Pt 3 - राग बिलावलु - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Bilaval - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
रोगु मिटाइआ आपि प्रभि उपजिआ सुखु सांति ॥ वड परतापु अचरज रूपु हरि कीन्ही दाति ॥१॥

गुरि गोविंदि क्रिपा करी राखिआ मेरा भाई ॥ हम तिस की सरणागती जो सदा सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

बिरथी कदे न होवई जन की अरदासि ॥ नानक जोरु गोविंद का पूरन गुणतासि ॥२॥१३॥७७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
मरि मरि जनमे जिन बिसरिआ जीवन का दाता ॥ पारब्रहमु जनि सेविआ अनदिनु रंगि राता ॥१॥

सांति सहजु आनदु घना पूरन भई आस ॥ सुखु पाइआ हरि साधसंगि सिमरत गुणतास ॥१॥ रहाउ ॥

सुणि सुआमी अरदासि जन तुम्ह अंतरजामी ॥ थान थनंतरि रवि रहे नानक के सुआमी ॥२॥१४॥७८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥ चउगिरद हमारै राम कार दुखु लगै न भाई ॥१॥

सतिगुरु पूरा भेटिआ जिनि बणत बणाई ॥ राम नामु अउखधु दीआ एका लिव लाई ॥१॥ रहाउ ॥

राखि लीए तिनि रखनहारि सभ बिआधि मिटाई ॥ कहु नानक किरपा भई प्रभ भए सहाई ॥२॥१५॥७९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥ सुख सांति सहज आनद भए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥

भगत जना की बेनती सुणी प्रभि आपि ॥ रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥१॥

दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥ मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥२॥१६॥८०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 820) रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥१॥ रहाउ ॥

सेवत सेवि सेवि साध सेवउ सदा करउ किरताए ॥ अभै दानु पावउ पुरख दाते मिलि संगति हरि गुण गाए ॥१॥

रसना अगह अगह गुन राती नैन दरस रंगु लाए ॥ होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन मोहि चरण रिदै वसाए ॥२॥

सभहू तलै तलै सभ ऊपरि एह द्रिसटि द्रिसटाए ॥ अभिमानु खोइ खोइ खोइ खोई हउ मो कउ सतिगुर मंत्रु द्रिड़ाए ॥३॥

अतुलु अतुलु अतुलु नह तुलीऐ भगति वछलु किरपाए ॥ जो जो सरणि परिओ गुर नानक अभै दानु सुख पाए ॥४॥१॥८१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 820) बिलावलु महला ५ ॥
प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥ नमसकार डंडउति बंदना अनिक बार जाउ बारै ॥१॥ रहाउ ॥

ऊठत बैठत सोवत जागत इहु मनु तुझहि चितारै ॥ सूख दूख इसु मन की बिरथा तुझ ही आगै सारै ॥१॥

तू मेरी ओट बल बुधि धनु तुम ही तुमहि मेरै परवारै ॥ जो तुम करहु सोई भल हमरै पेखि नानक सुख चरनारै ॥२॥२॥८२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 820) बिलावलु महला ५ ॥
सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥ मोह मगन पतित संगि प्रानी ऐसे मनहि बिसारन ॥१॥ रहाउ ॥

संचि बिखिआ ले ग्राहजु कीनी अम्रितु मन ते डारन ॥ काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥१॥

इन ते काढि लेहु मेरे सुआमी हारि परे तुम्ह सारन ॥ नानक की बेनंती प्रभ पहि साधसंगि रंक तारन ॥२॥३॥८३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 820) बिलावलु महला ५ ॥
संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥ कथा कीरतनु आनंद मंगल धुनि पूरि रही दिनसु अरु राति ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा अपने प्रभि कीने नाम अपुने की कीनी दाति ॥ आठ पहर गुन गावत प्रभ के काम क्रोध इसु तन ते जात ॥१॥

