राग बसंतु हिंडोल - बाणी शब्द, Raag Basant Hindol - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1170) महला १ बसंतु हिंडोल घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साल ग्राम बिप पूजि मनावहु सुक्रितु तुलसी माला ॥ राम नामु जपि बेड़ा बांधहु दइआ करहु दइआला ॥१॥

काहे कलरा सिंचहु जनमु गवावहु ॥ काची ढहगि दिवाल काहे गचु लावहु ॥१॥ रहाउ ॥

कर हरिहट माल टिंड परोवहु तिसु भीतरि मनु जोवहु ॥ अम्रितु सिंचहु भरहु किआरे तउ माली के होवहु ॥२॥

कामु क्रोधु दुइ करहु बसोले गोडहु धरती भाई ॥ जिउ गोडहु तिउ तुम्ह सुख पावहु किरतु न मेटिआ जाई ॥३॥

बगुले ते फुनि हंसुला होवै जे तू करहि दइआला ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा दइआ करहु दइआला ॥४॥१॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1171) बसंतु महला १ हिंडोल ॥
साहुरड़ी वथु सभु किछु साझी पेवकड़ै धन वखे ॥ आपि कुचजी दोसु न देऊ जाणा नाही रखे ॥१॥

मेरे साहिबा हउ आपे भरमि भुलाणी ॥ अखर लिखे सेई गावा अवर न जाणा बाणी ॥१॥ रहाउ ॥

कढि कसीदा पहिरहि चोली तां तुम्ह जाणहु नारी ॥ जे घरु राखहि बुरा न चाखहि होवहि कंत पिआरी ॥२॥

जे तूं पड़िआ पंडितु बीना दुइ अखर दुइ नावा ॥ प्रणवति नानकु एकु लंघाए जे करि सचि समावां ॥३॥२॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1171) बसंतु हिंडोल महला १ ॥
राजा बालकु नगरी काची दुसटा नालि पिआरो ॥ दुइ माई दुइ बापा पड़ीअहि पंडित करहु बीचारो ॥१॥

सुआमी पंडिता तुम्ह देहु मती ॥ किन बिधि पावउ प्रानपती ॥१॥ रहाउ ॥

भीतरि अगनि बनासपति मउली सागरु पंडै पाइआ ॥ चंदु सूरजु दुइ घर ही भीतरि ऐसा गिआनु न पाइआ ॥२॥

राम रवंता जाणीऐ इक माई भोगु करेइ ॥ ता के लखण जाणीअहि खिमा धनु संग्रहेइ ॥३॥

कहिआ सुणहि न खाइआ मानहि तिन्हा ही सेती वासा ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा खिनु तोला खिनु मासा ॥४॥३॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1171) बसंतु हिंडोल महला १ ॥
साचा साहु गुरू सुखदाता हरि मेले भुख गवाए ॥ करि किरपा हरि भगति द्रिड़ाए अनदिनु हरि गुण गाए ॥१॥

मत भूलहि रे मन चेति हरी ॥ बिनु गुर मुकति नाही त्रै लोई गुरमुखि पाईऐ नामु हरी ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु भगती नही सतिगुरु पाईऐ बिनु भागा नही भगति हरी ॥ बिनु भागा सतसंगु न पाईऐ करमि मिलै हरि नामु हरी ॥२॥

घटि घटि गुपतु उपाए वेखै परगटु गुरमुखि संत जना ॥ हरि हरि करहि सु हरि रंगि भीने हरि जलु अम्रित नामु मना ॥३॥

जिन कउ तखति मिलै वडिआई गुरमुखि से परधान कीए ॥ पारसु भेटि भए से पारस नानक हरि गुर संगि थीए ॥४॥४॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1177) बसंतु हिंडोल महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर की बाणी विटहु वारिआ भाई गुर सबद विटहु बलि जाई ॥ गुरु सालाही सद अपणा भाई गुर चरणी चितु लाई ॥१॥

मेरे मन राम नामि चितु लाइ ॥ मनु तनु तेरा हरिआ होवै इकु हरि नामा फलु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरि राखे से उबरे भाई हरि रसु अम्रितु पीआइ ॥ विचहु हउमै दुखु उठि गइआ भाई सुखु वुठा मनि आइ ॥२॥

धुरि आपे जिन्हा नो बखसिओनु भाई सबदे लइअनु मिलाइ ॥ धूड़ि तिन्हा की अघुलीऐ भाई सतसंगति मेलि मिलाइ ॥३॥

आपि कराए करे आपि भाई जिनि हरिआ कीआ सभु कोइ ॥ नानक मनि तनि सुखु सद वसै भाई सबदि मिलावा होइ ॥४॥१॥१८॥१२॥१८॥३०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1178) बसंतु हिंडोल महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥ सतिगुरु मिलै त खोजीऐ मिलि जोती जोति समानी ॥१॥

माधो साधू जन देहु मिलाइ ॥ देखत दरसु पाप सभि नासहि पवित्र परम पदु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

पंच चोर मिलि लागे नगरीआ राम नाम धनु हिरिआ ॥ गुरमति खोज परे तब पकरे धनु साबतु रासि उबरिआ ॥२॥

पाखंड भरम उपाव करि थाके रिद अंतरि माइआ माइआ ॥ साधू पुरखु पुरखपति पाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥३॥

जगंनाथ जगदीस गुसाई करि किरपा साधु मिलावै ॥ नानक सांति होवै मन अंतरि नित हिरदै हरि गुण गावै ॥४॥१॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1178) बसंतु महला ४ हिंडोल ॥
तुम्ह वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥ हरि दीन दइआल करहु प्रभ किरपा गुर सतिगुर चरण हम बनछे ॥१॥

गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि करि क्रिपछे ॥ जनम जनम के किलविख मलु भरिआ मिलि संगति करि प्रभ हनछे ॥१॥ रहाउ ॥

तुम्हरा जनु जाति अविजाता हरि जपिओ पतित पवीछे ॥ हरि कीओ सगल भवन ते ऊपरि हरि सोभा हरि प्रभ दिनछे ॥२॥

जाति अजाति कोई प्रभ धिआवै सभि पूरे मानस तिनछे ॥ से धंनि वडे वड पूरे हरि जन जिन्ह हरि धारिओ हरि उरछे ॥३॥

हम ढींढे ढीम बहुतु अति भारी हरि धारि क्रिपा प्रभ मिलछे ॥ जन नानक गुरु पाइआ हरि तूठे हम कीए पतित पवीछे ॥४॥२॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1178) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥ जिउ बारिकु रसकि परिओ थनि माता थनि काढे बिलल बिलीधे ॥१॥

गोबिंद जीउ मेरे मन तन नाम हरि बीधे ॥ वडै भागि गुरु सतिगुरु पाइआ विचि काइआ नगर हरि सीधे ॥१॥ रहाउ ॥

जन के सास सास है जेते हरि बिरहि प्रभू हरि बीधे ॥ जिउ जल कमल प्रीति अति भारी बिनु जल देखे सुकलीधे ॥२॥

जन जपिओ नामु निरंजनु नरहरि उपदेसि गुरू हरि प्रीधे ॥ जनम जनम की हउमै मलु निकसी हरि अम्रिति हरि जलि नीधे ॥३॥

हमरे करम न बिचरहु ठाकुर तुम्ह पैज रखहु अपनीधे ॥ हरि भावै सुणि बिनउ बेनती जन नानक सरणि पवीधे ॥४॥३॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1179) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
मनु खिनु खिनु भरमि भरमि बहु धावै तिलु घरि नही वासा पाईऐ ॥ गुरि अंकसु सबदु दारू सिरि धारिओ घरि मंदरि आणि वसाईऐ ॥१॥

गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि हरि धिआईऐ ॥ हउमै रोगु गइआ सुखु पाइआ हरि सहजि समाधि लगाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

घरि रतन लाल बहु माणक लादे मनु भ्रमिआ लहि न सकाईऐ ॥ जिउ ओडा कूपु गुहज खिन काढै तिउ सतिगुरि वसतु लहाईऐ ॥२॥

जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते ध्रिगु ध्रिगु नर जीवाईऐ ॥ जनमु पदारथु पुंनि फलु पाइआ कउडी बदलै जाईऐ ॥३॥

मधुसूदन हरि धारि प्रभ किरपा करि किरपा गुरू मिलाईऐ ॥ जन नानक निरबाण पदु पाइआ मिलि साधू हरि गुण गाईऐ ॥४॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1179) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
आवण जाणु भइआ दुखु बिखिआ देह मनमुख सुंञी सुंञु ॥ राम नामु खिनु पलु नही चेतिआ जमि पकरे कालि सलुंञु ॥१॥

गोबिंद जीउ बिखु हउमै ममता मुंञु ॥ सतसंगति गुर की हरि पिआरी मिलि संगति हरि रसु भुंञु ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगति साध दइआ करि मेलहु सरणागति साधू पंञु ॥ हम डुबदे पाथर काढि लेहु प्रभ तुम्ह दीन दइआल दुख भंञु ॥२॥

हरि उसतति धारहु रिद अंतरि सुआमी सतसंगति मिलि बुधि लंञु ॥ हरि नामै हम प्रीति लगानी हम हरि विटहु घुमि वंञु ॥३॥

जन के पूरि मनोरथ हरि प्रभ हरि नामु देवहु हरि लंञु ॥ जन नानक मनि तनि अनदु भइआ है गुरि मंत्रु दीओ हरि भंञु ॥४॥५॥७॥१२॥१८॥७॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1185) बसंतु महला ५ घरु २ हिंडोल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥ हरि नामै के होवहु जोड़ी गुरमुखि बैसहु सफा विछाइ ॥१॥

इन्ह बिधि पासा ढालहु बीर ॥ गुरमुखि नामु जपहु दिनु राती अंत कालि नह लागै पीर ॥१॥ रहाउ ॥

करम धरम तुम्ह चउपड़ि साजहु सतु करहु तुम्ह सारी ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु जीतहु ऐसी खेल हरि पिआरी ॥२॥

उठि इसनानु करहु परभाते सोए हरि आराधे ॥ बिखड़े दाउ लंघावै मेरा सतिगुरु सुख सहज सेती घरि जाते ॥३॥

हरि आपे खेलै आपे देखै हरि आपे रचनु रचाइआ ॥ जन नानक गुरमुखि जो नरु खेलै सो जिणि बाजी घरि आइआ ॥४॥१॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1185) बसंतु महला ५ हिंडोल ॥
तेरी कुदरति तूहै जाणहि अउरु न दूजा जाणै ॥ जिस नो क्रिपा करहि मेरे पिआरे सोई तुझै पछाणै ॥१॥

तेरिआ भगता कउ बलिहारा ॥ थानु सुहावा सदा प्रभ तेरा रंग तेरे आपारा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरी सेवा तुझ ते होवै अउरु न दूजा करता ॥ भगतु तेरा सोई तुधु भावै जिस नो तू रंगु धरता ॥२॥

तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥ तू समरथु सुआमी मेरा हउ किआ जाणा तेरी पूजा ॥३॥

तेरा महलु अगोचरु मेरे पिआरे बिखमु तेरा है भाणा ॥ कहु नानक ढहि पइआ दुआरै रखि लेवहु मुगध अजाणा ॥४॥२॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1186) बसंतु हिंडोल महला ५ ॥
मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥१॥

पिता पारब्रहम प्रभ धनी ॥ मोहि निसतारहु निरगुनी ॥१॥ रहाउ ॥

ओपति परलउ प्रभ ते होवै इह बीचारी हरि जनी ॥२॥

नाम प्रभू के जो रंगि राते कलि महि सुखीए से गनी ॥३॥

अवरु उपाउ न कोई सूझै नानक तरीऐ गुर बचनी ॥४॥३॥२१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 1186) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बसंतु हिंडोल महला ९ ॥
साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥ या भीतरि जो रामु बसतु है साचो ताहि पछानो ॥१॥ रहाउ ॥

इहु जगु है स्मपति सुपने की देखि कहा ऐडानो ॥ संगि तिहारै कछू न चालै ताहि कहा लपटानो ॥१॥

उसतति निंदा दोऊ परहरि हरि कीरति उरि आनो ॥ जन नानक सभ ही मै पूरन एक पुरख भगवानो ॥२॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1190) बसंतु हिंडोलु महला १ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नउ सत चउदह तीनि चारि करि महलति चारि बहाली ॥ चारे दीवे चहु हथि दीए एका एका वारी ॥१॥

मिहरवान मधुसूदन माधौ ऐसी सकति तुम्हारी ॥१॥ रहाउ ॥

घरि घरि लसकरु पावकु तेरा धरमु करे सिकदारी ॥ धरती देग मिलै इक वेरा भागु तेरा भंडारी ॥२॥

ना साबूरु होवै फिरि मंगै नारदु करे खुआरी ॥ लबु अधेरा बंदीखाना अउगण पैरि लुहारी ॥३॥

पूंजी मार पवै नित मुदगर पापु करे कोटवारी ॥ भावै चंगा भावै मंदा जैसी नदरि तुम्हारी ॥४॥

आदि पुरख कउ अलहु कहीऐ सेखां आई वारी ॥ देवल देवतिआ करु लागा ऐसी कीरति चाली ॥५॥

कूजा बांग निवाज मुसला नील रूप बनवारी ॥ घरि घरि मीआ सभनां जीआं बोली अवर तुमारी ॥६॥

जे तू मीर महीपति साहिबु कुदरति कउण हमारी ॥ चारे कुंट सलामु करहिगे घरि घरि सिफति तुम्हारी ॥७॥

तीरथ सिम्रिति पुंन दान किछु लाहा मिलै दिहाड़ी ॥ नानक नामु मिलै वडिआई मेका घड़ी सम्हाली ॥८॥१॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1191) बसंतु हिंडोलु घरु २ महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कांइआ नगरि इकु बालकु वसिआ खिनु पलु थिरु न रहाई ॥ अनिक उपाव जतन करि थाके बारं बार भरमाई ॥१॥

मेरे ठाकुर बालकु इकतु घरि आणु ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ भजु राम नामु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मिरतकु मड़ा सरीरु है सभु जगु जितु राम नामु नही वसिआ ॥ राम नामु गुरि उदकु चुआइआ फिरि हरिआ होआ रसिआ ॥२॥

मै निरखत निरखत सरीरु सभु खोजिआ इकु गुरमुखि चलतु दिखाइआ ॥ बाहरु खोजि मुए सभि साकत हरि गुरमती घरि पाइआ ॥३॥

दीना दीन दइआल भए है जिउ क्रिसनु बिदर घरि आइआ ॥ मिलिओ सुदामा भावनी धारि सभु किछु आगै दालदु भंजि समाइआ ॥४॥

राम नाम की पैज वडेरी मेरे ठाकुरि आपि रखाई ॥ जे सभि साकत करहि बखीली इक रती तिलु न घटाई ॥५॥

जन की उसतति है राम नामा दह दिसि सोभा पाई ॥ निंदकु साकतु खवि न सकै तिलु अपणै घरि लूकी लाई ॥६॥

जन कउ जनु मिलि सोभा पावै गुण महि गुण परगासा ॥ मेरे ठाकुर के जन प्रीतम पिआरे जो होवहि दासनि दासा ॥७॥

आपे जलु अपर्मपरु करता आपे मेलि मिलावै ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलाए जिउ जलु जलहि समावै ॥८॥१॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 1195) बसंतु हिंडोलु घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥ आवहि जूठे जाहि भी जूठे जूठे मरहि अभागे ॥१॥

कहु पंडित सूचा कवनु ठाउ ॥ जहां बैसि हउ भोजनु खाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जिहबा जूठी बोलत जूठा करन नेत्र सभि जूठे ॥ इंद्री की जूठि उतरसि नाही ब्रहम अगनि के लूठे ॥२॥

अगनि भी जूठी पानी जूठा जूठी बैसि पकाइआ ॥ जूठी करछी परोसन लागा जूठे ही बैठि खाइआ ॥३॥

गोबरु जूठा चउका जूठा जूठी दीनी कारा ॥ कहि कबीर तेई नर सूचे साची परी बिचारा ॥४॥१॥७॥

(भक्त रामानंद जी -- SGGS 1195) रामानंद जी घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥ मेरा चितु न चलै मनु भइओ पंगु ॥१॥ रहाउ ॥

एक दिवस मन भई उमंग ॥ घसि चंदन चोआ बहु सुगंध ॥ पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥ सो ब्रहमु बताइओ गुर मन ही माहि ॥१॥

जहा जाईऐ तह जल पखान ॥ तू पूरि रहिओ है सभ समान ॥ बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥ ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥२॥

सतिगुर मै बलिहारी तोर ॥ जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥ रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥ गुर का सबदु काटै कोटि करम ॥३॥१॥


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