Pt 4 - राग बिलावलु - बाणी शब्द, Part 4 - Raag Bilaval - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 831) बिलावलु असटपदीआ महला १ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निकटि वसै देखै सभु सोई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥ विणु भै पइऐ भगति न होई ॥ सबदि रते सदा सुखु होई ॥१॥

ऐसा गिआनु पदारथु नामु ॥ गुरमुखि पावसि रसि रसि मानु ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनु गिआनु कथै सभु कोई ॥ कथि कथि बादु करे दुखु होई ॥ कथि कहणै ते रहै न कोई ॥ बिनु रस राते मुकति न होई ॥२॥

गिआनु धिआनु सभु गुर ते होई ॥ साची रहत साचा मनि सोई ॥ मनमुख कथनी है परु रहत न होई ॥ नावहु भूले थाउ न कोई ॥३॥

मनु माइआ बंधिओ सर जालि ॥ घटि घटि बिआपि रहिओ बिखु नालि ॥ जो आंजै सो दीसै कालि ॥ कारजु सीधो रिदै सम्हालि ॥४॥

सो गिआनी जिनि सबदि लिव लाई ॥ मनमुखि हउमै पति गवाई ॥ आपे करतै भगति कराई ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥५॥

रैणि अंधारी निरमल जोति ॥ नाम बिना झूठे कुचल कछोति ॥ बेदु पुकारै भगति सरोति ॥ सुणि सुणि मानै वेखै जोति ॥६॥

सासत्र सिम्रिति नामु द्रिड़ामं ॥ गुरमुखि सांति ऊतम करामं ॥ मनमुखि जोनी दूख सहामं ॥ बंधन तूटे इकु नामु वसामं ॥७॥

मंने नामु सची पति पूजा ॥ किसु वेखा नाही को दूजा ॥ देखि कहउ भावै मनि सोइ ॥ नानकु कहै अवरु नही कोइ ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 832) बिलावलु महला १ ॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥ इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥ माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥ त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥

तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥ बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥

कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥ धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥ खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥ बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥

गीत राग घन ताल सि कूरे ॥ त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥ दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥ छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥३॥

धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥ अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥ नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥ बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥४॥

सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥ पसू मलेछ नीच चंडाला ॥ गुर ते मुहु फेरे तिन्ह जोनि भवाईऐ ॥ बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥५॥

गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥ हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥ साची दरगह पूछ न होइ ॥ माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥६॥

सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥ रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥ हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥ काल बिकाल सबदि भए नासु ॥७॥

रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥ तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥ ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥ नानक साचे साचि समाइ ॥८॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 832) बिलावलु महला ३ असटपदी घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥ अंतरि लोभु झूठु अभिमानु ॥ बिनु नावै पाजु लहगु निदानि ॥१॥

सतिगुर सेवि नामु वसै मनि चीति ॥ गुरु भेटे हरि नामु चेतावै बिनु नावै होर झूठु परीति ॥१॥ रहाउ ॥

गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥ सबदु चीन्हि सहज घरि आवहु ॥ साचै नाइ वडाई पावहु ॥२॥

आपि न बूझै लोक बुझावै ॥ मन का अंधा अंधु कमावै ॥ दरु घरु महलु ठउरु कैसे पावै ॥३॥

हरि जीउ सेवीऐ अंतरजामी ॥ घट घट अंतरि जिस की जोति समानी ॥ तिसु नालि किआ चलै पहनामी ॥४॥

साचा नामु साचै सबदि जानै ॥ आपै आपु मिलै चूकै अभिमानै ॥ गुरमुखि नामु सदा सदा वखानै ॥५॥

सतिगुरि सेविऐ दूजी दुरमति जाई ॥ अउगण काटि पापा मति खाई ॥ कंचन काइआ जोती जोति समाई ॥६॥

सतिगुरि मिलिऐ वडी वडिआई ॥ दुखु काटै हिरदै नामु वसाई ॥ नामि रते सदा सुखु पाई ॥७॥

गुरमति मानिआ करणी सारु ॥ गुरमति मानिआ मोख दुआरु ॥ नानक गुरमति मानिआ परवारै साधारु ॥८॥१॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 833) बिलावलु महला ४ असटपदीआ घरु ११
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥ गुरमुखि परचै कंचन काइआ निरभउ जोती जोति मिलईआ ॥१॥

मै हरि हरि नामु अधारु रमईआ ॥ खिनु पलु रहि न सकउ बिनु नावै गुरमुखि हरि हरि पाठ पड़ईआ ॥१॥ रहाउ ॥