त्रिपति अघाए पेखि प्रभ दरसनु अम्रित हरि रसु भोजनु खात ॥ चरन सरन नानक प्रभ तेरी करि किरपा संतसंगि मिलात ॥२॥४॥८४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 821) बिलावलु महला ५ ॥
राखि लीए अपने जन आप ॥ करि किरपा हरि हरि नामु दीनो बिनसि गए सभ सोग संताप ॥१॥ रहाउ ॥

गुण गोविंद गावहु सभि हरि जन राग रतन रसना आलाप ॥ कोटि जनम की त्रिसना निवरी राम रसाइणि आतम ध्राप ॥१॥

चरण गहे सरणि सुखदाते गुर कै बचनि जपे हरि जाप ॥ सागर तरे भरम भै बिनसे कहु नानक ठाकुर परताप ॥२॥५॥८५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 821) बिलावलु महला ५ ॥
तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥ सतिगुर अपने कउ बलि जाई जिनि पैज रखी सारै संसारि ॥१॥ रहाउ ॥

करु मसतकि धारि बालिकु रखि लीनो ॥ प्रभि अम्रित नामु महा रसु दीनो ॥१॥

दास की लाज रखै मिहरवानु ॥ गुरु नानकु बोलै दरगह परवानु ॥२॥६॥८६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 821) रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥ बिनसिओ अंधकार तिह मंदरि रतन कोठड़ी खुल्ही अनूपा ॥१॥ रहाउ ॥

बिसमन बिसम भए जउ पेखिओ कहनु न जाइ वडिआई ॥ मगन भए ऊहा संगि माते ओति पोति लपटाई ॥१॥

आल जाल नही कछू जंजारा अह्मबुधि नही भोरा ॥ ऊचन ऊचा बीचु न खीचा हउ तेरा तूं मोरा ॥२॥

एकंकारु एकु पासारा एकै अपर अपारा ॥ एकु बिसथीरनु एकु स्मपूरनु एकै प्रान अधारा ॥३॥

निरमल निरमल सूचा सूचो सूचा सूचो सूचा ॥ अंत न अंता सदा बेअंता कहु नानक ऊचो ऊचा ॥४॥१॥८७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 821) बिलावलु महला ५ ॥
बिनु हरि कामि न आवत हे ॥ जा सिउ राचि माचि तुम्ह लागे ओह मोहनी मोहावत हे ॥१॥ रहाउ ॥

कनिक कामिनी सेज सोहनी छोडि खिनै महि जावत हे ॥ उरझि रहिओ इंद्री रस प्रेरिओ बिखै ठगउरी खावत हे ॥१॥

त्रिण को मंदरु साजि सवारिओ पावकु तलै जरावत हे ॥ ऐसे गड़ महि ऐठि हठीलो फूलि फूलि किआ पावत हे ॥२॥

पंच दूत मूड परि ठाढे केस गहे फेरावत हे ॥ द्रिसटि न आवहि अंध अगिआनी सोइ रहिओ मद मावत हे ॥३॥

जालु पसारि चोग बिसथारी पंखी जिउ फाहावत हे ॥ कहु नानक बंधन काटन कउ मै सतिगुरु पुरखु धिआवत हे ॥४॥२॥८८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 822) बिलावलु महला ५ ॥
हरि हरि नामु अपार अमोली ॥ प्रान पिआरो मनहि अधारो चीति चितवउ जैसे पान त्मबोली ॥१॥ रहाउ ॥

सहजि समाइओ गुरहि बताइओ रंगि रंगी मेरे तन की चोली ॥ प्रिअ मुखि लागो जउ वडभागो सुहागु हमारो कतहु न डोली ॥१॥

रूप न धूप न गंध न दीपा ओति पोति अंग अंग संगि मउली ॥ कहु नानक प्रिअ रवी सुहागनि अति नीकी मेरी बनी खटोली ॥२॥३॥८९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 822) बिलावलु महला ५ ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥ जब ते भेटे साध दइआरा तब ते दुरमति दूरि भई ॥१॥ रहाउ ॥

