राग बसंत - बाणी शब्द, Raag Basant - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1168) रागु बसंतु महला १ घरु १ चउपदे दुतुके
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु ॥ परफड़ु चित समालि सोइ सदा सदा गोबिंदु ॥१॥

भोलिआ हउमै सुरति विसारि ॥ हउमै मारि बीचारि मन गुण विचि गुणु लै सारि ॥१॥ रहाउ ॥

करम पेडु साखा हरी धरमु फुलु फलु गिआनु ॥ पत परापति छाव घणी चूका मन अभिमानु ॥२॥

अखी कुदरति कंनी बाणी मुखि आखणु सचु नामु ॥ पति का धनु पूरा होआ लागा सहजि धिआनु ॥३॥

माहा रुती आवणा वेखहु करम कमाइ ॥ नानक हरे न सूकही जि गुरमुखि रहे समाइ ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1168) महला १ बसंतु ॥
रुति आईले सरस बसंत माहि ॥ रंगि राते रवहि सि तेरै चाइ ॥ किसु पूज चड़ावउ लगउ पाइ ॥१॥

तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥ जगजीवन जुगति न मिलै काइ ॥१॥ रहाउ ॥

तेरी मूरति एका बहुतु रूप ॥ किसु पूज चड़ावउ देउ धूप ॥ तेरा अंतु न पाइआ कहा पाइ ॥ तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥२॥

तेरे सठि स्मबत सभि तीरथा ॥ तेरा सचु नामु परमेसरा ॥ तेरी गति अविगति नही जाणीऐ ॥ अणजाणत नामु वखाणीऐ ॥३॥

नानकु वेचारा किआ कहै ॥ सभु लोकु सलाहे एकसै ॥ सिरु नानक लोका पाव है ॥ बलिहारी जाउ जेते तेरे नाव है ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1168) बसंतु महला १ ॥
सुइने का चउका कंचन कुआर ॥ रुपे कीआ कारा बहुतु बिसथारु ॥ गंगा का उदकु करंते की आगि ॥ गरुड़ा खाणा दुध सिउ गाडि ॥१॥

रे मन लेखै कबहू न पाइ ॥ जामि न भीजै साच नाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दस अठ लीखे होवहि पासि ॥ चारे बेद मुखागर पाठि ॥ पुरबी नावै वरनां की दाति ॥ वरत नेम करे दिन राति ॥२॥

काजी मुलां होवहि सेख ॥ जोगी जंगम भगवे भेख ॥ को गिरही करमा की संधि ॥ बिनु बूझे सभ खड़ीअसि बंधि ॥३॥

जेते जीअ लिखी सिरि कार ॥ करणी उपरि होवगि सार ॥ हुकमु करहि मूरख गावार ॥ नानक साचे के सिफति भंडार ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1169) बसंतु महला ३ तीजा ॥
बसत्र उतारि दिग्मबरु होगु ॥ जटाधारि किआ कमावै जोगु ॥ मनु निरमलु नही दसवै दुआर ॥ भ्रमि भ्रमि आवै मूड़्हा वारो वार ॥१॥

एकु धिआवहु मूड़्ह मना ॥ पारि उतरि जाहि इक खिनां ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र करहि वखिआण ॥ नादी बेदी पड़्हहि पुराण ॥ पाखंड द्रिसटि मनि कपटु कमाहि ॥ तिन कै रमईआ नेड़ि नाहि ॥२॥

जे को ऐसा संजमी होइ ॥ क्रिआ विसेख पूजा करेइ ॥ अंतरि लोभु मनु बिखिआ माहि ॥ ओइ निरंजनु कैसे पाहि ॥३॥

कीता होआ करे किआ होइ ॥ जिस नो आपि चलाए सोइ ॥ नदरि करे तां भरमु चुकाए ॥ हुकमै बूझै तां साचा पाए ॥४॥

जिसु जीउ अंतरु मैला होइ ॥ तीरथ भवै दिसंतर लोइ ॥ नानक मिलीऐ सतिगुर संग ॥ तउ भवजल के तूटसि बंध ॥५॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1169) बसंतु महला १ ॥
सगल भवन तेरी माइआ मोह ॥ मै अवरु न दीसै सरब तोह ॥ तू सुरि नाथा देवा देव ॥ हरि नामु मिलै गुर चरन सेव ॥१॥

मेरे सुंदर गहिर ग्मभीर लाल ॥ गुरमुखि राम नाम गुन गाए तू अपर्मपरु सरब पाल ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु साध न पाईऐ हरि का संगु ॥ बिनु गुर मैल मलीन अंगु ॥ बिनु हरि नाम न सुधु होइ ॥ गुर सबदि सलाहे साचु सोइ ॥२॥