एकु गिरहु दस दुआर है जा के अहिनिसि तसकर पंच चोर लगईआ ॥ धरमु अरथु सभु हिरि ले जावहि मनमुख अंधुले खबरि न पईआ ॥२॥

कंचन कोटु बहु माणकि भरिआ जागे गिआन तति लिव लईआ ॥ तसकर हेरू आइ लुकाने गुर कै सबदि पकड़ि बंधि पईआ ॥३॥

हरि हरि नामु पोतु बोहिथा खेवटु सबदु गुरु पारि लंघईआ ॥ जमु जागाती नेड़ि न आवै ना को तसकरु चोरु लगईआ ॥४॥

हरि गुण गावै सदा दिनु राती मै हरि जसु कहते अंतु न लहीआ ॥ गुरमुखि मनूआ इकतु घरि आवै मिलउ गोपाल नीसानु बजईआ ॥५॥

नैनी देखि दरसु मनु त्रिपतै स्रवन बाणी गुर सबदु सुणईआ ॥ सुनि सुनि आतम देव है भीने रसि रसि राम गोपाल रवईआ ॥६॥

त्रै गुण माइआ मोहि विआपे तुरीआ गुणु है गुरमुखि लहीआ ॥ एक द्रिसटि सभ सम करि जाणै नदरी आवै सभु ब्रहमु पसरईआ ॥७॥

राम नामु है जोति सबाई गुरमुखि आपे अलखु लखईआ ॥ नानक दीन दइआल भए है भगति भाइ हरि नामि समईआ ॥८॥१॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 833) बिलावलु महला ४ ॥
हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ मै हिरड पलास संगि हरि बुहीआ ॥१॥

जपि जगंनाथ जगदीस गुसईआ ॥ सरणि परे सेई जन उबरे जिउ प्रहिलाद उधारि समईआ ॥१॥ रहाउ ॥

भार अठारह महि चंदनु ऊतम चंदन निकटि सभ चंदनु हुईआ ॥ साकत कूड़े ऊभ सुक हूए मनि अभिमानु विछुड़ि दूरि गईआ ॥२॥

हरि गति मिति करता आपे जाणै सभ बिधि हरि हरि आपि बनईआ ॥ जिसु सतिगुरु भेटे सु कंचनु होवै जो धुरि लिखिआ सु मिटै न मिटईआ ॥३॥

रतन पदारथ गुरमति पावै सागर भगति भंडार खुल्हईआ ॥ गुर चरणी इक सरधा उपजी मै हरि गुण कहते त्रिपति न भईआ ॥४॥

परम बैरागु नित नित हरि धिआए मै हरि गुण कहते भावनी कहीआ ॥ बार बार खिनु खिनु पलु कहीऐ हरि पारु न पावै परै परईआ ॥५॥

सासत बेद पुराण पुकारहि धरमु करहु खटु करम द्रिड़ईआ ॥ मनमुख पाखंडि भरमि विगूते लोभ लहरि नाव भारि बुडईआ ॥६॥

नामु जपहु नामे गति पावहु सिम्रिति सासत्र नामु द्रिड़ईआ ॥ हउमै जाइ त निरमलु होवै गुरमुखि परचै परम पदु पईआ ॥७॥

इहु जगु वरनु रूपु सभु तेरा जितु लावहि से करम कमईआ ॥ नानक जंत वजाए वाजहि जितु भावै तितु राहि चलईआ ॥८॥२॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 834) बिलावलु महला ४ ॥
गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥ राम नामु मेरै प्राणि वसाए सतिगुर परसि हरि नामि समईआ ॥१॥

जन की टेक हरि नामु टिकईआ ॥ सतिगुर की धर लागा जावा गुर किरपा ते हरि दरु लहीआ ॥१॥ रहाउ ॥

इहु सरीरु करम की धरती गुरमुखि मथि मथि ततु कढईआ ॥ लालु जवेहर नामु प्रगासिआ भांडै भाउ पवै तितु अईआ ॥२॥

दासनि दास दास होइ रहीऐ जो जन राम भगत निज भईआ ॥ मनु बुधि अरपि धरउ गुर आगै गुर परसादी मै अकथु कथईआ ॥३॥

मनमुख माइआ मोहि विआपे इहु मनु त्रिसना जलत तिखईआ ॥ गुरमति नामु अम्रित जलु पाइआ अगनि बुझी गुर सबदि बुझईआ ॥४॥

इहु मनु नाचै सतिगुर आगै अनहद सबद धुनि तूर वजईआ ॥ हरि हरि उसतति करै दिनु राती रखि रखि चरण हरि ताल पूरईआ ॥५॥

हरि कै रंगि रता मनु गावै रसि रसाल रसि सबदु रवईआ ॥ निज घरि धार चुऐ अति निरमल जिनि पीआ तिन ही सुखु लहीआ ॥६॥

मनहठि करम करै अभिमानी जिउ बालक बालू घर उसरईआ ॥ आवै लहरि समुंद सागर की खिन महि भिंन भिंन ढहि पईआ ॥७॥

हरि सरु सागरु हरि है आपे इहु जगु है सभु खेलु खेलईआ ॥ जिउ जल तरंग जलु जलहि समावहि नानक आपे आपि रमईआ ॥८॥३॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 835) बिलावलु महला ४ ॥
सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥ अमर पिंड भए साधू संगि जनम मरण दोऊ मिटि गईआ ॥१॥

मेरे मन साधसंगति मिलि रहीआ ॥ क्रिपा करहु मधसूदन माधउ मै खिनु खिनु साधू चरण पखईआ ॥१॥ रहाउ ॥

तजै गिरसतु भइआ बन वासी इकु खिनु मनूआ टिकै न टिकईआ ॥ धावतु धाइ तदे घरि आवै हरि हरि साधू सरणि पवईआ ॥२॥

धीआ पूत छोडि संनिआसी आसा आस मनि बहुतु करईआ ॥ आसा आस करै नही बूझै गुर कै सबदि निरास सुखु लहीआ ॥३॥

उपजी तरक दिग्मबरु होआ मनु दह दिस चलि चलि गवनु करईआ ॥ प्रभवनु करै बूझै नही त्रिसना मिलि संगि साध दइआ घरु लहीआ ॥४॥

आसण सिध सिखहि बहुतेरे मनि मागहि रिधि सिधि चेटक चेटकईआ ॥ त्रिपति संतोखु मनि सांति न आवै मिलि साधू त्रिपति हरि नामि सिधि पईआ ॥५॥

अंडज जेरज सेतज उतभुज सभि वरन रूप जीअ जंत उपईआ ॥ साधू सरणि परै सो उबरै खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु चंडालु चंडईआ ॥६॥

नामा जैदेउ क्मबीरु त्रिलोचनु अउजाति रविदासु चमिआरु चमईआ ॥ जो जो मिलै साधू जन संगति धनु धंना जटु सैणु मिलिआ हरि दईआ ॥७॥

संत जना की हरि पैज रखाई भगति वछलु अंगीकारु करईआ ॥ नानक सरणि परे जगजीवन हरि हरि किरपा धारि रखईआ ॥८॥४॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 835) बिलावलु महला ४ ॥
अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥ मन की बिरथा मन ही जाणै अवरु कि जाणै को पीर परईआ ॥१॥

राम गुरि मोहनि मोहि मनु लईआ ॥ हउ आकल बिकल भई गुर देखे हउ लोट पोट होइ पईआ ॥१॥ रहाउ ॥

हउ निरखत फिरउ सभि देस दिसंतर मै प्रभ देखन को बहुतु मनि चईआ ॥ मनु तनु काटि देउ गुर आगै जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखईआ ॥२॥

कोई आणि सदेसा देइ प्रभ केरा रिद अंतरि मनि तनि मीठ लगईआ ॥ मसतकु काटि देउ चरणा तलि जो हरि प्रभु मेले मेलि मिलईआ ॥३॥

चलु चलु सखी हम प्रभु परबोधह गुण कामण करि हरि प्रभु लहीआ ॥ भगति वछलु उआ को नामु कहीअतु है सरणि प्रभू तिसु पाछै पईआ ॥४॥

खिमा सीगार करे प्रभ खुसीआ मनि दीपक गुर गिआनु बलईआ ॥ रसि रसि भोग करे प्रभु मेरा हम तिसु आगै जीउ कटि कटि पईआ ॥५॥

हरि हरि हारु कंठि है बनिआ मनु मोतीचूरु वड गहन गहनईआ ॥ हरि हरि सरधा सेज विछाई प्रभु छोडि न सकै बहुतु मनि भईआ ॥६॥

कहै प्रभु अवरु अवरु किछु कीजै सभु बादि सीगारु फोकट फोकटईआ ॥ कीओ सीगारु मिलण कै ताई प्रभु लीओ सुहागनि थूक मुखि पईआ ॥७॥

हम चेरी तू अगम गुसाई किआ हम करह तेरै वसि पईआ ॥ दइआ दीन करहु रखि लेवहु नानक हरि गुर सरणि समईआ ॥८॥५॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 836) बिलावलु महला ४ ॥
मै मनि तनि प्रेमु अगम ठाकुर का खिनु खिनु सरधा मनि बहुतु उठईआ ॥ गुर देखे सरधा मन पूरी जिउ चात्रिक प्रिउ प्रिउ बूंद मुखि पईआ ॥१॥

मिलु मिलु सखी हरि कथा सुनईआ ॥ सतिगुरु दइआ करे प्रभु मेले मै तिसु आगै सिरु कटि कटि पईआ ॥१॥ रहाउ ॥

रोमि रोमि मनि तनि इक बेदन मै प्रभ देखे बिनु नीद न पईआ ॥ बैदक नाटिक देखि भुलाने मै हिरदै मनि तनि प्रेम पीर लगईआ ॥२॥

हउ खिनु पलु रहि न सकउ बिनु प्रीतम जिउ बिनु अमलै अमली मरि गईआ ॥ जिन कउ पिआस होइ प्रभ केरी तिन्ह अवरु न भावै बिनु हरि को दुईआ ॥३॥

कोई आनि आनि मेरा प्रभू मिलावै हउ तिसु विटहु बलि बलि घुमि गईआ ॥ अनेक जनम के विछुड़े जन मेले जा सति सति सतिगुर सरणि पवईआ ॥४॥

सेज एक एको प्रभु ठाकुरु महलु न पावै मनमुख भरमईआ ॥ गुरु गुरु करत सरणि जे आवै प्रभु आइ मिलै खिनु ढील न पईआ ॥५॥

करि करि किरिआचार वधाए मनि पाखंड करमु कपट लोभईआ ॥ बेसुआ कै घरि बेटा जनमिआ पिता ताहि किआ नामु सदईआ ॥६॥

पूरब जनमि भगति करि आए गुरि हरि हरि हरि हरि भगति जमईआ ॥ भगति भगति करते हरि पाइआ जा हरि हरि हरि हरि नामि समईआ ॥७॥

प्रभि आणि आणि महिंदी पीसाई आपे घोलि घोलि अंगि लईआ ॥ जिन कउ ठाकुरि किरपा धारी बाह पकरि नानक कढि लईआ ॥८॥६॥२॥१॥६॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 837) रागु बिलावलु महला ५ असटपदी घरु १२
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उपमा जात न कही मेरे प्रभ की उपमा जात न कही ॥ तजि आन सरणि गही ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ चरन कमल अपार ॥ हउ जाउ सद बलिहार ॥ मनि प्रीति लागी ताहि ॥ तजि आन कतहि न जाहि ॥१॥

हरि नाम रसना कहन ॥ मल पाप कलमल दहन ॥ चड़ि नाव संत उधारि ॥ भै तरे सागर पारि ॥२॥

मनि डोरि प्रेम परीति ॥ इह संत निरमल रीति ॥ तजि गए पाप बिकार ॥ हरि मिले प्रभ निरंकार ॥३॥

प्रभ पेखीऐ बिसमाद ॥ चखि अनद पूरन साद ॥ नह डोलीऐ इत ऊत ॥ प्रभ बसे हरि हरि चीत ॥४॥

तिन्ह नाहि नरक निवासु ॥ नित सिमरि प्रभ गुणतासु ॥ ते जमु न पेखहि नैन ॥ सुनि मोहे अनहत बैन ॥५॥

हरि सरणि सूर गुपाल ॥ प्रभ भगत वसि दइआल ॥ हरि निगम लहहि न भेव ॥ नित करहि मुनि जन सेव ॥६॥

दुख दीन दरद निवार ॥ जा की महा बिखड़ी कार ॥ ता की मिति न जानै कोइ ॥ जलि थलि महीअलि सोइ ॥७॥

करि बंदना लख बार ॥ थकि परिओ प्रभ दरबार ॥ प्रभ करहु साधू धूरि ॥ नानक मनसा पूरि ॥८॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 837) बिलावलु महला ५ ॥
प्रभ जनम मरन निवारि ॥ हारि परिओ दुआरि ॥ गहि चरन साधू संग ॥ मन मिसट हरि हरि रंग ॥ करि दइआ लेहु लड़ि लाइ ॥ नानका नामु धिआइ ॥१॥

दीना नाथ दइआल मेरे सुआमी दीना नाथ दइआल ॥ जाचउ संत रवाल ॥१॥ रहाउ ॥

संसारु बिखिआ कूप ॥ तम अगिआन मोहत घूप ॥ गहि भुजा प्रभ जी लेहु ॥ हरि नामु अपुना देहु ॥ प्रभ तुझ बिना नही ठाउ ॥ नानका बलि बलि जाउ ॥२॥

लोभि मोहि बाधी देह ॥ बिनु भजन होवत खेह ॥ जमदूत महा भइआन ॥ चित गुपत करमहि जान ॥ दिनु रैनि साखि सुनाइ ॥ नानका हरि सरनाइ ॥३॥

भै भंजना मुरारि ॥ करि दइआ पतित उधारि ॥ मेरे दोख गने न जाहि ॥ हरि बिना कतहि समाहि ॥ गहि ओट चितवी नाथ ॥ नानका दे रखु हाथ ॥४॥

हरि गुण निधे गोपाल ॥ सरब घट प्रतिपाल ॥ मनि प्रीति दरसन पिआस ॥ गोबिंद पूरन आस ॥ इक निमख रहनु न जाइ ॥ वड भागि नानक पाइ ॥५॥

प्रभ तुझ बिना नही होर ॥ मनि प्रीति चंद चकोर ॥ जिउ मीन जल सिउ हेतु ॥ अलि कमल भिंनु न भेतु ॥ जिउ चकवी सूरज आस ॥ नानक चरन पिआस ॥६॥

जिउ तरुनि भरत परान ॥ जिउ लोभीऐ धनु दानु ॥ जिउ दूध जलहि संजोगु ॥ जिउ महा खुधिआरथ भोगु ॥ जिउ मात पूतहि हेतु ॥ हरि सिमरि नानक नेत ॥७॥

जिउ दीप पतन पतंग ॥ जिउ चोरु हिरत निसंग ॥ मैगलहि कामै बंधु ॥ जिउ ग्रसत बिखई धंधु ॥ जिउ जूआर बिसनु न जाइ ॥ हरि नानक इहु मनु लाइ ॥८॥

कुरंक नादै नेहु ॥ चात्रिकु चाहत मेहु ॥ जन जीवना सतसंगि ॥ गोबिदु भजना रंगि ॥ रसना बखानै नामु ॥ नानक दरसन दानु ॥९॥

गुन गाइ सुनि लिखि देइ ॥ सो सरब फल हरि लेइ ॥ कुल समूह करत उधारु ॥ संसारु उतरसि पारि ॥ हरि चरन बोहिथ ताहि ॥ मिलि साधसंगि जसु गाहि ॥ हरि पैज रखै मुरारि ॥ हरि नानक सरनि दुआरि ॥१०॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 838) बिलावलु महला १ थिती घरु १० जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकम एकंकारु निराला ॥ अमरु अजोनी जाति न जाला ॥ अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥ खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥ जो देखि दिखावै तिस कउ बलि जाई ॥ गुर परसादि परम पदु पाई ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) किआ जपु जापउ बिनु जगदीसै ॥ गुर कै सबदि महलु घरु दीसै ॥१॥ रहाउ ॥

दूजै भाइ लगे पछुताणे ॥ जम दरि बाधे आवण जाणे ॥ किआ लै आवहि किआ ले जाहि ॥ सिरि जमकालु सि चोटा खाहि ॥ बिनु गुर सबद न छूटसि कोइ ॥ पाखंडि कीन्है मुकति न होइ ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) आपे सचु कीआ कर जोड़ि ॥ अंडज फोड़ि जोड़ि विछोड़ि ॥ धरति अकासु कीए बैसण कउ थाउ ॥ राति दिनंतु कीए भउ भाउ ॥ जिनि कीए करि वेखणहारा ॥ अवरु न दूजा सिरजणहारा ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) त्रितीआ ब्रहमा बिसनु महेसा ॥ देवी देव उपाए वेसा ॥ जोती जाती गणत न आवै ॥ जिनि साजी सो कीमति पावै ॥ कीमति पाइ रहिआ भरपूरि ॥ किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) चउथि उपाए चारे बेदा ॥ खाणी चारे बाणी भेदा ॥ असट दसा खटु तीनि उपाए ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥ तीनि समावै चउथै वासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) पंचमी पंच भूत बेताला ॥ आपि अगोचरु पुरखु निराला ॥ इकि भ्रमि भूखे मोह पिआसे ॥ इकि रसु चाखि सबदि त्रिपतासे ॥ इकि रंगि राते इकि मरि धूरि ॥ इकि दरि घरि साचै देखि हदूरि ॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) झूठे कउ नाही पति नाउ ॥ कबहु न सूचा काला काउ ॥ पिंजरि पंखी बंधिआ कोइ ॥ छेरीं भरमै मुकति न होइ ॥ तउ छूटै जा खसमु छडाए ॥ गुरमति मेले भगति द्रिड़ाए ॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) खसटी खटु दरसन प्रभ साजे ॥ अनहद सबदु निराला वाजे ॥ जे प्रभ भावै ता महलि बुलावै ॥ सबदे भेदे तउ पति पावै ॥ करि करि वेस खपहि जलि जावहि ॥ साचै साचे साचि समावहि ॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) सपतमी सतु संतोखु सरीरि ॥ सात समुंद भरे निरमल नीरि ॥ मजनु सीलु सचु रिदै वीचारि ॥ गुर कै सबदि पावै सभि पारि ॥ मनि साचा मुखि साचउ भाइ ॥ सचु नीसाणै ठाक न पाइ ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) असटमी असट सिधि बुधि साधै ॥ सचु निहकेवलु करमि अराधै ॥ पउण पाणी अगनी बिसराउ ॥ तही निरंजनु साचो नाउ ॥ तिसु महि मनूआ रहिआ लिव लाइ ॥ प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 839) नाउ नउमी नवे नाथ नव खंडा ॥ घटि घटि नाथु महा बलवंडा ॥ आई पूता इहु जगु सारा ॥ प्रभ आदेसु आदि रखवारा ॥ आदि जुगादी है भी होगु ॥ ओहु अपर्मपरु करणै जोगु ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) दसमी नामु दानु इसनानु ॥ अनदिनु मजनु सचा गुण गिआनु ॥ सचि मैलु न लागै भ्रमु भउ भागै ॥ बिलमु न तूटसि काचै तागै ॥ जिउ तागा जगु एवै जाणहु ॥ असथिरु चीतु साचि रंगु माणहु ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) एकादसी इकु रिदै वसावै ॥ हिंसा ममता मोहु चुकावै ॥ फलु पावै ब्रतु आतम चीनै ॥ पाखंडि राचि ततु नही बीनै ॥ निरमलु निराहारु निहकेवलु ॥ सूचै साचे ना लागै मलु ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) जह देखउ तह एको एका ॥ होरि जीअ उपाए वेको वेका ॥ फलोहार कीए फलु जाइ ॥ रस कस खाए सादु गवाइ ॥ कूड़ै लालचि लपटै लपटाइ ॥ छूटै गुरमुखि साचु कमाइ ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) दुआदसि मुद्रा मनु अउधूता ॥ अहिनिसि जागहि कबहि न सूता ॥ जागतु जागि रहै लिव लाइ ॥ गुर परचै तिसु कालु न खाइ ॥ अतीत भए मारे बैराई ॥ प्रणवति नानक तह लिव लाई ॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) दुआदसी दइआ दानु करि जाणै ॥ बाहरि जातो भीतरि आणै ॥ बरती बरत रहै निहकाम ॥ अजपा जापु जपै मुखि नाम ॥ तीनि भवण महि एको जाणै ॥ सभि सुचि संजम साचु पछाणै ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) तेरसि तरवर समुद कनारै ॥ अम्रितु मूलु सिखरि लिव तारै ॥ डर डरि मरै न बूडै कोइ ॥ निडरु बूडि मरै पति खोइ ॥ डर महि घरु घर महि डरु जाणै ॥ तखति निवासु सचु मनि भाणै ॥१७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) चउदसि चउथे थावहि लहि पावै ॥ राजस तामस सत काल समावै ॥ ससीअर कै घरि सूरु समावै ॥ जोग जुगति की कीमति पावै ॥ चउदसि भवन पाताल समाए ॥ खंड ब्रहमंड रहिआ लिव लाए ॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) अमावसिआ चंदु गुपतु गैणारि ॥ बूझहु गिआनी सबदु बीचारि ॥ ससीअरु गगनि जोति तिहु लोई ॥ करि करि वेखै करता सोई ॥ गुर ते दीसै सो तिस ही माहि ॥ मनमुखि भूले आवहि जाहि ॥१९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 840) घरु दरु थापि थिरु थानि सुहावै ॥ आपु पछाणै जा सतिगुरु पावै ॥ जह आसा तह बिनसि बिनासा ॥ फूटै खपरु दुबिधा मनसा ॥ ममता जाल ते रहै उदासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥२०॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 841) बिलावलु महला ३ वार सत घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥ आपे वरतै अवरु न कोई ॥ ओति पोति जगु रहिआ परोई ॥ आपे करता करै सु होई ॥ नामि रते सदा सुखु होई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥१॥

हिरदै जपनी जपउ गुणतासा ॥ हरि अगम अगोचरु अपर्मपर सुआमी जन पगि लगि धिआवउ होइ दासनि दासा ॥१॥ रहाउ ॥

सोमवारि सचि रहिआ समाइ ॥ तिस की कीमति कही न जाइ ॥ आखि आखि रहे सभि लिव लाइ ॥ जिसु देवै तिसु पलै पाइ ॥ अगम अगोचरु लखिआ न जाइ ॥ गुर कै सबदि हरि रहिआ समाइ ॥२॥

मंगलि माइआ मोहु उपाइआ ॥ आपे सिरि सिरि धंधै लाइआ ॥ आपि बुझाए सोई बूझै ॥ गुर कै सबदि दरु घरु सूझै ॥ प्रेम भगति करे लिव लाइ ॥ हउमै ममता सबदि जलाइ ॥३॥

बुधवारि आपे बुधि सारु ॥ गुरमुखि करणी सबदु वीचारु ॥ नामि रते मनु निरमलु होइ ॥ हरि गुण गावै हउमै मलु खोइ ॥ दरि सचै सद सोभा पाए ॥ नामि रते गुर सबदि सुहाए ॥४॥

लाहा नामु पाए गुर दुआरि ॥ आपे देवै देवणहारु ॥ जो देवै तिस कउ बलि जाईऐ ॥ गुर परसादी आपु गवाईऐ ॥ नानक नामु रखहु उर धारि ॥ देवणहारे कउ जैकारु ॥५॥

वीरवारि वीर भरमि भुलाए ॥ प्रेत भूत सभि दूजै लाए ॥ आपि उपाए करि वेखै वेका ॥ सभना करते तेरी टेका ॥ जीअ जंत तेरी सरणाई ॥ सो मिलै जिसु लैहि मिलाई ॥६॥

सुक्रवारि प्रभु रहिआ समाई ॥ आपि उपाइ सभ कीमति पाई ॥ गुरमुखि होवै सु करै बीचारु ॥ सचु संजमु करणी है कार ॥ वरतु नेमु निताप्रति पूजा ॥ बिनु बूझे सभु भाउ है दूजा ॥७॥

छनिछरवारि सउण सासत बीचारु ॥ हउमै मेरा भरमै संसारु ॥ मनमुखु अंधा दूजै भाइ ॥ जम दरि बाधा चोटा खाइ ॥ गुर परसादी सदा सुखु पाए ॥ सचु करणी साचि लिव लाए ॥८॥

सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥ हउमै मारि सचि लिव लागी ॥ तेरै रंगि राते सहजि सुभाइ ॥ तू सुखदाता लैहि मिलाइ ॥ एकस ते दूजा नाही कोइ ॥ गुरमुखि बूझै सोझी होइ ॥९॥

पंद्रह थितीं तै सत वार ॥ माहा रुती आवहि वार वार ॥ दिनसु रैणि तिवै संसारु ॥ आवा गउणु कीआ करतारि ॥ निहचलु साचु रहिआ कल धारि ॥ नानक गुरमुखि बूझै को सबदु वीचारि ॥१०॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 842) बिलावलु महला ३ ॥
आदि पुरखु आपे स्रिसटि साजे ॥ जीअ जंत माइआ मोहि पाजे ॥ दूजै भाइ परपंचि लागे ॥ आवहि जावहि मरहि अभागे ॥ सतिगुरि भेटिऐ सोझी पाइ ॥ परपंचु चूकै सचि समाइ ॥१॥

जा कै मसतकि लिखिआ लेखु ॥ ता कै मनि वसिआ प्रभु एकु ॥१॥ रहाउ ॥

स्रिसटि उपाइ आपे सभु वेखै ॥ कोइ न मेटै तेरै लेखै ॥ सिध साधिक जे को कहै कहाए ॥ भरमे भूला आवै जाए ॥ सतिगुरु सेवै सो जनु बूझै ॥ हउमै मारे ता दरु सूझै ॥२॥

एकसु ते सभु दूजा हूआ ॥ एको वरतै अवरु न बीआ ॥ दूजे ते जे एको जाणै ॥ गुर कै सबदि हरि दरि नीसाणै ॥ सतिगुरु भेटे ता एको पाए ॥ विचहु दूजा ठाकि रहाए ॥३॥

जिस दा साहिबु डाढा होइ ॥ तिस नो मारि न साकै कोइ ॥ साहिब की सेवकु रहै सरणाई ॥ आपे बखसे दे वडिआई ॥ तिस ते ऊपरि नाही कोइ ॥ कउणु डरै डरु किस का होइ ॥४॥

गुरमती सांति वसै सरीर ॥ सबदु चीन्हि फिरि लगै न पीर ॥ आवै न जाइ ना दुखु पाए ॥ नामे राते सहजि समाए ॥ नानक गुरमुखि वेखै हदूरि ॥ मेरा प्रभु सद रहिआ भरपूरि ॥५॥

इकि सेवक इकि भरमि भुलाए ॥ आपे करे हरि आपि कराए ॥ एको वरतै अवरु न कोइ ॥ मनि रोसु कीजै जे दूजा होइ ॥ सतिगुरु सेवे करणी सारी ॥ दरि साचै साचे वीचारी ॥६॥

थिती वार सभि सबदि सुहाए ॥ सतिगुरु सेवे ता फलु पाए ॥ थिती वार सभि आवहि जाहि ॥ गुर सबदु निहचलु सदा सचि समाहि ॥ थिती वार ता जा सचि राते ॥ बिनु नावै सभि भरमहि काचे ॥७॥

मनमुख मरहि मरि बिगती जाहि ॥ एकु न चेतहि दूजै लोभाहि ॥ अचेत पिंडी अगिआन अंधारु ॥ बिनु सबदै किउ पाए पारु ॥ आपि उपाए उपावणहारु ॥ आपे कीतोनु गुर वीचारु ॥८॥

बहुते भेख करहि भेखधारी ॥ भवि भवि भरमहि काची सारी ॥ ऐथै सुखु न आगै होइ ॥ मनमुख मुए अपणा जनमु खोइ ॥ सतिगुरु सेवे भरमु चुकाए ॥ घर ही अंदरि सचु महलु पाए ॥९॥

आपे पूरा करे सु होइ ॥ एहि थिती वार दूजा दोइ ॥ सतिगुर बाझहु अंधु गुबारु ॥ थिती वार सेवहि मुगध गवार ॥ नानक गुरमुखि बूझै सोझी पाइ ॥ इकतु नामि सदा रहिआ समाइ ॥१०॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 843) बिलावलु महला १ ॥
मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥ मोही प्रेम पिरे प्रभि अबिनासी राम ॥ अविगतो हरि नाथु नाथह तिसै भावै सो थीऐ ॥ किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीऐ ॥ मै अवरु गिआनु न धिआनु पूजा हरि नामु अंतरि वसि रहे ॥ भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे ॥१॥

भिंनड़ी रैणि भली दिनस सुहाए राम ॥ निज घरि सूतड़ीए पिरमु जगाए राम ॥ नव हाणि नव धन सबदि जागी आपणे पिर भाणीआ ॥ तजि कूड़ु कपटु सुभाउ दूजा चाकरी लोकाणीआ ॥ मै नामु हरि का हारु कंठे साच सबदु नीसाणिआ ॥ कर जोड़ि नानकु साचु मागै नदरि करि तुधु भाणिआ ॥२॥

जागु सलोनड़ीए बोलै गुरबाणी राम ॥ जिनि सुणि मंनिअड़ी अकथ कहाणी राम ॥ अकथ कहाणी पदु निरबाणी को विरला गुरमुखि बूझए ॥ ओहु सबदि समाए आपु गवाए त्रिभवण सोझी सूझए ॥ रहै अतीतु अपर्मपरि राता साचु मनि गुण सारिआ ॥ ओहु पूरि रहिआ सरब ठाई नानका उरि धारिआ ॥३॥

महलि बुलाइड़ीए भगति सनेही राम ॥ गुरमति मनि रहसी सीझसि देही राम ॥ मनु मारि रीझै सबदि सीझै त्रै लोक नाथु पछाणए ॥ मनु डीगि डोलि न जाइ कत ही आपणा पिरु जाणए ॥ मै आधारु तेरा तू खसमु मेरा मै ताणु तकीआ तेरओ ॥ साचि सूचा सदा नानक गुर सबदि झगरु निबेरओ ॥४॥२॥


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