पूरन पूरि रहिओ स्मपूरन सीतल सांति दइआल दई ॥ काम क्रोध त्रिसना अहंकारा तन ते होए सगल खई ॥१॥

सतु संतोखु दइआ धरमु सुचि संतन ते इहु मंतु लई ॥ कहु नानक जिनि मनहु पछानिआ तिन कउ सगली सोझ पई ॥२॥४॥९०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 822) बिलावलु महला ५ ॥
किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥ ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा बेअंत ठाकुर तेरी गति नही पाई ॥१॥

किआ कथीऐ किछु कथनु न जाई ॥ जह जह देखा तह रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ ॥

जह महा भइआन दूख जम सुनीऐ तह मेरे प्रभ तूहै सहाई ॥ सरनि परिओ हरि चरन गहे प्रभ गुरि नानक कउ बूझ बुझाई ॥२॥५॥९१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 822) बिलावलु महला ५ ॥
अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥ अचरजु सुनिओ परापति भेटुले संत चरन चरन मनु लाईऐ ॥१॥

कितु बिधीऐ कितु संजमि पाईऐ ॥ कहु सुरजन कितु जुगती धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

जो मानुखु मानुख की सेवा ओहु तिस की लई लई फुनि जाईऐ ॥ नानक सरनि सरणि सुख सागर मोहि टेक तेरो इक नाईऐ ॥२॥६॥९२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 822) बिलावलु महला ५ ॥
संत सरणि संत टहल करी ॥ धंधु बंधु अरु सगल जंजारो अवर काज ते छूटि परी ॥१॥ रहाउ ॥

सूख सहज अरु घनो अनंदा गुर ते पाइओ नामु हरी ॥ ऐसो हरि रसु बरनि न साकउ गुरि पूरै मेरी उलटि धरी ॥१॥

पेखिओ मोहनु सभ कै संगे ऊन न काहू सगल भरी ॥ पूरन पूरि रहिओ किरपा निधि कहु नानक मेरी पूरी परी ॥२॥७॥९३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 823) बिलावलु महला ५ ॥
मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥ जान प्रबीन ठाकुर प्रभ मेरे तिसु आगै किआ कहता ॥१॥ रहाउ ॥

अनबोले कउ तुही पछानहि जो जीअन महि होता ॥ रे मन काइ कहा लउ डहकहि जउ पेखत ही संगि सुनता ॥१॥

ऐसो जानि भए मनि आनद आन न बीओ करता ॥ कहु नानक गुर भए दइआरा हरि रंगु न कबहू लहता ॥२॥८॥९४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 823) बिलावलु महला ५ ॥
निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥ इह नीसानी सुनहु तुम भाई जिउ कालर भीति गिरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

जउ देखै छिद्रु तउ निंदकु उमाहै भलो देखि दुख भरीऐ ॥ आठ पहर चितवै नही पहुचै बुरा चितवत चितवत मरीऐ ॥१॥

निंदकु प्रभू भुलाइआ कालु नेरै आइआ हरि जन सिउ बादु उठरीऐ ॥ नानक का राखा आपि प्रभु सुआमी किआ मानस बपुरे करीऐ ॥२॥९॥९५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 823) बिलावलु महला ५ ॥
ऐसे काहे भूलि परे ॥ करहि करावहि मूकरि पावहि पेखत सुनत सदा संगि हरे ॥१॥ रहाउ ॥

काच बिहाझन कंचन छाडन बैरी संगि हेतु साजन तिआगि खरे ॥ होवनु कउरा अनहोवनु मीठा बिखिआ महि लपटाइ जरे ॥१॥

अंध कूप महि परिओ परानी भरम गुबार मोह बंधि परे ॥ कहु नानक प्रभ होत दइआरा गुरु भेटै काढै बाह फरे ॥२॥१०॥९६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 823) बिलावलु महला ५ ॥
मन तन रसना हरि चीन्हा ॥ भए अनंदा मिटे अंदेसे सरब सूख मो कउ गुरि दीन्हा ॥१॥ रहाउ ॥

इआनप ते सभ भई सिआनप प्रभु मेरा दाना बीना ॥ हाथ देइ राखै अपने कउ काहू न करते कछु खीना ॥१॥

बलि जावउ दरसन साधू कै जिह प्रसादि हरि नामु लीना ॥ कहु नानक ठाकुर भारोसै कहू न मानिओ मनि छीना ॥२॥११॥९७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 823) बिलावलु महला ५ ॥
गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥ अम्रित नामु रिदे महि दीनो जनम जनम की मैलु गई ॥१॥ रहाउ ॥

निवरे दूत दुसट बैराई गुर पूरे का जपिआ जापु ॥ कहा करै कोई बेचारा प्रभ मेरे का बड परतापु ॥१॥

सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ चरन कमल रखु मन माही ॥ ता की सरनि परिओ नानक दासु जा ते ऊपरि को नाही ॥२॥१२॥९८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 824) बिलावलु महला ५ ॥
सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥ जरा मरा कछु दूखु न बिआपै आगै दरगह पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥

आपु तिआगि परीऐ नित सरनी गुर ते पाईऐ एहु निधानु ॥ जनम मरण की कटीऐ फासी साची दरगह का नीसानु ॥१॥

जो तुम्ह करहु सोई भल मानउ मन ते छूटै सगल गुमानु ॥ कहु नानक ता की सरणाई जा का कीआ सगल जहानु ॥२॥१३॥९९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 824) बिलावलु महला ५ ॥
मन तन अंतरि प्रभु आही ॥ हरि गुन गावत परउपकार नित तिसु रसना का मोलु किछु नाही ॥१॥ रहाउ ॥

कुल समूह उधरे खिन भीतरि जनम जनम की मलु लाही ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना अनद सेती बिखिआ बनु गाही ॥१॥

चरन प्रभू के बोहिथु पाए भव सागरु पारि पराही ॥ संत सेवक भगत हरि ता के नानक मनु लागा है ताही ॥२॥१४॥१००॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 824) बिलावलु महला ५ ॥
धीरउ देखि तुम्हारे रंगा ॥ तुही सुआमी अंतरजामी तूही वसहि साध कै संगा ॥१॥ रहाउ ॥

खिन महि थापि निवाजे ठाकुर नीच कीट ते करहि राजंगा ॥१॥

कबहू न बिसरै हीए मोरे ते नानक दास इही दानु मंगा ॥२॥१५॥१०१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 824) बिलावलु महला ५ ॥
अचुत पूजा जोग गोपाल ॥ मनु तनु अरपि रखउ हरि आगै सरब जीआ का है प्रतिपाल ॥१॥ रहाउ ॥

सरनि सम्रथ अकथ सुखदाता किरपा सिंधु बडो दइआल ॥ कंठि लाइ राखै अपने कउ तिस नो लगै न ताती बाल ॥१॥

दामोदर दइआल सुआमी सरबसु संत जना धन माल ॥ नानक जाचिक दरसु प्रभ मागै संत जना की मिलै रवाल ॥२॥१६॥१०२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 824) बिलावलु महला ५ ॥
सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥ साधसंगि मिलि हरि गुन गाए जमदूतन कउ त्रास अहे ॥१॥ रहाउ ॥

जेते पुनहचरन से कीन्हे मनि तनि प्रभ के चरण गहे ॥ आवण जाणु भरमु भउ नाठा जनम जनम के किलविख दहे ॥१॥

