Pt 9 - राग आसा - बाणी शब्द, Part 9 - Raag Asa - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 450) आसा महला ४ ॥
जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥ जे बाहरहु भुलि चुकि बोलदे भी खरे हरि भाणे ॥ हरि संता नो होरु थाउ नाही हरि माणु निमाणे ॥ जन नानक नामु दीबाणु है हरि ताणु सताणे ॥१॥

जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरू सो थानु सुहावा राम राजे ॥ गुरसिखीं सो थानु भालिआ लै धूरि मुखि लावा ॥ गुरसिखा की घाल थाइ पई जिन हरि नामु धिआवा ॥ जिन्ह नानकु सतिगुरु पूजिआ तिन हरि पूज करावा ॥२॥

गुरसिखा मनि हरि प्रीति है हरि नाम हरि तेरी राम राजे ॥ करि सेवहि पूरा सतिगुरू भुख जाइ लहि मेरी ॥ गुरसिखा की भुख सभ गई तिन पिछै होर खाइ घनेरी ॥ जन नानक हरि पुंनु बीजिआ फिरि तोटि न आवै हरि पुंन केरी ॥३॥

गुरसिखा मनि वाधाईआ जिन मेरा सतिगुरू डिठा राम राजे ॥ कोई करि गल सुणावै हरि नाम की सो लगै गुरसिखा मनि मिठा ॥ हरि दरगह गुरसिख पैनाईअहि जिन्हा मेरा सतिगुरु तुठा ॥ जन नानकु हरि हरि होइआ हरि हरि मनि वुठा ॥४॥१२॥१९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 451) आसा महला ४ ॥
जिन्हा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥ तिस की त्रिसना भुख सभ उतरै जो हरि नामु धिआवै ॥ जो हरि हरि नामु धिआइदे तिन्ह जमु नेड़ि न आवै ॥ जन नानक कउ हरि क्रिपा करि नित जपै हरि नामु हरि नामि तरावै ॥१॥

जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ तिना फिरि बिघनु न होई राम राजे ॥ जिनी सतिगुरु पुरखु मनाइआ तिन पूजे सभु कोई ॥ जिन्ही सतिगुरु पिआरा सेविआ तिन्हा सुखु सद होई ॥ जिन्हा नानकु सतिगुरु भेटिआ तिन्हा मिलिआ हरि सोई ॥२॥

जिन्हा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन्ह हरि रखणहारा राम राजे ॥ तिन्ह की निंदा कोई किआ करे जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥ जिन हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा ॥ जन नानक नामु धिआइआ हरि रखणहारा ॥३॥

हरि जुगु जुगु भगत उपाइआ पैज रखदा आइआ राम राजे ॥ हरणाखसु दुसटु हरि मारिआ प्रहलादु तराइआ ॥ अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ ॥ जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ ॥४॥१३॥२०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 451) आसा महला ४ छंत घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥ हरि गुरू मिलावहु मेरे पिआरे घरि वसै हरे ॥ रंगि रलीआ माणहु मेरे पिआरे हरि किरपा करे ॥ गुरु नानकु तुठा मेरे पिआरे मेले हरे ॥१॥

मै प्रेमु न चाखिआ मेरे पिआरे भाउ करे ॥ मनि त्रिसना न बुझी मेरे पिआरे नित आस करे ॥ नित जोबनु जावै मेरे पिआरे जमु सास हिरे ॥ भाग मणी सोहागणि मेरे पिआरे नानक हरि उरि धारे ॥२॥

पिर रतिअड़े मैडे लोइण मेरे पिआरे चात्रिक बूंद जिवै ॥ मनु सीतलु होआ मेरे पिआरे हरि बूंद पीवै ॥ तनि बिरहु जगावै मेरे पिआरे नीद न पवै किवै ॥ हरि सजणु लधा मेरे पिआरे नानक गुरू लिवै ॥३॥

चड़ि चेतु बसंतु मेरे पिआरे भलीअ रुते ॥ पिर बाझड़िअहु मेरे पिआरे आंगणि धूड़ि लुते ॥ मनि आस उडीणी मेरे पिआरे दुइ नैन जुते ॥ गुरु नानकु देखि विगसी मेरे पिआरे जिउ मात सुते ॥४॥

हरि कीआ कथा कहाणीआ मेरे पिआरे सतिगुरू सुणाईआ ॥ गुर विटड़िअहु हउ घोली मेरे पिआरे जिनि हरि मेलाईआ ॥ सभि आसा हरि पूरीआ मेरे पिआरे मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ ॥ हरि तुठड़ा मेरे पिआरे जनु नानकु नामि समाइआ ॥५॥

पिआरे हरि बिनु प्रेमु न खेलसा ॥ किउ पाई गुरु जितु लगि पिआरा देखसा ॥ हरि दातड़े मेलि गुरू मुखि गुरमुखि मेलसा ॥ गुरु नानकु पाइआ मेरे पिआरे धुरि मसतकि लेखु सा ॥६॥१४॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 452) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला ५ छंत घरु १ ॥
अनदो अनदु घणा मै सो प्रभु डीठा राम ॥ चाखिअड़ा चाखिअड़ा मै हरि रसु मीठा राम ॥ हरि रसु मीठा मन महि वूठा सतिगुरु तूठा सहजु भइआ ॥ ग्रिहु वसि आइआ मंगलु गाइआ पंच दुसट ओइ भागि गइआ ॥ सीतल आघाणे अम्रित बाणे साजन संत बसीठा ॥ कहु नानक हरि सिउ मनु मानिआ सो प्रभु नैणी डीठा ॥१॥

सोहिअड़े सोहिअड़े मेरे बंक दुआरे राम ॥ पाहुनड़े पाहुनड़े मेरे संत पिआरे राम ॥ संत पिआरे कारज सारे नमसकार करि लगे सेवा ॥ आपे जाञी आपे माञी आपि सुआमी आपि देवा ॥ अपणा कारजु आपि सवारे आपे धारन धारे ॥ कहु नानक सहु घर महि बैठा सोहे बंक दुआरे ॥२॥

नव निधे नउ निधे मेरे घर महि आई राम ॥ सभु किछु मै सभु किछु पाइआ नामु धिआई राम ॥ नामु धिआई सदा सखाई सहज सुभाई गोविंदा ॥ गणत मिटाई चूकी धाई कदे न विआपै मन चिंदा ॥ गोविंद गाजे अनहद वाजे अचरज सोभ बणाई ॥ कहु नानक पिरु मेरै संगे ता मै नव निधि पाई ॥३॥

सरसिअड़े सरसिअड़े मेरे भाई सभ मीता राम ॥ बिखमो बिखमु अखाड़ा मै गुर मिलि जीता राम ॥ गुर मिलि जीता हरि हरि कीता तूटी भीता भरम गड़ा ॥ पाइआ खजाना बहुतु निधाना साणथ मेरी आपि खड़ा ॥ सोई सुगिआना सो परधाना जो प्रभि अपना कीता ॥ कहु नानक जां वलि सुआमी ता सरसे भाई मीता ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 453) आसा महला ५ ॥
अकथा हरि अकथ कथा किछु जाइ न जाणी राम ॥ सुरि नर सुरि नर मुनि जन सहजि वखाणी राम ॥ सहजे वखाणी अमिउ बाणी चरण कमल रंगु लाइआ ॥ जपि एकु अलखु प्रभु निरंजनु मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ तजि मानु मोहु विकारु दूजा जोती जोति समाणी ॥ बिनवंति नानक गुर प्रसादी सदा हरि रंगु माणी ॥१॥

हरि संता हरि संत सजन मेरे मीत सहाई राम ॥ वडभागी वडभागी सतसंगति पाई राम ॥ वडभागी पाए नामु धिआए लाथे दूख संतापै ॥ गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे आपु मिटाइआ आपै ॥ करि किरपा मेले प्रभि अपुनै विछुड़ि कतहि न जाई ॥ बिनवंति नानक दासु तेरा सदा हरि सरणाई ॥२॥

हरि दरे हरि दरि सोहनि तेरे भगत पिआरे राम ॥ वारी तिन वारी जावा सद बलिहारे राम ॥ सद बलिहारे करि नमसकारे जिन भेटत प्रभु जाता ॥ घटि घटि रवि रहिआ सभ थाई पूरन पुरखु बिधाता ॥ गुरु पूरा पाइआ नामु धिआइआ जूऐ जनमु न हारे ॥ बिनवंति नानक सरणि तेरी राखु किरपा धारे ॥३॥

बेअंता बेअंत गुण तेरे केतक गावा राम ॥ तेरे चरणा तेरे चरण धूड़ि वडभागी पावा राम ॥ हरि धूड़ी न्हाईऐ मैलु गवाईऐ जनम मरण दुख लाथे ॥ अंतरि बाहरि सदा हदूरे परमेसरु प्रभु साथे ॥ मिटे दूख कलिआण कीरतन बहुड़ि जोनि न पावा ॥ बिनवंति नानक गुर सरणि तरीऐ आपणे प्रभ भावा ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 453) आसा छंत महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि चरन कमल मनु बेधिआ किछु आन न मीठा राम राजे ॥ मिलि संतसंगति आराधिआ हरि घटि घटे डीठा राम राजे ॥ हरि घटि घटे डीठा अम्रितो वूठा जनम मरन दुख नाठे ॥ गुण निधि गाइआ सभ दूख मिटाइआ हउमै बिनसी गाठे ॥ प्रिउ सहज सुभाई छोडि न जाई मनि लागा रंगु मजीठा ॥ हरि नानक बेधे चरन कमल किछु आन न मीठा ॥१॥

जिउ राती जलि माछुली तिउ राम रसि माते राम राजे ॥ गुर पूरै उपदेसिआ जीवन गति भाते राम राजे ॥ जीवन गति सुआमी अंतरजामी आपि लीए लड़ि लाए ॥ हरि रतन पदारथो परगटो पूरनो छोडि न कतहू जाए ॥ प्रभु सुघरु सरूपु सुजानु सुआमी ता की मिटै न दाते ॥ जल संगि राती माछुली नानक हरि माते ॥२॥

चात्रिकु जाचै बूंद जिउ हरि प्रान अधारा राम राजे ॥ मालु खजीना सुत भ्रात मीत सभहूं ते पिआरा राम राजे ॥ सभहूं ते पिआरा पुरखु निरारा ता की गति नही जाणीऐ ॥ हरि सासि गिरासि न बिसरै कबहूं गुर सबदी रंगु माणीऐ ॥ प्रभु पुरखु जगजीवनो संत रसु पीवनो जपि भरम मोह दुख डारा ॥ चात्रिकु जाचै बूंद जिउ नानक हरि पिआरा ॥३॥

मिले नराइण आपणे मानोरथो पूरा राम राजे ॥ ढाठी भीति भरम की भेटत गुरु सूरा राम राजे ॥ पूरन गुर पाए पुरबि लिखाए सभ निधि दीन दइआला ॥ आदि मधि अंति प्रभु सोई सुंदर गुर गोपाला ॥ सूख सहज आनंद घनेरे पतित पावन साधू धूरा ॥ हरि मिले नराइण नानका मानोरथो पूरा ॥४॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 454) आसा महला ५ छंत घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥ नानक प्रीति लगी तिन्ह राम सिउ भेटत साध संगात ॥१॥

छंतु ॥
जल दुध निआई रीति अब दुध आच नही मन ऐसी प्रीति हरे ॥ अब उरझिओ अलि कमलेह बासन माहि मगन इकु खिनु भी नाहि टरै ॥ खिनु नाहि टरीऐ प्रीति हरीऐ सीगार हभि रस अरपीऐ ॥ जह दूखु सुणीऐ जम पंथु भणीऐ तह साधसंगि न डरपीऐ ॥ करि कीरति गोविंद गुणीऐ सगल प्राछत दुख हरे ॥ कहु नानक छंत गोविंद हरि के मन हरि सिउ नेहु करेहु ऐसी मन प्रीति हरे ॥१॥

जैसी मछुली नीर इकु खिनु भी ना धीरे मन ऐसा नेहु करेहु ॥ जैसी चात्रिक पिआस खिनु खिनु बूंद चवै बरसु सुहावे मेहु ॥ हरि प्रीति करीजै इहु मनु दीजै अति लाईऐ चितु मुरारी ॥ मानु न कीजै सरणि परीजै दरसन कउ बलिहारी ॥ गुर सुप्रसंने मिलु नाह विछुंने धन देदी साचु सनेहा ॥ कहु नानक छंत अनंत ठाकुर के हरि सिउ कीजै नेहा मन ऐसा नेहु करेहु ॥२॥

चकवी सूर सनेहु चितवै आस घणी कदि दिनीअरु देखीऐ ॥ कोकिल अंब परीति चवै सुहावीआ मन हरि रंगु कीजीऐ ॥ हरि प्रीति करीजै मानु न कीजै इक राती के हभि पाहुणिआ ॥ अब किआ रंगु लाइओ मोहु रचाइओ नागे आवण जावणिआ ॥ थिरु साधू सरणी पड़ीऐ चरणी अब टूटसि मोहु जु कितीऐ ॥ कहु नानक छंत दइआल पुरख के मन हरि लाइ परीति कब दिनीअरु देखीऐ ॥३॥

निसि कुरंक जैसे नाद सुणि स्रवणी हीउ डिवै मन ऐसी प्रीति कीजै ॥ जैसी तरुणि भतार उरझी पिरहि सिवै इहु मनु लाल दीजै ॥ मनु लालहि दीजै भोग करीजै हभि खुसीआ रंग माणे ॥ पिरु अपना पाइआ रंगु लालु बणाइआ अति मिलिओ मित्र चिराणे ॥ गुरु थीआ साखी ता डिठमु आखी पिर जेहा अवरु न दीसै ॥ कहु नानक छंत दइआल मोहन के मन हरि चरण गहीजै ऐसी मन प्रीति कीजै ॥४॥१॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 455) आसा महला ५ ॥
सलोकु ॥
बनु बनु फिरती खोजती हारी बहु अवगाहि ॥ नानक भेटे साध जब हरि पाइआ मन माहि ॥१॥

छंत ॥
जा कउ खोजहि असंख मुनी अनेक तपे ॥ ब्रहमे कोटि अराधहि गिआनी जाप जपे ॥ जप ताप संजम किरिआ पूजा अनिक सोधन बंदना ॥ करि गवनु बसुधा तीरथह मजनु मिलन कउ निरंजना ॥ मानुख बनु तिनु पसू पंखी सगल तुझहि अराधते ॥ दइआल लाल गोबिंद नानक मिलु साधसंगति होइ गते ॥१॥

कोटि बिसन अवतार संकर जटाधार ॥ चाहहि तुझहि दइआर मनि तनि रुच अपार ॥ अपार अगम गोबिंद ठाकुर सगल पूरक प्रभ धनी ॥ सुर सिध गण गंधरब धिआवहि जख किंनर गुण भनी ॥ कोटि इंद्र अनेक देवा जपत सुआमी जै जै कार ॥ अनाथ नाथ दइआल नानक साधसंगति मिलि उधार ॥२॥

कोटि देवी जा कउ सेवहि लखिमी अनिक भाति ॥ गुपत प्रगट जा कउ अराधहि पउण पाणी दिनसु राति ॥ नखिअत्र ससीअर सूर धिआवहि बसुध गगना गावए ॥ सगल खाणी सगल बाणी सदा सदा धिआवए ॥ सिम्रिति पुराण चतुर बेदह खटु सासत्र जा कउ जपाति ॥ पतित पावन भगति वछल नानक मिलीऐ संगि साति ॥३॥

जेती प्रभू जनाई रसना तेत भनी ॥ अनजानत जो सेवै तेती नह जाइ गनी ॥ अविगत अगनत अथाह ठाकुर सगल मंझे बाहरा ॥ सरब जाचिक एकु दाता नह दूरि संगी जाहरा ॥ वसि भगत थीआ मिले जीआ ता की उपमा कित गनी ॥ इहु दानु मानु नानकु पाए सीसु साधह धरि चरनी ॥४॥२॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 456) आसा महला ५ ॥
सलोक ॥
उदमु करहु वडभागीहो सिमरहु हरि हरि राइ ॥ नानक जिसु सिमरत सभ सुख होवहि दूखु दरदु भ्रमु जाइ ॥१॥

छंतु ॥
नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥ भेटत साधू संग जम पुरि नह जाईऐ ॥ दूख दरद न भउ बिआपै नामु सिमरत सद सुखी ॥ सासि सासि अराधि हरि हरि धिआइ सो प्रभु मनि मुखी ॥ क्रिपाल दइआल रसाल गुण निधि करि दइआ सेवा लाईऐ ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥१॥

पावन पतित पुनीत नाम निरंजना ॥ भरम अंधेर बिनास गिआन गुर अंजना ॥ गुर गिआन अंजन प्रभ निरंजन जलि थलि महीअलि पूरिआ ॥ इक निमख जा कै रिदै वसिआ मिटे तिसहि विसूरिआ ॥ अगाधि बोध समरथ सुआमी सरब का भउ भंजना ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै पावन पतित पुनीत नाम निरंजना ॥२॥

ओट गही गोपाल दइआल क्रिपा निधे ॥ मोहि आसर तुअ चरन तुमारी सरनि सिधे ॥ हरि चरन कारन करन सुआमी पतित उधरन हरि हरे ॥ सागर संसार भव उतार नामु सिमरत बहु तरे ॥ आदि अंति बेअंत खोजहि सुनी उधरन संतसंग बिधे ॥ नानकु पइअंपै चरन ज्मपै ओट गही गोपाल दइआल क्रिपा निधे ॥३॥

भगति वछलु हरि बिरदु आपि बनाइआ ॥ जह जह संत अराधहि तह तह प्रगटाइआ ॥ प्रभि आपि लीए समाइ सहजि सुभाइ भगत कारज सारिआ ॥ आनंद हरि जस महा मंगल सरब दूख विसारिआ ॥ चमतकार प्रगासु दह दिस एकु तह द्रिसटाइआ ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै भगति वछलु हरि बिरदु आपि बनाइआ ॥४॥३॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 457) आसा महला ५ ॥
थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥ जा कै ग्रिहि हरि नाहु सु सद ही रावए ॥ अविनासी अविगतु सो प्रभु सदा नवतनु निरमला ॥ नह दूरि सदा हदूरि ठाकुरु दह दिस पूरनु सद सदा ॥ प्रानपति गति मति जा ते प्रिअ प्रीति प्रीतमु भावए ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥१॥

जा कउ राम भतारु ता कै अनदु घणा ॥ सुखवंती सा नारि सोभा पूरि बणा ॥ माणु महतु कलिआणु हरि जसु संगि सुरजनु सो प्रभू ॥ सरब सिधि नव निधि तितु ग्रिहि नही ऊना सभु कछू ॥ मधुर बानी पिरहि मानी थिरु सोहागु ता का बणा ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा को रामु भतारु ता कै अनदु घणा ॥२॥

आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥ पीसउ चरण पखारि आपु तिआगीऐ ॥ तजि आपु मिटै संतापु आपु नह जाणाईऐ ॥ सरणि गहीजै मानि लीजै करे सो सुखु पाईऐ ॥ करि दास दासी तजि उदासी कर जोड़ि दिनु रैणि जागीऐ ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥३॥

जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥ ता की पूरन आस जिन्ह साधसंगु पाइआ ॥ साधसंगि हरि कै रंगि गोबिंद सिमरण लागिआ ॥ भरमु मोहु विकारु दूजा सगल तिनहि तिआगिआ ॥ मनि सांति सहजु सुभाउ वूठा अनद मंगल गुण गाइआ ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥४॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 457) आसा महला ५ ॥
सलोकु ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥ नानक मनु तनु सुखी होइ अंते मिलै गोपालु ॥१॥

छंत ॥
मिलउ संतन कै संगि मोहि उधारि लेहु ॥ बिनउ करउ कर जोड़ि हरि हरि नामु देहु ॥ हरि नामु मागउ चरण लागउ मानु तिआगउ तुम्ह दइआ ॥ कतहूं न धावउ सरणि पावउ करुणा मै प्रभ करि मइआ ॥ समरथ अगथ अपार निरमल सुणहु सुआमी बिनउ एहु ॥ कर जोड़ि नानक दानु मागै जनम मरण निवारि लेहु ॥१॥

अपराधी मतिहीनु निरगुनु अनाथु नीचु ॥ सठ कठोरु कुलहीनु बिआपत मोह कीचु ॥ मल भरम करम अहं ममता मरणु चीति न आवए ॥ बनिता बिनोद अनंद माइआ अगिआनता लपटावए ॥ खिसै जोबनु बधै जरूआ दिन निहारे संगि मीचु ॥ बिनवंति नानक आस तेरी सरणि साधू राखु नीचु ॥२॥

भरमे जनम अनेक संकट महा जोन ॥ लपटि रहिओ तिह संगि मीठे भोग सोन ॥ भ्रमत भार अगनत आइओ बहु प्रदेसह धाइओ ॥ अब ओट धारी प्रभ मुरारी सरब सुख हरि नाइओ ॥ राखनहारे प्रभ पिआरे मुझ ते कछू न होआ होन ॥ सूख सहज आनंद नानक क्रिपा तेरी तरै भउन ॥३॥

नाम धारीक उधारे भगतह संसा कउन ॥ जेन केन परकारे हरि हरि जसु सुनहु स्रवन ॥ सुनि स्रवन बानी पुरख गिआनी मनि निधाना पावहे ॥ हरि रंगि राते प्रभ बिधाते राम के गुण गावहे ॥ बसुध कागद बनराज कलमा लिखण कउ जे होइ पवन ॥ बेअंत अंतु न जाइ पाइआ गही नानक चरण सरन ॥४॥५॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 458) आसा महला ५ ॥
पुरख पते भगवान ता की सरणि गही ॥ निरभउ भए परान चिंता सगल लही ॥ मात पिता सुत मीत सुरिजन इसट बंधप जाणिआ ॥ गहि कंठि लाइआ गुरि मिलाइआ जसु बिमल संत वखाणिआ ॥ बेअंत गुण अनेक महिमा कीमति कछू न जाइ कही ॥ प्रभ एक अनिक अलख ठाकुर ओट नानक तिसु गही ॥१॥

अम्रित बनु संसारु सहाई आपि भए ॥ राम नामु उर हारु बिखु के दिवस गए ॥ गतु भरम मोह बिकार बिनसे जोनि आवण सभ रहे ॥ अगनि सागर भए सीतल साध अंचल गहि रहे ॥ गोविंद गुपाल दइआल सम्रिथ बोलि साधू हरि जै जए ॥ नानक नामु धिआइ पूरन साधसंगि पाई परम गते ॥२॥

जह देखउ तह संगि एको रवि रहिआ ॥ घट घट वासी आपि विरलै किनै लहिआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन कीट हसति समानिआ ॥ आदि अंते मधि सोई गुर प्रसादी जानिआ ॥ ब्रहमु पसरिआ ब्रहम लीला गोविंद गुण निधि जनि कहिआ ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी हरि एकु नानक रवि रहिआ ॥३॥

दिनु रैणि सुहावड़ी आई सिमरत नामु हरे ॥ चरण कमल संगि प्रीति कलमल पाप टरे ॥ दूख भूख दारिद्र नाठे प्रगटु मगु दिखाइआ ॥ मिलि साधसंगे नाम रंगे मनि लोड़ीदा पाइआ ॥ हरि देखि दरसनु इछ पुंनी कुल स्मबूहा सभि तरे ॥ दिनसु रैणि अनंद अनदिनु सिमरंत नानक हरि हरे ॥४॥६॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 459) आसा महला ५ छंत घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥ नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥१॥

छंत ॥
भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥ जागहि संत जना मेरे राम पिआरे ॥ राम पिआरे सदा जागहि नामु सिमरहि अनदिनो ॥ चरण कमल धिआनु हिरदै प्रभ बिसरु नाही इकु खिनो ॥ तजि मानु मोहु बिकारु मन का कलमला दुख जारे ॥ बिनवंति नानक सदा जागहि हरि दास संत पिआरे ॥१॥

मेरी सेजड़ीऐ आड्मबरु बणिआ ॥ मनि अनदु भइआ प्रभु आवत सुणिआ ॥ प्रभ मिले सुआमी सुखह गामी चाव मंगल रस भरे ॥ अंग संगि लागे दूख भागे प्राण मन तन सभि हरे ॥ मन इछ पाई प्रभ धिआई संजोगु साहा सुभ गणिआ ॥ बिनवंति नानक मिले स्रीधर सगल आनंद रसु बणिआ ॥२॥

मिलि सखीआ पुछहि कहु कंत नीसाणी ॥ रसि प्रेम भरी कछु बोलि न जाणी ॥ गुण गूड़ गुपत अपार करते निगम अंतु न पावहे ॥ भगति भाइ धिआइ सुआमी सदा हरि गुण गावहे ॥ सगल गुण सुगिआन पूरन आपणे प्रभ भाणी ॥ बिनवंति नानक रंगि राती प्रेम सहजि समाणी ॥३॥

सुख सोहिलड़े हरि गावण लागे ॥ साजन सरसिअड़े दुख दुसमन भागे ॥ सुख सहज सरसे हरि नामि रहसे प्रभि आपि किरपा धारीआ ॥ हरि चरण लागे सदा जागे मिले प्रभ बनवारीआ ॥ सुभ दिवस आए सहजि पाए सगल निधि प्रभ पागे ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी सदा हरि जन तागे ॥४॥१॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 459) आसा महला ५ ॥
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥ मुहलति पुंनड़ीआ कितु कूड़ि लोभाइआ ॥ कूड़े लुभाइआ धोहु माइआ करहि पाप अमितिआ ॥ तनु भसम ढेरी जमहि हेरी कालि बपुड़ै जितिआ ॥ मालु जोबनु छोडि वैसी रहिओ पैनणु खाइआ ॥ नानक कमाणा संगि जुलिआ नह जाइ किरतु मिटाइआ ॥१॥

फाथोहु मिरग जिवै पेखि रैणि चंद्राइणु ॥ सूखहु दूख भए नित पाप कमाइणु ॥ पापा कमाणे छडहि नाही लै चले घति गलाविआ ॥ हरिचंदउरी देखि मूठा कूड़ु सेजा राविआ ॥ लबि लोभि अहंकारि माता गरबि भइआ समाइणु ॥ नानक म्रिग अगिआनि बिनसे नह मिटै आवणु जाइणु ॥२॥

मिठै मखु मुआ किउ लए ओडारी ॥ हसती गरति पइआ किउ तरीऐ तारी ॥ तरणु दुहेला भइआ खिन महि खसमु चिति न आइओ ॥ दूखा सजाई गणत नाही कीआ अपणा पाइओ ॥ गुझा कमाणा प्रगटु होआ ईत उतहि खुआरी ॥ नानक सतिगुर बाझु मूठा मनमुखो अहंकारी ॥३॥

हरि के दास जीवे लगि प्रभ की चरणी ॥ कंठि लगाइ लीए तिसु ठाकुर सरणी ॥ बल बुधि गिआनु धिआनु अपणा आपि नामु जपाइआ ॥ साधसंगति आपि होआ आपि जगतु तराइआ ॥ राखि लीए रखणहारै सदा निरमल करणी ॥ नानक नरकि न जाहि कबहूं हरि संत हरि की सरणी ॥४॥२॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 460) आसा महला ५ ॥
वंञु मेरे आलसा हरि पासि बेनंती ॥ रावउ सहु आपनड़ा प्रभ संगि सोहंती ॥ संगे सोहंती कंत सुआमी दिनसु रैणी रावीऐ ॥ सासि सासि चितारि जीवा प्रभु पेखि हरि गुण गावीऐ ॥ बिरहा लजाइआ दरसु पाइआ अमिउ द्रिसटि सिंचंती ॥ बिनवंति नानकु मेरी इछ पुंनी मिले जिसु खोजंती ॥१॥

नसि वंञहु किलविखहु करता घरि आइआ ॥ दूतह दहनु भइआ गोविंदु प्रगटाइआ ॥ प्रगटे गुपाल गोबिंद लालन साधसंगि वखाणिआ ॥ आचरजु डीठा अमिउ वूठा गुर प्रसादी जाणिआ ॥ मनि सांति आई वजी वधाई नह अंतु जाई पाइआ ॥ बिनवंति नानक सुख सहजि मेला प्रभू आपि बणाइआ ॥२॥

नरक न डीठड़िआ सिमरत नाराइण ॥ जै जै धरमु करे दूत भए पलाइण ॥ धरम धीरज सहज सुखीए साधसंगति हरि भजे ॥ करि अनुग्रहु राखि लीने मोह ममता सभ तजे ॥ गहि कंठि लाए गुरि मिलाए गोविंद जपत अघाइण ॥ बिनवंति नानक सिमरि सुआमी सगल आस पुजाइण ॥३॥

निधि सिधि चरण गहे ता केहा काड़ा ॥ सभु किछु वसि जिसै सो प्रभू असाड़ा ॥ गहि भुजा लीने नाम दीने करु धारि मसतकि राखिआ ॥ संसार सागरु नह विआपै अमिउ हरि रसु चाखिआ ॥ साधसंगे नाम रंगे रणु जीति वडा अखाड़ा ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी बहुड़ि जमि न उपाड़ा ॥४॥३॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 461) आसा महला ५ ॥
दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥ जिसु पासि लुकाइदड़ो सो वेखी साथै ॥ संगि देखै करणहारा काइ पापु कमाईऐ ॥ सुक्रितु कीजै नामु लीजै नरकि मूलि न जाईऐ ॥ आठ पहर हरि नामु सिमरहु चलै तेरै साथे ॥ भजु साधसंगति सदा नानक मिटहि दोख कमाते ॥१॥

वलवंच करि उदरु भरहि मूरख गावारा ॥ सभु किछु दे रहिआ हरि देवणहारा ॥ दातारु सदा दइआलु सुआमी काइ मनहु विसारीऐ ॥ मिलु साधसंगे भजु निसंगे कुल समूहा तारीऐ ॥ सिध साधिक देव मुनि जन भगत नामु अधारा ॥ बिनवंति नानक सदा भजीऐ प्रभु एकु करणैहारा ॥२॥

खोटु न कीचई प्रभु परखणहारा ॥ कूड़ु कपटु कमावदड़े जनमहि संसारा ॥ संसारु सागरु तिन्ही तरिआ जिन्ही एकु धिआइआ ॥ तजि कामु क्रोधु अनिंद निंदा प्रभ सरणाई आइआ ॥ जलि थलि महीअलि रविआ सुआमी ऊच अगम अपारा ॥ बिनवंति नानक टेक जन की चरण कमल अधारा ॥३॥

पेखु हरिचंदउरड़ी असथिरु किछु नाही ॥ माइआ रंग जेते से संगि न जाही ॥ हरि संगि साथी सदा तेरै दिनसु रैणि समालीऐ ॥ हरि एक बिनु कछु अवरु नाही भाउ दुतीआ जालीऐ ॥ मीतु जोबनु मालु सरबसु प्रभु एकु करि मन माही ॥ बिनवंति नानकु वडभागि पाईऐ सूखि सहजि समाही ॥४॥४॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 461) आसा महला ५ छंत घरु ८
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥ गहबर बन घोर गहबर बन घोर हे ग्रिह मूसत मन चोर हे दिनकरो अनदिनु खात ॥ दिन खात जात बिहात प्रभ बिनु मिलहु प्रभ करुणा पते ॥ जनम मरण अनेक बीते प्रिअ संग बिनु कछु नह गते ॥ कुल रूप धूप गिआनहीनी तुझ बिना मोहि कवन मात ॥ कर जोड़ि नानकु सरणि आइओ प्रिअ नाथ नरहर करहु गात ॥१॥

मीना जलहीन मीना जलहीन हे ओहु बिछुरत मन तन खीन हे कत जीवनु प्रिअ बिनु होत ॥ सनमुख सहि बान सनमुख सहि बान हे म्रिग अरपे मन तन प्रान हे ओहु बेधिओ सहज सरोत ॥ प्रिअ प्रीति लागी मिलु बैरागी खिनु रहनु ध्रिगु तनु तिसु बिना ॥ पलका न लागै प्रिअ प्रेम पागै चितवंति अनदिनु प्रभ मना ॥ स्रीरंग राते नाम माते भै भरम दुतीआ सगल खोत ॥ करि मइआ दइआ दइआल पूरन हरि प्रेम नानक मगन होत ॥२॥

अलीअल गुंजात अलीअल गुंजात हे मकरंद रस बासन मात हे प्रीति कमल बंधावत आप ॥ चात्रिक चित पिआस चात्रिक चित पिआस हे घन बूंद बचित्रि मनि आस हे अल पीवत बिनसत ताप ॥ तापा बिनासन दूख नासन मिलु प्रेमु मनि तनि अति घना ॥ सुंदरु चतुरु सुजान सुआमी कवन रसना गुण भना ॥ गहि भुजा लेवहु नामु देवहु द्रिसटि धारत मिटत पाप ॥ नानकु ज्मपै पतित पावन हरि दरसु पेखत नह संताप ॥३॥

चितवउ चित नाथ चितवउ चित नाथ हे रखि लेवहु सरणि अनाथ हे मिलु चाउ चाईले प्रान ॥ सुंदर तन धिआन सुंदर तन धिआन हे मनु लुबध गोपाल गिआन हे जाचिक जन राखत मान ॥ प्रभ मान पूरन दुख बिदीरन सगल इछ पुजंतीआ ॥ हरि कंठि लागे दिन सभागे मिलि नाह सेज सोहंतीआ ॥ प्रभ द्रिसटि धारी मिले मुरारी सगल कलमल भए हान ॥ बिनवंति नानक मेरी आस पूरन मिले स्रीधर गुण निधान ॥४॥१॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 462) ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
आसा महला १ ॥
वार सलोका नालि सलोक भी महले पहिले के लिखे टुंडे अस राजै की धुनी ॥
सलोकु मः १ ॥
बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥ जिनि माणस ते देवते कीए करत न लागी वार ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 463) महला २ ॥
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार ॥ एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 463) मः १ ॥
नानक गुरू न चेतनी मनि आपणै सुचेत ॥ छुटे तिल बूआड़ जिउ सुंञे अंदरि खेत ॥ खेतै अंदरि छुटिआ कहु नानक सउ नाह ॥ फलीअहि फुलीअहि बपुड़े भी तन विचि सुआह ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 463) पउड़ी ॥
आपीन्है आपु साजिओ आपीन्है रचिओ नाउ ॥ दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ ॥ दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ ॥ तूं जाणोई सभसै दे लैसहि जिंदु कवाउ ॥ करि आसणु डिठो चाउ ॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates