Pt 3 - राग भैरउ - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Bhairo - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1149) भैरउ महला ५ ॥
करण कारण समरथु गुरु मेरा ॥ जीअ प्राण सुखदाता नेरा ॥ भै भंजन अबिनासी राइ ॥ दरसनि देखिऐ सभु दुखु जाइ ॥१॥

जत कत पेखउ तेरी सरणा ॥ बलि बलि जाई सतिगुर चरणा ॥१॥ रहाउ ॥

पूरन काम मिले गुरदेव ॥ सभि फलदाता निरमल सेव ॥ करु गहि लीने अपुने दास ॥ राम नामु रिद दीओ निवास ॥२॥

सदा अनंदु नाही किछु सोगु ॥ दूखु दरदु नह बिआपै रोगु ॥ सभु किछु तेरा तू करणैहारु ॥ पारब्रहम गुर अगम अपार ॥३॥

निरमल सोभा अचरज बाणी ॥ पारब्रहम पूरन मनि भाणी ॥ जलि थलि महीअलि रविआ सोइ ॥ नानक सभु किछु प्रभ ते होइ ॥४॥३४॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1149) भैरउ महला ५ ॥
मनु तनु राता राम रंगि चरणे ॥ सरब मनोरथ पूरन करणे ॥ आठ पहर गावत भगवंतु ॥ सतिगुरि दीनो पूरा मंतु ॥१॥

सो वडभागी जिसु नामि पिआरु ॥ तिस कै संगि तरै संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

सोई गिआनी जि सिमरै एक ॥ सो धनवंता जिसु बुधि बिबेक ॥ सो कुलवंता जि सिमरै सुआमी ॥ सो पतिवंता जि आपु पछानी ॥२॥

गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥ गुण गोपाल दिनु रैनि धिआइआ ॥ तूटे बंधन पूरन आसा ॥ हरि के चरण रिद माहि निवासा ॥३॥

कहु नानक जा के पूरन करमा ॥ सो जनु आइआ प्रभ की सरना ॥ आपि पवितु पावन सभि कीने ॥ राम रसाइणु रसना चीन्हे ॥४॥३५॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
नामु लैत किछु बिघनु न लागै ॥ नामु सुणत जमु दूरहु भागै ॥ नामु लैत सभ दूखह नासु ॥ नामु जपत हरि चरण निवासु ॥१॥

निरबिघन भगति भजु हरि हरि नाउ ॥ रसकि रसकि हरि के गुण गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि सिमरत किछु चाखु न जोहै ॥ हरि सिमरत दैत देउ न पोहै ॥ हरि सिमरत मोहु मानु न बधै ॥ हरि सिमरत गरभ जोनि न रुधै ॥२॥

हरि सिमरन की सगली बेला ॥ हरि सिमरनु बहु माहि इकेला ॥ जाति अजाति जपै जनु कोइ ॥ जो जापै तिस की गति होइ ॥३॥

हरि का नामु जपीऐ साधसंगि ॥ हरि के नाम का पूरन रंगु ॥ नानक कउ प्रभ किरपा धारि ॥ सासि सासि हरि देहु चितारि ॥४॥३६॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
आपे सासतु आपे बेदु ॥ आपे घटि घटि जाणै भेदु ॥ जोति सरूप जा की सभ वथु ॥ करण कारण पूरन समरथु ॥१॥

प्रभ की ओट गहहु मन मेरे ॥ चरन कमल गुरमुखि आराधहु दुसमन दूखु न आवै नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

आपे वणु त्रिणु त्रिभवण सारु ॥ जा कै सूति परोइआ संसारु ॥ आपे सिव सकती संजोगी ॥ आपि निरबाणी आपे भोगी ॥२॥

जत कत पेखउ तत तत सोइ ॥ तिसु बिनु दूजा नाही कोइ ॥ सागरु तरीऐ नाम कै रंगि ॥ गुण गावै नानकु साधसंगि ॥३॥

मुकति भुगति जुगति वसि जा कै ॥ ऊणा नाही किछु जन ता कै ॥ करि किरपा जिसु होइ सुप्रसंन ॥ नानक दास सेई जन धंन ॥४॥३७॥५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
भगता मनि आनंदु गोबिंद ॥ असथिति भए बिनसी सभ चिंद ॥ भै भ्रम बिनसि गए खिन माहि ॥ पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥१॥

राम राम संत सदा सहाइ ॥ घरि बाहरि नाले परमेसरु रवि रहिआ पूरन सभ ठाइ ॥१॥ रहाउ ॥

धनु मालु जोबनु जुगति गोपाल ॥ जीअ प्राण नित सुख प्रतिपाल ॥ अपने दास कउ दे राखै हाथ ॥ निमख न छोडै सद ही साथ ॥२॥

