राग भैरउ - बाणी शब्द, Raag Bhairo - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1125) रागु भैरउ महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
तुझ ते बाहरि किछू न होइ ॥ तू करि करि देखहि जाणहि सोइ ॥१॥

किआ कहीऐ किछु कही न जाइ ॥ जो किछु अहै सभ तेरी रजाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु करणा सु तेरै पासि ॥ किसु आगै कीचै अरदासि ॥२॥

आखणु सुनणा तेरी बाणी ॥ तू आपे जाणहि सरब विडाणी ॥३॥

करे कराए जाणै आपि ॥ नानक देखै थापि उथापि ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1125) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु भैरउ महला १ घरु २ ॥
गुर कै सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रहमादि तरे ॥ सनक सनंदन तपसी जन केते गुर परसादी पारि परे ॥१॥

भवजलु बिनु सबदै किउ तरीऐ ॥ नाम बिना जगु रोगि बिआपिआ दुबिधा डुबि डुबि मरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु देवा गुरु अलख अभेवा त्रिभवण सोझी गुर की सेवा ॥ आपे दाति करी गुरि दातै पाइआ अलख अभेवा ॥२॥

मनु राजा मनु मन ते मानिआ मनसा मनहि समाई ॥ मनु जोगी मनु बिनसि बिओगी मनु समझै गुण गाई ॥३॥

गुर ते मनु मारिआ सबदु वीचारिआ ते विरले संसारा ॥ नानक साहिबु भरिपुरि लीणा साच सबदि निसतारा ॥४॥१॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1125) भैरउ महला १ ॥
नैनी द्रिसटि नही तनु हीना जरि जीतिआ सिरि कालो ॥ रूपु रंगु रहसु नही साचा किउ छोडै जम जालो ॥१॥

प्राणी हरि जपि जनमु गइओ ॥ साच सबद बिनु कबहु न छूटसि बिरथा जनमु भइओ ॥१॥ रहाउ ॥

तन महि कामु क्रोधु हउ ममता कठिन पीर अति भारी ॥ गुरमुखि राम जपहु रसु रसना इन बिधि तरु तू तारी ॥२॥

बहरे करन अकलि भई होछी सबद सहजु नही बूझिआ ॥ जनमु पदारथु मनमुखि हारिआ बिनु गुर अंधु न सूझिआ ॥३॥

रहै उदासु आस निरासा सहज धिआनि बैरागी ॥ प्रणवति नानक गुरमुखि छूटसि राम नामि लिव लागी ॥४॥२॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1126) भैरउ महला १ ॥
भूंडी चाल चरण कर खिसरे तुचा देह कुमलानी ॥ नेत्री धुंधि करन भए बहरे मनमुखि नामु न जानी ॥१॥

अंधुले किआ पाइआ जगि आइ ॥ रामु रिदै नही गुर की सेवा चाले मूलु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जिहवा रंगि नही हरि राती जब बोलै तब फीके ॥ संत जना की निंदा विआपसि पसू भए कदे होहि न नीके ॥२॥

अम्रित का रसु विरली पाइआ सतिगुर मेलि मिलाए ॥ जब लगु सबद भेदु नही आइआ तब लगु कालु संताए ॥३॥

अन को दरु घरु कबहू न जानसि एको दरु सचिआरा ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ नानकु कहै विचारा ॥४॥३॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1126) भैरउ महला १ ॥
सगली रैणि सोवत गलि फाही दिनसु जंजालि गवाइआ ॥ खिनु पलु घड़ी नही प्रभु जानिआ जिनि इहु जगतु उपाइआ ॥१॥

मन रे किउ छूटसि दुखु भारी ॥ किआ ले आवसि किआ ले जावसि राम जपहु गुणकारी ॥१॥ रहाउ ॥

ऊंधउ कवलु मनमुख मति होछी मनि अंधै सिरि धंधा ॥ कालु बिकालु सदा सिरि तेरै बिनु नावै गलि फंधा ॥२॥

डगरी चाल नेत्र फुनि अंधुले सबद सुरति नही भाई ॥ सासत्र बेद त्रै गुण है माइआ अंधुलउ धंधु कमाई ॥३॥

खोइओ मूलु लाभु कह पावसि दुरमति गिआन विहूणे ॥ सबदु बीचारि राम रसु चाखिआ नानक साचि पतीणे ॥४॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1126) भैरउ महला १ ॥
गुर कै संगि रहै दिनु राती रामु रसनि रंगि राता ॥ अवरु न जाणसि सबदु पछाणसि अंतरि जाणि पछाता ॥१॥

सो जनु ऐसा मै मनि भावै ॥ आपु मारि अपर्मपरि राता गुर की कार कमावै ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि बाहरि पुरखु निरंजनु आदि पुरखु आदेसो ॥ घट घट अंतरि सरब निरंतरि रवि रहिआ सचु वेसो ॥२॥

साचि रते सचु अम्रितु जिहवा मिथिआ मैलु न राई ॥ निरमल नामु अम्रित रसु चाखिआ सबदि रते पति पाई ॥३॥

गुणी गुणी मिलि लाहा पावसि गुरमुखि नामि वडाई ॥ सगले दूख मिटहि गुर सेवा नानक नामु सखाई ॥४॥५॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1127) भैरउ महला १ ॥
हिरदै नामु सरब धनु धारणु गुर परसादी पाईऐ ॥ अमर पदारथ ते किरतारथ सहज धिआनि लिव लाईऐ ॥१॥

मन रे राम भगति चितु लाईऐ ॥ गुरमुखि राम नामु जपि हिरदै सहज सेती घरि जाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

भरमु भेदु भउ कबहु न छूटसि आवत जात न जानी ॥ बिनु हरि नाम को मुकति न पावसि डूबि मुए बिनु पानी ॥२॥

धंधा करत सगली पति खोवसि भरमु न मिटसि गवारा ॥ बिनु गुर सबद मुकति नही कब ही अंधुले धंधु पसारा ॥३॥

अकुल निरंजन सिउ मनु मानिआ मन ही ते मनु मूआ ॥ अंतरि बाहरि एको जानिआ नानक अवरु न दूआ ॥४॥६॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1127) भैरउ महला १ ॥
जगन होम पुंन तप पूजा देह दुखी नित दूख सहै ॥ राम नाम बिनु मुकति न पावसि मुकति नामि गुरमुखि लहै ॥१॥

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा ॥ बिखु खावै बिखु बोली बोलै बिनु नावै निहफलु मरि भ्रमना ॥१॥ रहाउ ॥

पुसतक पाठ बिआकरण वखाणै संधिआ करम तिकाल करै ॥ बिनु गुर सबद मुकति कहा प्राणी राम नाम बिनु उरझि मरै ॥२॥

डंड कमंडल सिखा सूतु धोती तीरथि गवनु अति भ्रमनु करै ॥ राम नाम बिनु सांति न आवै जपि हरि हरि नामु सु पारि परै ॥३॥

जटा मुकटु तनि भसम लगाई बसत्र छोडि तनि नगनु भइआ ॥ राम नाम बिनु त्रिपति न आवै किरत कै बांधै भेखु भइआ ॥४॥

जेते जीअ जंत जलि थलि महीअलि जत्र कत्र तू सरब जीआ ॥ गुर परसादि राखि ले जन कउ हरि रसु नानक झोलि पीआ ॥५॥७॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1127) रागु भैरउ महला ३ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जाति का गरबु न करीअहु कोई ॥ ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु होई ॥१॥

जाति का गरबु न करि मूरख गवारा ॥ इसु गरब ते चलहि बहुतु विकारा ॥१॥ रहाउ ॥

चारे वरन आखै सभु कोई ॥ ब्रहमु बिंद ते सभ ओपति होई ॥२॥

माटी एक सगल संसारा ॥ बहु बिधि भांडे घड़ै कुम्हारा ॥३॥

पंच ततु मिलि देही का आकारा ॥ घटि वधि को करै बीचारा ॥४॥

कहतु नानक इहु जीउ करम बंधु होई ॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न होई ॥५॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
जोगी ग्रिही पंडित भेखधारी ॥ ए सूते अपणै अहंकारी ॥१॥

माइआ मदि माता रहिआ सोइ ॥ जागतु रहै न मूसै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सो जागै जिसु सतिगुरु मिलै ॥ पंच दूत ओहु वसगति करै ॥२॥

सो जागै जो ततु बीचारै ॥ आपि मरै अवरा नह मारै ॥३॥

सो जागै जो एको जाणै ॥ परकिरति छोडै ततु पछाणै ॥४॥

चहु वरना विचि जागै कोइ ॥ जमै कालै ते छूटै सोइ ॥५॥

कहत नानक जनु जागै सोइ ॥ गिआन अंजनु जा की नेत्री होइ ॥६॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
जा कउ राखै अपणी सरणाई ॥ साचे लागै साचा फलु पाई ॥१॥

रे जन कै सिउ करहु पुकारा ॥ हुकमे होआ हुकमे वरतारा ॥१॥ रहाउ ॥

एहु आकारु तेरा है धारा ॥ खिन महि बिनसै करत न लागै बारा ॥२॥

करि प्रसादु इकु खेलु दिखाइआ ॥ गुर किरपा ते परम पदु पाइआ ॥३॥

कहत नानकु मारि जीवाले सोइ ॥ ऐसा बूझहु भरमि न भूलहु कोइ ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
मै कामणि मेरा कंतु करतारु ॥ जेहा कराए तेहा करी सीगारु ॥१॥

जां तिसु भावै तां करे भोगु ॥ तनु मनु साचे साहिब जोगु ॥१॥ रहाउ ॥

उसतति निंदा करे किआ कोई ॥ जां आपे वरतै एको सोई ॥२॥

गुर परसादी पिरम कसाई ॥ मिलउगी दइआल पंच सबद वजाई ॥३॥

भनति नानकु करे किआ कोइ ॥ जिस नो आपि मिलावै सोइ ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
सो मुनि जि मन की दुबिधा मारे ॥ दुबिधा मारि ब्रहमु बीचारे ॥१॥

इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥ मनु खोजत नामु नउ निधि पाई ॥१॥ रहाउ ॥

मूलु मोहु करि करतै जगतु उपाइआ ॥ ममता लाइ भरमि भोलाइआ ॥२॥

इसु मन ते सभ पिंड पराणा ॥ मन कै वीचारि हुकमु बुझि समाणा ॥३॥

करमु होवै गुरु किरपा करै ॥ इहु मनु जागै इसु मन की दुबिधा मरै ॥४॥

मन का सुभाउ सदा बैरागी ॥ सभ महि वसै अतीतु अनरागी ॥५॥

कहत नानकु जो जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥६॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
राम नामु जगत निसतारा ॥ भवजलु पारि उतारणहारा ॥१॥

गुर परसादी हरि नामु सम्हालि ॥ सद ही निबहै तेरै नालि ॥१॥ रहाउ ॥

नामु न चेतहि मनमुख गावारा ॥ बिनु नावै कैसे पावहि पारा ॥२॥

आपे दाति करे दातारु ॥ देवणहारे कउ जैकारु ॥३॥

नदरि करे सतिगुरू मिलाए ॥ नानक हिरदै नामु वसाए ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
नामे उधरे सभि जितने लोअ ॥ गुरमुखि जिना परापति होइ ॥१॥

हरि जीउ अपणी क्रिपा करेइ ॥ गुरमुखि नामु वडिआई देइ ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामि जिन प्रीति पिआरु ॥ आपि उधरे सभि कुल उधारणहारु ॥२॥

बिनु नावै मनमुख जम पुरि जाहि ॥ अउखे होवहि चोटा खाहि ॥३॥

आपे करता देवै सोइ ॥ नानक नामु परापति होइ ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
गोविंद प्रीति सनकादिक उधारे ॥ राम नाम सबदि बीचारे ॥१॥

हरि जीउ अपणी किरपा धारु ॥ गुरमुखि नामे लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि प्रीति भगति साची होइ ॥ पूरै गुरि मेलावा होइ ॥२॥

निज घरि वसै सहजि सुभाइ ॥ गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥३॥

आपे वेखै वेखणहारु ॥ नानक नामु रखहु उर धारि ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
कलजुग महि राम नामु उर धारु ॥ बिनु नावै माथै पावै छारु ॥१॥

राम नामु दुलभु है भाई ॥ गुर परसादि वसै मनि आई ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु जन भालहि सोइ ॥ पूरे गुर ते प्रापति होइ ॥२॥

हरि का भाणा मंनहि से जन परवाणु ॥ गुर कै सबदि नाम नीसाणु ॥३॥

सो सेवहु जो कल रहिआ धारि ॥ नानक गुरमुखि नामु पिआरि ॥४॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
कलजुग महि बहु करम कमाहि ॥ ना रुति न करम थाइ पाहि ॥१॥

कलजुग महि राम नामु है सारु ॥ गुरमुखि साचा लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

तनु मनु खोजि घरै महि पाइआ ॥ गुरमुखि राम नामि चितु लाइआ ॥२॥

गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥ राम नामु रवि रहिआ तिहु लोइ ॥३॥

कलिजुग महि हरि जीउ एकु होर रुति न काई ॥ नानक गुरमुखि हिरदै राम नामु लेहु जमाई ॥४॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥ मरि मरि जमहि ठउर न पावहि बिरथा जनमु गवाई ॥१॥

मेरे प्रीतम करि किरपा देहु बुझाई ॥ हउमै रोगी जगतु उपाइआ बिनु सबदै रोगु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र पड़हि मुनि केते बिनु सबदै सुरति न पाई ॥ त्रै गुण सभे रोगि विआपे ममता सुरति गवाई ॥२॥

इकि आपे काढि लए प्रभि आपे गुर सेवा प्रभि लाए ॥ हरि का नामु निधानो पाइआ सुखु वसिआ मनि आए ॥३॥

चउथी पदवी गुरमुखि वरतहि तिन निज घरि वासा पाइआ ॥ पूरै सतिगुरि किरपा कीनी विचहु आपु गवाइआ ॥४॥

एकसु की सिरि कार एक जिनि ब्रहमा बिसनु रुद्रु उपाइआ ॥ नानक निहचलु साचा एको ना ओहु मरै न जाइआ ॥५॥१॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ ॥
मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥ गुरमुखि बूझहि रोगु गवावहि गुर सबदी वीचारा ॥१॥

हरि जीउ सतसंगति मेलाइ ॥ नानक तिस नो देइ वडिआई जो राम नामि चितु लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

ममता कालि सभि रोगि विआपे तिन जम की है सिरि कारा ॥ गुरमुखि प्राणी जमु नेड़ि न आवै जिन हरि राखिआ उरि धारा ॥२॥

जिन हरि का नामु न गुरमुखि जाता से जग महि काहे आइआ ॥ गुर की सेवा कदे न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥३॥

नानक से पूरे वडभागी सतिगुर सेवा लाए ॥ जो इछहि सोई फलु पावहि गुरबाणी सुखु पाए ॥४॥२॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ ॥
दुख विचि जमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥ गरभ जोनी विचि कदे न निकलै बिसटा माहि समाइ ॥१॥

ध्रिगु ध्रिगु मनमुखि जनमु गवाइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी हरि का नामु न भाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर का सबदु सभि रोग गवाए जिस नो हरि जीउ लाए ॥ नामे नामि मिलै वडिआई जिस नो मंनि वसाए ॥२॥

सतिगुरु भेटै ता फलु पाए सचु करणी सुख सारु ॥ से जन निरमल जो हरि लागे हरि नामे धरहि पिआरु ॥३॥

तिन की रेणु मिलै तां मसतकि लाई जिन सतिगुरु पूरा धिआइआ ॥ नानक तिन की रेणु पूरै भागि पाईऐ जिनी राम नामि चितु लाइआ ॥४॥३॥१३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
सबदु बीचारे सो जनु साचा जिन कै हिरदै साचा सोई ॥ साची भगति करहि दिनु राती तां तनि दूखु न होई ॥१॥

भगतु भगतु कहै सभु कोई ॥ बिनु सतिगुर सेवे भगति न पाईऐ पूरै भागि मिलै प्रभु सोई ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख मूलु गवावहि लाभु मागहि लाहा लाभु किदू होई ॥ जमकालु सदा है सिर ऊपरि दूजै भाइ पति खोई ॥२॥

बहले भेख भवहि दिनु राती हउमै रोगु न जाई ॥ पड़ि पड़ि लूझहि बादु वखाणहि मिलि माइआ सुरति गवाई ॥३॥

सतिगुरु सेवहि परम गति पावहि नामि मिलै वडिआई ॥ नानक नामु जिना मनि वसिआ दरि साचै पति पाई ॥४॥४॥१४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
मनमुख आसा नही उतरै दूजै भाइ खुआए ॥ उदरु नै साणु न भरीऐ कबहू त्रिसना अगनि पचाए ॥१॥

सदा अनंदु राम रसि राते ॥ हिरदै नामु दुबिधा मनि भागी हरि हरि अम्रितु पी त्रिपताते ॥१॥ रहाउ ॥

आपे पारब्रहमु स्रिसटि जिनि साजी सिरि सिरि धंधै लाए ॥ माइआ मोहु कीआ जिनि आपे आपे दूजै लाए ॥२॥

तिस नो किहु कहीऐ जे दूजा होवै सभि तुधै माहि समाए ॥ गुरमुखि गिआनु ततु बीचारा जोती जोति मिलाए ॥३॥

सो प्रभु साचा सद ही साचा साचा सभु आकारा ॥ नानक सतिगुरि सोझी पाई सचि नामि निसतारा ॥४॥५॥१५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
कलि महि प्रेत जिन्ही रामु न पछाता सतजुगि परम हंस बीचारी ॥ दुआपुरि त्रेतै माणस वरतहि विरलै हउमै मारी ॥१॥

कलि महि राम नामि वडिआई ॥ जुगि जुगि गुरमुखि एको जाता विणु नावै मुकति न पाई ॥१॥ रहाउ ॥

हिरदै नामु लखै जनु साचा गुरमुखि मंनि वसाई ॥ आपि तरे सगले कुल तारे जिनी राम नामि लिव लाई ॥२॥

मेरा प्रभु है गुण का दाता अवगण सबदि जलाए ॥ जिन मनि वसिआ से जन सोहे हिरदै नामु वसाए ॥३॥

घरु दरु महलु सतिगुरू दिखाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥ जो किछु कहै सु भला करि मानै नानक नामु वखाणै ॥४॥६॥१६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
मनसा मनहि समाइ लै गुर सबदी वीचार ॥ गुर पूरे ते सोझी पवै फिरि मरै न वारो वार ॥१॥

मन मेरे राम नामु आधारु ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सभ इछ पुजावणहारु ॥१॥ रहाउ ॥

सभ महि एको रवि रहिआ गुर बिनु बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि प्रगटु होआ मेरा हरि प्रभु अनदिनु हरि गुण गाइ ॥२॥

सुखदाता हरि एकु है होर थै सुखु न पाहि ॥ सतिगुरु जिनी न सेविआ दाता से अंति गए पछुताहि ॥३॥

सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ फिरि दुखु न लागै धाइ ॥ नानक हरि भगति परापति होई जोती जोति समाइ ॥४॥७॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
बाझु गुरू जगतु बउराना भूला चोटा खाई ॥ मरि मरि जमै सदा दुखु पाए दर की खबरि न पाई ॥१॥

मेरे मन सदा रहहु सतिगुर की सरणा ॥ हिरदै हरि नामु मीठा सद लागा गुर सबदे भवजलु तरणा ॥१॥ रहाउ ॥

भेख करै बहुतु चितु डोलै अंतरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥ अंतरि तिसा भूख अति बहुती भउकत फिरै दर बारु ॥२॥

गुर कै सबदि मरहि फिरि जीवहि तिन कउ मुकति दुआरि ॥ अंतरि सांति सदा सुखु होवै हरि राखिआ उर धारि ॥३॥

जिउ तिसु भावै तिवै चलावै करणा किछू न जाई ॥ नानक गुरमुखि सबदु सम्हाले राम नामि वडिआई ॥४॥८॥१८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
हउमै माइआ मोहि खुआइआ दुखु खटे दुख खाइ ॥ अंतरि लोभ हलकु दुखु भारी बिनु बिबेक भरमाइ ॥१॥

मनमुखि ध्रिगु जीवणु सैसारि ॥ राम नामु सुपनै नही चेतिआ हरि सिउ कदे न लागै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

पसूआ करम करै नही बूझै कूड़ु कमावै कूड़ो होइ ॥ सतिगुरु मिलै त उलटी होवै खोजि लहै जनु कोइ ॥२॥

हरि हरि नामु रिदै सद वसिआ पाइआ गुणी निधानु ॥ गुर परसादी पूरा पाइआ चूका मन अभिमानु ॥३॥

आपे करता करे कराए आपे मारगि पाए ॥ आपे गुरमुखि दे वडिआई नानक नामि समाए ॥४॥९॥१९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1133) भैरउ महला ३ ॥
मेरी पटीआ लिखहु हरि गोविंद गोपाला ॥ दूजै भाइ फाथे जम जाला ॥ सतिगुरु करे मेरी प्रतिपाला ॥ हरि सुखदाता मेरै नाला ॥१॥

गुर उपदेसि प्रहिलादु हरि उचरै ॥ सासना ते बालकु गमु न करै ॥१॥ रहाउ ॥

माता उपदेसै प्रहिलाद पिआरे ॥ पुत्र राम नामु छोडहु जीउ लेहु उबारे ॥ प्रहिलादु कहै सुनहु मेरी माइ ॥ राम नामु न छोडा गुरि दीआ बुझाइ ॥२॥

संडा मरका सभि जाइ पुकारे ॥ प्रहिलादु आपि विगड़िआ सभि चाटड़े विगाड़े ॥ दुसट सभा महि मंत्रु पकाइआ ॥ प्रहलाद का राखा होइ रघुराइआ ॥३॥

हाथि खड़गु करि धाइआ अति अहंकारि ॥ हरि तेरा कहा तुझु लए उबारि ॥ खिन महि भैआन रूपु निकसिआ थम्ह उपाड़ि ॥ हरणाखसु नखी बिदारिआ प्रहलादु लीआ उबारि ॥४॥

संत जना के हरि जीउ कारज सवारे ॥ प्रहलाद जन के इकीह कुल उधारे ॥ गुर कै सबदि हउमै बिखु मारे ॥ नानक राम नामि संत निसतारे ॥५॥१०॥२०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1133) भैरउ महला ३ ॥
आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥ जो तेरी सदा सरणाई तिन मनि दुखु न होई ॥१॥

जुगि जुगि भगता की रखदा आइआ ॥ दैत पुत्रु प्रहलादु गाइत्री तरपणु किछू न जाणै सबदे मेलि मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु भगति करहि दिन राती दुबिधा सबदे खोई ॥ सदा निरमल है जो सचि राते सचु वसिआ मनि सोई ॥२॥

मूरख दुबिधा पड़्हहि मूलु न पछाणहि बिरथा जनमु गवाइआ ॥ संत जना की निंदा करहि दुसटु दैतु चिड़ाइआ ॥३॥

प्रहलादु दुबिधा न पड़ै हरि नामु न छोडै डरै न किसै दा डराइआ ॥ संत जना का हरि जीउ राखा दैतै कालु नेड़ा आइआ ॥४॥

आपणी पैज आपे राखै भगतां देइ वडिआई ॥ नानक हरणाखसु नखी बिदारिआ अंधै दर की खबरि न पाई ॥५॥११॥२१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1133) रागु भैरउ महला ४ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥ गुर सबदी हरि भजु सुरति समाइणु ॥१॥

मेरे मन हरि भजु नामु नराइणु ॥ हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि भवजलु हरि नामि तराइणु ॥१॥ रहाउ ॥

संगति साध मेलि हरि गाइणु ॥ गुरमती ले राम रसाइणु ॥२॥

गुर साधू अम्रित गिआन सरि नाइणु ॥ सभि किलविख पाप गए गावाइणु ॥३॥

तू आपे करता स्रिसटि धराइणु ॥ जनु नानकु मेलि तेरा दास दसाइणु ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
बोलि हरि नामु सफल सा घरी ॥ गुर उपदेसि सभि दुख परहरी ॥१॥

मेरे मन हरि भजु नामु नरहरी ॥ करि किरपा मेलहु गुरु पूरा सतसंगति संगि सिंधु भउ तरी ॥१॥ रहाउ ॥

जगजीवनु धिआइ मनि हरि सिमरी ॥ कोट कोटंतर तेरे पाप परहरी ॥२॥

सतसंगति साध धूरि मुखि परी ॥ इसनानु कीओ अठसठि सुरसरी ॥३॥

हम मूरख कउ हरि किरपा करी ॥ जनु नानकु तारिओ तारण हरी ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
सुक्रितु करणी सारु जपमाली ॥ हिरदै फेरि चलै तुधु नाली ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु बनवाली ॥ करि किरपा मेलहु सतसंगति तूटि गई माइआ जम जाली ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सेवा घाल जिनि घाली ॥ तिसु घड़ीऐ सबदु सची टकसाली ॥२॥

हरि अगम अगोचरु गुरि अगम दिखाली ॥ विचि काइआ नगर लधा हरि भाली ॥३॥

हम बारिक हरि पिता प्रतिपाली ॥ जन नानक तारहु नदरि निहाली ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
सभि घट तेरे तू सभना माहि ॥ तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥१॥

हरि सुखदाता मेरे मन जापु ॥ हउ तुधु सालाही तू मेरा हरि प्रभु बापु ॥१॥ रहाउ ॥

जह जह देखा तह हरि प्रभु सोइ ॥ सभ तेरै वसि दूजा अवरु न कोइ ॥२॥

जिस कउ तुम हरि राखिआ भावै ॥ तिस कै नेड़ै कोइ न जावै ॥३॥

तू जलि थलि महीअलि सभ तै भरपूरि ॥ जन नानक हरि जपि हाजरा हजूरि ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि का संतु हरि की हरि मूरति जिसु हिरदै हरि नामु मुरारि ॥ मसतकि भागु होवै जिसु लिखिआ सो गुरमति हिरदै हरि नामु सम्हारि ॥१॥

मधुसूदनु जपीऐ उर धारि ॥ देही नगरि तसकर पंच धातू गुर सबदी हरि काढे मारि ॥१॥ रहाउ ॥

जिन का हरि सेती मनु मानिआ तिन कारज हरि आपि सवारि ॥ तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि अंगीकारु कीआ करतारि ॥२॥

मता मसूरति तां किछु कीजै जे किछु होवै हरि बाहरि ॥ जो किछु करे सोई भल होसी हरि धिआवहु अनदिनु नामु मुरारि ॥३॥

हरि जो किछु करे सु आपे आपे ओहु पूछि न किसै करे बीचारि ॥ नानक सो प्रभु सदा धिआईऐ जिनि मेलिआ सतिगुरु किरपा धारि ॥४॥१॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1135) भैरउ महला ४ ॥
ते साधू हरि मेलहु सुआमी जिन जपिआ गति होइ हमारी ॥ तिन का दरसु देखि मनु बिगसै खिनु खिनु तिन कउ हउ बलिहारी ॥१॥

हरि हिरदै जपि नामु मुरारी ॥ क्रिपा क्रिपा करि जगत पित सुआमी हम दासनि दास कीजै पनिहारी ॥१॥ रहाउ ॥

तिन मति ऊतम तिन पति ऊतम जिन हिरदै वसिआ बनवारी ॥ तिन की सेवा लाइ हरि सुआमी तिन सिमरत गति होइ हमारी ॥२॥

जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते हरि दरगह काढे मारी ॥ ते नर निंदक सोभ न पावहि तिन नक काटे सिरजनहारी ॥३॥

हरि आपि बुलावै आपे बोलै हरि आपि निरंजनु निरंकारु निराहारी ॥ हरि जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलसी जन नानक किआ एहि जंत विचारी ॥४॥२॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1135) भैरउ महला ४ ॥
सतसंगति साई हरि तेरी जितु हरि कीरति हरि सुनणे ॥ जिन हरि नामु सुणिआ मनु भीना तिन हम स्रेवह नित चरणे ॥१॥

जगजीवनु हरि धिआइ तरणे ॥ अनेक असंख नाम हरि तेरे न जाही जिहवा इतु गनणे ॥१॥ रहाउ ॥

गुरसिख हरि बोलहु हरि गावहु ले गुरमति हरि जपणे ॥ जो उपदेसु सुणे गुर केरा सो जनु पावै हरि सुख घणे ॥२॥

धंनु सु वंसु धंनु सु पिता धंनु सु माता जिनि जन जणे ॥ जिन सासि गिरासि धिआइआ मेरा हरि हरि से साची दरगह हरि जन बणे ॥३॥

हरि हरि अगम नाम हरि तेरे विचि भगता हरि धरणे ॥ नानक जनि पाइआ मति गुरमति जपि हरि हरि पारि पवणे ॥४॥३॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगली थीति पासि डारि राखी ॥ असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥१॥

भरमि भूले नर करत कचराइण ॥ जनम मरण ते रहत नाराइण ॥१॥ रहाउ ॥

करि पंजीरु खवाइओ चोर ॥ ओहु जनमि न मरै रे साकत ढोर ॥२॥

सगल पराध देहि लोरोनी ॥ सो मुखु जलउ जितु कहहि ठाकुरु जोनी ॥३॥

जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥ नानक का प्रभु रहिओ समाइ ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
ऊठत सुखीआ बैठत सुखीआ ॥ भउ नही लागै जां ऐसे बुझीआ ॥१॥

राखा एकु हमारा सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ ॥

सोइ अचिंता जागि अचिंता ॥ जहा कहां प्रभु तूं वरतंता ॥२॥

घरि सुखि वसिआ बाहरि सुखु पाइआ ॥ कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥३॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
वरत न रहउ न मह रमदाना ॥ तिसु सेवी जो रखै निदाना ॥१॥

एकु गुसाई अलहु मेरा ॥ हिंदू तुरक दुहां नेबेरा ॥१॥ रहाउ ॥

हज काबै जाउ न तीरथ पूजा ॥ एको सेवी अवरु न दूजा ॥२॥

पूजा करउ न निवाज गुजारउ ॥ एक निरंकार ले रिदै नमसकारउ ॥३॥

ना हम हिंदू न मुसलमान ॥ अलह राम के पिंडु परान ॥४॥

कहु कबीर इहु कीआ वखाना ॥ गुर पीर मिलि खुदि खसमु पछाना ॥५॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥ पांच मिरग बेधे सिव की बानी ॥१॥

संतसंगि ले चड़िओ सिकार ॥ म्रिग पकरे बिनु घोर हथीआर ॥१॥ रहाउ ॥

आखेर बिरति बाहरि आइओ धाइ ॥ अहेरा पाइओ घर कै गांइ ॥२॥

म्रिग पकरे घरि आणे हाटि ॥ चुख चुख ले गए बांढे बाटि ॥३॥

एहु अहेरा कीनो दानु ॥ नानक कै घरि केवल नामु ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥ साकत हरि हरि चीति न आइआ ॥१॥

संत जना की लेहु मते ॥ साधसंगि पावहु परम गते ॥१॥ रहाउ ॥

पाथर कउ बहु नीरु पवाइआ ॥ नह भीगै अधिक सूकाइआ ॥२॥

खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥ जैसे दह दिस पवनु झुलाइआ ॥३॥

बिनु कण खलहानु जैसे गाहन पाइआ ॥ तिउ साकत ते को न बरासाइआ ॥४॥

तित ही लागा जितु को लाइआ ॥ कहु नानक प्रभि बणत बणाइआ ॥५॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1137) भैरउ महला ५ ॥
जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥ जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥१॥

गुरु गोबिंदु जीअ कै काम ॥ हलति पलति जा की सद छाम ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु आराधन निरमल रीति ॥ साधसंगि बिनसी बिपरीति ॥२॥

मीत हीत धनु नह पारणा ॥ धंनि धंनि मेरे नाराइणा ॥३॥

नानकु बोलै अम्रित बाणी ॥ एक बिना दूजा नही जाणी ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1137) भैरउ महला ५ ॥
आगै दयु पाछै नाराइण ॥ मधि भागि हरि प्रेम रसाइण ॥१॥

प्रभू हमारै सासत्र सउण ॥ सूख सहज आनंद ग्रिह भउण ॥१॥ रहाउ ॥

रसना नामु करन सुणि जीवे ॥ प्रभु सिमरि सिमरि अमर थिरु थीवे ॥२॥

जनम जनम के दूख निवारे ॥ अनहद सबद वजे दरबारे ॥३॥

करि किरपा प्रभि लीए मिलाए ॥ नानक प्रभ सरणागति आए ॥४॥७॥


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