Pt 2 - राग बसंत - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Basant - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥ पारब्रहमि प्रभि करी मइआ ॥ सरब मनोरथ पूरन काम ॥ जपि जीवै नानकु राम नाम ॥१॥

सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥ बिनु सतिगुर दीसै बिललांती साकतु फिरि फिरि आवै जावै ॥१॥ रहाउ ॥

से धनवंत जिन हरि प्रभु रासि ॥ काम क्रोध गुर सबदि नासि ॥ भै बिनसे निरभै पदु पाइआ ॥ गुर मिलि नानकि खसमु धिआइआ ॥२॥

साधसंगति प्रभि कीओ निवास ॥ हरि जपि जपि होई पूरन आस ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ ॥ गुर मिलि नानकि हरि हरि कहिआ ॥३॥

असट सिधि नव निधि एह ॥ करमि परापति जिसु नामु देह ॥ प्रभ जपि जपि जीवहि तेरे दास ॥ गुर मिलि नानक कमल प्रगास ॥४॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ घरु १ इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल इछा जपि पुंनीआ ॥ प्रभि मेले चिरी विछुंनिआ ॥१॥

तुम रवहु गोबिंदै रवण जोगु ॥ जितु रविऐ सुख सहज भोगु ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा नदरि निहालिआ ॥ अपणा दासु आपि सम्हालिआ ॥२॥

सेज सुहावी रसि बनी ॥ आइ मिले प्रभ सुख धनी ॥३॥

मेरा गुणु अवगणु न बीचारिआ ॥ प्रभ नानक चरण पूजारिआ ॥४॥१॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥ अनदिन उपजी सहज धुना ॥१॥

मनु मउलिओ हरि चरन संगि ॥ करि किरपा साधू जन भेटे नित रातौ हरि नाम रंगि ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा प्रगटे गोपाल ॥ लड़ि लाइ उधारे दीन दइआल ॥२॥

इहु मनु होआ साध धूरि ॥ नित देखै सुआमी हजूरि ॥३॥

काम क्रोध त्रिसना गई ॥ नानक प्रभ किरपा भई ॥४॥२॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
रोग मिटाए प्रभू आपि ॥ बालक राखे अपने कर थापि ॥१॥

सांति सहज ग्रिहि सद बसंतु ॥ गुर पूरे की सरणी आए कलिआण रूप जपि हरि हरि मंतु ॥१॥ रहाउ ॥

सोग संताप कटे प्रभि आपि ॥ गुर अपुने कउ नित नित जापि ॥२॥

जो जनु तेरा जपे नाउ ॥ सभि फल पाए निहचल गुण गाउ ॥३॥

नानक भगता भली रीति ॥ सुखदाता जपदे नीत नीति ॥४॥३॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
हुकमु करि कीन्हे निहाल ॥ अपने सेवक कउ भइआ दइआलु ॥१॥

गुरि पूरै सभु पूरा कीआ ॥ अम्रित नामु रिद महि दीआ ॥१॥ रहाउ ॥

करमु धरमु मेरा कछु न बीचारिओ ॥ बाह पकरि भवजलु निसतारिओ ॥२॥

प्रभि काटि मैलु निरमल करे ॥ गुर पूरे की सरणी परे ॥३॥

आपि करहि आपि करणैहारे ॥ करि किरपा नानक उधारे ॥४॥४॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1185) बसंतु महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देखु फूल फूल फूले ॥ अहं तिआगि तिआगे ॥ चरन कमल पागे ॥ तुम मिलहु प्रभ सभागे ॥ हरि चेति मन मेरे ॥ रहाउ ॥

सघन बासु कूले ॥ इकि रहे सूकि कठूले ॥ बसंत रुति आई ॥ परफूलता रहे ॥१॥

अब कलू आइओ रे ॥ इकु नामु बोवहु बोवहु ॥ अन रूति नाही नाही ॥ मतु भरमि भूलहु भूलहु ॥ गुर मिले हरि पाए ॥ जिसु मसतकि है लेखा ॥ मन रुति नाम रे ॥ गुन कहे नानक हरि हरे हरि हरे ॥२॥१८॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥ मनु चंचलु या ते गहिओ न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जोगी जंगम अरु संनिआस ॥ सभ ही परि डारी इह फास ॥१॥

