Pt 7 - राग आसा - बाणी शब्द, Part 7 - Raag Asa - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 426) आसा महला ३ ॥
आपै आपु पछाणिआ सादु मीठा भाई ॥ हरि रसि चाखिऐ मुकतु भए जिन्हा साचो भाई ॥१॥

हरि जीउ निरमल निरमला निरमल मनि वासा ॥ गुरमती सालाहीऐ बिखिआ माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु सबदै आपु न जापई सभ अंधी भाई ॥ गुरमती घटि चानणा नामु अंति सखाई ॥२॥

नामे ही नामि वरतदे नामे वरतारा ॥ अंतरि नामु मुखि नामु है नामे सबदि वीचारा ॥३॥

नामु सुणीऐ नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥ नामु सलाहे सदा सदा नामे महलु पाई ॥४॥

नामे ही घटि चानणा नामे सोभा पाई ॥ नामे ही सुखु ऊपजै नामे सरणाई ॥५॥

बिनु नावै कोइ न मंनीऐ मनमुखि पति गवाई ॥ जम पुरि बाधे मारीअहि बिरथा जनमु गवाई ॥६॥

नामै की सभ सेवा करै गुरमुखि नामु बुझाई ॥ नामहु ही नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥७॥

जिस नो देवै तिसु मिलै गुरमती नामु बुझाई ॥ नानक सभ किछु नावै कै वसि है पूरै भागि को पाई ॥८॥७॥२९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 426) आसा महला ३ ॥
दोहागणी महलु न पाइन्ही न जाणनि पिर का सुआउ ॥ फिका बोलहि ना निवहि दूजा भाउ सुआउ ॥१॥

इहु मनूआ किउ करि वसि आवै ॥ गुर परसादी ठाकीऐ गिआन मती घरि आवै ॥१॥ रहाउ ॥

सोहागणी आपि सवारीओनु लाइ प्रेम पिआरु ॥ सतिगुर कै भाणै चलदीआ नामे सहजि सीगारु ॥२॥

सदा रावहि पिरु आपणा सची सेज सुभाइ ॥ पिर कै प्रेमि मोहीआ मिलि प्रीतम सुखु पाइ ॥३॥

गिआन अपारु सीगारु है सोभावंती नारि ॥ सा सभराई सुंदरी पिर कै हेति पिआरि ॥४॥

सोहागणी विचि रंगु रखिओनु सचै अलखि अपारि ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा सचै भाइ पिआरि ॥५॥

सोहागणी सीगारु बणाइआ गुण का गलि हारु ॥ प्रेम पिरमलु तनि लावणा अंतरि रतनु वीचारु ॥६॥

भगति रते से ऊतमा जति पति सबदे होइ ॥ बिनु नावै सभ नीच जाति है बिसटा का कीड़ा होइ ॥७॥

हउ हउ करदी सभ फिरै बिनु सबदै हउ न जाइ ॥ नानक नामि रते तिन हउमै गई सचै रहे समाइ ॥८॥८॥३०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 426) आसा महला ३ ॥
सचे रते से निरमले सदा सची सोइ ॥ ऐथै घरि घरि जापदे आगै जुगि जुगि परगटु होइ ॥१॥

ए मन रूड़्हे रंगुले तूं सचा रंगु चड़ाइ ॥ रूड़ी बाणी जे रपै ना इहु रंगु लहै न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हम नीच मैले अति अभिमानी दूजै भाइ विकार ॥ गुरि पारसि मिलिऐ कंचनु होए निरमल जोति अपार ॥२॥

बिनु गुर कोइ न रंगीऐ गुरि मिलिऐ रंगु चड़ाउ ॥ गुर कै भै भाइ जो रते सिफती सचि समाउ ॥३॥

भै बिनु लागि न लगई ना मनु निरमलु होइ ॥ बिनु भै करम कमावणे झूठे ठाउ न कोइ ॥४॥

जिस नो आपे रंगे सु रपसी सतसंगति मिलाइ ॥ पूरे गुर ते सतसंगति ऊपजै सहजे सचि सुभाइ ॥५॥

बिनु संगती सभि ऐसे रहहि जैसे पसु ढोर ॥ जिन्हि कीते तिसै न जाणन्ही बिनु नावै सभि चोर ॥६॥

इकि गुण विहाझहि अउगण विकणहि गुर कै सहजि सुभाइ ॥ गुर सेवा ते नाउ पाइआ वुठा अंदरि आइ ॥७॥

सभना का दाता एकु है सिरि धंधै लाइ ॥ नानक नामे लाइ सवारिअनु सबदे लए मिलाइ ॥८॥९॥३१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 427) आसा महला ३ ॥
सभ नावै नो लोचदी जिसु क्रिपा करे सो पाए ॥ बिनु नावै सभु दुखु है सुखु तिसु जिसु मंनि वसाए ॥१॥

तूं बेअंतु दइआलु है तेरी सरणाई ॥ गुर पूरे ते पाईऐ नामे वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि बाहरि एकु है बहु बिधि स्रिसटि उपाई ॥ हुकमे कार कराइदा दूजा किसु कहीऐ भाई ॥२॥

बुझणा अबुझणा तुधु कीआ इह तेरी सिरि कार ॥ इकन्हा बखसिहि मेलि लैहि इकि दरगह मारि कढे कूड़िआर ॥३॥

इकि धुरि पवित पावन हहि तुधु नामे लाए ॥ गुर सेवा ते सुखु ऊपजै सचै सबदि बुझाए ॥४॥

इकि कुचल कुचील विखली पते नावहु आपि खुआए ॥ ना ओन सिधि न बुधि है न संजमी फिरहि उतवताए ॥५॥

नदरि करे जिसु आपणी तिस नो भावनी लाए ॥ सतु संतोखु इह संजमी मनु निरमलु सबदु सुणाए ॥६॥

लेखा पड़ि न पहूचीऐ कथि कहणै अंतु न पाइ ॥ गुर ते कीमति पाईऐ सचि सबदि सोझी पाइ ॥७॥

इहु मनु देही सोधि तूं गुर सबदि वीचारि ॥ नानक इसु देही विचि नामु निधानु है पाईऐ गुर कै हेति अपारि ॥८॥१०॥३२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 427) आसा महला ३ ॥
सचि रतीआ सोहागणी जिना गुर कै सबदि सीगारि ॥ घर ही सो पिरु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥१॥

अवगण गुणी बखसाइआ हरि सिउ लिव लाई ॥ हरि वरु पाइआ कामणी गुरि मेलि मिलाई ॥१॥ रहाउ ॥

इकि पिरु हदूरि न जाणन्ही दूजै भरमि भुलाइ ॥ किउ पाइन्हि डोहागणी दुखी रैणि विहाइ ॥२॥

जिन कै मनि सचु वसिआ सची कार कमाइ ॥ अनदिनु सेवहि सहज सिउ सचे माहि समाइ ॥३॥

दोहागणी भरमि भुलाईआ कूड़ु बोलि बिखु खाहि ॥ पिरु न जाणनि आपणा सुंञी सेज दुखु पाहि ॥४॥

सचा साहिबु एकु है मतु मन भरमि भुलाहि ॥ गुर पूछि सेवा करहि सचु निरमलु मंनि वसाहि ॥५॥

सोहागणी सदा पिरु पाइआ हउमै आपु गवाइ ॥ पिर सेती अनदिनु गहि रही सची सेज सुखु पाइ ॥६॥

मेरी मेरी करि गए पलै किछु न पाइ ॥ महलु नाही डोहागणी अंति गई पछुताइ ॥७॥

सो पिरु मेरा एकु है एकसु सिउ लिव लाइ ॥ नानक जे सुखु लोड़हि कामणी हरि का नामु मंनि वसाइ ॥८॥११॥३३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 428) आसा महला ३ ॥
अम्रितु जिन्हा चखाइओनु रसु आइआ सहजि सुभाइ ॥ सचा वेपरवाहु है तिस नो तिलु न तमाइ ॥१॥

अम्रितु सचा वरसदा गुरमुखा मुखि पाइ ॥ मनु सदा हरीआवला सहजे हरि गुण गाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुखि सदा दोहागणी दरि खड़ीआ बिललाहि ॥ जिन्हा पिर का सुआदु न आइओ जो धुरि लिखिआ सो कमाहि ॥२॥

गुरमुखि बीजे सचु जमै सचु नामु वापारु ॥ जो इतु लाहै लाइअनु भगती देइ भंडार ॥३॥

गुरमुखि सदा सोहागणी भै भगति सीगारि ॥ अनदिनु रावहि पिरु आपणा सचु रखहि उर धारि ॥४॥

जिन्हा पिरु राविआ आपणा तिन्हा विटहु बलि जाउ ॥ सदा पिर कै संगि रहहि विचहु आपु गवाइ ॥५॥

तनु मनु सीतलु मुख उजले पिर कै भाइ पिआरि ॥ सेज सुखाली पिरु रवै हउमै त्रिसना मारि ॥६॥

करि किरपा घरि आइआ गुर कै हेति अपारि ॥ वरु पाइआ सोहागणी केवल एकु मुरारि ॥७॥

सभे गुनह बखसाइ लइओनु मेले मेलणहारि ॥ नानक आखणु आखीऐ जे सुणि धरे पिआरु ॥८॥१२॥३४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 428) आसा महला ३ ॥
सतिगुर ते गुण ऊपजै जा प्रभु मेलै सोइ ॥ सहजे नामु धिआईऐ गिआनु परगटु होइ ॥१॥

ए मन मत जाणहि हरि दूरि है सदा वेखु हदूरि ॥ सद सुणदा सद वेखदा सबदि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि आपु पछाणिआ तिन्ही इक मनि धिआइआ ॥ सदा रवहि पिरु आपणा सचै नामि सुखु पाइआ ॥२॥

ए मन तेरा को नही करि वेखु सबदि वीचारु ॥ हरि सरणाई भजि पउ पाइहि मोख दुआरु ॥३॥

सबदि सुणीऐ सबदि बुझीऐ सचि रहै लिव लाइ ॥ सबदे हउमै मारीऐ सचै महलि सुखु पाइ ॥४॥

इसु जुग महि सोभा नाम की बिनु नावै सोभ न होइ ॥ इह माइआ की सोभा चारि दिहाड़े जादी बिलमु न होइ ॥५॥

जिनी नामु विसारिआ से मुए मरि जाहि ॥ हरि रस सादु न आइओ बिसटा माहि समाहि ॥६॥

इकि आपे बखसि मिलाइअनु अनदिनु नामे लाइ ॥ सचु कमावहि सचि रहहि सचे सचि समाहि ॥७॥

बिनु सबदै सुणीऐ न देखीऐ जगु बोला अंन्हा भरमाइ ॥ बिनु नावै दुखु पाइसी नामु मिलै तिसै रजाइ ॥८॥

जिन बाणी सिउ चितु लाइआ से जन निरमल परवाणु ॥ नानक नामु तिन्हा कदे न वीसरै से दरि सचे जाणु ॥९॥१३॥३५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 429) आसा महला ३ ॥
सबदौ ही भगत जापदे जिन्ह की बाणी सची होइ ॥ विचहु आपु गइआ नाउ मंनिआ सचि मिलावा होइ ॥१॥

हरि हरि नामु जन की पति होइ ॥ सफलु तिन्हा का जनमु है तिन्ह मानै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

हउमै मेरा जाति है अति क्रोधु अभिमानु ॥ सबदि मरै ता जाति जाइ जोती जोति मिलै भगवानु ॥२॥

पूरा सतिगुरु भेटिआ सफल जनमु हमारा ॥ नामु नवै निधि पाइआ भरे अखुट भंडारा ॥३॥

आवहि इसु रासी के वापारीए जिन्हा नामु पिआरा ॥ गुरमुखि होवै सो धनु पाए तिन्हा अंतरि सबदु वीचारा ॥४॥

भगती सार न जाणन्ही मनमुख अहंकारी ॥ धुरहु आपि खुआइअनु जूऐ बाजी हारी ॥५॥

बिनु पिआरै भगति न होवई ना सुखु होइ सरीरि ॥ प्रेम पदारथु पाईऐ गुर भगती मन धीरि ॥६॥

जिस नो भगति कराए सो करे गुर सबद वीचारि ॥ हिरदै एको नामु वसै हउमै दुबिधा मारि ॥७॥

भगता की जति पति एको नामु है आपे लए सवारि ॥ सदा सरणाई तिस की जिउ भावै तिउ कारजु सारि ॥८॥

भगति निराली अलाह दी जापै गुर वीचारि ॥ नानक नामु हिरदै वसै भै भगती नामि सवारि ॥९॥१४॥३६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 430) आसा महला ३ ॥
अन रस महि भोलाइआ बिनु नामै दुख पाइ ॥ सतिगुरु पुरखु न भेटिओ जि सची बूझ बुझाइ ॥१॥

ए मन मेरे बावले हरि रसु चखि सादु पाइ ॥ अन रसि लागा तूं फिरहि बिरथा जनमु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥

इसु जुग महि गुरमुख निरमले सचि नामि रहहि लिव लाइ ॥ विणु करमा किछु पाईऐ नही किआ करि कहिआ जाइ ॥२॥

आपु पछाणहि सबदि मरहि मनहु तजि विकार ॥ गुर सरणाई भजि पए बखसे बखसणहार ॥३॥

बिनु नावै सुखु न पाईऐ ना दुखु विचहु जाइ ॥ इहु जगु माइआ मोहि विआपिआ दूजै भरमि भुलाइ ॥४॥

दोहागणी पिर की सार न जाणही किआ करि करहि सीगारु ॥ अनदिनु सदा जलदीआ फिरहि सेजै रवै न भतारु ॥५॥

सोहागणी महलु पाइआ विचहु आपु गवाइ ॥ गुर सबदी सीगारीआ अपणे सहि लईआ मिलाइ ॥६॥

मरणा मनहु विसारिआ माइआ मोहु गुबारु ॥ मनमुख मरि मरि जमहि भी मरहि जम दरि होहि खुआरु ॥७॥

आपि मिलाइअनु से मिले गुर सबदि वीचारि ॥ नानक नामि समाणे मुख उजले तितु सचै दरबारि ॥८॥२२॥१५॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 430) आसा महला ५ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥१॥

इन्ह बिधि नगरु वुठा मेरे भाई ॥ दुरतु गइआ गुरि गिआनु द्रिड़ाई ॥१॥ रहाउ ॥

साच धरम की करि दीनी वारि ॥ फरहे मुहकम गुर गिआनु बीचारि ॥२॥

नामु खेती बीजहु भाई मीत ॥ सउदा करहु गुरु सेवहु नीत ॥३॥

सांति सहज सुख के सभि हाट ॥ साह वापारी एकै थाट ॥४॥

जेजीआ डंनु को लए न जगाति ॥ सतिगुरि करि दीनी धुर की छाप ॥५॥

वखरु नामु लदि खेप चलावहु ॥ लै लाहा गुरमुखि घरि आवहु ॥६॥

सतिगुरु साहु सिख वणजारे ॥ पूंजी नामु लेखा साचु सम्हारे ॥७॥

सो वसै इतु घरि जिसु गुरु पूरा सेव ॥ अबिचल नगरी नानक देव ॥८॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 431) आसा महला ५ बिरहड़े घरु ४ छंता की जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥१॥

जिसु सिमरत दुख बीसरहि पिआरे सो किउ तजणा जाइ ॥२॥

इहु तनु वेची संत पहि पिआरे प्रीतमु देइ मिलाइ ॥३॥

सुख सीगार बिखिआ के फीके तजि छोडे मेरी माइ ॥४॥

कामु क्रोधु लोभु तजि गए पिआरे सतिगुर चरनी पाइ ॥५॥

जो जन राते राम सिउ पिआरे अनत न काहू जाइ ॥६॥

हरि रसु जिन्ही चाखिआ पिआरे त्रिपति रहे आघाइ ॥७॥

अंचलु गहिआ साध का नानक भै सागरु पारि पराइ ॥८॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 431) जनम मरण दुखु कटीऐ पिआरे जब भेटै हरि राइ ॥१॥

सुंदरु सुघरु सुजाणु प्रभु मेरा जीवनु दरसु दिखाइ ॥२॥

जो जीअ तुझ ते बीछुरे पिआरे जनमि मरहि बिखु खाइ ॥३॥

जिसु तूं मेलहि सो मिलै पिआरे तिस कै लागउ पाइ ॥४॥

जो सुखु दरसनु पेखते पिआरे मुख ते कहणु न जाइ ॥५॥

साची प्रीति न तुटई पिआरे जुगु जुगु रही समाइ ॥६॥

जो तुधु भावै सो भला पिआरे तेरी अमरु रजाइ ॥७॥

नानक रंगि रते नाराइणै पिआरे माते सहजि सुभाइ ॥८॥२॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 432) सभ बिधि तुम ही जानते पिआरे किसु पहि कहउ सुनाइ ॥१॥

तूं दाता जीआ सभना का तेरा दिता पहिरहि खाइ ॥२॥

सुखु दुखु तेरी आगिआ पिआरे दूजी नाही जाइ ॥३॥

जो तूं करावहि सो करी पिआरे अवरु किछु करणु न जाइ ॥४॥

दिनु रैणि सभ सुहावणे पिआरे जितु जपीऐ हरि नाउ ॥५॥

साई कार कमावणी पिआरे धुरि मसतकि लेखु लिखाइ ॥६॥

एको आपि वरतदा पिआरे घटि घटि रहिआ समाइ ॥७॥

संसार कूप ते उधरि लै पिआरे नानक हरि सरणाइ ॥८॥३॥२२॥१५॥२॥४२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) रागु आसा महला १ पटी लिखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ससै सोइ स्रिसटि जिनि साजी सभना साहिबु एकु भइआ ॥ सेवत रहे चितु जिन्ह का लागा आइआ तिन्ह का सफलु भइआ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) मन काहे भूले मूड़ मना ॥ जब लेखा देवहि बीरा तउ पड़िआ ॥१॥ रहाउ ॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) ईवड़ी आदि पुरखु है दाता आपे सचा सोई ॥ एना अखरा महि जो गुरमुखि बूझै तिसु सिरि लेखु न होई ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) ऊड़ै उपमा ता की कीजै जा का अंतु न पाइआ ॥ सेवा करहि सेई फलु पावहि जिन्ही सचु कमाइआ ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) ङंङै ङिआनु बूझै जे कोई पड़िआ पंडितु सोई ॥ सरब जीआ महि एको जाणै ता हउमै कहै न कोई ॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) ककै केस पुंडर जब हूए विणु साबूणै उजलिआ ॥ जम राजे के हेरू आए माइआ कै संगलि बंधि लइआ ॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) खखै खुंदकारु साह आलमु करि खरीदि जिनि खरचु दीआ ॥ बंधनि जा कै सभु जगु बाधिआ अवरी का नही हुकमु पइआ ॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) गगै गोइ गाइ जिनि छोडी गली गोबिदु गरबि भइआ ॥ घड़ि भांडे जिनि आवी साजी चाड़ण वाहै तई कीआ ॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) घघै घाल सेवकु जे घालै सबदि गुरू कै लागि रहै ॥ बुरा भला जे सम करि जाणै इन बिधि साहिबु रमतु रहै ॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 432) चचै चारि वेद जिनि साजे चारे खाणी चारि जुगा ॥ जुगु जुगु जोगी खाणी भोगी पड़िआ पंडितु आपि थीआ ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) छछै छाइआ वरती सभ अंतरि तेरा कीआ भरमु होआ ॥ भरमु उपाइ भुलाईअनु आपे तेरा करमु होआ तिन्ह गुरू मिलिआ ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) जजै जानु मंगत जनु जाचै लख चउरासीह भीख भविआ ॥ एको लेवै एको देवै अवरु न दूजा मै सुणिआ ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) झझै झूरि मरहु किआ प्राणी जो किछु देणा सु दे रहिआ ॥ दे दे वेखै हुकमु चलाए जिउ जीआ का रिजकु पइआ ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) ञंञै नदरि करे जा देखा दूजा कोई नाही ॥ एको रवि रहिआ सभ थाई एकु वसिआ मन माही ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) टटै टंचु करहु किआ प्राणी घड़ी कि मुहति कि उठि चलणा ॥ जूऐ जनमु न हारहु अपणा भाजि पड़हु तुम हरि सरणा ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) ठठै ठाढि वरती तिन अंतरि हरि चरणी जिन्ह का चितु लागा ॥ चितु लागा सेई जन निसतरे तउ परसादी सुखु पाइआ ॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) डडै ड्मफु करहु किआ प्राणी जो किछु होआ सु सभु चलणा ॥ तिसै सरेवहु ता सुखु पावहु सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) ढढै ढाहि उसारै आपे जिउ तिसु भावै तिवै करे ॥ करि करि वेखै हुकमु चलाए तिसु निसतारे जा कउ नदरि करे ॥१७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) णाणै रवतु रहै घट अंतरि हरि गुण गावै सोई ॥ आपे आपि मिलाए करता पुनरपि जनमु न होई ॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) ततै तारू भवजलु होआ ता का अंतु न पाइआ ॥ ना तर ना तुलहा हम बूडसि तारि लेहि तारण राइआ ॥१९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) थथै थानि थानंतरि सोई जा का कीआ सभु होआ ॥ किआ भरमु किआ माइआ कहीऐ जो तिसु भावै सोई भला ॥२०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करमा आपणिआ ॥ जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना ॥२१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) धधै धारि कला जिनि छोडी हरि चीजी जिनि रंग कीआ ॥ तिस दा दीआ सभनी लीआ करमी करमी हुकमु पइआ ॥२२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) नंनै नाह भोग नित भोगै ना डीठा ना सम्हलिआ ॥ गली हउ सोहागणि भैणे कंतु न कबहूं मै मिलिआ ॥२३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) पपै पातिसाहु परमेसरु वेखण कउ परपंचु कीआ ॥ देखै बूझै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥२४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) फफै फाही सभु जगु फासा जम कै संगलि बंधि लइआ ॥ गुर परसादी से नर उबरे जि हरि सरणागति भजि पइआ ॥२५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 433) बबै बाजी खेलण लागा चउपड़ि कीते चारि जुगा ॥ जीअ जंत सभ सारी कीते पासा ढालणि आपि लगा ॥२६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) भभै भालहि से फलु पावहि गुर परसादी जिन्ह कउ भउ पइआ ॥ मनमुख फिरहि न चेतहि मूड़े लख चउरासीह फेरु पइआ ॥२७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) ममै मोहु मरणु मधुसूदनु मरणु भइआ तब चेतविआ ॥ काइआ भीतरि अवरो पड़िआ ममा अखरु वीसरिआ ॥२८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) ययै जनमु न होवी कद ही जे करि सचु पछाणै ॥ गुरमुखि आखै गुरमुखि बूझै गुरमुखि एको जाणै ॥२९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) रारै रवि रहिआ सभ अंतरि जेते कीए जंता ॥ जंत उपाइ धंधै सभ लाए करमु होआ तिन नामु लइआ ॥३०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) ललै लाइ धंधै जिनि छोडी मीठा माइआ मोहु कीआ ॥ खाणा पीणा सम करि सहणा भाणै ता कै हुकमु पइआ ॥३१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) ववै वासुदेउ परमेसरु वेखण कउ जिनि वेसु कीआ ॥ वेखै चाखै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥३२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) ड़ाड़ै राड़ि करहि किआ प्राणी तिसहि धिआवहु जि अमरु होआ ॥ तिसहि धिआवहु सचि समावहु ओसु विटहु कुरबाणु कीआ ॥३३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) हाहै होरु न कोई दाता जीअ उपाइ जिनि रिजकु दीआ ॥ हरि नामु धिआवहु हरि नामि समावहु अनदिनु लाहा हरि नामु लीआ ॥३४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 434) आइड़ै आपि करे जिनि छोडी जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥ करे कराए सभ किछु जाणै नानक साइर इव कहिआ ॥३५॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) रागु आसा महला ३ पटी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अयो अंङै सभु जगु आइआ काखै घंङै कालु भइआ ॥ रीरी लली पाप कमाणे पड़ि अवगण गुण वीसरिआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) मन ऐसा लेखा तूं की पड़िआ ॥ लेखा देणा तेरै सिरि रहिआ ॥१॥ रहाउ ॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) सिधंङाइऐ सिमरहि नाही नंनै ना तुधु नामु लइआ ॥ छछै छीजहि अहिनिसि मूड़े किउ छूटहि जमि पाकड़िआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) बबै बूझहि नाही मूड़े भरमि भुले तेरा जनमु गइआ ॥ अणहोदा नाउ धराइओ पाधा अवरा का भारु तुधु लइआ ॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) जजै जोति हिरि लई तेरी मूड़े अंति गइआ पछुतावहिगा ॥ एकु सबदु तूं चीनहि नाही फिरि फिरि जूनी आवहिगा ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 434) तुधु सिरि लिखिआ सो पड़ु पंडित अवरा नो न सिखालि बिखिआ ॥ पहिला फाहा पइआ पाधे पिछो दे गलि चाटड़िआ ॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) ससै संजमु गइओ मूड़े एकु दानु तुधु कुथाइ लइआ ॥ साई पुत्री जजमान की सा तेरी एतु धानि खाधै तेरा जनमु गइआ ॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) ममै मति हिरि लई तेरी मूड़े हउमै वडा रोगु पइआ ॥ अंतर आतमै ब्रहमु न चीन्हिआ माइआ का मुहताजु भइआ ॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) ककै कामि क्रोधि भरमिओहु मूड़े ममता लागे तुधु हरि विसरिआ ॥ पड़हि गुणहि तूं बहुतु पुकारहि विणु बूझे तूं डूबि मुआ ॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) ततै तामसि जलिओहु मूड़े थथै थान भरिसटु होआ ॥ घघै घरि घरि फिरहि तूं मूड़े ददै दानु न तुधु लइआ ॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) पपै पारि न पवही मूड़े परपंचि तूं पलचि रहिआ ॥ सचै आपि खुआइओहु मूड़े इहु सिरि तेरै लेखु पइआ ॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) भभै भवजलि डुबोहु मूड़े माइआ विचि गलतानु भइआ ॥ गुर परसादी एको जाणै एक घड़ी महि पारि पइआ ॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) ववै वारी आईआ मूड़े वासुदेउ तुधु वीसरिआ ॥ एह वेला न लहसहि मूड़े फिरि तूं जम कै वसि पइआ ॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) झझै कदे न झूरहि मूड़े सतिगुर का उपदेसु सुणि तूं विखा ॥ सतिगुर बाझहु गुरु नही कोई निगुरे का है नाउ बुरा ॥१३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) धधै धावत वरजि रखु मूड़े अंतरि तेरै निधानु पइआ ॥ गुरमुखि होवहि ता हरि रसु पीवहि जुगा जुगंतरि खाहि पइआ ॥१४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) गगै गोबिदु चिति करि मूड़े गली किनै न पाइआ ॥ गुर के चरन हिरदै वसाइ मूड़े पिछले गुनह सभ बखसि लइआ ॥१५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) हाहै हरि कथा बूझु तूं मूड़े ता सदा सुखु होई ॥ मनमुखि पड़हि तेता दुखु लागै विणु सतिगुर मुकति न होई ॥१६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) रारै रामु चिति करि मूड़े हिरदै जिन्ह कै रवि रहिआ ॥ गुर परसादी जिन्ही रामु पछाता निरगुण रामु तिन्ही बूझि लहिआ ॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 435) तेरा अंतु न जाई लखिआ अकथु न जाई हरि कथिआ ॥ नानक जिन्ह कउ सतिगुरु मिलिआ तिन्ह का लेखा निबड़िआ ॥१८॥१॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 435) रागु आसा महला १ छंत घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध जोबनि बालड़ीए मेरा पिरु रलीआला राम ॥ धन पिर नेहु घणा रसि प्रीति दइआला राम ॥ धन पिरहि मेला होइ सुआमी आपि प्रभु किरपा करे ॥ सेजा सुहावी संगि पिर कै सात सर अम्रित भरे ॥ करि दइआ मइआ दइआल साचे सबदि मिलि गुण गावओ ॥ नानका हरि वरु देखि बिगसी मुंध मनि ओमाहओ ॥१॥

मुंध सहजि सलोनड़ीए इक प्रेम बिनंती राम ॥ मै मनि तनि हरि भावै प्रभ संगमि राती राम ॥ प्रभ प्रेमि राती हरि बिनंती नामि हरि कै सुखि वसै ॥ तउ गुण पछाणहि ता प्रभु जाणहि गुणह वसि अवगण नसै ॥ तुधु बाझु इकु तिलु रहि न साका कहणि सुनणि न धीजए ॥ नानका प्रिउ प्रिउ करि पुकारे रसन रसि मनु भीजए ॥२॥

सखीहो सहेलड़ीहो मेरा पिरु वणजारा राम ॥ हरि नामो वणंजड़िआ रसि मोलि अपारा राम ॥ मोलि अमोलो सच घरि ढोलो प्रभ भावै ता मुंध भली ॥ इकि संगि हरि कै करहि रलीआ हउ पुकारी दरि खली ॥ करण कारण समरथ स्रीधर आपि कारजु सारए ॥ नानक नदरी धन सोहागणि सबदु अभ साधारए ॥३॥

हम घरि साचा सोहिलड़ा प्रभ आइअड़े मीता राम ॥ रावे रंगि रातड़िआ मनु लीअड़ा दीता राम ॥ आपणा मनु दीआ हरि वरु लीआ जिउ भावै तिउ रावए ॥ तनु मनु पिर आगै सबदि सभागै घरि अम्रित फलु पावए ॥ बुधि पाठि न पाईऐ बहु चतुराईऐ भाइ मिलै मनि भाणे ॥ नानक ठाकुर मीत हमारे हम नाही लोकाणे ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 436) आसा महला १ ॥
अनहदो अनहदु वाजै रुण झुणकारे राम ॥ मेरा मनो मेरा मनु राता लाल पिआरे राम ॥ अनदिनु राता मनु बैरागी सुंन मंडलि घरु पाइआ ॥ आदि पुरखु अपर्मपरु पिआरा सतिगुरि अलखु लखाइआ ॥ आसणि बैसणि थिरु नाराइणु तितु मनु राता वीचारे ॥ नानक नामि रते बैरागी अनहद रुण झुणकारे ॥१॥

तितु अगम तितु अगम पुरे कहु कितु बिधि जाईऐ राम ॥ सचु संजमो सारि गुणा गुर सबदु कमाईऐ राम ॥ सचु सबदु कमाईऐ निज घरि जाईऐ पाईऐ गुणी निधाना ॥ तितु साखा मूलु पतु नही डाली सिरि सभना परधाना ॥ जपु तपु करि करि संजम थाकी हठि निग्रहि नही पाईऐ ॥ नानक सहजि मिले जगजीवन सतिगुर बूझ बुझाईऐ ॥२॥

गुरु सागरो रतनागरु तितु रतन घणेरे राम ॥ करि मजनो सपत सरे मन निरमल मेरे राम ॥ निरमल जलि न्हाए जा प्रभ भाए पंच मिले वीचारे ॥ कामु करोधु कपटु बिखिआ तजि सचु नामु उरि धारे ॥ हउमै लोभ लहरि लब थाके पाए दीन दइआला ॥ नानक गुर समानि तीरथु नही कोई साचे गुर गोपाला ॥३॥

हउ बनु बनो देखि रही त्रिणु देखि सबाइआ राम ॥ त्रिभवणो तुझहि कीआ सभु जगतु सबाइआ राम ॥ तेरा सभु कीआ तूं थिरु थीआ तुधु समानि को नाही ॥ तूं दाता सभ जाचिक तेरे तुधु बिनु किसु सालाही ॥ अणमंगिआ दानु दीजै दाते तेरी भगति भरे भंडारा ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई नानकु कहै वीचारा ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 437) आसा महला १ ॥
मेरा मनो मेरा मनु राता राम पिआरे राम ॥ सचु साहिबो आदि पुरखु अपर्मपरो धारे राम ॥ अगम अगोचरु अपर अपारा पारब्रहमु परधानो ॥ आदि जुगादी है भी होसी अवरु झूठा सभु मानो ॥ करम धरम की सार न जाणै सुरति मुकति किउ पाईऐ ॥ नानक गुरमुखि सबदि पछाणै अहिनिसि नामु धिआईऐ ॥१॥

मेरा मनो मेरा मनु मानिआ नामु सखाई राम ॥ हउमै ममता माइआ संगि न जाई राम ॥ माता पित भाई सुत चतुराई संगि न स्मपै नारे ॥ साइर की पुत्री परहरि तिआगी चरण तलै वीचारे ॥ आदि पुरखि इकु चलतु दिखाइआ जह देखा तह सोई ॥ नानक हरि की भगति न छोडउ सहजे होइ सु होई ॥२॥

मेरा मनो मेरा मनु निरमलु साचु समाले राम ॥ अवगण मेटि चले गुण संगम नाले राम ॥ अवगण परहरि करणी सारी दरि सचै सचिआरो ॥ आवणु जावणु ठाकि रहाए गुरमुखि ततु वीचारो ॥ साजनु मीतु सुजाणु सखा तूं सचि मिलै वडिआई ॥ नानक नामु रतनु परगासिआ ऐसी गुरमति पाई ॥३॥

सचु अंजनो अंजनु सारि निरंजनि राता राम ॥ मनि तनि रवि रहिआ जगजीवनो दाता राम ॥ जगजीवनु दाता हरि मनि राता सहजि मिलै मेलाइआ ॥ साध सभा संता की संगति नदरि प्रभू सुखु पाइआ ॥ हरि की भगति रते बैरागी चूके मोह पिआसा ॥ नानक हउमै मारि पतीणे विरले दास उदासा ॥४॥३॥


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