पटी लिखी (महला 1) (35 अखरी), Patti Likhi (Mahalla 1) (35 Akhri) Path in Hindi Gurbani online


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रागु आसा महला १ पटी लिखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

ससै सोइ स्रिसटि जिनि साजी सभना साहिबु एकु भइआ ॥ सेवत रहे चितु जिन्ह का लागा आइआ तिन्ह का सफलु भइआ ॥१॥

मन काहे भूले मूड़ मना ॥ जब लेखा देवहि बीरा तउ पड़िआ ॥१॥ रहाउ ॥

ईवड़ी आदि पुरखु है दाता आपे सचा सोई ॥ एना अखरा महि जो गुरमुखि बूझै तिसु सिरि लेखु न होई ॥२॥

ऊड़ै उपमा ता की कीजै जा का अंतु न पाइआ ॥ सेवा करहि सेई फलु पावहि जिन्ही सचु कमाइआ ॥३॥

ङंङै ङिआनु बूझै जे कोई पड़िआ पंडितु सोई ॥ सरब जीआ महि एको जाणै ता हउमै कहै न कोई ॥४॥

ककै केस पुंडर जब हूए विणु साबूणै उजलिआ ॥ जम राजे के हेरू आए माइआ कै संगलि बंधि लइआ ॥५॥

खखै खुंदकारु साह आलमु करि खरीदि जिनि खरचु दीआ ॥ बंधनि जा कै सभु जगु बाधिआ अवरी का नही हुकमु पइआ ॥६॥

गगै गोइ गाइ जिनि छोडी गली गोबिदु गरबि भइआ ॥ घड़ि भांडे जिनि आवी साजी चाड़ण वाहै तई कीआ ॥७॥

घघै घाल सेवकु जे घालै सबदि गुरू कै लागि रहै ॥ बुरा भला जे सम करि जाणै इन बिधि साहिबु रमतु रहै ॥८॥

चचै चारि वेद जिनि साजे चारे खाणी चारि जुगा ॥ जुगु जुगु जोगी खाणी भोगी पड़िआ पंडितु आपि थीआ ॥९॥

छछै छाइआ वरती सभ अंतरि तेरा कीआ भरमु होआ ॥ भरमु उपाइ भुलाईअनु आपे तेरा करमु होआ तिन्ह गुरू मिलिआ ॥१०॥

जजै जानु मंगत जनु जाचै लख चउरासीह भीख भविआ ॥ एको लेवै एको देवै अवरु न दूजा मै सुणिआ ॥११॥

झझै झूरि मरहु किआ प्राणी जो किछु देणा सु दे रहिआ ॥ दे दे वेखै हुकमु चलाए जिउ जीआ का रिजकु पइआ ॥१२॥

ञंञै नदरि करे जा देखा दूजा कोई नाही ॥ एको रवि रहिआ सभ थाई एकु वसिआ मन माही ॥१३॥

टटै टंचु करहु किआ प्राणी घड़ी कि मुहति कि उठि चलणा ॥ जूऐ जनमु न हारहु अपणा भाजि पड़हु तुम हरि सरणा ॥१४॥

ठठै ठाढि वरती तिन अंतरि हरि चरणी जिन्ह का चितु लागा ॥ चितु लागा सेई जन निसतरे तउ परसादी सुखु पाइआ ॥१५॥

डडै ड्मफु करहु किआ प्राणी जो किछु होआ सु सभु चलणा ॥ तिसै सरेवहु ता सुखु पावहु सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥१६॥

ढढै ढाहि उसारै आपे जिउ तिसु भावै तिवै करे ॥ करि करि वेखै हुकमु चलाए तिसु निसतारे जा कउ नदरि करे ॥१७॥

णाणै रवतु रहै घट अंतरि हरि गुण गावै सोई ॥ आपे आपि मिलाए करता पुनरपि जनमु न होई ॥१८॥

ततै तारू भवजलु होआ ता का अंतु न पाइआ ॥ ना तर ना तुलहा हम बूडसि तारि लेहि तारण राइआ ॥१९॥

थथै थानि थानंतरि सोई जा का कीआ सभु होआ ॥ किआ भरमु किआ माइआ कहीऐ जो तिसु भावै सोई भला ॥२०॥

ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करमा आपणिआ ॥ जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना ॥२१॥

धधै धारि कला जिनि छोडी हरि चीजी जिनि रंग कीआ ॥ तिस दा दीआ सभनी लीआ करमी करमी हुकमु पइआ ॥२२॥

नंनै नाह भोग नित भोगै ना डीठा ना सम्हलिआ ॥ गली हउ सोहागणि भैणे कंतु न कबहूं मै मिलिआ ॥२३॥

पपै पातिसाहु परमेसरु वेखण कउ परपंचु कीआ ॥ देखै बूझै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥२४॥

फफै फाही सभु जगु फासा जम कै संगलि बंधि लइआ ॥ गुर परसादी से नर उबरे जि हरि सरणागति भजि पइआ ॥२५॥

बबै बाजी खेलण लागा चउपड़ि कीते चारि जुगा ॥ जीअ जंत सभ सारी कीते पासा ढालणि आपि लगा ॥२६॥

भभै भालहि से फलु पावहि गुर परसादी जिन्ह कउ भउ पइआ ॥ मनमुख फिरहि न चेतहि मूड़े लख चउरासीह फेरु पइआ ॥२७॥

ममै मोहु मरणु मधुसूदनु मरणु भइआ तब चेतविआ ॥ काइआ भीतरि अवरो पड़िआ ममा अखरु वीसरिआ ॥२८॥

ययै जनमु न होवी कद ही जे करि सचु पछाणै ॥ गुरमुखि आखै गुरमुखि बूझै गुरमुखि एको जाणै ॥२९॥

रारै रवि रहिआ सभ अंतरि जेते कीए जंता ॥ जंत उपाइ धंधै सभ लाए करमु होआ तिन नामु लइआ ॥३०॥

ललै लाइ धंधै जिनि छोडी मीठा माइआ मोहु कीआ ॥ खाणा पीणा सम करि सहणा भाणै ता कै हुकमु पइआ ॥३१॥

ववै वासुदेउ परमेसरु वेखण कउ जिनि वेसु कीआ ॥ वेखै चाखै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥३२॥

ड़ाड़ै राड़ि करहि किआ प्राणी तिसहि धिआवहु जि अमरु होआ ॥ तिसहि धिआवहु सचि समावहु ओसु विटहु कुरबाणु कीआ ॥३३॥

हाहै होरु न कोई दाता जीअ उपाइ जिनि रिजकु दीआ ॥ हरि नामु धिआवहु हरि नामि समावहु अनदिनु लाहा हरि नामु लीआ ॥३४॥

आइड़ै आपि करे जिनि छोडी जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥ करे कराए सभ किछु जाणै नानक साइर इव कहिआ ॥३५॥१॥


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