हरि सा प्रीतमु अवरु न कोइ ॥ सारि सम्हाले साचा सोइ ॥ मात पिता सुत बंधु नराइणु ॥ आदि जुगादि भगत गुण गाइणु ॥३॥

तिस की धर प्रभ का मनि जोरु ॥ एक बिना दूजा नही होरु ॥ नानक कै मनि इहु पुरखारथु ॥ प्रभू हमारा सारे सुआरथु ॥४॥३८॥५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥ सगल बिआधि मिटी त्रिहु गुण की दास के होए पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के लोक सदा गुण गावहि तिन कउ मिलिआ पूरन धाम ॥ जन का दरसु बांछै दिन राती होइ पुनीत धरम राइ जाम ॥१॥

काम क्रोध लोभ मद निंदा साधसंगि मिटिआ अभिमान ॥ ऐसे संत भेटहि वडभागी नानक तिन कै सद कुरबान ॥२॥३९॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
पंच मजमी जो पंचन राखै ॥ मिथिआ रसना नित उठि भाखै ॥ चक्र बणाइ करै पाखंड ॥ झुरि झुरि पचै जैसे त्रिअ रंड ॥१॥

हरि के नाम बिना सभ झूठु ॥ बिनु गुर पूरे मुकति न पाईऐ साची दरगहि साकत मूठु ॥१॥ रहाउ ॥

सोई कुचीलु कुदरति नही जानै ॥ लीपिऐ थाइ न सुचि हरि मानै ॥ अंतरु मैला बाहरु नित धोवै ॥ साची दरगहि अपनी पति खोवै ॥२॥

माइआ कारणि करै उपाउ ॥ कबहि न घालै सीधा पाउ ॥ जिनि कीआ तिसु चीति न आणै ॥ कूड़ी कूड़ी मुखहु वखाणै ॥३॥

जिस नो करमु करे करतारु ॥ साधसंगि होइ तिसु बिउहारु ॥ हरि नाम भगति सिउ लागा रंगु ॥ कहु नानक तिसु जन नही भंगु ॥४॥४०॥५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
निंदक कउ फिटके संसारु ॥ निंदक का झूठा बिउहारु ॥ निंदक का मैला आचारु ॥ दास अपुने कउ राखनहारु ॥१॥

निंदकु मुआ निंदक कै नालि ॥ पारब्रहम परमेसरि जन राखे निंदक कै सिरि कड़किओ कालु ॥१॥ रहाउ ॥

निंदक का कहिआ कोइ न मानै ॥ निंदक झूठु बोलि पछुताने ॥ हाथ पछोरहि सिरु धरनि लगाहि ॥ निंदक कउ दई छोडै नाहि ॥२॥

हरि का दासु किछु बुरा न मागै ॥ निंदक कउ लागै दुख सांगै ॥ बगुले जिउ रहिआ पंख पसारि ॥ मुख ते बोलिआ तां कढिआ बीचारि ॥३॥

अंतरजामी करता सोइ ॥ हरि जनु करै सु निहचलु होइ ॥ हरि का दासु साचा दरबारि ॥ जन नानक कहिआ ततु बीचारि ॥४॥४१॥५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1152) भैरउ महला ५ ॥
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥ जीउ पिंडु धनु तिस की रासि ॥ सोई मेरा सुआमी करनैहारु ॥ कोटि बार जाई बलिहार ॥१॥

साधू धूरि पुनीत करी ॥ मन के बिकार मिटहि प्रभ सिमरत जनम जनम की मैलु हरी ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै ग्रिह महि सगल निधान ॥ जा की सेवा पाईऐ मानु ॥ सगल मनोरथ पूरनहार ॥ जीअ प्रान भगतन आधार ॥२॥

घट घट अंतरि सगल प्रगास ॥ जपि जपि जीवहि भगत गुणतास ॥ जा की सेव न बिरथी जाइ ॥ मन तन अंतरि एकु धिआइ ॥३॥

गुर उपदेसि दइआ संतोखु ॥ नामु निधानु निरमलु इहु थोकु ॥ करि किरपा लीजै लड़ि लाइ ॥ चरन कमल नानक नित धिआइ ॥४॥४२॥५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1152) भैरउ महला ५ ॥
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥ कारजु आइआ सगला रासि ॥ मन तन अंतरि प्रभू धिआइआ ॥ गुर पूरे डरु सगल चुकाइआ ॥१॥

सभ ते वड समरथ गुरदेव ॥ सभि सुख पाई तिस की सेव ॥ रहाउ ॥

जा का कीआ सभु किछु होइ ॥ तिस का अमरु न मेटै कोइ ॥ पारब्रहमु परमेसरु अनूपु ॥ सफल मूरति गुरु तिस का रूपु ॥२॥

जा कै अंतरि बसै हरि नामु ॥ जो जो पेखै सु ब्रहम गिआनु ॥ बीस बिसुए जा कै मनि परगासु ॥ तिसु जन कै पारब्रहम का निवासु ॥३॥

तिसु गुर कउ सद करी नमसकार ॥ तिसु गुर कउ सद जाउ बलिहार ॥ सतिगुर के चरन धोइ धोइ पीवा ॥ गुर नानक जपि जपि सद जीवा ॥४॥४३॥५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1153) रागु भैरउ महला ५ पड़ताल घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
परतिपाल प्रभ क्रिपाल कवन गुन गनी ॥ अनिक रंग बहु तरंग सरब को धनी ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक गिआन अनिक धिआन अनिक जाप जाप ताप ॥ अनिक गुनित धुनित ललित अनिक धार मुनी ॥१॥

अनिक नाद अनिक बाज निमख निमख अनिक स्वाद अनिक दोख अनिक रोग मिटहि जस सुनी ॥ नानक सेव अपार देव तटह खटह बरत पूजा गवन भवन जात्र करन सगल फल पुनी ॥२॥१॥५७॥८॥२१॥७॥५७॥९३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1153) भैरउ असटपदीआ महला १ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आतम महि रामु राम महि आतमु चीनसि गुर बीचारा ॥ अम्रित बाणी सबदि पछाणी दुख काटै हउ मारा ॥१॥

नानक हउमै रोग बुरे ॥ जह देखां तह एका बेदन आपे बखसै सबदि धुरे ॥१॥ रहाउ ॥

आपे परखे परखणहारै बहुरि सूलाकु न होई ॥ जिन कउ नदरि भई गुरि मेले प्रभ भाणा सचु सोई ॥२॥

पउणु पाणी बैसंतरु रोगी रोगी धरति सभोगी ॥ मात पिता माइआ देह सि रोगी रोगी कुट्मब संजोगी ॥३॥

रोगी ब्रहमा बिसनु सरुद्रा रोगी सगल संसारा ॥ हरि पदु चीनि भए से मुकते गुर का सबदु वीचारा ॥४॥

रोगी सात समुंद सनदीआ खंड पताल सि रोगि भरे ॥ हरि के लोक सि साचि सुहेले सरबी थाई नदरि करे ॥५॥

रोगी खट दरसन भेखधारी नाना हठी अनेका ॥ बेद कतेब करहि कह बपुरे नह बूझहि इक एका ॥६॥

मिठ रसु खाइ सु रोगि भरीजै कंद मूलि सुखु नाही ॥ नामु विसारि चलहि अन मारगि अंत कालि पछुताही ॥७॥

तीरथि भरमै रोगु न छूटसि पड़िआ बादु बिबादु भइआ ॥ दुबिधा रोगु सु अधिक वडेरा माइआ का मुहताजु भइआ ॥८॥

गुरमुखि साचा सबदि सलाहै मनि साचा तिसु रोगु गइआ ॥ नानक हरि जन अनदिनु निरमल जिन कउ करमि नीसाणु पइआ ॥९॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1154) भैरउ महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिनि करतै इकु चलतु उपाइआ ॥ अनहद बाणी सबदु सुणाइआ ॥ मनमुखि भूले गुरमुखि बुझाइआ ॥ कारणु करता करदा आइआ ॥१॥

गुर का सबदु मेरै अंतरि धिआनु ॥ हउ कबहु न छोडउ हरि का नामु ॥१॥ रहाउ ॥

पिता प्रहलादु पड़ण पठाइआ ॥ लै पाटी पाधे कै आइआ ॥ नाम बिना नह पड़उ अचार ॥ मेरी पटीआ लिखि देहु गोबिंद मुरारि ॥२॥

पुत्र प्रहिलाद सिउ कहिआ माइ ॥ परविरति न पड़हु रही समझाइ ॥ निरभउ दाता हरि जीउ मेरै नालि ॥ जे हरि छोडउ तउ कुलि लागै गालि ॥३॥

प्रहलादि सभि चाटड़े विगारे ॥ हमारा कहिआ न सुणै आपणे कारज सवारे ॥ सभ नगरी महि भगति द्रिड़ाई ॥ दुसट सभा का किछु न वसाई ॥४॥

संडै मरकै कीई पूकार ॥ सभे दैत रहे झख मारि ॥ भगत जना की पति राखै सोई ॥ कीते कै कहिऐ किआ होई ॥५॥

