त्व प्रसादि कबित्त, Tav Prasad Kabit (Patshahi 10) Path in Hindi Gurbani online


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दसम ग्रंथ (पन्ना 11 से 12) त्व प्रसादि ॥ कबित्त ॥
कतहूँ सुचेत हुइ कै चेतना को चार कीओ कतहूँ अचिंत हुइ कै सोवत अचेत हो ॥ कतहूँ भिखारी हुइ कै माँगत फिरत भीख कहूँ महा दान हुइ कै माँगिओ धन देत हो ॥ कहूँ महाँ राजन को दीजत अनंत दान कहूँ महाँ राजन ते छीन छित लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥१॥११॥

कहूँ जच्छ गंध्रब उरग कहूँ बिदिआधर कहूँ भए किंनर पिसाच कहूँ प्रेत हो ॥ कहूँ हुइ कै हिंदूआ गाइत्री को गुपत जपिओ कहूँ हुइ कै तुरका पुकारे बाँग देत हो ॥ कहूँ कोक काब हुइ कै पुरान को पड़त मत कतहूँ कुरान को निदान जान लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥२॥१२॥

कहूँ देवतान के दिवान मै बिराजमान कहूँ दानवान को गुमान मत देत हो ॥ कहूँ इंद्र राजा को मिलत इंद्र पदवी सी कहूँ इंद्र पदवी छिपाइ छीन लेत हो ॥ कतहूँ बिचार अबिचार को बिचारत हो कहूँ निज नार पर नार के निकेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥३॥१३॥

कहूँ ससत्रधारी कहूँ बिदिआ के बिचारी कहूँ मारत अहारी कहूँ नार के निकेत हो ॥ कहूँ देवबानी कहूँ सारदा भवानी कहूँ मंगला मृड़ानी कहूँ सिआम कहूँ सेत हो ॥ कहूँ धरम धामी कहूँ सरब ठउर गामी कहूँ जती कहूँ कामी कहूँ देत कहूँ लेत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ ता सिउ बिप्रीत कहूँ तृगुन अतीत कहूँ सुरगुन समेत हो ॥४॥१४॥

कहूँ जटाधारी कहूँ कंठी धरे ब्रहमचारी कहूँ जोग साधी कहूँ साधना करत हो ॥ कहूँ कान फारे कहूँ डंडी हुइ पधारे कहूँ फूक फूक पावन कउ पृथी पै धरत हो ॥ कतहूँ सिपाही हुइ कै साधत सिलाहन कौ कहूँ छत्री हुइ कै अर मारत मरत हो ॥ कहूँ भूम भार कौ उतारत हो महाराज कहूँ भव भूतन की भावना भरत हो ॥५॥१५॥

कहूँ गीत नाद के निदान कौ बतावत हो कहूँ नृतकारी चित्रकारी के निधान हो ॥ कतहूँ पयूख हुइ कै पीवत पिवावत हो कतहूँ मयूख ऊख कहूँ मद पान हो ॥ कहूँ महा सूर हुइ कै मारत मवासन कौ कहूँ महादेव देवतान के समान हो ॥ कहूँ महादीन कहूँ द्रब के अधीन कहूँ बिदिआ मै प्रबीन कहूँ भूम कहूँ भान हो ॥६॥१६॥

कहूँ अकलंक कहूँ मारत मयंक कहूँ पूरन प्रजंक कहूँ सु्ुधता की सार हो ॥ कहूँ देव धरम कहूँ साधना के हरम कहूँ कुतसत कुकरम कहूँ धरम के प्रकार हो ॥ कहूँ पउन अहारी कहूँ बिदिआ के बीचारी कहूँ जोगी जती ब्रहमचारी नर कहूँ नार हो ॥ कहूँ छत्रधारी कहूँ छाला धरे छैल भारी कहूँ छकवारी कहूँ छल के प्रकार हो ॥७॥१७॥

कहूँ गीत के गवय्या कहूँ बेन के बजय्या कहूँ नृत के नचय्या कहूँ नर को अकार हो ॥ कहूँ बेद बानी कहूँ कोक की कहानी कहूँ राजा कहूँ रानी कहूँ नार के प्रकार हो ॥ कहूँ बेन के बजय्या कहूँ धेन के चरय्या कहूँ लाखन लवय्या कहूँ सुँदर कुमार हो ॥ सुधता की सान हो कि संतन के प्रान हो कि दाता महा दान हो कि नृदोखी निरंकार हो ॥८॥१८॥

निरजुर निरूप हो कि सुँदर सरूप हो कि भूपन के भूप हो कि दाता महा दान हो ॥ प्रान के बचय्या दूध पूत के दिवय्या रोग सोग के मिटय्या किधौ मानी महा मान हो ॥ बिदिआ के बिचार हो कि अद्वै अवतार हो कि सिद्धता की सूरति हो कि सुधता की सान हो ॥ जोबन के जाल हो कि काल हूँ के काल हो कि सत्रन के सूल हो कि मित्रन के प्रान हो ॥९॥१९॥

कहूँ ब्रहम बाद कहूँ बिदिआ को बिखाद कहूँ नाद को ननाद कहूँ पूरन भगत हो ॥ कहूँ बेद रीत कहूँ बिदिआ की प्रतीत कहूँ नीत अउ अनीत कहूँ जुआला सी जगत हो ॥ पूरन प्रताप कहूँ इकाती को जाप कहूँ ताप को अताप कहूँ जोग ते डिगत हो ॥ कहूँ बर देत कहूँ छल सिउ छिनाइ लेत सरब काल सरब ठउर एक से लगत हो ॥१०॥२०॥

दसम ग्रंथ (पन्ना 14 से 19) त्व प्रसादि ॥ कबित्तु ॥
खूक मलहारी गज गदाहा बिभूतधारी गिदूआ मसान बास करिओ ई करत हैं ॥ घुघू मटबासी लगे डोलत उदासी मृग तरवर सदीव मोन साधे ई मरत हैं ॥ बिंद के सधय्या ताहि हीज की बडय्या देत बंदरा सदीव पाइ नागे ई फिरत हैं ॥ अंगना अधीन काम क्रोध मै प्रबीन एक गिआन के बिहीन छीन कैसे कै तरत हैं ॥१॥७१॥

भूत बनचारी छित छउना सभै दूधाधारी पउन के अहारी सु भुजंग जानीअतु हैं ॥ तृण के भछय्या धन लोभ के तजय्या ते तो गऊअन के जय्या बृखभय्या मानीअतु हैं ॥ नभ के उडय्या ताहि पंछी की बडय्या देत बगुला बिड़ाल बृक धिआनी ठानीअतु हैं ॥ जेतो बडे गिआनी तिनो जानी पै बखानी नाहि ऐसे न प्रपंच मनि भूलि आनीअतु हैं ॥२॥७२॥

भूम के बसय्या ताहि भूचरी कै जय्या कहै नभ के उडय्या सो चिरय्या कै बखानीऐ ॥ फल के भछय्या ताहि बाँदरी के जय्या कहै आदिस फिरय्या ते तो भूत कै पछानीऐ ॥ जल के तरय्या को गंगेरी सी कहत जग आग के भछय्या सो चकोर सम मानीऐ ॥ सूरज सिवय्या ताहि कौल की बडाई देत चंद्रमा सिवय्या कौ कवी कै पहिचानीऐ ॥३॥७३॥

नाराइण कच्छ मच्छ तिंदूआ कहत सभ कउल नाभ कउल जिह ताल मैं रहतु हैं ॥ गोपी नाथ गूजर गुपाल सभै धेनचारी रिखीकेस नाम कै महंत लहीअतु हैं ॥ माधव भवर औ अटेरू को कन्हया नाम कंस के बधय्या जमदूत कहीअतु हैं ॥ मूड़्ह रूड़्ह पीटत न गूड़्हता को भेद पावै पूजत न ताहि जा के राखे रहीअतु हैं ॥४॥७४॥

बिस्वपाल जगत काल दीन दिआल बैरी साल सदा प्रतपाल जम जाल ते रहत हैं ॥ जोगी जटाधारी सती साचे बडे ब्रहमचारी धिआन काज भूख पिआस देह पै सहत हैं ॥ निउली करम जल होम पावक पवन होम अधो मुख एक पाइ ठाढे न बहत हैं ॥ मानव फनिंद देव दानव न पावै भेद बेद औ कतेब नेत नेत कै कहत हैं ॥५॥७५॥

नाचत फिरत मोर बादर करत घोर दामनी अनेक भाउ करिओ ई करत है ॥ चंद्रमा ते सीतल न सूरज के तपत तेज इंद्र सो न राजा भव भूम को भरत है ॥ सिव से तपसी आदि ब्रहमा से न बेदचारी सनत कुमार सी तपस्सिआ न अनत है ॥ गिआन के बिहीन काल फास के अधीन सदा जुग्गन की चउकरी फिराए ई फिरत है ॥६॥७६॥

एक सिव भए एक गए एक फेर भए रामचंद्र कृसन के अवतार भी अनेक हैं ॥ ब्रहमा अरु बिसन केते बेद औ पुरान केते सिंमृति समूहन कै हुइ हुइ बितए हैं ॥ मोनदी मदार केते असुनी कुमार केते अंसा अवतार केते काल बस भए हैं ॥ पीर औ पिकाँबर केते गने न परत एते भूम ही ते हुइ कै फेरि भूमि ही मिलए हैं ॥७॥७७॥

जोगी जती ब्रहमचारी बडे बडे छत्रधारी छत्र ही की छाइआ कई कोस लौ चलत हैं ॥ बडे बडे राजन के दाबति फिरति देस बडे बडे राजन के द्रप को दलतु हैं ॥ मान से महीप औ दिलीप कैसे छत्रधारी बडो अभिमान भुज दंड को करत हैं ॥ दारा से दिलीसर द्रुजोधन से मानधारी भोग भोग भूमि अंत भूमि मै मिलत हैं ॥८॥७८॥

सिजदे करे अनेक तोपची कपट भेस पोसती अनेक दा निवावत है सीस कौ ॥ कहा भइओ मल्ल जौ पै काढत अनेक डंड सो तौ न डंडौत असटाँग अथतीस कौ ॥ कहा भइओ रोगी जौ पै डारिओ रहिओ उरध मुख मन ते न मूँड निहराइओ आदि ईस कौ ॥ कामना अधीन सदा दामना प्रबीन एक भावना बिहीन कैसे पावै जगदीस कौ ॥९॥७९॥

सीस पटकत जा के कान मै खजूरा धसै मूँड छटकत मित्र पुत्र हूँ के सोक सौ ॥ आक को चरय्या फल फूल को भछय्या सदा बन कौ भ्रमय्या और दूसरो न बोक सौ ॥ कहा भयो भेड जउ घसत्त सीस बृछन्न सों माटी को भछय्या बोल पूछ लीजै जोक सौ ॥ कामना अधीन काम क्रोध मैं प्रबीन एक भावना बिहीन कैसे भेटै परलोक सौ ॥१०॥८०॥

नाचिओ ई करत मोर दादर करत सोर सदा घनघोर घन करिओ ई करत हैं ॥ एक पाइ ठाढे सदा बन मै रहत बृछ फूक फूक पाव भूम स्रावग धरत हैं ॥ पाहन अनेक जुग एक ठउर बासु करै काग अउर चील देस देस बिचरत हैं ॥ गिआन के बिहीन महा दान मै न हूजै लीन भावना यकीन दीन कैसे कै तरत हैं ॥११॥८१॥

जैसे एक स्वाँगी कहूँ जोगीआ बैरागी बनै कबहूँ सनिआस भेस बन कै दिखावई ॥ कहूँ पउनहारी कहूँ बैठे लाइ तारी कहूँ लोभ की खुमारी सौं अनेक गुन गावई ॥ कहूँ ब्रहमचारी कहूँ हाथ पै लगावै बारी कहूँ डंड धारी हुइ कै लोगन भ्रमावई ॥ कामना अधीन परिओ नाचत है नाचन सों गिआन के बिहीन कैसे ब्रहम लोक पावई ॥१२॥८२॥

पंच बार गीदर पुकारे परे सीतकाल कुँचर औ गदहा अनेकदा प्रकार हीं ॥ कहा भयो जो पै कलवत्र लीओ काँसी बीच चीर चीर चोरटा कुठारन सों मार ही ॥ कहा भयो फाँसी डारि बूडिओ जड़ गंग धारि डारि डारि फाँस ठग मारि मारि डार हीं ॥ डूबे नरक धार मूड़्ह गिआन के बिना बिचार भावना बिहीन कैसे गिआन को बिचार हीं ॥१३॥८३॥

ताप के सहे ते जो पै पाईऐ अताप नाथ तापना अनेक तन घाइल सहत हैं ॥ जाप के कीए ते जो पै पायत अजाप देव पूदना सदीव तुहीं तुहीं उचरत हैं ॥ नभ के उडे ते जो पै नाराइण पाईयत अनल अकास पंछी डोलबो करत हैं ॥ आग मै जरे ते गति राँड की परत कर पताल के बासी किउ भुजंग न तरत हैं ॥१४॥८४॥

कोऊ भइओ मुँडीआ संनिआसी कोऊ जोगी भइओ कोऊ ब्रहमचारी कोऊ जती अनुमानबो ॥ हिंदू तुरक कोऊ राफजी इमाम साफी मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो ॥ करता करीम सोई राजक रहीम ओई दूसरो न भेद कोई भूल भ्रम मानबो ॥ एक ही की सेव सभ ही को गुरदेव एक एक ही सरूप सबै एकै जोत जानबो ॥१५॥८५॥

देहरा मसीत सोई पूजा औ निवाज ओई मानस सबै एक पै अनेक को भ्रमाउ है ॥ देवता अदेव जच्छ गंध्रब तुरक हिंदू निआरे निआरे देसन के भेस को प्रभाउ है ॥ एकै नैन एकै कान एकै देह एकै बान खाक बाद आतस औ आब को रलाउ है ॥ अलह अभेख सोई पुरान औ कुरान ओई एक ही सरूप सभै एक ही बनाउ है ॥१६॥८६॥

जैसे एक आग ते कनूका कोट आग उठे निआरे निआरे हुइ कै फेरि आग मै मिलाहिंगे ॥ जैसे एक धूर ते अनेक धूर पूरत है धूर के कनूका फेर धूर ही समाहिंगे ॥ जैसे एक नद ते तरंग कोट उपजत हैं पान के तरंग सबै पान ही कहाहिंगे ॥ तैसे बिस्व रूप ते अभूत भूत प्रगट हुइ ताही ते उपज सबै ताही मै समाहिंगे ॥१७॥८७॥

केते कच्छ मच्छ केते उन कउ करत भच्छ केते अच्छ वच्छ हुइ सपच्छ उड जाहिंगे ॥ केते नभ बीच अच्छ पच्छ कउ करैंगे भच्छ केतक प्रत्तछ हुइ पचाइ खाइ जाहिंगे ॥ जल कहा थल कहा गगन के गउन कहा काल के बनाइ सबै काल ही चबाहिंगे ॥ तेज जिउ अतेज मै अतेज जैसे तेज लीन ताही ते उपज सबै ताही मै समाहिंगे ॥१८॥८८॥

कूकत फिरत केते रोवत मरत केते जल मैं डुबत केते आग मैं जरत हैं ॥ केते गंग बासी केते मदीना मका निवासी केतक उदासी के भ्रमाए ई फिरत हैं ॥ करवत सहत केते भूमि मै गडत केते सूआ पै चड़्हत केते दुख कउ भरत हैं ॥ गैन मैं उडत केते जल मैं रहत केते गिआन के बिहीन जक जारे ई मरत हैं ॥१९॥८९॥

सोध हारे देवता बिरोध हारे दानो बडे बोध हारे बोधक प्रबोध हारे जापसी ॥ घस हारे चंदन लगाइ हारे चोआ चारु पूज हारे पाहन चढाइ हारे लापसी ॥ गाह हारे गोरन मनाइ हारे मड़्ही मट्ट लीप हारे भीतन लगाइ हारे छापसी ॥ गाइ हारे गंध्रब बजाए हारे किंनर सभ पच हारे पंडत तपंत हारे तापसी ॥२०॥९०॥

दसम ग्रंथ (पन्ना 37 से 38) त्व प्रसादि ॥ कबित्त ॥
अत्र के चलय्या छित छत्र के धरय्या छत्र धारीओ के छलय्या महा सत्रन के साल हैं ॥ दान के दिवय्या महा मान के बढय्या अवसान के दिवय्या हैं कटय्या जम जाल हैं ॥ जुद्ध के जितय्या औ बिरु्ुध के मिटय्या महाँ बु्ुधि के दिवय्या महाँ मानहूँ के मान हैं ॥ गिआन हूँ के गिआता महाँ बुद्धिता के दाता देव काल हूँ के काल महा काल हूँ के काल हैं ॥१॥२५३॥

पूरबी न पार पावैं हिंगुला हिमालै धिआवैं गोर गरदेजी गुन गावैं तेरे नाम हैं ॥ जोगी जोग साधै पउन साधना कितेक बाधै आरब के आरबी अराधैं तेरे नाम हैं ॥ फरा के फिरंगी मानैं कंधारी कुरेसी जानैं पछम के पच्छमी पछानैं निज काम हैं ॥ मरहटा मघेले तेरी मन सों तपसिआ करै दृड़वै तिलंगी पहचाने धरम धाम हैं ॥२॥२५४॥

बंग के बंगाली फिरहंग के फिरंगावाली दिली के दिलवाली तेरी आगिआ मै चलत हैं ॥ रोह के रुहेले माघ देस के मघेले बीर बंगसी बुँदेले पाप पुँज को मलत हैं ॥ गोखा गुन गावै चीन मचीन के सीस न्यावै तिब्बती धिआइ दोख देह को दलत हैं ॥ जिनै तोहि धिआइओ तिनै पूरन प्रताप पाइओ सरब धन धाम फल फूल सों फलत हैं ॥३॥२५५॥

देव देवतान कौ सुरेस दानवान कौ महेस गंग धान कौ अभेस कहीअतु हैं ॥ रंग मै रंगीन राग रूप मैं प्रबीन और काहू पै न दीन साध अधीन कहीअतु हैं ॥ पाईऐ न पार तेज पुँज मैं अपार सरब बिदिआ के उदार हैं अपार कहीअतु हैं ॥ हाथी की पुकार पल पाछै पहुचत ताहि चीटी की चिंघार पहिले ही सुनीअतु हैं ॥४॥२५६॥

केते इंद्र दुआर केते ब्रहमा मुख चार केते कृसन अवतार केते राम कहीअतु हैं ॥ केते ससि रासी केते सूरज प्रकासी केते मुँडीआ उदासी जोग दुआर कहीअतु हैं ॥ केते महादीन केते बिआस से प्रबीन केते कुमेर कुलीन केते जछ कहीअतु हैं ॥ करत हैं बिचार पै न पूरन को पावै पार ताही ते अपार निराधार लहीअतु हैं ॥५॥२५७॥

पूरन अवतार निराधार है न पारावार पाईऐ न पार पै अपार कै बखानीऐ ॥ अद्वै अबिनासी परम पूरन प्रकासी महा रूप हूँ के रासी हैं अनासी कै कै मानीऐ ॥ जंत्र हूँ न जात जा की बाप हूँ न माइ ता की पूरन प्रभा की सु छटा कै अनुमानीऐ ॥ तेज हूँ को तंत्र हैं कि राजसी को जंत्र हैं कि मोहनी को मंत्र हैं निजंत्र कै कै जानीऐ ॥६॥२५८॥

तेज हूँ को तरु हैं कि राजसी को सरु हैं कि सु्ुधता को घरु हैं कि सिद्धता की सारु हैं ॥ कामना की खान हैं कि साधना की सान हैं बिरकतता की बान हैं कि बुद्धि को उदार हैं ॥ सुँदर सरूप हैं कि भूपन को भूप हैं कि रूप हूँ को रूप हैं कुमति को प्रहारु हैं ॥ दीनन को दाता हैं गनीमन को गारक हैं साधन को रच्छक है गुनन को पहारु हैं ॥७॥२५९॥

सिद्ध को सरूप हैं कि बुधि को बिभूति हैं कि क्रुध को अभूत हैं कि अच्छै अबिनासी हैं ॥ काम को कुनिंदा हैं कि खूबी को दिहंदा हैं गनीम गरिंदा हैं कि तेज को प्रकासी हैं ॥ काल हूँ को काल हैं कि सत्रन को साल हैं कि मित्रन को पोखत हैं कि बृधता को बासी हैं ॥ जोग हूँ को जंत्र हैं कि तेज हूँ को तंत्र हैं कि मोहनी को मंत्र हैं कि पूरन प्रकासी हैं ॥८॥२६०॥

रूप को निवास हैं कि बुद्धि को प्रकास हैं कि सिद्धता को बास हैं कि बुद्धि हूँ को घरु हैं ॥ देवन को देव हैं निरंजन अभेव हैं अदेवन को देव हैं कि सुद्धता को सरु हैं ॥ जान को बचय्या हैं इमान को दिवय्या हैं जम जाल को कट्टया हैं कि कामना को करु हैं ॥ तेज को प्रचंड हैं अखंडण को खंड हैं महीपन को मंड हैं कि इसत्री हैं न नरु हैं ॥९॥२६१॥

बिस्व को भरन हैं कि अपदा को हरन हैं कि सुख को करन हैं कि तेज को प्रकाश हैं ॥ पाईऐ न पार पारावार हूँ को पार जाँ को कीजत बिचार सुबिचार को निवास हैं ॥ हिंगुला हिमालै गावै हबसी हल्लबी धिआवै पूरबी न पार पावै आसा ते अनास हैं ॥ देवन को देव महादेव हूँ के देव हैं निरंजन अभेव नाथ अद्वै अबिनास हैं ॥१०॥२६२॥

अंजन बिहीन हैं निरंजन प्रबीन हैं कि सेवक अधीन है कटय्या जम जाल के ॥ देवन के देव महादेव हूँ के देवनाथ भूम के भुजय्या है मुहय्या महा बाल के ॥ राजन के राजा महा साज हूँ के साजा महा जोग हूँ के जोग हैं धरय्या द्रुम छाल के ॥ कामना के करु हैं कुबिद्धिता को हरु हैं कि सिद्धता के साथी हैं कि काल हैं कुचाल के ॥११॥२६३॥

छीर कैसी छीरावध छाछ कैसी छत्त्रानेर छपाकर कैसी छबि कालइंद्री के कूल कै ॥ हंसनी सी सीहारूम हीरा सी हुसैनाबाद गंगा कैसी धार चली सातो सिंध रूल कै ॥ पारा सी पलाऊगढ रूपा कैसी रामपुर सोरा सी सुरंगाबाद नीकै रही झूल कै ॥ चंपा सी चंदेरी कोट चाँदनी सी चाँदागड़्ह कीरति तिहारी रही मालती सी फूल कै ॥१२॥२६४॥

फटक सी कैलास कमाँऊगड़्ह काँसीपुर सीसा सी सुरंगाबादि नीकै सोहीअतु है ॥ हिमा सी हिमालैहर हार सी हल्लबा नेर हंस कैसी हाजीपुर देखे मोहीअतु है ॥ चंदन सी चंपावती चंद्रमा सी चंद्रागिर चाँदनी सी चाँदगड़्ह जौन जोहीअतु है ॥ गंगा सम गंगधार बकान सी बलिंदावाद कीरति तिहारी की उजीआरी सोहीअतु है ॥१३॥२६५॥

फरा सी फिरंगी फरासीस के दुरंगी मकरान के मृदंगी तेरे गीत गाईअतु है ॥ भखरी कंधारी गोर गखरी गरदेजा चारी पउन के अहारी तेरो नामु धिआईअतु है ॥ पूरब पलाऊं काम रूप औ कमाऊं सरब ठउर मै बिराजै जहाँ जहाँ जाईअतु है ॥ पूरन प्रतापी जंत्र मंत्र ते अतापी नाथ कीरति तिहारी को न पार पाईअतु है ॥१४॥२६६॥


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