जा कउ तू राखहि रखनहार ॥ सतिगुरू मिलावहि करहि सार ॥ बिखु हउमै ममता परहराइ ॥ सभि दूख बिनासे राम राइ ॥३॥

ऊतम गति मिति हरि गुन सरीर ॥ गुरमति प्रगटे राम नाम हीर ॥ लिव लागी नामि तजि दूजा भाउ ॥ जन नानक हरि गुरु गुर मिलाउ ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1169) बसंतु महला १ ॥
मेरी सखी सहेली सुनहु भाइ ॥ मेरा पिरु रीसालू संगि साइ ॥ ओहु अलखु न लखीऐ कहहु काइ ॥ गुरि संगि दिखाइओ राम राइ ॥१॥

मिलु सखी सहेली हरि गुन बने ॥ हरि प्रभ संगि खेलहि वर कामनि गुरमुखि खोजत मन मने ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुखी दुहागणि नाहि भेउ ॥ ओहु घटि घटि रावै सरब प्रेउ ॥ गुरमुखि थिरु चीनै संगि देउ ॥ गुरि नामु द्रिड़ाइआ जपु जपेउ ॥२॥

बिनु गुर भगति न भाउ होइ ॥ बिनु गुर संत न संगु देइ ॥ बिनु गुर अंधुले धंधु रोइ ॥ मनु गुरमुखि निरमलु मलु सबदि खोइ ॥३॥

गुरि मनु मारिओ करि संजोगु ॥ अहिनिसि रावे भगति जोगु ॥ गुर संत सभा दुखु मिटै रोगु ॥ जन नानक हरि वरु सहज जोगु ॥४॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1170) बसंतु महला १ ॥
आपे कुदरति करे साजि ॥ सचु आपि निबेड़े राजु राजि ॥ गुरमति ऊतम संगि साथि ॥ हरि नामु रसाइणु सहजि आथि ॥१॥

मत बिसरसि रे मन राम बोलि ॥ अपर्मपरु अगम अगोचरु गुरमुखि हरि आपि तुलाए अतुलु तोलि ॥१॥ रहाउ ॥

गुर चरन सरेवहि गुरसिख तोर ॥ गुर सेव तरे तजि मेर तोर ॥ नर निंदक लोभी मनि कठोर ॥ गुर सेव न भाई सि चोर चोर ॥२॥

गुरु तुठा बखसे भगति भाउ ॥ गुरि तुठै पाईऐ हरि महलि ठाउ ॥ परहरि निंदा हरि भगति जागु ॥ हरि भगति सुहावी करमि भागु ॥३॥

गुरु मेलि मिलावै करे दाति ॥ गुरसिख पिआरे दिनसु राति ॥ फलु नामु परापति गुरु तुसि देइ ॥ कहु नानक पावहि विरले केइ ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1170) बसंतु महला ३ इक तुका ॥
साहिब भावै सेवकु सेवा करै ॥ जीवतु मरै सभि कुल उधरै ॥१॥

तेरी भगति न छोडउ किआ को हसै ॥ साचु नामु मेरै हिरदै वसै ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे माइआ मोहि प्राणी गलतु रहै ॥ तैसे संत जन राम नाम रवत रहै ॥२॥

मै मूरख मुगध ऊपरि करहु दइआ ॥ तउ सरणागति रहउ पइआ ॥३॥

कहतु नानकु संसार के निहफल कामा ॥ गुर प्रसादि को पावै अम्रित नामा ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ घरु १ दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माहा रुती महि सद बसंतु ॥ जितु हरिआ सभु जीअ जंतु ॥ किआ हउ आखा किरम जंतु ॥ तेरा किनै न पाइआ आदि अंतु ॥१॥

तै साहिब की करहि सेव ॥ परम सुख पावहि आतम देव ॥१॥ रहाउ ॥

करमु होवै तां सेवा करै ॥ गुर परसादी जीवत मरै ॥ अनदिनु साचु नामु उचरै ॥ इन बिधि प्राणी दुतरु तरै ॥२॥

बिखु अम्रितु करतारि उपाए ॥ संसार बिरख कउ दुइ फल लाए ॥ आपे करता करे कराए ॥ जो तिसु भावै तिसै खवाए ॥३॥

नानक जिस नो नदरि करेइ ॥ अम्रित नामु आपे देइ ॥ बिखिआ की बासना मनहि करेइ ॥ अपणा भाणा आपि करेइ ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ ॥
राते साचि हरि नामि निहाला ॥ दइआ करहु प्रभ दीन दइआला ॥ तिसु बिनु अवरु नही मै कोइ ॥ जिउ भावै तिउ राखै सोइ ॥१॥

गुर गोपाल मेरै मनि भाए ॥ रहि न सकउ दरसन देखे बिनु सहजि मिलउ गुरु मेलि मिलाए ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मनु लोभी लोभि लुभाना ॥ राम बिसारि बहुरि पछुताना ॥ बिछुरत मिलाइ गुर सेव रांगे ॥ हरि नामु दीओ मसतकि वडभागे ॥२॥

पउण पाणी की इह देह सरीरा ॥ हउमै रोगु कठिन तनि पीरा ॥ गुरमुखि राम नाम दारू गुण गाइआ ॥ करि किरपा गुरि रोगु गवाइआ ॥३॥

चारि नदीआ अगनी तनि चारे ॥ त्रिसना जलत जले अहंकारे ॥ गुरि राखे वडभागी तारे ॥ जन नानक उरि हरि अम्रितु धारे ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ ॥
हरि सेवे सो हरि का लोगु ॥ साचु सहजु कदे न होवै सोगु ॥ मनमुख मुए नाही हरि मन माहि ॥ मरि मरि जमहि भी मरि जाहि ॥१॥

से जन जीवे जिन हरि मन माहि ॥ साचु सम्हालहि साचि समाहि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि न सेवहि ते हरि ते दूरि ॥ दिसंतरु भवहि सिरि पावहि धूरि ॥ हरि आपे जन लीए लाइ ॥ तिन सदा सुखु है तिलु न तमाइ ॥२॥

नदरि करे चूकै अभिमानु ॥ साची दरगह पावै मानु ॥ हरि जीउ वेखै सद हजूरि ॥ गुर कै सबदि रहिआ भरपूरि ॥३॥

जीअ जंत की करे प्रतिपाल ॥ गुर परसादी सद सम्हाल ॥ दरि साचै पति सिउ घरि जाइ ॥ नानक नामि वडाई पाइ ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
अंतरि पूजा मन ते होइ ॥ एको वेखै अउरु न कोइ ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ ॥१॥

मेरा प्रभु मउलिआ सद बसंतु ॥ इहु मनु मउलिआ गाइ गुण गोबिंद ॥१॥ रहाउ ॥

गुर पूछहु तुम्ह करहु बीचारु ॥ तां प्रभ साचे लगै पिआरु ॥ आपु छोडि होहि दासत भाइ ॥ तउ जगजीवनु वसै मनि आइ ॥२॥

भगति करे सद वेखै हजूरि ॥ मेरा प्रभु सद रहिआ भरपूरि ॥ इसु भगती का कोई जाणै भेउ ॥ सभु मेरा प्रभु आतम देउ ॥३॥

आपे सतिगुरु मेलि मिलाए ॥ जगजीवन सिउ आपि चितु लाए ॥ मनु तनु हरिआ सहजि सुभाए ॥ नानक नामि रहे लिव लाए ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
भगति वछलु हरि वसै मनि आइ ॥ गुर किरपा ते सहज सुभाइ ॥ भगति करे विचहु आपु खोइ ॥ तद ही साचि मिलावा होइ ॥१॥

भगत सोहहि सदा हरि प्रभ दुआरि ॥ गुर कै हेति साचै प्रेम पिआरि ॥१॥ रहाउ ॥

भगति करे सो जनु निरमलु होइ ॥ गुर सबदी विचहु हउमै खोइ ॥ हरि जीउ आपि वसै मनि आइ ॥ सदा सांति सुखि सहजि समाइ ॥२॥

साचि रते तिन सद बसंत ॥ मनु तनु हरिआ रवि गुण गुविंद ॥ बिनु नावै सूका संसारु ॥ अगनि त्रिसना जलै वारो वार ॥३॥

सोई करे जि हरि जीउ भावै ॥ सदा सुखु सरीरि भाणै चितु लावै ॥ अपणा प्रभु सेवे सहजि सुभाइ ॥ नानक नामु वसै मनि आइ ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
माइआ मोहु सबदि जलाए ॥ मनु तनु हरिआ सतिगुर भाए ॥ सफलिओ बिरखु हरि कै दुआरि ॥ साची बाणी नाम पिआरि ॥१॥

ए मन हरिआ सहज सुभाइ ॥ सच फलु लागै सतिगुर भाइ ॥१॥ रहाउ ॥

आपे नेड़ै आपे दूरि ॥ गुर कै सबदि वेखै सद हजूरि ॥ छाव घणी फूली बनराइ ॥ गुरमुखि बिगसै सहजि सुभाइ ॥२॥

अनदिनु कीरतनु करहि दिन राति ॥ सतिगुरि गवाई विचहु जूठि भरांति ॥ परपंच वेखि रहिआ विसमादु ॥ गुरमुखि पाईऐ नाम प्रसादु ॥३॥

आपे करता सभि रस भोग ॥ जो किछु करे सोई परु होग ॥ वडा दाता तिलु न तमाइ ॥ नानक मिलीऐ सबदु कमाइ ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
पूरै भागि सचु कार कमावै ॥ एको चेतै फिरि जोनि न आवै ॥ सफल जनमु इसु जग महि आइआ ॥ साचि नामि सहजि समाइआ ॥१॥

गुरमुखि कार करहु लिव लाइ ॥ हरि नामु सेवहु विचहु आपु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥

तिसु जन की है साची बाणी ॥ गुर कै सबदि जग माहि समाणी ॥ चहु जुग पसरी साची सोइ ॥ नामि रता जनु परगटु होइ ॥२॥

इकि साचै सबदि रहे लिव लाइ ॥ से जन साचे साचै भाइ ॥ साचु धिआइनि देखि हजूरि ॥ संत जना की पग पंकज धूरि ॥३॥

एको करता अवरु न कोइ ॥ गुर सबदी मेलावा होइ ॥ जिनि सचु सेविआ तिनि रसु पाइआ ॥ नानक सहजे नामि समाइआ ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
भगति करहि जन देखि हजूरि ॥ संत जना की पग पंकज धूरि ॥ हरि सेती सद रहहि लिव लाइ ॥ पूरै सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥१॥

दासा का दासु विरला कोई होइ ॥ ऊतम पदवी पावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

एको सेवहु अवरु न कोइ ॥ जितु सेविऐ सदा सुखु होइ ॥ ना ओहु मरै न आवै जाइ ॥ तिसु बिनु अवरु सेवी किउ माइ ॥२॥

से जन साचे जिनी साचु पछाणिआ ॥ आपु मारि सहजे नामि समाणिआ ॥ गुरमुखि नामु परापति होइ ॥ मनु निरमलु निरमल सचु सोइ ॥३॥

जिनि गिआनु कीआ तिसु हरि तू जाणु ॥ साच सबदि प्रभु एकु सिञाणु ॥ हरि रसु चाखै तां सुधि होइ ॥ नानक नामि रते सचु सोइ ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
नामि रते कुलां का करहि उधारु ॥ साची बाणी नाम पिआरु ॥ मनमुख भूले काहे आए ॥ नामहु भूले जनमु गवाए ॥१॥

जीवत मरै मरि मरणु सवारै ॥ गुर कै सबदि साचु उर धारै ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सचु भोजनु पवितु सरीरा ॥ मनु निरमलु सद गुणी गहीरा ॥ जमै मरै न आवै जाइ ॥ गुर परसादी साचि समाइ ॥२॥

साचा सेवहु साचु पछाणै ॥ गुर कै सबदि हरि दरि नीसाणै ॥ दरि साचै सचु सोभा होइ ॥ निज घरि वासा पावै सोइ ॥३॥

आपि अभुलु सचा सचु सोइ ॥ होरि सभि भूलहि दूजै पति खोइ ॥ साचा सेवहु साची बाणी ॥ नानक नामे साचि समाणी ॥४॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1175) बसंतु महला ३ ॥
बिनु करमा सभ भरमि भुलाई ॥ माइआ मोहि बहुतु दुखु पाई ॥ मनमुख अंधे ठउर न पाई ॥ बिसटा का कीड़ा बिसटा माहि समाई ॥१॥

हुकमु मंने सो जनु परवाणु ॥ गुर कै सबदि नामि नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥

साचि रते जिन्हा धुरि लिखि पाइआ ॥ हरि का नामु सदा मनि भाइआ ॥ सतिगुर की बाणी सदा सुखु होइ ॥ जोती जोति मिलाए सोइ ॥२॥

एकु नामु तारे संसारु ॥ गुर परसादी नाम पिआरु ॥ बिनु नामै मुकति किनै न पाई ॥ पूरे गुर ते नामु पलै पाई ॥३॥

सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥ सतिगुर सेवा नामु द्रिड़्हाए ॥ जिन इकु जाता से जन परवाणु ॥ नानक नामि रते दरि नीसाणु ॥४॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1175) बसंतु महला ३ ॥
क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥ आपे आपि वसै मनि आए ॥ निहचल मति सदा मन धीर ॥ हरि गुण गावै गुणी गहीर ॥१॥

नामहु भूले मरहि बिखु खाइ ॥ ब्रिथा जनमु फिरि आवहि जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

बहु भेख करहि मनि सांति न होइ ॥ बहु अभिमानि अपणी पति खोइ ॥ से वडभागी जिन सबदु पछाणिआ ॥ बाहरि जादा घर महि आणिआ ॥२॥

घर महि वसतु अगम अपारा ॥ गुरमति खोजहि सबदि बीचारा ॥ नामु नव निधि पाई घर ही माहि ॥ सदा रंगि राते सचि समाहि ॥३॥

आपि करे किछु करणु न जाइ ॥ आपे भावै लए मिलाइ ॥ तिस ते नेड़ै नाही को दूरि ॥ नानक नामि रहिआ भरपूरि ॥४॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1175) बसंतु महला ३ ॥
गुर सबदी हरि चेति सुभाइ ॥ राम नाम रसि रहै अघाइ ॥ कोट कोटंतर के पाप जलि जाहि ॥ जीवत मरहि हरि नामि समाहि ॥१॥

हरि की दाति हरि जीउ जाणै ॥ गुर कै सबदि इहु मनु मउलिआ हरि गुणदाता नामु वखाणै ॥१॥ रहाउ ॥

भगवै वेसि भ्रमि मुकति न होइ ॥ बहु संजमि सांति न पावै कोइ ॥ गुरमति नामु परापति होइ ॥ वडभागी हरि पावै सोइ ॥२॥

कलि महि राम नामि वडिआई ॥ गुर पूरे ते पाइआ जाई ॥ नामि रते सदा सुखु पाई ॥ बिनु नामै हउमै जलि जाई ॥३॥

वडभागी हरि नामु बीचारा ॥ छूटै राम नामि दुखु सारा ॥ हिरदै वसिआ सु बाहरि पासारा ॥ नानक जाणै सभु उपावणहारा ॥४॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1176) बसंतु महला ३ इक तुके ॥
तेरा कीआ किरम जंतु ॥ देहि त जापी आदि मंतु ॥१॥

गुण आखि वीचारी मेरी माइ ॥ हरि जपि हरि कै लगउ पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर प्रसादि लागे नाम सुआदि ॥ काहे जनमु गवावहु वैरि वादि ॥२॥

गुरि किरपा कीन्ही चूका अभिमानु ॥ सहज भाइ पाइआ हरि नामु ॥३॥

ऊतमु ऊचा सबद कामु ॥ नानकु वखाणै साचु नामु ॥४॥१॥१३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1176) बसंतु महला ३ ॥
बनसपति मउली चड़िआ बसंतु ॥ इहु मनु मउलिआ सतिगुरू संगि ॥१॥

तुम्ह साचु धिआवहु मुगध मना ॥ तां सुखु पावहु मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

इतु मनि मउलिऐ भइआ अनंदु ॥ अम्रित फलु पाइआ नामु गोबिंद ॥२॥

एको एकु सभु आखि वखाणै ॥ हुकमु बूझै तां एको जाणै ॥३॥

कहत नानकु हउमै कहै न कोइ ॥ आखणु वेखणु सभु साहिब ते होइ ॥४॥२॥१४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1176) बसंतु महला ३ ॥
सभि जुग तेरे कीते होए ॥ सतिगुरु भेटै मति बुधि होए ॥१॥

हरि जीउ आपे लैहु मिलाइ ॥ गुर कै सबदि सच नामि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनि बसंतु हरे सभि लोइ ॥ फलहि फुलीअहि राम नामि सुखु होइ ॥२॥

सदा बसंतु गुर सबदु वीचारे ॥ राम नामु राखै उर धारे ॥३॥

मनि बसंतु तनु मनु हरिआ होइ ॥ नानक इहु तनु बिरखु राम नामु फलु पाए सोइ ॥४॥३॥१५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1176) बसंतु महला ३ ॥
तिन्ह बसंतु जो हरि गुण गाइ ॥ पूरै भागि हरि भगति कराइ ॥१॥

इसु मन कउ बसंत की लगै न सोइ ॥ इहु मनु जलिआ दूजै दोइ ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मनु धंधै बांधा करम कमाइ ॥ माइआ मूठा सदा बिललाइ ॥२॥

इहु मनु छूटै जां सतिगुरु भेटै ॥ जमकाल की फिरि आवै न फेटै ॥३॥

इहु मनु छूटा गुरि लीआ छडाइ ॥ नानक माइआ मोहु सबदि जलाइ ॥४॥४॥१६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1176) बसंतु महला ३ ॥
बसंतु चड़िआ फूली बनराइ ॥ एहि जीअ जंत फूलहि हरि चितु लाइ ॥१॥

इन बिधि इहु मनु हरिआ होइ ॥ हरि हरि नामु जपै दिनु राती गुरमुखि हउमै कढै धोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुर बाणी सबदु सुणाए ॥ इहु जगु हरिआ सतिगुर भाए ॥२॥

फल फूल लागे जां आपे लाए ॥ मूलि लगै तां सतिगुरु पाए ॥३॥

आपि बसंतु जगतु सभु वाड़ी ॥ नानक पूरै भागि भगति निराली ॥४॥५॥१७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1177) रागु बसंतु महला ४ घरु १ इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥ तिउ घटि घटि रमईआ ओति पोति ॥१॥

एको हरि रविआ स्रब थाइ ॥ गुर सबदी मिलीऐ मेरी माइ ॥१॥ रहाउ ॥

घटि घटि अंतरि एको हरि सोइ ॥ गुरि मिलिऐ इकु प्रगटु होइ ॥२॥

एको एकु रहिआ भरपूरि ॥ साकत नर लोभी जाणहि दूरि ॥३॥

एको एकु वरतै हरि लोइ ॥ नानक हरि एको करे सु होइ ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1177) बसंतु महला ४ ॥
रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥ मन हरि सिमरहु अंति सदा रखि लए ॥१॥

हरि हरि चेति सदा मन मेरे ॥ सभु आलसु दूख भंजि प्रभु पाइआ गुरमति गावहु गुण प्रभ केरे ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख फिरि फिरि हउमै मुए ॥ कालि दैति संघारे जम पुरि गए ॥२॥

गुरमुखि हरि हरि हरि लिव लागे ॥ जनम मरण दोऊ दुख भागे ॥३॥

भगत जना कउ हरि किरपा धारी ॥ गुरु नानकु तुठा मिलिआ बनवारी ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ घरु १ दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सेवउ करि नमसकार ॥ आजु हमारै मंगलचार ॥ आजु हमारै महा अनंद ॥ चिंत लथी भेटे गोबिंद ॥१॥

आजु हमारै ग्रिहि बसंत ॥ गुन गाए प्रभ तुम्ह बेअंत ॥१॥ रहाउ ॥

आजु हमारै बने फाग ॥ प्रभ संगी मिलि खेलन लाग ॥ होली कीनी संत सेव ॥ रंगु लागा अति लाल देव ॥२॥

मनु तनु मउलिओ अति अनूप ॥ सूकै नाही छाव धूप ॥ सगली रूती हरिआ होइ ॥ सद बसंत गुर मिले देव ॥३॥

बिरखु जमिओ है पारजात ॥ फूल लगे फल रतन भांति ॥ त्रिपति अघाने हरि गुणह गाइ ॥ जन नानक हरि हरि हरि धिआइ ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ ॥
हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥ जूआरी जूए माहि चीतु ॥ अमली जीवै अमलु खाइ ॥ तिउ हरि जनु जीवै हरि धिआइ ॥१॥

अपनै रंगि सभु को रचै ॥ जितु प्रभि लाइआ तितु तितु लगै ॥१॥ रहाउ ॥

मेघ समै मोर निरतिकार ॥ चंद देखि बिगसहि कउलार ॥ माता बारिक देखि अनंद ॥ तिउ हरि जन जीवहि जपि गोबिंद ॥२॥

सिंघ रुचै सद भोजनु मास ॥ रणु देखि सूरे चित उलास ॥ किरपन कउ अति धन पिआरु ॥ हरि जन कउ हरि हरि आधारु ॥३॥

सरब रंग इक रंग माहि ॥ सरब सुखा सुख हरि कै नाइ ॥ तिसहि परापति इहु निधानु ॥ नानक गुरु जिसु करे दानु ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ ॥
तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥ तिसु बसंतु जिसु गुरु दइआलु ॥ मंगलु तिस कै जिसु एकु कामु ॥ तिसु सद बसंतु जिसु रिदै नामु ॥१॥

ग्रिहि ता के बसंतु गनी ॥ जा कै कीरतनु हरि धुनी ॥१॥ रहाउ ॥

प्रीति पारब्रहम मउलि मना ॥ गिआनु कमाईऐ पूछि जनां ॥ सो तपसी जिसु साधसंगु ॥ सद धिआनी जिसु गुरहि रंगु ॥२॥

से निरभउ जिन्ह भउ पइआ ॥ सो सुखीआ जिसु भ्रमु गइआ ॥ सो इकांती जिसु रिदा थाइ ॥ सोई निहचलु साच ठाइ ॥३॥

एका खोजै एक प्रीति ॥ दरसन परसन हीत चीति ॥ हरि रंग रंगा सहजि माणु ॥ नानक दास तिसु जन कुरबाणु ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
जीअ प्राण तुम्ह पिंड दीन्ह ॥ मुगध सुंदर धारि जोति कीन्ह ॥ सभि जाचिक प्रभ तुम्ह दइआल ॥ नामु जपत होवत निहाल ॥१॥

मेरे प्रीतम कारण करण जोग ॥ हउ पावउ तुम ते सगल थोक ॥१॥ रहाउ ॥

नामु जपत होवत उधार ॥ नामु जपत सुख सहज सार ॥ नामु जपत पति सोभा होइ ॥ नामु जपत बिघनु नाही कोइ ॥२॥

जा कारणि इह दुलभ देह ॥ सो बोलु मेरे प्रभू देहि ॥ साधसंगति महि इहु बिस्रामु ॥ सदा रिदै जपी प्रभ तेरो नामु ॥३॥

तुझ बिनु दूजा कोइ नाहि ॥ सभु तेरो खेलु तुझ महि समाहि ॥ जिउ भावै तिउ राखि ले ॥ सुखु नानक पूरा गुरु मिले ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥ जिसहि देखि हउ जीवा माइ ॥ जा कै सिमरनि दुखु न होइ ॥ करि दइआ मिलावहु तिसहि मोहि ॥१॥

मेरे प्रीतम प्रान अधार मन ॥ जीउ प्रान सभु तेरो धन ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ खोजहि सुरि नर देव ॥ मुनि जन सेख न लहहि भेव ॥ जा की गति मिति कही न जाइ ॥ घटि घटि घटि घटि रहिआ समाइ ॥२॥

जा के भगत आनंद मै ॥ जा के भगत कउ नाही खै ॥ जा के भगत कउ नाही भै ॥ जा के भगत कउ सदा जै ॥३॥

कउन उपमा तेरी कही जाइ ॥ सुखदाता प्रभु रहिओ समाइ ॥ नानकु जाचै एकु दानु ॥ करि किरपा मोहि देहु नामु ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥ साधसंगति तिउ हउमै छूट ॥ जैसी दासे धीर मीर ॥ तैसे उधारन गुरह पीर ॥१॥

तुम दाते प्रभ देनहार ॥ निमख निमख तिसु नमसकार ॥१॥ रहाउ ॥

जिसहि परापति साधसंगु ॥ तिसु जन लागा पारब्रहम रंगु ॥ ते बंधन ते भए मुकति ॥ भगत अराधहि जोग जुगति ॥२॥

नेत्र संतोखे दरसु पेखि ॥ रसना गाए गुण अनेक ॥ त्रिसना बूझी गुर प्रसादि ॥ मनु आघाना हरि रसहि सुआदि ॥३॥

सेवकु लागो चरण सेव ॥ आदि पुरख अपर्मपर देव ॥ सगल उधारण तेरो नामु ॥ नानक पाइओ इहु निधानु ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
तुम बड दाते दे रहे ॥ जीअ प्राण महि रवि रहे ॥ दीने सगले भोजन खान ॥ मोहि निरगुन इकु गुनु न जान ॥१॥

हउ कछू न जानउ तेरी सार ॥ तू करि गति मेरी प्रभ दइआर ॥१॥ रहाउ ॥

जाप न ताप न करम कीति ॥ आवै नाही कछू रीति ॥ मन महि राखउ आस एक ॥ नाम तेरे की तरउ टेक ॥२॥

सरब कला प्रभ तुम्ह प्रबीन ॥ अंतु न पावहि जलहि मीन ॥ अगम अगम ऊचह ते ऊच ॥ हम थोरे तुम बहुत मूच ॥३॥

जिन तू धिआइआ से गनी ॥ जिन तू पाइआ से धनी ॥ जिनि तू सेविआ सुखी से ॥ संत सरणि नानक परे ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥ तिसु अराधि जिनि जीउ दीआ ॥ तिस का चाकरु होहि फिरि डानु न लागै ॥ तिस की करि पोतदारी फिरि दूखु न लागै ॥१॥

एवड भाग होहि जिसु प्राणी ॥ सो पाए इहु पदु निरबाणी ॥१॥ रहाउ ॥

दूजी सेवा जीवनु बिरथा ॥ कछू न होई है पूरन अरथा ॥ माणस सेवा खरी दुहेली ॥ साध की सेवा सदा सुहेली ॥२॥

जे लोड़हि सदा सुखु भाई ॥ साधू संगति गुरहि बताई ॥ ऊहा जपीऐ केवल नाम ॥ साधू संगति पारगराम ॥३॥

सगल तत महि ततु गिआनु ॥ सरब धिआन महि एकु धिआनु ॥ हरि कीरतन महि ऊतम धुना ॥ नानक गुर मिलि गाइ गुना ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥ जिसु सिमरत निरमल है सोइ ॥ जिसु अराधे जमु किछु न कहै ॥ जिस की सेवा सभु किछु लहै ॥१॥

राम राम बोलि राम राम ॥ तिआगहु मन के सगल काम ॥१॥ रहाउ ॥

जिस के धारे धरणि अकासु ॥ घटि घटि जिस का है प्रगासु ॥ जिसु सिमरत पतित पुनीत होइ ॥ अंत कालि फिरि फिरि न रोइ ॥२॥

सगल धरम महि ऊतम धरम ॥ करम करतूति कै ऊपरि करम ॥ जिस कउ चाहहि सुरि नर देव ॥ संत सभा की लगहु सेव ॥३॥

आदि पुरखि जिसु कीआ दानु ॥ तिस कउ मिलिआ हरि निधानु ॥ तिस की गति मिति कही न जाइ ॥ नानक जन हरि हरि धिआइ ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
मन तन भीतरि लागी पिआस ॥ गुरि दइआलि पूरी मेरी आस ॥ किलविख काटे साधसंगि ॥ नामु जपिओ हरि नाम रंगि ॥१॥

गुर परसादि बसंतु बना ॥ चरन कमल हिरदै उरि धारे सदा सदा हरि जसु सुना ॥१॥ रहाउ ॥

समरथ सुआमी कारण करण ॥ मोहि अनाथ प्रभ तेरी सरण ॥ जीअ जंत तेरे आधारि ॥ करि किरपा प्रभ लेहि निसतारि ॥२॥

भव खंडन दुख नास देव ॥ सुरि नर मुनि जन ता की सेव ॥ धरणि अकासु जा की कला माहि ॥ तेरा दीआ सभि जंत खाहि ॥३॥

अंतरजामी प्रभ दइआल ॥ अपणे दास कउ नदरि निहालि ॥ करि किरपा मोहि देहु दानु ॥ जपि जीवै नानकु तेरो नामु ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
राम रंगि सभ गए पाप ॥ राम जपत कछु नही संताप ॥ गोबिंद जपत सभि मिटे अंधेर ॥ हरि सिमरत कछु नाहि फेर ॥१॥

बसंतु हमारै राम रंगु ॥ संत जना सिउ सदा संगु ॥१॥ रहाउ ॥

संत जनी कीआ उपदेसु ॥ जह गोबिंद भगतु सो धंनि देसु ॥ हरि भगतिहीन उदिआन थानु ॥ गुर प्रसादि घटि घटि पछानु ॥२॥

हरि कीरतन रस भोग रंगु ॥ मन पाप करत तू सदा संगु ॥ निकटि पेखु प्रभु करणहार ॥ ईत ऊत प्रभ कारज सार ॥३॥

चरन कमल सिउ लगो धिआनु ॥ करि किरपा प्रभि कीनो दानु ॥ तेरिआ संत जना की बाछउ धूरि ॥ जपि नानक सुआमी सद हजूरि ॥४॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
सचु परमेसरु नित नवा ॥ गुर किरपा ते नित चवा ॥ प्रभ रखवाले माई बाप ॥ जा कै सिमरणि नही संताप ॥१॥

खसमु धिआई इक मनि इक भाइ ॥ गुर पूरे की सदा सरणाई साचै साहिबि रखिआ कंठि लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

अपणे जन प्रभि आपि रखे ॥ दुसट दूत सभि भ्रमि थके ॥ बिनु गुर साचे नही जाइ ॥ दुखु देस दिसंतरि रहे धाइ ॥२॥

किरतु ओन्हा का मिटसि नाहि ॥ ओइ अपणा बीजिआ आपि खाहि ॥ जन का रखवाला आपि सोइ ॥ जन कउ पहुचि न सकसि कोइ ॥३॥

प्रभि दास रखे करि जतनु आपि ॥ अखंड पूरन जा को प्रतापु ॥ गुण गोबिंद नित रसन गाइ ॥ नानकु जीवै हरि चरण धिआइ ॥४॥१२॥


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