किरत संजोगी दैति राजु चलाइआ ॥ हरि न बूझै तिनि आपि भुलाइआ ॥ पुत्र प्रहलाद सिउ वादु रचाइआ ॥ अंधा न बूझै कालु नेड़ै आइआ ॥६॥

प्रहलादु कोठे विचि राखिआ बारि दीआ ताला ॥ निरभउ बालकु मूलि न डरई मेरै अंतरि गुर गोपाला ॥ कीता होवै सरीकी करै अनहोदा नाउ धराइआ ॥ जो धुरि लिखिआ सो आइ पहुता जन सिउ वादु रचाइआ ॥७॥

पिता प्रहलाद सिउ गुरज उठाई ॥ कहां तुम्हारा जगदीस गुसाई ॥ जगजीवनु दाता अंति सखाई ॥ जह देखा तह रहिआ समाई ॥८॥

थम्हु उपाड़ि हरि आपु दिखाइआ ॥ अहंकारी दैतु मारि पचाइआ ॥ भगता मनि आनंदु वजी वधाई ॥ अपने सेवक कउ दे वडिआई ॥९॥

जमणु मरणा मोहु उपाइआ ॥ आवणु जाणा करतै लिखि पाइआ ॥ प्रहलाद कै कारजि हरि आपु दिखाइआ ॥ भगता का बोलु आगै आइआ ॥१०॥

देव कुली लखिमी कउ करहि जैकारु ॥ माता नरसिंघ का रूपु निवारु ॥ लखिमी भउ करै न साकै जाइ ॥ प्रहलादु जनु चरणी लागा आइ ॥११॥

सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ ॥ राजु मालु झूठी सभ माइआ ॥ लोभी नर रहे लपटाइ ॥ हरि के नाम बिनु दरगह मिलै सजाइ ॥१२॥

कहै नानकु सभु को करे कराइआ ॥ से परवाणु जिनी हरि सिउ चितु लाइआ ॥ भगता का अंगीकारु करदा आइआ ॥ करतै अपणा रूपु दिखाइआ ॥१३॥१॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1155) भैरउ महला ३ ॥
गुर सेवा ते अम्रित फलु पाइआ हउमै त्रिसन बुझाई ॥ हरि का नामु ह्रिदै मनि वसिआ मनसा मनहि समाई ॥१॥

हरि जीउ क्रिपा करहु मेरे पिआरे ॥ अनदिनु हरि गुण दीन जनु मांगै गुर कै सबदि उधारे ॥१॥ रहाउ ॥

संत जना कउ जमु जोहि न साकै रती अंच दूख न लाई ॥ आपि तरहि सगले कुल तारहि जो तेरी सरणाई ॥२॥

भगता की पैज रखहि तू आपे एह तेरी वडिआई ॥ जनम जनम के किलविख दुख काटहि दुबिधा रती न राई ॥३॥

हम मूड़ मुगध किछु बूझहि नाही तू आपे देहि बुझाई ॥ जो तुधु भावै सोई करसी अवरु न करणा जाई ॥४॥

जगतु उपाइ तुधु धंधै लाइआ भूंडी कार कमाई ॥ जनमु पदारथु जूऐ हारिआ सबदै सुरति न पाई ॥५॥

मनमुखि मरहि तिन किछू न सूझै दुरमति अगिआन अंधारा ॥ भवजलु पारि न पावहि कब ही डूबि मुए बिनु गुर सिरि भारा ॥६॥

साचै सबदि रते जन साचे हरि प्रभि आपि मिलाए ॥ गुर की बाणी सबदि पछाती साचि रहे लिव लाए ॥७॥

तूं आपि निरमलु तेरे जन है निरमल गुर कै सबदि वीचारे ॥ नानकु तिन कै सद बलिहारै राम नामु उरि धारे ॥८॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1155) भैरउ महला ५ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु पूरे काजा ॥ जिसु नामु रिदै तिनि कोटि धन पाए ॥ नाम बिना जनमु बिरथा जाए ॥१॥

तिसु सालाही जिसु हरि धनु रासि ॥ सो वडभागी जिसु गुर मसतकि हाथु ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु नामु रिदै तिसु कोट कई सैना ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सहज सुखैना ॥ जिसु नामु रिदै सो सीतलु हूआ ॥ नाम बिना ध्रिगु जीवणु मूआ ॥२॥

जिसु नामु रिदै सो जीवन मुकता ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सभ ही जुगता ॥ जिसु नामु रिदै तिनि नउ निधि पाई ॥ नाम बिना भ्रमि आवै जाई ॥३॥

जिसु नामु रिदै सो वेपरवाहा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सद ही लाहा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु वड परवारा ॥ नाम बिना मनमुख गावारा ॥४॥