जिहि जिहि हरि को नामु सम्हारि ॥ ते भव सागर उतरे पारि ॥२॥

जन नानक हरि की सरनाइ ॥ दीजै नामु रहै गुन गाइ ॥३॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥ मनु मेरो धावन ते छूटिओ करि बैठो बिसरामु ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ ममता तन ते भागी उपजिओ निरमल गिआनु ॥ लोभ मोह एह परसि न साकै गही भगति भगवान ॥१॥

जनम जनम का संसा चूका रतनु नामु जब पाइआ ॥ त्रिसना सकल बिनासी मन ते निज सुख माहि समाइआ ॥२॥

जा कउ होत दइआलु किरपा निधि सो गोबिंद गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि की स्मपै कोऊ गुरमुखि पावै ॥३॥३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥ तनु बिनसै जम सिउ परै कामु ॥१॥ रहाउ ॥

इहु जगु धूए का पहार ॥ तै साचा मानिआ किह बिचारि ॥१॥

धनु दारा स्मपति ग्रेह ॥ कछु संगि न चालै समझ लेह ॥२॥

इक भगति नाराइन होइ संगि ॥ कहु नानक भजु तिह एक रंगि ॥३॥४॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1187) बसंतु महला ९ ॥
कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥ कछु बिगरिओ नाहिन अजहु जाग ॥१॥ रहाउ ॥

सम सुपनै कै इहु जगु जानु ॥ बिनसै छिन मै साची मानु ॥१॥

संगि तेरै हरि बसत नीत ॥ निस बासुर भजु ताहि मीत ॥२॥

बार अंत की होइ सहाइ ॥ कहु नानक गुन ता के गाइ ॥३॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1187) बसंतु महला १ असटपदीआ घरु १ दुतुकीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगु कऊआ नामु नही चीति ॥ नामु बिसारि गिरै देखु भीति ॥ मनूआ डोलै चीति अनीति ॥ जग सिउ तूटी झूठ परीति ॥१॥

कामु क्रोधु बिखु बजरु भारु ॥ नाम बिना कैसे गुन चारु ॥१॥ रहाउ ॥

घरु बालू का घूमन घेरि ॥ बरखसि बाणी बुदबुदा हेरि ॥ मात्र बूंद ते धरि चकु फेरि ॥ सरब जोति नामै की चेरि ॥२॥

सरब उपाइ गुरू सिरि मोरु ॥ भगति करउ पग लागउ तोर ॥ नामि रतो चाहउ तुझ ओरु ॥ नामु दुराइ चलै सो चोरु ॥३॥

पति खोई बिखु अंचलि पाइ ॥ साच नामि रतो पति सिउ घरि जाइ ॥ जो किछु कीन्हसि प्रभु रजाइ ॥ भै मानै निरभउ मेरी माइ ॥४॥

कामनि चाहै सुंदरि भोगु ॥ पान फूल मीठे रस रोग ॥ खीलै बिगसै तेतो सोग ॥ प्रभ सरणागति कीन्हसि होग ॥५॥

कापड़ु पहिरसि अधिकु सीगारु ॥ माटी फूली रूपु बिकारु ॥ आसा मनसा बांधो बारु ॥ नाम बिना सूना घरु बारु ॥६॥

गाछहु पुत्री राज कुआरि ॥ नामु भणहु सचु दोतु सवारि ॥ प्रिउ सेवहु प्रभ प्रेम अधारि ॥ गुर सबदी बिखु तिआस निवारि ॥७॥

मोहनि मोहि लीआ मनु मोहि ॥ गुर कै सबदि पछाना तोहि ॥ नानक ठाढे चाहहि प्रभू दुआरि ॥ तेरे नामि संतोखे किरपा धारि ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1187) बसंतु महला १ ॥
मनु भूलउ भरमसि आइ जाइ ॥ अति लुबध लुभानउ बिखम माइ ॥ नह असथिरु दीसै एक भाइ ॥ जिउ मीन कुंडलीआ कंठि पाइ ॥१॥

मनु भूलउ समझसि साच नाइ ॥ गुर सबदु बीचारे सहज भाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु भूलउ भरमसि भवर तार ॥ बिल बिरथे चाहै बहु बिकार ॥ मैगल जिउ फाससि कामहार ॥ कड़ि बंधनि बाधिओ सीस मार ॥२॥

मनु मुगधौ दादरु भगतिहीनु ॥ दरि भ्रसट सरापी नाम बीनु ॥ ता कै जाति न पाती नाम लीन ॥ सभि दूख सखाई गुणह बीन ॥३॥

मनु चलै न जाई ठाकि राखु ॥ बिनु हरि रस राते पति न साखु ॥ तू आपे सुरता आपि राखु ॥ धरि धारण देखै जाणै आपि ॥४॥

आपि भुलाए किसु कहउ जाइ ॥ गुरु मेले बिरथा कहउ माइ ॥ अवगण छोडउ गुण कमाइ ॥ गुर सबदी राता सचि समाइ ॥५॥

सतिगुर मिलिऐ मति ऊतम होइ ॥ मनु निरमलु हउमै कढै धोइ ॥ सदा मुकतु बंधि न सकै कोइ ॥ सदा नामु वखाणै अउरु न कोइ ॥६॥

मनु हरि कै भाणै आवै जाइ ॥ सभ महि एको किछु कहणु न जाइ ॥ सभु हुकमो वरतै हुकमि समाइ ॥ दूख सूख सभ तिसु रजाइ ॥७॥

तू अभुलु न भूलौ कदे नाहि ॥ गुर सबदु सुणाए मति अगाहि ॥ तू मोटउ ठाकुरु सबद माहि ॥ मनु नानक मानिआ सचु सलाहि ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1188) बसंतु महला १ ॥
दरसन की पिआस जिसु नर होइ ॥ एकतु राचै परहरि दोइ ॥ दूरि दरदु मथि अम्रितु खाइ ॥ गुरमुखि बूझै एक समाइ ॥१॥

तेरे दरसन कउ केती बिललाइ ॥ विरला को चीनसि गुर सबदि मिलाइ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद वखाणि कहहि इकु कहीऐ ॥ ओहु बेअंतु अंतु किनि लहीऐ ॥ एको करता जिनि जगु कीआ ॥ बाझु कला धरि गगनु धरीआ ॥२॥

एको गिआनु धिआनु धुनि बाणी ॥ एकु निरालमु अकथ कहाणी ॥ एको सबदु सचा नीसाणु ॥ पूरे गुर ते जाणै जाणु ॥३॥

एको धरमु द्रिड़ै सचु कोई ॥ गुरमति पूरा जुगि जुगि सोई ॥ अनहदि राता एक लिव तार ॥ ओहु गुरमुखि पावै अलख अपार ॥४॥

एको तखतु एको पातिसाहु ॥ सरबी थाई वेपरवाहु ॥ तिस का कीआ त्रिभवण सारु ॥ ओहु अगमु अगोचरु एकंकारु ॥५॥

एका मूरति साचा नाउ ॥ तिथै निबड़ै साचु निआउ ॥ साची करणी पति परवाणु ॥ साची दरगह पावै माणु ॥६॥

एका भगति एको है भाउ ॥ बिनु भै भगती आवउ जाउ ॥ गुर ते समझि रहै मिहमाणु ॥ हरि रसि राता जनु परवाणु ॥७॥

इत उत देखउ सहजे रावउ ॥ तुझ बिनु ठाकुर किसै न भावउ ॥ नानक हउमै सबदि जलाइआ ॥ सतिगुरि साचा दरसु दिखाइआ ॥८॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1189) बसंतु महला १ ॥
चंचलु चीतु न पावै पारा ॥ आवत जात न लागै बारा ॥ दूखु घणो मरीऐ करतारा ॥ बिनु प्रीतम को करै न सारा ॥१॥

सभ ऊतम किसु आखउ हीना ॥ हरि भगती सचि नामि पतीना ॥१॥ रहाउ ॥

अउखध करि थाकी बहुतेरे ॥ किउ दुखु चूकै बिनु गुर मेरे ॥ बिनु हरि भगती दूख घणेरे ॥ दुख सुख दाते ठाकुर मेरे ॥२॥

रोगु वडो किउ बांधउ धीरा ॥ रोगु बुझै सो काटै पीरा ॥ मै अवगण मन माहि सरीरा ॥ ढूढत खोजत गुरि मेले बीरा ॥३॥

गुर का सबदु दारू हरि नाउ ॥ जिउ तू राखहि तिवै रहाउ ॥ जगु रोगी कह देखि दिखाउ ॥ हरि निरमाइलु निरमलु नाउ ॥४॥

घर महि घरु जो देखि दिखावै ॥ गुर महली सो महलि बुलावै ॥ मन महि मनूआ चित महि चीता ॥ ऐसे हरि के लोग अतीता ॥५॥

हरख सोग ते रहहि निरासा ॥ अम्रितु चाखि हरि नामि निवासा ॥ आपु पछाणि रहै लिव लागा ॥ जनमु जीति गुरमति दुखु भागा ॥६॥

गुरि दीआ सचु अम्रितु पीवउ ॥ सहजि मरउ जीवत ही जीवउ ॥ अपणो करि राखहु गुर भावै ॥ तुमरो होइ सु तुझहि समावै ॥७॥

भोगी कउ दुखु रोग विआपै ॥ घटि घटि रवि रहिआ प्रभु जापै ॥ सुख दुख ही ते गुर सबदि अतीता ॥ नानक रामु रवै हित चीता ॥८॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1189) बसंतु महला १ इक तुकीआ ॥
मतु भसम अंधूले गरबि जाहि ॥ इन बिधि नागे जोगु नाहि ॥१॥

मूड़्हे काहे बिसारिओ तै राम नाम ॥ अंत कालि तेरै आवै काम ॥१॥ रहाउ ॥

गुर पूछि तुम करहु बीचारु ॥ जह देखउ तह सारिगपाणि ॥२॥

किआ हउ आखा जां कछू नाहि ॥ जाति पति सभ तेरै नाइ ॥३॥

काहे मालु दरबु देखि गरबि जाहि ॥ चलती बार तेरो कछू नाहि ॥४॥

पंच मारि चितु रखहु थाइ ॥ जोग जुगति की इहै पांइ ॥५॥

हउमै पैखड़ु तेरे मनै माहि ॥ हरि न चेतहि मूड़े मुकति जाहि ॥६॥

मत हरि विसरिऐ जम वसि पाहि ॥ अंत कालि मूड़े चोट खाहि ॥७॥

गुर सबदु बीचारहि आपु जाइ ॥ साच जोगु मनि वसै आइ ॥८॥

जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु चेतहि नाहि ॥ मड़ी मसाणी मूड़े जोगु नाहि ॥९॥

गुण नानकु बोलै भली बाणि ॥ तुम होहु सुजाखे लेहु पछाणि ॥१०॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1190) बसंतु महला १ ॥
दुबिधा दुरमति अधुली कार ॥ मनमुखि भरमै मझि गुबार ॥१॥

मनु अंधुला अंधुली मति लागै ॥ गुर करणी बिनु भरमु न भागै ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुखि अंधुले गुरमति न भाई ॥ पसू भए अभिमानु न जाई ॥२॥

लख चउरासीह जंत उपाए ॥ मेरे ठाकुर भाणे सिरजि समाए ॥३॥

सगली भूलै नही सबदु अचारु ॥ सो समझै जिसु गुरु करतारु ॥४॥

गुर के चाकर ठाकुर भाणे ॥ बखसि लीए नाही जम काणे ॥५॥

जिन कै हिरदै एको भाइआ ॥ आपे मेले भरमु चुकाइआ ॥६॥

बेमुहताजु बेअंतु अपारा ॥ सचि पतीजै करणैहारा ॥७॥

नानक भूले गुरु समझावै ॥ एकु दिखावै साचि टिकावै ॥८॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1190) बसंतु महला १ ॥
आपे भवरा फूल बेलि ॥ आपे संगति मीत मेलि ॥१॥

ऐसी भवरा बासु ले ॥ तरवर फूले बन हरे ॥१॥ रहाउ ॥

आपे कवला कंतु आपि ॥ आपे रावे सबदि थापि ॥२॥

आपे बछरू गऊ खीरु ॥ आपे मंदरु थम्हु सरीरु ॥३॥

आपे करणी करणहारु ॥ आपे गुरमुखि करि बीचारु ॥४॥

तू करि करि देखहि करणहारु ॥ जोति जीअ असंख देइ अधारु ॥५॥

तू सरु सागरु गुण गहीरु ॥ तू अकुल निरंजनु परम हीरु ॥६॥

तू आपे करता करण जोगु ॥ निहकेवलु राजन सुखी लोगु ॥७॥

नानक ध्रापे हरि नाम सुआदि ॥ बिनु हरि गुर प्रीतम जनमु बादि ॥८॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1192) बसंतु महला ५ घरु १ दुतुकीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुणि साखी मन जपि पिआर ॥ अजामलु उधरिआ कहि एक बार ॥ बालमीकै होआ साधसंगु ॥ ध्रू कउ मिलिआ हरि निसंग ॥१॥

तेरिआ संता जाचउ चरन रेन ॥ ले मसतकि लावउ करि क्रिपा देन ॥१॥ रहाउ ॥

गनिका उधरी हरि कहै तोत ॥ गजइंद्र धिआइओ हरि कीओ मोख ॥ बिप्र सुदामे दालदु भंज ॥ रे मन तू भी भजु गोबिंद ॥२॥

बधिकु उधारिओ खमि प्रहार ॥ कुबिजा उधरी अंगुसट धार ॥ बिदरु उधारिओ दासत भाइ ॥ रे मन तू भी हरि धिआइ ॥३॥

प्रहलाद रखी हरि पैज आप ॥ बसत्र छीनत द्रोपती रखी लाज ॥ जिनि जिनि सेविआ अंत बार ॥ रे मन सेवि तू परहि पार ॥४॥

धंनै सेविआ बाल बुधि ॥ त्रिलोचन गुर मिलि भई सिधि ॥ बेणी कउ गुरि कीओ प्रगासु ॥ रे मन तू भी होहि दासु ॥५॥

जैदेव तिआगिओ अहमेव ॥ नाई उधरिओ सैनु सेव ॥ मनु डीगि न डोलै कहूं जाइ ॥ मन तू भी तरसहि सरणि पाइ ॥६॥

जिह अनुग्रहु ठाकुरि कीओ आपि ॥ से तैं लीने भगत राखि ॥ तिन का गुणु अवगणु न बीचारिओ कोइ ॥ इह बिधि देखि मनु लगा सेव ॥७॥

कबीरि धिआइओ एक रंग ॥ नामदेव हरि जीउ बसहि संगि ॥ रविदास धिआए प्रभ अनूप ॥ गुर नानक देव गोविंद रूप ॥८॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1192) बसंतु महला ५ ॥
अनिक जनम भ्रमे जोनि माहि ॥ हरि सिमरन बिनु नरकि पाहि ॥ भगति बिहूना खंड खंड ॥ बिनु बूझे जमु देत डंड ॥१॥

गोबिंद भजहु मेरे सदा मीत ॥ साच सबद करि सदा प्रीति ॥१॥ रहाउ ॥

संतोखु न आवत कहूं काज ॥ धूम बादर सभि माइआ साज ॥ पाप करंतौ नह संगाइ ॥ बिखु का माता आवै जाइ ॥२॥

हउ हउ करत बधे बिकार ॥ मोह लोभ डूबौ संसार ॥ कामि क्रोधि मनु वसि कीआ ॥ सुपनै नामु न हरि लीआ ॥३॥

कब ही राजा कब मंगनहारु ॥ दूख सूख बाधौ संसार ॥ मन उधरण का साजु नाहि ॥ पाप बंधन नित पउत जाहि ॥४॥

ईठ मीत कोऊ सखा नाहि ॥ आपि बीजि आपे ही खांहि ॥ जा कै कीन्है होत बिकार ॥ से छोडि चलिआ खिन महि गवार ॥५॥

माइआ मोहि बहु भरमिआ ॥ किरत रेख करि करमिआ ॥ करणैहारु अलिपतु आपि ॥ नही लेपु प्रभ पुंन पापि ॥६॥

राखि लेहु गोबिंद दइआल ॥ तेरी सरणि पूरन क्रिपाल ॥ तुझ बिनु दूजा नही ठाउ ॥ करि किरपा प्रभ देहु नाउ ॥७॥