निरभउ होइ भजहु जगदीसै एहु पदारथु वडभागि लहे ॥ करि किरपा पूरन प्रभ दाते निरमल जसु नानक दास कहे ॥२॥१७॥१०३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 825) बिलावलु महला ५ ॥
सुलही ते नाराइण राखु ॥ सुलही का हाथु कही न पहुचै सुलही होइ मूआ नापाकु ॥१॥ रहाउ ॥

काढि कुठारु खसमि सिरु काटिआ खिन महि होइ गइआ है खाकु ॥ मंदा चितवत चितवत पचिआ जिनि रचिआ तिनि दीना धाकु ॥१॥

पुत्र मीत धनु किछू न रहिओ सु छोडि गइआ सभ भाई साकु ॥ कहु नानक तिसु प्रभ बलिहारी जिनि जन का कीनो पूरन वाकु ॥२॥१८॥१०४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 825) बिलावलु महला ५ ॥
पूरे गुर की पूरी सेव ॥ आपे आपि वरतै सुआमी कारजु रासि कीआ गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥

आदि मधि प्रभु अंति सुआमी अपना थाटु बनाइओ आपि ॥ अपने सेवक की आपे राखै प्रभ मेरे को वड परतापु ॥१॥

पारब्रहम परमेसुर सतिगुर वसि कीन्हे जिनि सगले जंत ॥ चरन कमल नानक सरणाई राम नाम जपि निरमल मंत ॥२॥१९॥१०५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 825) बिलावलु महला ५ ॥
ताप पाप ते राखे आप ॥ सीतल भए गुर चरनी लागे राम नाम हिरदे महि जाप ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा हसत प्रभि दीने जगत उधार नव खंड प्रताप ॥ दुख बिनसे सुख अनद प्रवेसा त्रिसन बुझी मन तन सचु ध्राप ॥१॥

अनाथ को नाथु सरणि समरथा सगल स्रिसटि को माई बापु ॥ भगति वछल भै भंजन सुआमी गुण गावत नानक आलाप ॥२॥२०॥१०६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 825) बिलावलु महला ५ ॥
जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥ पारब्रहमु परमेसरु धिआइआ कुसल खेम होए कलिआन ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु पूरा भेटिओ बड भागी अंतरजामी सुघड़ु सुजानु ॥ हाथ देइ राखे करि अपने बड समरथु निमाणिआ को मानु ॥१॥

भ्रम भै बिनसि गए खिन भीतरि अंधकार प्रगटे चानाणु ॥ सासि सासि आराधै नानकु सदा सदा जाईऐ कुरबाणु ॥२॥२१॥१०७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 825) बिलावलु महला ५ ॥
दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥ हलत पलत पारब्रहमि सवारे कारज होए सगले पूरे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपत सुख सहजे मजनु होवत साधू धूरे ॥ आवण जाण रहे थिति पाई जनम मरण के मिटे बिसूरे ॥१॥

भ्रम भै तरे छुटे भै जम के घटि घटि एकु रहिआ भरपूरे ॥ नानक सरणि परिओ दुख भंजन अंतरि बाहरि पेखि हजूरे ॥२॥२२॥१०८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 826) बिलावलु महला ५ ॥
दरसनु देखत दोख नसे ॥ कबहु न होवहु द्रिसटि अगोचर जीअ कै संगि बसे ॥१॥ रहाउ ॥

प्रीतम प्रान अधार सुआमी ॥ पूरि रहे प्रभ अंतरजामी ॥१॥

किआ गुण तेरे सारि सम्हारी ॥ सासि सासि प्रभ तुझहि चितारी ॥२॥

किरपा निधि प्रभ दीन दइआला ॥ जीअ जंत की करहु प्रतिपाला ॥३॥

आठ पहर तेरा नामु जनु जापे ॥ नानक प्रीति लाई प्रभि आपे ॥४॥२३॥१०९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 826) बिलावलु महला ५ ॥
तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥ राम नाम का भजनु न कीनो करत बिकार निसि भोरु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक प्रकार भोजन नित खाते मुख दंता घसि खीन खइआ ॥ मेरी मेरी करि करि मूठउ पाप करत नह परी दइआ ॥१॥

महा बिकार घोर दुख सागर तिसु महि प्राणी गलतु पइआ ॥ सरनि परे नानक सुआमी की बाह पकरि प्रभि काढि लइआ ॥२॥२४॥११०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 826) बिलावलु महला ५ ॥
आपना प्रभु आइआ चीति ॥ दुसमन दुसट रहे झख मारत कुसलु भइआ मेरे भाई मीत ॥१॥ रहाउ ॥

गई बिआधि उपाधि सभ नासी अंगीकारु कीओ करतारि ॥ सांति सूख अरु अनद घनेरे प्रीतम नामु रिदै उर हारि ॥१॥

जीउ पिंडु धनु रासि प्रभ तेरी तूं समरथु सुआमी मेरा ॥ दास अपुने कउ राखनहारा नानक दास सदा है चेरा ॥२॥२५॥१११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 826) बिलावलु महला ५ ॥
गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥ मिटी उपाधि भइआ सुखु साचा अंतरजामी सिमरिआ जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

जिस के जीअ तिनि कीए सुखाले भगत जना कउ साचा ताणु ॥ दास अपुने की आपे राखी भै भंजन ऊपरि करते माणु ॥१॥

भई मित्राई मिटी बुराई द्रुसट दूत हरि काढे छाणि ॥ सूख सहज आनंद घनेरे नानक जीवै हरि गुणह वखाणि ॥२॥२६॥११२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 826) बिलावलु महला ५ ॥
पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥ कारज सगल सवारे सतिगुर जपि जपि साधू भए निहाल ॥१॥ रहाउ ॥

अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै दोखी सगले भए रवाल ॥ कंठि लाइ राखे जन अपने उधरि लीए लाइ अपनै पाल ॥१॥

सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥ कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा गुर प्रसादि प्रभ भए निहाल ॥२॥२७॥११३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 827) बिलावलु महला ५ ॥
मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥

तोरी न तूटै छोरी न छूटै ऐसी माधो खिंच तनी ॥१॥

दिनसु रैनि मन माहि बसतु है तू करि किरपा प्रभ अपनी ॥२॥

बलि बलि जाउ सिआम सुंदर कउ अकथ कथा जा की बात सुनी ॥३॥

जन नानक दासनि दासु कहीअत है मोहि करहु क्रिपा ठाकुर अपुनी ॥४॥२८॥११४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 827) बिलावलु महला ५ ॥
हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥ गुरु मेरा पारब्रहम परमेसुरु ता का हिरदै धरि मन धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरि सिमरि सिमरि सुखदाता जा का कीआ सगल जहानु ॥ रसना रवहु एकु नाराइणु साची दरगह पावहु मानु ॥१॥

साधू संगु परापति जा कउ तिन ही पाइआ एहु निधानु ॥ गावउ गुण कीरतनु नित सुआमी करि किरपा नानक दीजै दानु ॥२॥२९॥११५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 827) बिलावलु महला ५ ॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥ जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥१॥ रहाउ ॥

बिस्व्मभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥ थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥१॥

जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥ आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥२॥३०॥११६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 827) रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ८
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥ ईघै निरगुन ऊघै सरगुन केल करत बिचि सुआमी मेरा ॥१॥ रहाउ ॥

नगर महि आपि बाहरि फुनि आपन प्रभ मेरे को सगल बसेरा ॥ आपे ही राजनु आपे ही राइआ कह कह ठाकुरु कह कह चेरा ॥१॥

का कउ दुराउ का सिउ बलबंचा जह जह पेखउ तह तह नेरा ॥ साध मूरति गुरु भेटिओ नानक मिलि सागर बूंद नही अन हेरा ॥२॥१॥११७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 827) बिलावलु महला ५ ॥
तुम्ह समरथा कारन करन ॥ ढाकन ढाकि गोबिद गुर मेरे मोहि अपराधी सरन चरन ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो कीनो सो तुम्ह जानिओ पेखिओ ठउर नाही कछु ढीठ मुकरन ॥ बड परतापु सुनिओ प्रभ तुम्हरो कोटि अघा तेरो नाम हरन ॥१॥

हमरो सहाउ सदा सद भूलन तुम्हरो बिरदु पतित उधरन ॥ करुणा मै किरपाल क्रिपा निधि जीवन पद नानक हरि दरसन ॥२॥२॥११८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 828) बिलावलु महला ५ ॥
ऐसी किरपा मोहि करहु ॥ संतह चरण हमारो माथा नैन दरसु तनि धूरि परहु ॥१॥ रहाउ ॥

गुर को सबदु मेरै हीअरै बासै हरि नामा मन संगि धरहु ॥ तसकर पंच निवारहु ठाकुर सगलो भरमा होमि जरहु ॥१॥

जो तुम्ह करहु सोई भल मानै भावनु दुबिधा दूरि टरहु ॥ नानक के प्रभ तुम ही दाते संतसंगि ले मोहि उधरहु ॥२॥३॥११९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 828) बिलावलु महला ५ ॥
ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥ तुम्हरो धिआनु तुम्हारो रंगा ॥ तुम्हरी सेवा तुम्हारे अंगा ॥१॥ रहाउ ॥

जन की टहल स्मभाखनु जन सिउ ऊठनु बैठनु जन कै संगा ॥ जन चर रज मुखि माथै लागी आसा पूरन अनंत तरंगा ॥१॥

जन पारब्रहम जा की निरमल महिमा जन के चरन तीरथ कोटि गंगा ॥ जन की धूरि कीओ मजनु नानक जनम जनम के हरे कलंगा ॥२॥४॥१२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 828) बिलावलु महला ५ ॥
जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥ पारब्रहम परमेसर सतिगुर हम बारिक तुम्ह पिता किरपाल ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि निरगुण गुणु नाही कोई पहुचि न साकउ तुम्हरी घाल ॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानहु जीउ पिंडु सभु तुमरो माल ॥१॥

अंतरजामी पुरख सुआमी अनबोलत ही जानहु हाल ॥ तनु मनु सीतलु होइ हमारो नानक प्रभ जीउ नदरि निहाल ॥२॥५॥१२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 828) बिलावलु महला ५ ॥
राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥ तू हमरो प्रीतमु मनमोहनु तुझ बिनु जीवनु सगल अकाथ ॥१॥ रहाउ ॥

रंक ते राउ करत खिन भीतरि प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥ जलत अगनि महि जन आपि उधारे करि अपुने दे राखे हाथ ॥१॥

सीतल सुखु पाइओ मन त्रिपते हरि सिमरत स्रम सगले लाथ ॥ निधि निधान नानक हरि सेवा अवर सिआनप सगल अकाथ ॥२॥६॥१२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 829) बिलावलु महला ५ ॥
अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥ उरि लागहु सुआमी प्रभ मेरे पूरब प्रीति गोबिंद बीचारहु ॥१॥ रहाउ ॥

पतित पावन प्रभ बिरदु तुम्हारो हमरे दोख रिदै मत धारहु ॥ जीवन प्रान हरि धनु सुखु तुम ही हउमै पटलु क्रिपा करि जारहु ॥१॥

जल बिहून मीन कत जीवन दूध बिना रहनु कत बारो ॥ जन नानक पिआस चरन कमलन्ह की पेखि दरसु सुआमी सुख सारो ॥२॥७॥१२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 829) बिलावलु महला ५ ॥
आगै पाछै कुसलु भइआ ॥ गुरि पूरै पूरी सभ राखी पारब्रहमि प्रभि कीनी मइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मनि तनि रवि रहिआ हरि प्रीतमु दूख दरद सगला मिटि गइआ ॥ सांति सहज आनद गुण गाए दूत दुसट सभि होए खइआ ॥१॥

गुनु अवगुनु प्रभि कछु न बीचारिओ करि किरपा अपुना करि लइआ ॥ अतुल बडाई अचुत अबिनासी नानकु उचरै हरि की जइआ ॥२॥८॥१२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 829) बिलावलु महला ५ ॥
बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥ करहु अनुग्रहु पतित उधारन राखु सुआमी आप भरोसे ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरनु नही आवत फिरत मद मावत बिखिआ राता सुआन जैसे ॥ अउध बिहावत अधिक मोहावत पाप कमावत बुडे ऐसे ॥१॥

सरनि दुख भंजन पुरख निरंजन साधू संगति रवणु जैसे ॥ केसव कलेस नास अघ खंडन नानक जीवत दरस दिसे ॥२॥९॥१२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 829) रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपहि मेलि लए ॥ जब ते सरनि तुमारी आए तब ते दोख गए ॥१॥ रहाउ ॥

तजि अभिमानु अरु चिंत बिरानी साधह सरन पए ॥ जपि जपि नामु तुम्हारो प्रीतम तन ते रोग खए ॥१॥

महा मुगध अजान अगिआनी राखे धारि दए ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ आवन जान रहे ॥२॥१॥१२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 829) बिलावलु महला ५ ॥
जीवउ नामु सुनी ॥ जउ सुप्रसंन भए गुर पूरे तब मेरी आस पुनी ॥१॥ रहाउ ॥

पीर गई बाधी मनि धीरा मोहिओ अनद धुनी ॥ उपजिओ चाउ मिलन प्रभ प्रीतम रहनु न जाइ खिनी ॥१॥

अनिक भगत अनिक जन तारे सिमरहि अनिक मुनी ॥ अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥२॥२॥१२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 830) रागु बिलावलु महला ५ घरु १३ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥ उडीनी उडीनी उडीनी ॥ कब घरि आवै री ॥१॥ रहाउ ॥

सरनि सुहागनि चरन सीसु धरि ॥ लालनु मोहि मिलावहु ॥ कब घरि आवै री ॥१॥

सुनहु सहेरी मिलन बात कहउ ॥ सगरो अहं मिटावहु तउ घर ही लालनु पावहु ॥ तब रस मंगल गुन गावहु ॥ आनद रूप धिआवहु ॥ नानकु दुआरै आइओ ॥ तउ मै लालनु पाइओ री ॥२॥

मोहन रूपु दिखावै ॥ अब मोहि नीद सुहावै ॥ सभ मेरी तिखा बुझानी ॥ अब मै सहजि समानी ॥ मीठी पिरहि कहानी ॥ मोहनु लालनु पाइओ री ॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 830) बिलावलु महला ५ ॥
मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥ राचहु नाथ ही सहाई संतना ॥ अब चरन गहे ॥१॥ रहाउ ॥

आहे मन अवरु न भावै चरनावै चरनावै उलझिओ अलि मकरंद कमल जिउ ॥ अन रस नही चाहै एकै हरि लाहै ॥१॥

अन ते टूटीऐ रिख ते छूटीऐ ॥ मन हरि रस घूटीऐ संगि साधू उलटीऐ ॥ अन नाही नाही रे ॥ नानक प्रीति चरन चरन हे ॥२॥२॥१२९॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 830) रागु बिलावलु महला ९ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥ अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥

गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥ नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥१॥

अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥ नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 830) बिलावलु महला ९ ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥ भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥

कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥ जोग जग निहफल तिह मानउ जो प्रभ जसु बिसरावै ॥१॥

मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥२॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 831) बिलावलु महला ९ ॥
जा मै भजनु राम को नाही ॥ तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥ निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥१॥

जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥ तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥२॥

कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेदु बतावै ॥ कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥३॥३॥


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