जिसु नामु रिदै तिसु निहचल आसनु ॥ जिसु नामु रिदै तिसु तखति निवासनु ॥ जिसु नामु रिदै सो साचा साहु ॥ नामहीण नाही पति वेसाहु ॥५॥

जिसु नामु रिदै सो सभ महि जाता ॥ जिसु नामु रिदै सो पुरखु बिधाता ॥ जिसु नामु रिदै सो सभ ते ऊचा ॥ नाम बिना भ्रमि जोनी मूचा ॥६॥

जिसु नामु रिदै तिसु प्रगटि पहारा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु मिटिआ अंधारा ॥ जिसु नामु रिदै सो पुरखु परवाणु ॥ नाम बिना फिरि आवण जाणु ॥७॥

तिनि नामु पाइआ जिसु भइओ क्रिपाल ॥ साधसंगति महि लखे गोपाल ॥ आवण जाण रहे सुखु पाइआ ॥ कहु नानक ततै ततु मिलाइआ ॥८॥१॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1156) भैरउ महला ५ ॥
कोटि बिसन कीने अवतार ॥ कोटि ब्रहमंड जा के ध्रमसाल ॥ कोटि महेस उपाइ समाए ॥ कोटि ब्रहमे जगु साजण लाए ॥१॥

ऐसो धणी गुविंदु हमारा ॥ बरनि न साकउ गुण बिसथारा ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि माइआ जा कै सेवकाइ ॥ कोटि जीअ जा की सिहजाइ ॥ कोटि उपारजना तेरै अंगि ॥ कोटि भगत बसत हरि संगि ॥२॥

कोटि छत्रपति करत नमसकार ॥ कोटि इंद्र ठाढे है दुआर ॥ कोटि बैकुंठ जा की द्रिसटी माहि ॥ कोटि नाम जा की कीमति नाहि ॥३॥

कोटि पूरीअत है जा कै नाद ॥ कोटि अखारे चलित बिसमाद ॥ कोटि सकति सिव आगिआकार ॥ कोटि जीअ देवै आधार ॥४॥

कोटि तीरथ जा के चरन मझार ॥ कोटि पवित्र जपत नाम चार ॥ कोटि पूजारी करते पूजा ॥ कोटि बिसथारनु अवरु न दूजा ॥५॥

कोटि महिमा जा की निरमल हंस ॥ कोटि उसतति जा की करत ब्रहमंस ॥ कोटि परलउ ओपति निमख माहि ॥ कोटि गुणा तेरे गणे न जाहि ॥६॥

कोटि गिआनी कथहि गिआनु ॥ कोटि धिआनी धरत धिआनु ॥ कोटि तपीसर तप ही करते ॥ कोटि मुनीसर मोनि महि रहते ॥७॥

अविगत नाथु अगोचर सुआमी ॥ पूरि रहिआ घट अंतरजामी ॥ जत कत देखउ तेरा वासा ॥ नानक कउ गुरि कीओ प्रगासा ॥८॥२॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1157) भैरउ महला ५ ॥
सतिगुरि मो कउ कीनो दानु ॥ अमोल रतनु हरि दीनो नामु ॥ सहज बिनोद चोज आनंता ॥ नानक कउ प्रभु मिलिओ अचिंता ॥१॥

कहु नानक कीरति हरि साची ॥ बहुरि बहुरि तिसु संगि मनु राची ॥१॥ रहाउ ॥

अचिंत हमारै भोजन भाउ ॥ अचिंत हमारै लीचै नाउ ॥ अचिंत हमारै सबदि उधार ॥ अचिंत हमारै भरे भंडार ॥२॥

अचिंत हमारै कारज पूरे ॥ अचिंत हमारै लथे विसूरे ॥ अचिंत हमारै बैरी मीता ॥ अचिंतो ही इहु मनु वसि कीता ॥३॥

अचिंत प्रभू हम कीआ दिलासा ॥ अचिंत हमारी पूरन आसा ॥ अचिंत हम्हा कउ सगल सिधांतु ॥ अचिंतु हम कउ गुरि दीनो मंतु ॥४॥

अचिंत हमारे बिनसे बैर ॥ अचिंत हमारे मिटे अंधेर ॥ अचिंतो ही मनि कीरतनु मीठा ॥ अचिंतो ही प्रभु घटि घटि डीठा ॥५॥

अचिंत मिटिओ है सगलो भरमा ॥ अचिंत वसिओ मनि सुख बिस्रामा ॥ अचिंत हमारै अनहत वाजै ॥ अचिंत हमारै गोबिंदु गाजै ॥६॥

अचिंत हमारै मनु पतीआना ॥ निहचल धनी अचिंतु पछाना ॥ अचिंतो उपजिओ सगल बिबेका ॥ अचिंत चरी हथि हरि हरि टेका ॥७॥

अचिंत प्रभू धुरि लिखिआ लेखु ॥ अचिंत मिलिओ प्रभु ठाकुरु एकु ॥ चिंत अचिंता सगली गई ॥ प्रभ नानक नानक नानक मई ॥८॥३॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1157) भैरउ बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥ गांठि न बाधउ बेचि न खाउ ॥१॥ रहाउ ॥

नाउ मेरे खेती नाउ मेरे बारी ॥ भगति करउ जनु सरनि तुम्हारी ॥१॥

नाउ मेरे माइआ नाउ मेरे पूंजी ॥ तुमहि छोडि जानउ नही दूजी ॥२॥

नाउ मेरे बंधिप नाउ मेरे भाई ॥ नाउ मेरे संगि अंति होइ सखाई ॥३॥

माइआ महि जिसु रखै उदासु ॥ कहि कबीर हउ ता को दासु ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1157) नांगे आवनु नांगे जाना ॥ कोइ न रहिहै राजा राना ॥१॥

रामु राजा नउ निधि मेरै ॥ स्मपै हेतु कलतु धनु तेरै ॥१॥ रहाउ ॥

आवत संग न जात संगाती ॥ कहा भइओ दरि बांधे हाथी ॥२॥

लंका गढु सोने का भइआ ॥ मूरखु रावनु किआ ले गइआ ॥३॥

कहि कबीर किछु गुनु बीचारि ॥ चले जुआरी दुइ हथ झारि ॥४॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1158) मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥ रवि मैला मैला है चंदु ॥१॥

मैला मलता इहु संसारु ॥ इकु हरि निरमलु जा का अंतु न पारु ॥१॥ रहाउ ॥

मैले ब्रहमंडाइ कै ईस ॥ मैले निसि बासुर दिन तीस ॥२॥

मैला मोती मैला हीरु ॥ मैला पउनु पावकु अरु नीरु ॥३॥

मैले सिव संकरा महेस ॥ मैले सिध साधिक अरु भेख ॥४॥

मैले जोगी जंगम जटा सहेति ॥ मैली काइआ हंस समेति ॥५॥

कहि कबीर ते जन परवान ॥ निरमल ते जो रामहि जान ॥६॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1158) मनु करि मका किबला करि देही ॥ बोलनहारु परम गुरु एही ॥१॥

कहु रे मुलां बांग निवाज ॥ एक मसीति दसै दरवाज ॥१॥ रहाउ ॥

मिसिमिलि तामसु भरमु कदूरी ॥ भाखि ले पंचै होइ सबूरी ॥२॥

हिंदू तुरक का साहिबु एक ॥ कह करै मुलां कह करै सेख ॥३॥

कहि कबीर हउ भइआ दिवाना ॥ मुसि मुसि मनूआ सहजि समाना ॥४॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1158) गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥ सो सलिता गंगा होइ निबरी ॥१॥

बिगरिओ कबीरा राम दुहाई ॥ साचु भइओ अन कतहि न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

चंदन कै संगि तरवरु बिगरिओ ॥ सो तरवरु चंदनु होइ निबरिओ ॥२॥

पारस कै संगि तांबा बिगरिओ ॥ सो तांबा कंचनु होइ निबरिओ ॥३॥

संतन संगि कबीरा बिगरिओ ॥ सो कबीरु रामै होइ निबरिओ ॥४॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1158) माथे तिलकु हथि माला बानां ॥ लोगन रामु खिलउना जानां ॥१॥

जउ हउ बउरा तउ राम तोरा ॥ लोगु मरमु कह जानै मोरा ॥१॥ रहाउ ॥

तोरउ न पाती पूजउ न देवा ॥ राम भगति बिनु निहफल सेवा ॥२॥

सतिगुरु पूजउ सदा सदा मनावउ ॥ ऐसी सेव दरगह सुखु पावउ ॥३॥

लोगु कहै कबीरु बउराना ॥ कबीर का मरमु राम पहिचानां ॥४॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1158) उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥ सुंन सहज महि बुनत हमारी ॥१॥

हमरा झगरा रहा न कोऊ ॥ पंडित मुलां छाडे दोऊ ॥१॥ रहाउ ॥

बुनि बुनि आप आपु पहिरावउ ॥ जह नही आपु तहा होइ गावउ ॥२॥

पंडित मुलां जो लिखि दीआ ॥ छाडि चले हम कछू न लीआ ॥३॥

रिदै इखलासु निरखि ले मीरा ॥ आपु खोजि खोजि मिले कबीरा ॥४॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1159) निरधन आदरु कोई न देइ ॥ लाख जतन करै ओहु चिति न धरेइ ॥१॥ रहाउ ॥

जउ निरधनु सरधन कै जाइ ॥ आगे बैठा पीठि फिराइ ॥१॥

जउ सरधनु निरधन कै जाइ ॥ दीआ आदरु लीआ बुलाइ ॥२॥

निरधनु सरधनु दोनउ भाई ॥ प्रभ की कला न मेटी जाई ॥३॥

कहि कबीर निरधनु है सोई ॥ जा के हिरदै नामु न होई ॥४॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1159) गुर सेवा ते भगति कमाई ॥ तब इह मानस देही पाई ॥ इस देही कउ सिमरहि देव ॥ सो देही भजु हरि की सेव ॥१॥

भजहु गोबिंद भूलि मत जाहु ॥ मानस जनम का एही लाहु ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु जरा रोगु नही आइआ ॥ जब लगु कालि ग्रसी नही काइआ ॥ जब लगु बिकल भई नही बानी ॥ भजि लेहि रे मन सारिगपानी ॥२॥

अब न भजसि भजसि कब भाई ॥ आवै अंतु न भजिआ जाई ॥ जो किछु करहि सोई अब सारु ॥ फिरि पछुताहु न पावहु पारु ॥३॥

सो सेवकु जो लाइआ सेव ॥ तिन ही पाए निरंजन देव ॥ गुर मिलि ता के खुल्हे कपाट ॥ बहुरि न आवै जोनी बाट ॥४॥

इही तेरा अउसरु इह तेरी बार ॥ घट भीतरि तू देखु बिचारि ॥ कहत कबीरु जीति कै हारि ॥ बहु बिधि कहिओ पुकारि पुकारि ॥५॥१॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1159) सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥ तह तुम्ह मिलि कै करहु बिचारु ॥ ईत ऊत की सोझी परै ॥ कउनु करम मेरा करि करि मरै ॥१॥

निज पद ऊपरि लागो धिआनु ॥ राजा राम नामु मोरा ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

मूल दुआरै बंधिआ बंधु ॥ रवि ऊपरि गहि राखिआ चंदु ॥ पछम दुआरै सूरजु तपै ॥ मेर डंड सिर ऊपरि बसै ॥२॥

पसचम दुआरे की सिल ओड़ ॥ तिह सिल ऊपरि खिड़की अउर ॥ खिड़की ऊपरि दसवा दुआरु ॥ कहि कबीर ता का अंतु न पारु ॥३॥२॥१०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1159) सो मुलां जो मन सिउ लरै ॥ गुर उपदेसि काल सिउ जुरै ॥ काल पुरख का मरदै मानु ॥ तिसु मुला कउ सदा सलामु ॥१॥

है हजूरि कत दूरि बतावहु ॥ दुंदर बाधहु सुंदर पावहु ॥१॥ रहाउ ॥

काजी सो जु काइआ बीचारै ॥ काइआ की अगनि ब्रहमु परजारै ॥ सुपनै बिंदु न देई झरना ॥ तिसु काजी कउ जरा न मरना ॥२॥

सो सुरतानु जु दुइ सर तानै ॥ बाहरि जाता भीतरि आनै ॥ गगन मंडल महि लसकरु करै ॥ सो सुरतानु छत्रु सिरि धरै ॥३॥

जोगी गोरखु गोरखु करै ॥ हिंदू राम नामु उचरै ॥ मुसलमान का एकु खुदाइ ॥ कबीर का सुआमी रहिआ समाइ ॥४॥३॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1160) महला ५ ॥
जो पाथर कउ कहते देव ॥ ता की बिरथा होवै सेव ॥ जो पाथर की पांई पाइ ॥ तिस की घाल अजांई जाइ ॥१॥

ठाकुरु हमरा सद बोलंता ॥ सरब जीआ कउ प्रभु दानु देता ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि देउ न जानै अंधु ॥ भ्रम का मोहिआ पावै फंधु ॥ न पाथरु बोलै ना किछु देइ ॥ फोकट करम निहफल है सेव ॥२॥

जे मिरतक कउ चंदनु चड़ावै ॥ उस ते कहहु कवन फल पावै ॥ जे मिरतक कउ बिसटा माहि रुलाई ॥ तां मिरतक का किआ घटि जाई ॥३॥

कहत कबीर हउ कहउ पुकारि ॥ समझि देखु साकत गावार ॥ दूजै भाइ बहुतु घर गाले ॥ राम भगत है सदा सुखाले ॥४॥४॥१२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1160) जल महि मीन माइआ के बेधे ॥ दीपक पतंग माइआ के छेदे ॥ काम माइआ कुंचर कउ बिआपै ॥ भुइअंगम भ्रिंग माइआ महि खापे ॥१॥

माइआ ऐसी मोहनी भाई ॥ जेते जीअ तेते डहकाई ॥१॥ रहाउ ॥

पंखी म्रिग माइआ महि राते ॥ साकर माखी अधिक संतापे ॥ तुरे उसट माइआ महि भेला ॥ सिध चउरासीह माइआ महि खेला ॥२॥

छिअ जती माइआ के बंदा ॥ नवै नाथ सूरज अरु चंदा ॥ तपे रखीसर माइआ महि सूता ॥ माइआ महि कालु अरु पंच दूता ॥३॥

सुआन सिआल माइआ महि राता ॥ बंतर चीते अरु सिंघाता ॥ मांजार गाडर अरु लूबरा ॥ बिरख मूल माइआ महि परा ॥४॥

माइआ अंतरि भीने देव ॥ सागर इंद्रा अरु धरतेव ॥ कहि कबीर जिसु उदरु तिसु माइआ ॥ तब छूटे जब साधू पाइआ ॥५॥५॥१३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1160) जब लगु मेरी मेरी करै ॥ तब लगु काजु एकु नही सरै ॥ जब मेरी मेरी मिटि जाइ ॥ तब प्रभ काजु सवारहि आइ ॥१॥

ऐसा गिआनु बिचारु मना ॥ हरि की न सिमरहु दुख भंजना ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु सिंघु रहै बन माहि ॥ तब लगु बनु फूलै ही नाहि ॥ जब ही सिआरु सिंघ कउ खाइ ॥ फूलि रही सगली बनराइ ॥२॥

जीतो बूडै हारो तिरै ॥ गुर परसादी पारि उतरै ॥ दासु कबीरु कहै समझाइ ॥ केवल राम रहहु लिव लाइ ॥३॥६॥१४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1161) सतरि सैइ सलार है जा के ॥ सवा लाखु पैकाबर ता के ॥ सेख जु कहीअहि कोटि अठासी ॥ छपन कोटि जा के खेल खासी ॥१॥

मो गरीब की को गुजरावै ॥ मजलसि दूरि महलु को पावै ॥१॥ रहाउ ॥

तेतीस करोड़ी है खेल खाना ॥ चउरासी लख फिरै दिवानां ॥ बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई ॥ उनि भी भिसति घनेरी पाई ॥२॥

दिल खलहलु जा कै जरद रू बानी ॥ छोडि कतेब करै सैतानी ॥ दुनीआ दोसु रोसु है लोई ॥ अपना कीआ पावै सोई ॥३॥

तुम दाते हम सदा भिखारी ॥ देउ जबाबु होइ बजगारी ॥ दासु कबीरु तेरी पनह समानां ॥ भिसतु नजीकि राखु रहमाना ॥४॥७॥१५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1161) सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥ ना जानउ बैकुंठु है कहां ॥१॥ रहाउ ॥

आप आप का मरमु न जानां ॥ बातन ही बैकुंठु बखानां ॥१॥

जब लगु मन बैकुंठ की आस ॥ तब लगु नाही चरन निवास ॥२॥

खाई कोटु न परल पगारा ॥ ना जानउ बैकुंठ दुआरा ॥३॥

कहि कमीर अब कहीऐ काहि ॥ साधसंगति बैकुंठै आहि ॥४॥८॥१६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1161) किउ लीजै गढु बंका भाई ॥ दोवर कोट अरु तेवर खाई ॥१॥ रहाउ ॥

पांच पचीस मोह मद मतसर आडी परबल माइआ ॥ जन गरीब को जोरु न पहुचै कहा करउ रघुराइआ ॥१॥

कामु किवारी दुखु सुखु दरवानी पापु पुंनु दरवाजा ॥ क्रोधु प्रधानु महा बड दुंदर तह मनु मावासी राजा ॥२॥

स्वाद सनाह टोपु ममता को कुबुधि कमान चढाई ॥ तिसना तीर रहे घट भीतरि इउ गढु लीओ न जाई ॥३॥

प्रेम पलीता सुरति हवाई गोला गिआनु चलाइआ ॥ ब्रहम अगनि सहजे परजाली एकहि चोट सिझाइआ ॥४॥

सतु संतोखु लै लरने लागा तोरे दुइ दरवाजा ॥ साधसंगति अरु गुर की क्रिपा ते पकरिओ गढ को राजा ॥५॥

भगवत भीरि सकति सिमरन की कटी काल भै फासी ॥ दासु कमीरु चड़्हिओ गड़्ह ऊपरि राजु लीओ अबिनासी ॥६॥९॥१७॥


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