तू करता तू करणहारु ॥ तू ऊचा तू बहु अपारु ॥ करि किरपा लड़ि लेहु लाइ ॥ नानक दास प्रभ की सरणाइ ॥८॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1193) बसंत की वार महलु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि का नामु धिआइ कै होहु हरिआ भाई ॥ करमि लिखंतै पाईऐ इह रुति सुहाई ॥ वणु त्रिणु त्रिभवणु मउलिआ अम्रित फलु पाई ॥ मिलि साधू सुखु ऊपजै लथी सभ छाई ॥ नानकु सिमरै एकु नामु फिरि बहुड़ि न धाई ॥१॥

पंजे बधे महाबली करि सचा ढोआ ॥ आपणे चरण जपाइअनु विचि दयु खड़ोआ ॥ रोग सोग सभि मिटि गए नित नवा निरोआ ॥ दिनु रैणि नामु धिआइदा फिरि पाइ न मोआ ॥ जिस ते उपजिआ नानका सोई फिरि होआ ॥२॥

किथहु उपजै कह रहै कह माहि समावै ॥ जीअ जंत सभि खसम के कउणु कीमति पावै ॥ कहनि धिआइनि सुणनि नित से भगत सुहावै ॥ अगमु अगोचरु साहिबो दूसरु लवै न लावै ॥ सचु पूरै गुरि उपदेसिआ नानकु सुणावै ॥३॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1193) बसंतु बाणी भगतां की ॥
कबीर जी घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मउली धरती मउलिआ अकासु ॥ घटि घटि मउलिआ आतम प्रगासु ॥१॥

राजा रामु मउलिआ अनत भाइ ॥ जह देखउ तह रहिआ समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दुतीआ मउले चारि बेद ॥ सिम्रिति मउली सिउ कतेब ॥२॥

संकरु मउलिओ जोग धिआन ॥ कबीर को सुआमी सभ समान ॥३॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1193) पंडित जन माते पड़्हि पुरान ॥ जोगी माते जोग धिआन ॥ संनिआसी माते अहमेव ॥ तपसी माते तप कै भेव ॥१॥

सभ मद माते कोऊ न जाग ॥ संग ही चोर घरु मुसन लाग ॥१॥ रहाउ ॥

जागै सुकदेउ अरु अकूरु ॥ हणवंतु जागै धरि लंकूरु ॥ संकरु जागै चरन सेव ॥ कलि जागे नामा जैदेव ॥२॥

जागत सोवत बहु प्रकार ॥ गुरमुखि जागै सोई सारु ॥ इसु देही के अधिक काम ॥ कहि कबीर भजि राम नाम ॥३॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1194) जोइ खसमु है जाइआ ॥ पूति बापु खेलाइआ ॥ बिनु स्रवणा खीरु पिलाइआ ॥१॥

देखहु लोगा कलि को भाउ ॥ सुति मुकलाई अपनी माउ ॥१॥ रहाउ ॥

पगा बिनु हुरीआ मारता ॥ बदनै बिनु खिर खिर हासता ॥ निद्रा बिनु नरु पै सोवै ॥ बिनु बासन खीरु बिलोवै ॥२॥

बिनु असथन गऊ लवेरी ॥ पैडे बिनु बाट घनेरी ॥ बिनु सतिगुर बाट न पाई ॥ कहु कबीर समझाई ॥३॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1194) प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥ संगि सखा बहु लीए बाल ॥ मो कउ कहा पड़्हावसि आल जाल ॥ मेरी पटीआ लिखि देहु स्री गोपाल ॥१॥

नही छोडउ रे बाबा राम नाम ॥ मेरो अउर पड़्हन सिउ नही कामु ॥१॥ रहाउ ॥

संडै मरकै कहिओ जाइ ॥ प्रहलाद बुलाए बेगि धाइ ॥ तू राम कहन की छोडु बानि ॥ तुझु तुरतु छडाऊ मेरो कहिओ मानि ॥२॥

मो कउ कहा सतावहु बार बार ॥ प्रभि जल थल गिरि कीए पहार ॥ इकु रामु न छोडउ गुरहि गारि ॥ मो कउ घालि जारि भावै मारि डारि ॥३॥

काढि खड़गु कोपिओ रिसाइ ॥ तुझ राखनहारो मोहि बताइ ॥ प्रभ थ्मभ ते निकसे कै बिसथार ॥ हरनाखसु छेदिओ नख बिदार ॥४॥

ओइ परम पुरख देवाधि देव ॥ भगति हेति नरसिंघ भेव ॥ कहि कबीर को लखै न पार ॥ प्रहलाद उधारे अनिक बार ॥५॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1194) इसु तन मन मधे मदन चोर ॥ जिनि गिआन रतनु हिरि लीन मोर ॥ मै अनाथु प्रभ कहउ काहि ॥ को को न बिगूतो मै को आहि ॥१॥

माधउ दारुन दुखु सहिओ न जाइ ॥ मेरो चपल बुधि सिउ कहा बसाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सनक सनंदन सिव सुकादि ॥ नाभि कमल जाने ब्रहमादि ॥ कबि जन जोगी जटाधारि ॥ सभ आपन अउसर चले सारि ॥२॥

तू अथाहु मोहि थाह नाहि ॥ प्रभ दीना नाथ दुखु कहउ काहि ॥ मोरो जनम मरन दुखु आथि धीर ॥ सुख सागर गुन रउ कबीर ॥३॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1194) नाइकु एकु बनजारे पाच ॥ बरध पचीसक संगु काच ॥ नउ बहीआं दस गोनि आहि ॥ कसनि बहतरि लागी ताहि ॥१॥

मोहि ऐसे बनज सिउ नहीन काजु ॥ जिह घटै मूलु नित बढै बिआजु ॥ रहाउ ॥

सात सूत मिलि बनजु कीन ॥ करम भावनी संग लीन ॥ तीनि जगाती करत रारि ॥ चलो बनजारा हाथ झारि ॥२॥

पूंजी हिरानी बनजु टूट ॥ दह दिस टांडो गइओ फूटि ॥ कहि कबीर मन सरसी काज ॥ सहज समानो त भरम भाज ॥३॥६॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1195) बसंतु बाणी नामदेउ जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साहिबु संकटवै सेवकु भजै ॥ चिरंकाल न जीवै दोऊ कुल लजै ॥१॥

तेरी भगति न छोडउ भावै लोगु हसै ॥ चरन कमल मेरे हीअरे बसैं ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे अपने धनहि प्रानी मरनु मांडै ॥ तैसे संत जनां राम नामु न छाडैं ॥२॥

गंगा गइआ गोदावरी संसार के कामा ॥ नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा ॥३॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1196) लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥ काइआ डूबै केसवा ॥१॥

संसारु समुंदे तारि गोबिंदे ॥ तारि लै बाप बीठुला ॥१॥ रहाउ ॥

अनिल बेड़ा हउ खेवि न साकउ ॥ तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥२॥

होहु दइआलु सतिगुरु मेलि तू मो कउ ॥ पारि उतारे केसवा ॥३॥

नामा कहै हउ तरि भी न जानउ ॥ मो कउ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥४॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 1196) सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥ पीछै तिनका लै करि हांकती ॥१॥

जैसे पनकत थ्रूटिटि हांकती ॥ सरि धोवन चाली लाडुली ॥१॥ रहाउ ॥

धोबी धोवै बिरह बिराता ॥ हरि चरन मेरा मनु राता ॥२॥

भणति नामदेउ रमि रहिआ ॥ अपने भगत पर करि दइआ ॥३॥३॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 1196) बसंतु बाणी रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥ पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥ गरबवती का नाही ठाउ ॥ तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥१॥

तू कांइ गरबहि बावली ॥ जैसे भादउ खू्मबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥ तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥ अप तन का जो करे बीचारु ॥ तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥२॥

पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥ ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥ फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥ पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥३॥

साधू की जउ लेहि ओट ॥ तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥ कहि रविदास जो जपै नामु ॥ तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1196) बसंतु कबीर जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुरह की जैसी तेरी चाल ॥ तेरी पूंछट ऊपरि झमक बाल ॥१॥

इस घर महि है सु तू ढूंढि खाहि ॥ अउर किस ही के तू मति ही जाहि ॥१॥ रहाउ ॥

चाकी चाटहि चूनु खाहि ॥ चाकी का चीथरा कहां लै जाहि ॥२॥

छीके पर तेरी बहुतु डीठि ॥ मतु लकरी सोटा तेरी परै पीठि ॥३॥

कहि कबीर भोग भले कीन ॥ मति कोऊ मारै ईंट ढेम ॥४॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates