइ प्रीति पिआरो ॥ कर जोड़ि प्रभ पहि करि बिनंती मिलै हरि जसु लाहा ॥ बिनवंति नानक दासु तेरा मेरा प्रभु अगम अथाहा ॥२॥

साहा अटलु गणिआ पूरन संजोगो राम ॥ सुखह समूह भइआ गइआ विजोगो राम ॥ मिलि संत आए प्रभ धिआए बणे अचरज जाञीआं ॥ मिलि इकत्र होए सहजि ढोए मनि प्रीति उपजी माञीआ ॥ मिलि जोति जोती ओति पोती हरि नामु सभि रस भोगो ॥ बिनवंति नानक सभ संति मेली प्रभु करण कारण जोगो ॥३॥

भवनु सुहावड़ा धरति सभागी राम ॥ प्रभु घरि आइअड़ा गुर चरणी लागी राम ॥ गुर चरण लागी सहजि जागी सगल इछा पुंनीआ ॥ मेरी आस पूरी संत धूरी हरि मिले कंत विछुंनिआ ॥ आनंद अनदिनु वजहि वाजे अहं मति मन की तिआगी ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी संतसंगि लिव लागी ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 846) बिलावलु महला ५ ॥
भाग सुलखणा हरि कंतु हमारा राम ॥ अनहद बाजित्रा तिसु धुनि दरबारा राम ॥ आनंद अनदिनु वजहि वाजे दिनसु रैणि उमाहा ॥ तह रोग सोग न दूखु बिआपै जनम मरणु न ताहा ॥ रिधि सिधि सुधा रसु अम्रितु भगति भरे भंडारा ॥ बिनवंति नानक बलिहारि वंञा पारब्रहम प्रान अधारा ॥१॥

सुणि सखीअ सहेलड़ीहो मिलि मंगलु गावह राम ॥ मनि तनि प्रेमु करे तिसु प्रभ कउ रावह राम ॥ करि प्रेमु रावह तिसै भावह इक निमख पलक न तिआगीऐ ॥ गहि कंठि लाईऐ नह लजाईऐ चरन रज मनु पागीऐ ॥ भगति ठगउरी पाइ मोहह अनत कतहू न धावह ॥ बिनवंति नानक मिलि संगि साजन अमर पदवी पावह ॥२॥

बिसमन बिसम भई पेखि गुण अबिनासी राम ॥ करु गहि भुजा गही कटि जम की फासी राम ॥ गहि भुजा लीन्ही दासि कीन्ही अंकुरि उदोतु जणाइआ ॥ मलन मोह बिकार नाठे दिवस निरमल आइआ ॥ द्रिसटि धारी मनि पिआरी महा दुरमति नासी ॥ बिनवंति नानक भई निरमल प्रभ मिले अबिनासी ॥३॥

सूरज किरणि मिले जल का जलु हूआ राम ॥ जोती जोति रली स्मपूरनु थीआ राम ॥ ब्रहमु दीसै ब्रहमु सुणीऐ एकु एकु वखाणीऐ ॥ आतम पसारा करणहारा प्रभ बिना नही जाणीऐ ॥ आपि करता आपि भुगता आपि कारणु कीआ ॥ बिनवंति नानक सेई जाणहि जिन्ही हरि रसु पीआ ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 847) बिलावलु महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सखी आउ सखी वसि आउ सखी असी पिर का मंगलु गावह ॥ तजि मानु सखी तजि मानु सखी मतु आपणे प्रीतम भावह ॥ तजि मानु मोहु बिकारु दूजा सेवि एकु निरंजनो ॥ लगु चरण सरण दइआल प्रीतम सगल दुरत बिखंडनो ॥ होइ दास दासी तजि उदासी बहुड़ि बिधी न धावा ॥ नानकु पइअ्मपै करहु किरपा तामि मंगलु गावा ॥१॥

अम्रितु प्रिअ का नामु मै अंधुले टोहनी ॥ ओह जोहै बहु परकार सुंदरि मोहनी ॥ मोहनी महा बचित्रि चंचलि अनिक भाव दिखावए ॥ होइ ढीठ मीठी मनहि लागै नामु लैण न आवए ॥ ग्रिह बनहि तीरै बरत पूजा बाट घाटै जोहनी ॥ नानकु पइअ्मपै दइआ धारहु मै नामु अंधुले टोहनी ॥२॥

मोहि अनाथ प्रिअ नाथ जिउ जानहु तिउ रखहु ॥ चतुराई मोहि नाहि रीझावउ कहि मुखहु ॥ नह चतुरि सुघरि सुजान बेती मोहि निरगुनि गुनु नही ॥ नह रूप धूप न नैण बंके जह भावै तह रखु तुही ॥ जै जै जइअ्मपहि सगल जा कउ करुणापति गति किनि लखहु ॥ नानकु पइअ्मपै सेव सेवकु जिउ जानहु तिउ मोहि रखहु ॥३॥

मोहि मछुली तुम नीर तुझ बिनु किउ सरै ॥ मोहि चात्रिक तुम्ह बूंद त्रिपतउ मुखि परै ॥ मुखि परै हरै पिआस मेरी जीअ हीआ प्रानपते ॥ लाडिले लाड लडाइ सभ महि मिलु हमारी होइ गते ॥ चीति चितवउ मिटु अंधारे जिउ आस चकवी दिनु चरै ॥ नानकु पइअ्मपै प्रिअ संगि मेली मछुली नीरु न वीसरै ॥४॥

धनि धंनि हमारे भाग घरि आइआ पिरु मेरा ॥ सोहे बंक दुआर सगला बनु हरा ॥ हर हरा सुआमी सुखह गामी अनद मंगल रसु घणा ॥ नवल नवतन नाहु बाला कवन रसना गुन भणा ॥ मेरी सेज सोही देखि मोही सगल सहसा दुखु हरा ॥ नानकु पइअ्मपै मेरी आस पूरी मिले सुआमी अपर्मपरा ॥५॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 848) बिलावलु महला ५ ॥
हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥ गुन गोविद सद गाईअहि पारब्रहम कै रंगे राम ॥ सो प्रभु सद ही सेवीऐ पाईअहि फल मंगे राम ॥ नानक प्रभ सरणागती जपि अनत तरंगे राम ॥१॥

इकु तिलु प्रभू न वीसरै जिनि सभु किछु दीना राम ॥ वडभागी मेलावड़ा गुरमुखि पिरु चीन्हा राम ॥ बाह पकड़ि तम ते काढिआ करि अपुना लीना राम ॥ नामु जपत नानक जीवै सीतलु मनु सीना राम ॥२॥

किआ गुण तेरे कहि सकउ प्रभ अंतरजामी राम ॥ सिमरि सिमरि नाराइणै भए पारगरामी राम ॥ गुन गावत गोविंद के सभ इछ पुजामी राम ॥ नानक उधरे जपि हरे सभहू का सुआमी राम ॥३॥

रस भिंनिअड़े अपुने राम संगे से लोइण नीके राम ॥ प्रभ पेखत इछा पुंनीआ मिलि साजन जी के राम ॥ अम्रित रसु हरि पाइआ बिखिआ रस फीके राम ॥ नानक जलु जलहि समाइआ जोती जोति मीके राम ॥४॥२॥५॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 849) बिलावल की वार महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ४ ॥
हरि उतमु हरि प्रभु गाविआ करि नादु बिलावलु रागु ॥ उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥ सभ दिनसु रैणि गुण उचरै हरि हरि हरि उरि लिव लागु ॥ सभु तनु मनु हरिआ होइआ मनु खिड़िआ हरिआ बागु ॥ अगिआनु अंधेरा मिटि गइआ गुर चानणु गिआनु चरागु ॥ जनु नानकु जीवै देखि हरि इक निमख घड़ी मुखि लागु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 849) मः ३ ॥
बिलावलु तब ही कीजीऐ जब मुखि होवै नामु ॥ राग नाद सबदि सोहणे जा लागै सहजि धिआनु ॥ राग नाद छोडि हरि सेवीऐ ता दरगह पाईऐ मानु ॥ नानक गुरमुखि ब्रहमु बीचारीऐ चूकै मनि अभिमानु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 849) पउड़ी ॥
तू हरि प्रभु आपि अगमु है सभि तुधु उपाइआ ॥ तू आपे आपि वरतदा सभु जगतु सबाइआ ॥ तुधु आपे ताड़ी लाईऐ आपे गुण गाइआ ॥ हरि धिआवहु भगतहु दिनसु राति अंति लए छडाइआ ॥ जिनि सेविआ तिनि सुखु पाइआ हरि नामि समाइआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 849) सलोक मः ३ ॥
दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥ पाखंडि भगति न होवई पारब्रहमु न पाइआ जाइ ॥ मनहठि करम कमावणे थाइ न कोई पाइ ॥ नानक गुरमुखि आपु बीचारीऐ विचहु आपु गवाइ ॥ आपे आपि पारब्रहमु है पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥ जमणु मरणा कटिआ जोती जोति मिलाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 849) मः ३ ॥
बिलावलु करिहु तुम्ह पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥ जनम मरण दुखु कटीऐ सचे रहै समाइ ॥ सदा बिलावलु अनंदु है जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सतसंगती बहि भाउ करि सदा हरि के गुण गाइ ॥ नानक से जन सोहणे जि गुरमुखि मेलि मिलाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 849) पउड़ी ॥
सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥ सभु कोई हरि कै वसि भगता कै अनंदु घरि ॥ हरि भगता का मेली सरबत सउ निसुल जन टंग धरि ॥ हरि सभना का है खसमु सो भगत जन चिति करि ॥ तुधु अपड़ि कोइ न सकै सभ झखि झखि पवै झड़ि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 850) सलोक मः ३ ॥
ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ जिन कै हिरदै हरि वसै हउमै रोगु गवाइ ॥ गुण रवहि गुण संग्रहहि जोती जोति मिलाइ ॥ इसु जुग महि विरले ब्राहमण ब्रहमु बिंदहि चितु लाइ ॥ नानक जिन्ह कउ नदरि करे हरि सचा से नामि रहे लिव लाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 850) मः ३ ॥
सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥ हउमै रोगु कमावणा अति दीरघु बहु सुआउ ॥ मनहठि करम कमावणे फिरि फिरि जोनी पाइ ॥ गुरमुखि जनमु सफलु है जिस नो आपे लए मिलाइ ॥ नानक नदरी नदरि करे ता नाम धनु पलै पाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 850) पउड़ी ॥
सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥ जि वसतु मंगीऐ साई पाईऐ जे नामि चितु लाईऐ ॥ गुहज गल जीअ की कीचै सतिगुरू पासि ता सरब सुखु पाईऐ ॥ गुरु पूरा हरि उपदेसु देइ सभ भुख लहि जाईऐ ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो हरि गुण गाईऐ ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 850) सलोक मः ३ ॥
सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥ सतिगुर का दरसनु सफलु है जेहा को इछे तेहा फलु पाए ॥ गुर का सबदु अम्रितु है सभ त्रिसना भुख गवाए ॥ हरि रसु पी संतोखु होआ सचु वसिआ मनि आए ॥ सचु धिआइ अमरा पदु पाइआ अनहद सबद वजाए ॥ सचो दह दिसि पसरिआ गुर कै सहजि सुभाए ॥ नानक जिन अंदरि सचु है से जन छपहि न किसै दे छपाए ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 850) मः ३ ॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥ मानस ते देवते भए सची भगति जिसु देइ ॥ हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि सुचेइ ॥ नानक सहजे मिलि रहे नामु वडिआई देइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 850) पउड़ी ॥
गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥ सेवक सिख सभि वेखि वेखि जीवन्हि ओन्हा अंदरि हिरदै भाई ॥ निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन्हा पराइआ भला न सुखाई ॥ किआ होवै किस ही की झख मारी जा सचे सिउ बणि आई ॥ जि गल करते भावै सा नित नित चड़ै सवाई सभ झखि झखि मरै लोकाई ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 850) सलोक मः ३ ॥
ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥ हरि सुखु पल्हरि तिआगिआ नामु विसारि दुखु पाए ॥ मनमुख अगिआनी अंधुले जनमि मरहि फिरि आवै जाए ॥ कारज सिधि न होवनी अंति गइआ पछुताए ॥ जिसु करमु होवै तिसु सतिगुरु मिलै सो हरि हरि नामु धिआए ॥ नामि रते जन सदा सुखु पाइन्हि जन नानक तिन बलि जाए ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 851) मः ३ ॥
आसा मनसा जगि मोहणी जिनि मोहिआ संसारु ॥ सभु को जम के चीरे विचि है जेता सभु आकारु ॥ हुकमी ही जमु लगदा सो उबरै जिसु बखसै करतारु ॥ नानक गुर परसादी एहु मनु तां तरै जा छोडै अहंकारु ॥ आसा मनसा मारे निरासु होइ गुर सबदी वीचारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 851) पउड़ी ॥
जिथै जाईऐ जगत महि तिथै हरि साई ॥ अगै सभु आपे वरतदा हरि सचा निआई ॥ कूड़िआरा के मुह फिटकीअहि सचु भगति वडिआई ॥ सचु साहिबु सचा निआउ है सिरि निंदक छाई ॥ जन नानक सचु अराधिआ गुरमुखि सुखु पाई ॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 851) सलोक मः ३ ॥
पूरै भागि सतिगुरु पाईऐ जे हरि प्रभु बखस करेइ ॥ ओपावा सिरि ओपाउ है नाउ परापति होइ ॥ अंदरु सीतलु सांति है हिरदै सदा सुखु होइ ॥ अम्रितु खाणा पैन्हणा नानक नाइ वडिआई होइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 851) मः ३ ॥
ए मन गुर की सिख सुणि पाइहि गुणी निधानु ॥ सुखदाता तेरै मनि वसै हउमै जाइ अभिमानु ॥ नानक नदरी पाईऐ अम्रितु गुणी निधानु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 851) पउड़ी ॥
जितने पातिसाह साह राजे खान उमराव सिकदार हहि तितने सभि हरि के कीए ॥ जो किछु हरि करावै सु ओइ करहि सभि हरि के अरथीए ॥ सो ऐसा हरि सभना का प्रभु सतिगुर कै वलि है तिनि सभि वरन चारे खाणी सभ स्रिसटि गोले करि सतिगुर अगै कार कमावण कउ दीए ॥ हरि सेवे की ऐसी वडिआई देखहु हरि संतहु जिनि विचहु काइआ नगरी दुसमन दूत सभि मारि कढीए ॥ हरि हरि किरपालु होआ भगत जना उपरि हरि आपणी किरपा करि हरि आपि रखि लीए ॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 851) सलोक मः ३ ॥
अंदरि कपटु सदा दुखु है मनमुख धिआनु न लागै ॥ दुख विचि कार कमावणी दुखु वरतै दुखु आगै ॥ करमी सतिगुरु भेटीऐ ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक सहजे सुखु होइ अंदरहु भ्रमु भउ भागै ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 851) मः ३ ॥
गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥ गुरमुखि वेखणु बोलणा नामु जपत सुखु पाइआ ॥ नानक गुरमुखि गिआनु प्रगासिआ तिमर अगिआनु अंधेरु चुकाइआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 852) मः ३ ॥
मनमुख मैले मरहि गवार ॥ गुरमुखि निरमल हरि राखिआ उर धारि ॥ भनति नानकु सुणहु जन भाई ॥ सतिगुरु सेविहु हउमै मलु जाई ॥ अंदरि संसा दूखु विआपे सिरि धंधा नित मार ॥ दूजै भाइ सूते कबहु न जागहि माइआ मोह पिआर ॥ नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का बीचार ॥ हरि नामु न भाइआ बिरथा जनमु गवाइआ नानक जमु मारि करे खुआर ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 852) पउड़ी ॥
जिस नो हरि भगति सचु बखसीअनु सो सचा साहु ॥ तिस की मुहताजी लोकु कढदा होरतु हटि न वथु न वेसाहु ॥ भगत जना कउ सनमुखु होवै सु हरि रासि लए वेमुख भसु पाहु ॥ हरि के नाम के वापारी हरि भगत हहि जमु जागाती तिना नेड़ि न जाहु ॥ जन नानकि हरि नाम धनु लदिआ सदा वेपरवाहु ॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 852) सलोक मः ३ ॥
इसु जुग महि भगती हरि धनु खटिआ होरु सभु जगतु भरमि भुलाइआ ॥ गुर परसादी नामु मनि वसिआ अनदिनु नामु धिआइआ ॥ बिखिआ माहि उदास है हउमै सबदि जलाइआ ॥ आपि तरिआ कुल उधरे धंनु जणेदी माइआ ॥ सदा सहजु सुखु मनि वसिआ सचे सिउ लिव लाइआ ॥ ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण भुले हउमै मोहु वधाइआ ॥ पंडित पड़ि पड़ि मोनी भुले दूजै भाइ चितु लाइआ ॥ जोगी जंगम संनिआसी भुले विणु गुर ततु न पाइआ ॥ मनमुख दुखीए सदा भ्रमि भुले तिन्ही बिरथा जनमु गवाइआ ॥ नानक नामि रते सेई जन समधे जि आपे बखसि मिलाइआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 852) मः ३ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥ तिसहि सरेवहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुरमुखि अंतरि मनि वसै सदा सदा सुखु होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 852) पउड़ी ॥
जिनी गुरमुखि हरि नाम धनु न खटिओ से देवालीए जुग माहि ॥ ओइ मंगदे फिरहि सभ जगत महि कोई मुहि थुक न तिन कउ पाहि ॥ पराई बखीली करहि आपणी परतीति खोवनि सगवा भी आपु लखाहि ॥ जिसु धन कारणि चुगली करहि सो धनु चुगली हथि न आवै ओइ भावै तिथै जाहि ॥ गुरमुखि सेवक भाइ हरि धनु मिलै तिथहु करमहीण लै न सकहि होर थै देस दिसंतरि हरि धनु नाहि ॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 853) सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥ जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥ नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 853) मः ३ ॥
कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥ अनदिनु जागै कदे न सोवै सहजे अम्रितु पिआउ ॥ मीठा बोले अम्रित बाणी अनदिनु हरि गुण गाउ ॥ निज घरि वासा सदा सोहदे नानक तिन मिलिआ सुखु पाउ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 853) पउड़ी ॥
हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥ जे किसै किहु दिसि आवै ता कोई किहु मंगि लए अकै कोई किहु देवाए एहु हरि धनु जोरि कीतै किसै नालि न जाइ वंडाइआ ॥ जिस नो सतिगुर नालि हरि सरधा लाए तिसु हरि धन की वंड हथि आवै जिस नो करतै धुरि लिखि पाइआ ॥ इसु हरि धन का कोई सरीकु नाही किसै का खतु नाही किसै कै सीव बंनै रोलु नाही जे को हरि धन की बखीली करे तिस का मुहु हरि चहु कुंडा विचि काला कराइआ ॥ हरि के दिते नालि किसै जोरु बखीली न चलई दिहु दिहु नित नित चड़ै सवाइआ ॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 853) सलोक मः ३ ॥
जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥ जितु दुआरै उबरै तितै लैहु उबारि ॥ सतिगुरि सुखु वेखालिआ सचा सबदु बीचारि ॥ नानक अवरु न सुझई हरि बिनु बखसणहारु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 853) मः ३ ॥
हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥ ना इह मारी न मरै ना इह हटि विकाइ ॥ गुर कै सबदि परजालीऐ ता इह विचहु जाइ ॥ तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥ नानक माइआ का मारणु सबदु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 853) पउड़ी ॥
सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥ पुती भातीई जावाई सकी अगहु पिछहु टोलि डिठा लाहिओनु सभना का अभिमानु ॥ जिथै को वेखै तिथै मेरा सतिगुरू हरि बखसिओसु सभु जहानु ॥ जि सतिगुर नो मिलि मंने सु हलति पलति सिझै जि वेमुखु होवै सु फिरै भरिसट थानु ॥ जन नानक कै वलि होआ मेरा सुआमी हरि सजण पुरखु सुजानु ॥ पउदी भिति देखि कै सभि आइ पए सतिगुर की पैरी लाहिओनु सभना किअहु मनहु गुमानु ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 854) सलोक मः १ ॥
कोई वाहे को लुणै को पाए खलिहानि ॥ नानक एव न जापई कोई खाइ निदानि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 854) मः १ ॥
जिसु मनि वसिआ तरिआ सोइ ॥ नानक जो भावै सो होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 854) पउड़ी ॥
पारब्रहमि दइआलि सागरु तारिआ ॥ गुरि पूरै मिहरवानि भरमु भउ मारिआ ॥ काम क्रोधु बिकरालु दूत सभि हारिआ ॥ अम्रित नामु निधानु कंठि उरि धारिआ ॥ नानक साधू संगि जनमु मरणु सवारिआ ॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 854) सलोक मः ३ ॥
जिन्ही नामु विसारिआ कूड़े कहण कहंन्हि ॥ पंच चोर तिना घरु मुहन्हि हउमै अंदरि संन्हि ॥ साकत मुठे दुरमती हरि रसु न जाणंन्हि ॥ जिन्ही अम्रितु भरमि लुटाइआ बिखु सिउ रचहि रचंन्हि ॥ दुसटा सेती पिरहड़ी जन सिउ वादु करंन्हि ॥ नानक साकत नरक महि जमि बधे दुख सहंन्हि ॥ पइऐ किरति कमावदे जिव राखहि तिवै रहंन्हि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 854) मः ३ ॥
जिन्ही सतिगुरु सेविआ ताणु निताणे तिसु ॥ सासि गिरासि सदा मनि वसै जमु जोहि न सकै तिसु ॥ हिरदै हरि हरि नाम रसु कवला सेवकि तिसु ॥ हरि दासा का दासु होइ परम पदारथु तिसु ॥ नानक मनि तनि जिसु प्रभु वसै हउ सद कुरबाणै तिसु ॥ जिन्ह कउ पूरबि लिखिआ रसु संत जना सिउ तिसु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 854) पउड़ी ॥
जो बोले पूरा सतिगुरू सो परमेसरि सुणिआ ॥ सोई वरतिआ जगत महि घटि घटि मुखि भणिआ ॥ बहुतु वडिआईआ साहिबै नह जाही गणीआ ॥ सचु सहजु अनदु सतिगुरू पासि सची गुर मणीआ ॥ नानक संत सवारे पारब्रहमि सचे जिउ बणिआ ॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 854) सलोक मः ३ ॥
अपणा आपु न पछाणई हरि प्रभु जाता दूरि ॥ गुर की सेवा विसरी किउ मनु रहै हजूरि ॥ मनमुखि जनमु गवाइआ झूठै लालचि कूरि ॥ नानक बखसि मिलाइअनु सचै सबदि हदूरि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 854) मः ३ ॥
हरि प्रभु सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥ अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥ वडभागी हरि पाइआ पूरनु परमानंदु ॥ जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 855) पउड़ी ॥
कोई निंदकु होवै सतिगुरू का फिरि सरणि गुर आवै ॥ पिछले गुनह सतिगुरु बखसि लए सतसंगति नालि रलावै ॥ जिउ मीहि वुठै गलीआ नालिआ टोभिआ का जलु जाइ पवै विचि सुरसरी सुरसरी मिलत पवित्रु पावनु होइ जावै ॥ एह वडिआई सतिगुर निरवैर विचि जितु मिलिऐ तिसना भुख उतरै हरि सांति तड़ आवै ॥ नानक इहु अचरजु देखहु मेरे हरि सचे साह का जि सतिगुरू नो मंनै सु सभनां भावै ॥१३॥१॥ सुधु ॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 855) बिलावलु बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ की
ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥ सूधे सूधे रेगि चलहु तुम नतर कुधका दिवईहै रे ॥१॥ रहाउ ॥

बारे बूढे तरुने भईआ सभहू जमु लै जईहै रे ॥ मानसु बपुरा मूसा कीनो मीचु बिलईआ खईहै रे ॥१॥

धनवंता अरु निरधन मनई ता की कछू न कानी रे ॥ राजा परजा सम करि मारै ऐसो कालु बडानी रे ॥२॥

हरि के सेवक जो हरि भाए तिन्ह की कथा निरारी रे ॥ आवहि न जाहि न कबहू मरते पारब्रहम संगारी रे ॥३॥

पुत्र कलत्र लछिमी माइआ इहै तजहु जीअ जानी रे ॥ कहत कबीरु सुनहु रे संतहु मिलिहै सारिगपानी रे ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 855) बिलावलु ॥
बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥ हरि गुन कथत सुनत बउरानो ॥१॥

मेरे बाबा मै बउरा सभ खलक सैआनी मै बउरा ॥ मै बिगरिओ बिगरै मति अउरा ॥१॥ रहाउ ॥

आपि न बउरा राम कीओ बउरा ॥ सतिगुरु जारि गइओ भ्रमु मोरा ॥२॥

मै बिगरे अपनी मति खोई ॥ मेरे भरमि भूलउ मति कोई ॥३॥

सो बउरा जो आपु न पछानै ॥ आपु पछानै त एकै जानै ॥४॥

अबहि न माता सु कबहु न माता ॥ कहि कबीर रामै रंगि राता ॥५॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 855) बिलावलु ॥
ग्रिहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥ अजहु बिकार न छोडई पापी मनु मंदा ॥१॥

किउ छूटउ कैसे तरउ भवजल निधि भारी ॥ राखु राखु मेरे बीठुला जनु सरनि तुम्हारी ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै बिखै की बासना तजीअ नह जाई ॥ अनिक जतन करि राखीऐ फिरि फिरि लपटाई ॥२॥

जरा जीवन जोबनु गइआ किछु कीआ न नीका ॥ इहु जीअरा निरमोलको कउडी लगि मीका ॥३॥

कहु कबीर मेरे माधवा तू सरब बिआपी ॥ तुम समसरि नाही दइआलु मोहि समसरि पापी ॥४॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 856) बिलावलु ॥
नित उठि कोरी गागरि आनै लीपत जीउ गइओ ॥ ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रसि लपटिओ ॥१॥

हमारे कुल कउने रामु कहिओ ॥ जब की माला लई निपूते तब ते सुखु न भइओ ॥१॥ रहाउ ॥

सुनहु जिठानी सुनहु दिरानी अचरजु एकु भइओ ॥ सात सूत इनि मुडींए खोए इहु मुडीआ किउ न मुइओ ॥२॥

सरब सुखा का एकु हरि सुआमी सो गुरि नामु दइओ ॥ संत प्रहलाद की पैज जिनि राखी हरनाखसु नख बिदरिओ ॥३॥

घर के देव पितर की छोडी गुर को सबदु लइओ ॥ कहत कबीरु सगल पाप खंडनु संतह लै उधरिओ ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 856) बिलावलु ॥
कोऊ हरि समानि नही राजा ॥ ए भूपति सभ दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरो जनु होइ सोइ कत डोलै तीनि भवन पर छाजा ॥ हाथु पसारि सकै को जन कउ बोलि सकै न अंदाजा ॥१॥

चेति अचेत मूड़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा ॥ कहि कबीर संसा भ्रमु चूको ध्रू प्रहिलाद निवाजा ॥२॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 856) बिलावलु ॥
राखि लेहु हम ते बिगरी ॥ सीलु धरमु जपु भगति न कीनी हउ अभिमान टेढ पगरी ॥१॥ रहाउ ॥

अमर जानि संची इह काइआ इह मिथिआ काची गगरी ॥ जिनहि निवाजि साजि हम कीए तिसहि बिसारि अवर लगरी ॥१॥

संधिक तोहि साध नही कहीअउ सरनि परे तुमरी पगरी ॥ कहि कबीर इह बिनती सुनीअहु मत घालहु जम की खबरी ॥२॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 856) बिलावलु ॥
दरमादे ठाढे दरबारि ॥ तुझ बिनु सुरति करै को मेरी दरसनु दीजै खोल्हि किवार ॥१॥ रहाउ ॥

तुम धन धनी उदार तिआगी स्रवनन्ह सुनीअतु सुजसु तुम्हार ॥ मागउ काहि रंक सभ देखउ तुम्ह ही ते मेरो निसतारु ॥१॥

जैदेउ नामा बिप सुदामा तिन कउ क्रिपा भई है अपार ॥ कहि कबीर तुम सम्रथ दाते चारि पदारथ देत न बार ॥२॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 856) बिलावलु ॥
डंडा मुंद्रा खिंथा आधारी ॥ भ्रम कै भाइ भवै भेखधारी ॥१॥

आसनु पवन दूरि करि बवरे ॥ छोडि कपटु नित हरि भजु बवरे ॥१॥ रहाउ ॥

जिह तू जाचहि सो त्रिभवन भोगी ॥ कहि कबीर केसौ जगि जोगी ॥२॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 857) बिलावलु ॥
इन्हि माइआ जगदीस गुसाई तुम्हरे चरन बिसारे ॥ किंचत प्रीति न उपजै जन कउ जन कहा करहि बेचारे ॥१॥ रहाउ ॥

ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु ध्रिगु इह माइआ ध्रिगु ध्रिगु मति बुधि फंनी ॥ इस माइआ कउ द्रिड़ु करि राखहु बांधे आप बचंनी ॥१॥

किआ खेती किआ लेवा देई परपंच झूठु गुमाना ॥ कहि कबीर ते अंति बिगूते आइआ कालु निदाना ॥२॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 857) बिलावलु ॥
सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥ परम जोति पुरखोतमो जा कै रेख न रूप ॥१॥

रे मन हरि भजु भ्रमु तजहु जगजीवन राम ॥१॥ रहाउ ॥

आवत कछू न दीसई नह दीसै जात ॥ जह उपजै बिनसै तही जैसे पुरिवन पात ॥२॥

मिथिआ करि माइआ तजी सुख सहज बीचारि ॥ कहि कबीर सेवा करहु मन मंझि मुरारि ॥३॥१०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 857) बिलावलु ॥
जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥ जीवत सुंनि समानिआ गुर साखी जागी ॥१॥ रहाउ ॥

कासी ते धुनि ऊपजै धुनि कासी जाई ॥ कासी फूटी पंडिता धुनि कहां समाई ॥१॥

त्रिकुटी संधि मै पेखिआ घट हू घट जागी ॥ ऐसी बुधि समाचरी घट माहि तिआगी ॥२॥

आपु आप ते जानिआ तेज तेजु समाना ॥ कहु कबीर अब जानिआ गोबिद मनु माना ॥३॥११॥


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