Pt 3 - भक्त कबीर जी - सलोक दोहे बाणी शब्द, Part 3 - Bhagat Kabir ji - Slok Dohe Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग आसा -- SGGS 480) आसा ॥
हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राजसु मनि भावै ॥ अलह अवलि दीन को साहिबु जोरु नही फुरमावै ॥१॥

काजी बोलिआ बनि नही आवै ॥१॥ रहाउ ॥

रोजा धरै निवाज गुजारै कलमा भिसति न होई ॥ सतरि काबा घट ही भीतरि जे करि जानै कोई ॥२॥

निवाज सोई जो निआउ बिचारै कलमा अकलहि जानै ॥ पाचहु मुसि मुसला बिछावै तब तउ दीनु पछानै ॥३॥

खसमु पछानि तरस करि जीअ महि मारि मणी करि फीकी ॥ आपु जनाइ अवर कउ जानै तब होइ भिसत सरीकी ॥४॥

माटी एक भेख धरि नाना ता महि ब्रहमु पछाना ॥ कहै कबीरा भिसत छोडि करि दोजक सिउ मनु माना ॥५॥४॥१७॥

(राग आसा -- SGGS 480) आसा ॥
गगन नगरि इक बूंद न बरखै नादु कहा जु समाना ॥ पारब्रहम परमेसुर माधो परम हंसु ले सिधाना ॥१॥

बाबा बोलते ते कहा गए देही के संगि रहते ॥ सुरति माहि जो निरते करते कथा बारता कहते ॥१॥ रहाउ ॥

बजावनहारो कहा गइओ जिनि इहु मंदरु कीन्हा ॥ साखी सबदु सुरति नही उपजै खिंचि तेजु सभु लीन्हा ॥२॥

स्रवनन बिकल भए संगि तेरे इंद्री का बलु थाका ॥ चरन रहे कर ढरकि परे है मुखहु न निकसै बाता ॥३॥

थाके पंच दूत सभ तसकर आप आपणै भ्रमते ॥ थाका मनु कुंचर उरु थाका तेजु सूतु धरि रमते ॥४॥

मिरतक भए दसै बंद छूटे मित्र भाई सभ छोरे ॥ कहत कबीरा जो हरि धिआवै जीवत बंधन तोरे ॥५॥५॥१८॥

(राग आसा -- SGGS 480) आसा इकतुके ४ ॥
सरपनी ते ऊपरि नही बलीआ ॥ जिनि ब्रहमा बिसनु महादेउ छलीआ ॥१॥

मारु मारु स्रपनी निरमल जलि पैठी ॥ जिनि त्रिभवणु डसीअले गुर प्रसादि डीठी ॥१॥ रहाउ ॥

स्रपनी स्रपनी किआ कहहु भाई ॥ जिनि साचु पछानिआ तिनि स्रपनी खाई ॥२॥

स्रपनी ते आन छूछ नही अवरा ॥ स्रपनी जीती कहा करै जमरा ॥३॥

इह स्रपनी ता की कीती होई ॥ बलु अबलु किआ इस ते होई ॥४॥

इह बसती ता बसत सरीरा ॥ गुर प्रसादि सहजि तरे कबीरा ॥५॥६॥१९॥

(राग आसा -- SGGS 481) आसा ॥
कहा सुआन कउ सिम्रिति सुनाए ॥ कहा साकत पहि हरि गुन गाए ॥१॥

राम राम राम रमे रमि रहीऐ ॥ साकत सिउ भूलि नही कहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कऊआ कहा कपूर चराए ॥ कह बिसीअर कउ दूधु पीआए ॥२॥

सतसंगति मिलि बिबेक बुधि होई ॥ पारसु परसि लोहा कंचनु सोई ॥३॥

साकतु सुआनु सभु करे कराइआ ॥ जो धुरि लिखिआ सु करम कमाइआ ॥४॥

अम्रितु लै लै नीमु सिंचाई ॥ कहत कबीर उआ को सहजु न जाई ॥५॥७॥२०॥

(राग आसा -- SGGS 481) आसा ॥
लंका सा कोटु समुंद सी खाई ॥ तिह रावन घर खबरि न पाई ॥१॥

किआ मागउ किछु थिरु न रहाई ॥ देखत नैन चलिओ जगु जाई ॥१॥ रहाउ ॥

इकु लखु पूत सवा लखु नाती ॥ तिह रावन घर दीआ न बाती ॥२॥

चंदु सूरजु जा के तपत रसोई ॥ बैसंतरु जा के कपरे धोई ॥३॥

गुरमति रामै नामि बसाई ॥ असथिरु रहै न कतहूं जाई ॥४॥

कहत कबीर सुनहु रे लोई ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई ॥५॥८॥२१॥

(राग आसा -- SGGS 481) आसा ॥
पहिला पूतु पिछैरी माई ॥ गुरु लागो चेले की पाई ॥१॥

एकु अच्मभउ सुनहु तुम्ह भाई ॥ देखत सिंघु चरावत गाई ॥१॥ रहाउ ॥

जल की मछुली तरवरि बिआई ॥ देखत कुतरा लै गई बिलाई ॥२॥

तलै रे बैसा ऊपरि सूला ॥ तिस कै पेडि लगे फल फूला ॥३॥

घोरै चरि भैस चरावन जाई ॥ बाहरि बैलु गोनि घरि आई ॥४॥

कहत कबीर जु इस पद बूझै ॥ राम रमत तिसु सभु किछु सूझै ॥५॥९॥२२॥

बाईस चउपदे तथा पंचपदे

(राग आसा -- SGGS 481) आसा स्री कबीर जीउ के तिपदे ८ दुतुके ७ इकतुका १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिंदु ते जिनि पिंडु कीआ अगनि कुंड रहाइआ ॥ दस मास माता उदरि राखिआ बहुरि लागी माइआ ॥१॥

प्रानी काहे कउ लोभि लागे रतन जनमु खोइआ ॥ पूरब जनमि करम भूमि बीजु नाही बोइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बारिक ते बिरधि भइआ होना सो होइआ ॥ जा जमु आइ झोट पकरै तबहि काहे रोइआ ॥२॥

जीवनै की आस करहि जमु निहारै सासा ॥ बाजीगरी संसारु कबीरा चेति ढालि पासा ॥३॥१॥२३॥

(राग आसा -- SGGS 482) आसा ॥
तनु रैनी मनु पुन रपि करि हउ पाचउ तत बराती ॥ राम राइ सिउ भावरि लैहउ आतम तिह रंगि राती ॥१॥

गाउ गाउ री दुलहनी मंगलचारा ॥ मेरे ग्रिह आए राजा राम भतारा ॥१॥ रहाउ ॥

नाभि कमल महि बेदी रचि ले ब्रहम गिआन उचारा ॥ राम राइ सो दूलहु पाइओ अस बडभाग हमारा ॥२॥

सुरि नर मुनि जन कउतक आए कोटि तेतीस उजानां ॥ कहि कबीर मोहि बिआहि चले है पुरख एक भगवाना ॥३॥२॥२४॥

(राग आसा -- SGGS 482) आसा ॥
सासु की दुखी ससुर की पिआरी जेठ के नामि डरउ रे ॥ सखी सहेली ननद गहेली देवर कै बिरहि जरउ रे ॥१॥

मेरी मति बउरी मै रामु बिसारिओ किन बिधि रहनि रहउ रे ॥ सेजै रमतु नैन नही पेखउ इहु दुखु का सउ कहउ रे ॥१॥ रहाउ ॥

बापु सावका करै लराई माइआ सद मतवारी ॥ बडे भाई कै जब संगि होती तब हउ नाह पिआरी ॥२॥

कहत कबीर पंच को झगरा झगरत जनमु गवाइआ ॥ झूठी माइआ सभु जगु बाधिआ मै राम रमत सुखु पाइआ ॥३॥३॥२५॥

(राग आसा -- SGGS 482) आसा ॥
हम घरि सूतु तनहि नित ताना कंठि जनेऊ तुमारे ॥ तुम्ह तउ बेद पड़हु गाइत्री गोबिंदु रिदै हमारे ॥१॥

मेरी जिहबा बिसनु नैन नाराइन हिरदै बसहि गोबिंदा ॥ जम दुआर जब पूछसि बवरे तब किआ कहसि मुकंदा ॥१॥ रहाउ ॥

हम गोरू तुम गुआर गुसाई जनम जनम रखवारे ॥ कबहूं न पारि उतारि चराइहु कैसे खसम हमारे ॥२॥

तूं बाम्हनु मै कासीक जुलहा बूझहु मोर गिआना ॥ तुम्ह तउ जाचे भूपति राजे हरि सउ मोर धिआना ॥३॥४॥२६॥

(राग आसा -- SGGS 482) आसा ॥
जगि जीवनु ऐसा सुपने जैसा जीवनु सुपन समानं ॥ साचु करि हम गाठि दीनी छोडि परम निधानं ॥१॥

बाबा माइआ मोह हितु कीन्ह ॥ जिनि गिआनु रतनु हिरि लीन्ह ॥१॥ रहाउ ॥

नैन देखि पतंगु उरझै पसु न देखै आगि ॥ काल फास न मुगधु चेतै कनिक कामिनि लागि ॥२॥

करि बिचारु बिकार परहरि तरन तारन सोइ ॥ कहि कबीर जगजीवनु ऐसा दुतीअ नाही कोइ ॥३॥५॥२७॥

(राग आसा -- SGGS 482) आसा ॥
जउ मै रूप कीए बहुतेरे अब फुनि रूपु न होई ॥ तागा तंतु साजु सभु थाका राम नाम बसि होई ॥१॥

अब मोहि नाचनो न आवै ॥ मेरा मनु मंदरीआ न बजावै ॥१॥ रहाउ ॥

कामु क्रोधु माइआ लै जारी त्रिसना गागरि फूटी ॥ काम चोलना भइआ है पुराना गइआ भरमु सभु छूटी ॥२॥

सरब भूत एकै करि जानिआ चूके बाद बिबादा ॥ कहि कबीर मै पूरा पाइआ भए राम परसादा ॥३॥६॥२८॥

(राग आसा -- SGGS 483) आसा ॥
रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥ आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥

काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥ खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥

साचु कतेब बखानै अलहु नारि पुरखु नही कोई ॥ पढे गुने नाही कछु बउरे जउ दिल महि खबरि न होई ॥२॥

अलहु गैबु सगल घट भीतरि हिरदै लेहु बिचारी ॥ हिंदू तुरक दुहूं महि एकै कहै कबीर पुकारी ॥३॥७॥२९॥

(राग आसा -- SGGS 483) आसा ॥ तिपदा ॥ इकतुका ॥
कीओ सिंगारु मिलन के ताई ॥ हरि न मिले जगजीवन गुसाई ॥१॥

हरि मेरो पिरु हउ हरि की बहुरीआ ॥ राम बडे मै तनक लहुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

धन पिर एकै संगि बसेरा ॥ सेज एक पै मिलनु दुहेरा ॥२॥

धंनि सुहागनि जो पीअ भावै ॥ कहि कबीर फिरि जनमि न आवै ॥३॥८॥३०॥

(राग आसा -- SGGS 483) आसा स्री कबीर जीउ के दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हीरै हीरा बेधि पवन मनु सहजे रहिआ समाई ॥ सगल जोति इनि हीरै बेधी सतिगुर बचनी मै पाई ॥१॥

हरि की कथा अनाहद बानी ॥ हंसु हुइ हीरा लेइ पछानी ॥१॥ रहाउ ॥

कहि कबीर हीरा अस देखिओ जग मह रहा समाई ॥ गुपता हीरा प्रगट भइओ जब गुर गम दीआ दिखाई ॥२॥१॥३१॥

(राग आसा -- SGGS 483) आसा ॥
पहिली करूपि कुजाति कुलखनी साहुरै पेईऐ बुरी ॥ अब की सरूपि सुजानि सुलखनी सहजे उदरि धरी ॥१॥

भली सरी मुई मेरी पहिली बरी ॥ जुगु जुगु जीवउ मेरी अब की धरी ॥१॥ रहाउ ॥

कहु कबीर जब लहुरी आई बडी का सुहागु टरिओ ॥ लहुरी संगि भई अब मेरै जेठी अउरु धरिओ ॥२॥२॥३२॥

(राग आसा -- SGGS 484) आसा ॥
मेरी बहुरीआ को धनीआ नाउ ॥ ले राखिओ राम जनीआ नाउ ॥१॥

इन्ह मुंडीअन मेरा घरु धुंधरावा ॥ बिटवहि राम रमऊआ लावा ॥१॥ रहाउ ॥

कहतु कबीर सुनहु मेरी माई ॥ इन्ह मुंडीअन मेरी जाति गवाई ॥२॥३॥३३॥

(राग आसा -- SGGS 484) आसा ॥
रहु रहु री बहुरीआ घूंघटु जिनि काढै ॥ अंत की बार लहैगी न आढै ॥१॥ रहाउ ॥

घूंघटु काढि गई तेरी आगै ॥ उन की गैलि तोहि जिनि लागै ॥१॥

घूंघट काढे की इहै बडाई ॥ दिन दस पांच बहू भले आई ॥२॥

घूंघटु तेरो तउ परि साचै ॥ हरि गुन गाइ कूदहि अरु नाचै ॥३॥

कहत कबीर बहू तब जीतै ॥ हरि गुन गावत जनमु बितीतै ॥४॥१॥३४॥

(राग आसा -- SGGS 484) आसा ॥
करवतु भला न करवट तेरी ॥ लागु गले सुनु बिनती मेरी ॥१॥

हउ वारी मुखु फेरि पिआरे ॥ करवटु दे मो कउ काहे कउ मारे ॥१॥ रहाउ ॥

जउ तनु चीरहि अंगु न मोरउ ॥ पिंडु परै तउ प्रीति न तोरउ ॥२॥

हम तुम बीचु भइओ नही कोई ॥ तुमहि सु कंत नारि हम सोई ॥३॥

कहतु कबीरु सुनहु रे लोई ॥ अब तुमरी परतीति न होई ॥४॥२॥३५॥

(राग आसा -- SGGS 484) आसा ॥
कोरी को काहू मरमु न जानां ॥ सभु जगु आनि तनाइओ तानां ॥१॥ रहाउ ॥

जब तुम सुनि ले बेद पुरानां ॥ तब हम इतनकु पसरिओ तानां ॥१॥

धरनि अकास की करगह बनाई ॥ चंदु सूरजु दुइ साथ चलाई ॥२॥

पाई जोरि बात इक कीनी तह तांती मनु मानां ॥ जोलाहे घरु अपना चीन्हां घट ही रामु पछानां ॥३॥

कहतु कबीरु कारगह तोरी ॥ सूतै सूत मिलाए कोरी ॥४॥३॥३६॥

(राग आसा -- SGGS 484) आसा ॥
अंतरि मैलु जे तीरथ नावै तिसु बैकुंठ न जानां ॥ लोक पतीणे कछू न होवै नाही रामु अयाना ॥१॥

पूजहु रामु एकु ही देवा ॥ साचा नावणु गुर की सेवा ॥१॥ रहाउ ॥

जल कै मजनि जे गति होवै नित नित मेंडुक नावहि ॥ जैसे मेंडुक तैसे ओइ नर फिरि फिरि जोनी आवहि ॥२॥

मनहु कठोरु मरै बानारसि नरकु न बांचिआ जाई ॥ हरि का संतु मरै हाड़्मबै त सगली सैन तराई ॥३॥

दिनसु न रैनि बेदु नही सासत्र तहा बसै निरंकारा ॥ कहि कबीर नर तिसहि धिआवहु बावरिआ संसारा ॥४॥४॥३७॥

(राग गूजरी -- SGGS 509) सलोकु ॥
कबीर मुकति दुआरा संकुड़ा राई दसवै भाइ ॥ मनु तउ मैगलु होइ रहा निकसिआ किउ करि जाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥ मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥१॥

(राग गूजरी -- SGGS 524) रागु गूजरी भगता की बाणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्री कबीर जीउ का चउपदा घरु २ दूजा ॥
चारि पाव दुइ सिंग गुंग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥ ऊठत बैठत ठेगा परिहै तब कत मूड लुकईहै ॥१॥

हरि बिनु बैल बिराने हुईहै ॥ फाटे नाकन टूटे काधन कोदउ को भुसु खईहै ॥१॥ रहाउ ॥

सारो दिनु डोलत बन महीआ अजहु न पेट अघईहै ॥ जन भगतन को कहो न मानो कीओ अपनो पईहै ॥२॥

दुख सुख करत महा भ्रमि बूडो अनिक जोनि भरमईहै ॥ रतन जनमु खोइओ प्रभु बिसरिओ इहु अउसरु कत पईहै ॥३॥

भ्रमत फिरत तेलक के कपि जिउ गति बिनु रैनि बिहईहै ॥ कहत कबीर राम नाम बिनु मूंड धुने पछुतईहै ॥४॥१॥

(राग गूजरी -- SGGS 524) गूजरी घरु ३ ॥
मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥ ए बारिक कैसे जीवहि रघुराई ॥१॥

तनना बुनना सभु तजिओ है कबीर ॥ हरि का नामु लिखि लीओ सरीर ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु तागा बाहउ बेही ॥ तब लगु बिसरै रामु सनेही ॥२॥

ओछी मति मेरी जाति जुलाहा ॥ हरि का नामु लहिओ मै लाहा ॥३॥

कहत कबीर सुनहु मेरी माई ॥ हमरा इन का दाता एकु रघुराई ॥४॥२॥

(राग बिहागड़ा -- SGGS 555) सलोक ॥
कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥ ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥१॥

(राग सोरठि -- SGGS 654) रागु सोरठि बाणी भगत कबीर जी की घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥ ओइ ले जारे ओइ ले गाडे तेरी गति दुहू न पाई ॥१॥

मन रे संसारु अंध गहेरा ॥ चहु दिस पसरिओ है जम जेवरा ॥१॥ रहाउ ॥

कबित पड़े पड़ि कबिता मूए कपड़ केदारै जाई ॥ जटा धारि धारि जोगी मूए तेरी गति इनहि न पाई ॥२॥

दरबु संचि संचि राजे मूए गडि ले कंचन भारी ॥ बेद पड़े पड़ि पंडित मूए रूपु देखि देखि नारी ॥३॥

राम नाम बिनु सभै बिगूते देखहु निरखि सरीरा ॥ हरि के नाम बिनु किनि गति पाई कहि उपदेसु कबीरा ॥४॥१॥

(राग सोरठि -- SGGS 654) जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥ काची गागरि नीरु परतु है इआ तन की इहै बडाई ॥१॥

काहे भईआ फिरतौ फूलिआ फूलिआ ॥ जब दस मास उरध मुख रहता सो दिनु कैसे भूलिआ ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ मधु माखी तिउ सठोरि रसु जोरि जोरि धनु कीआ ॥ मरती बार लेहु लेहु करीऐ भूतु रहन किउ दीआ ॥२॥

देहुरी लउ बरी नारि संगि भई आगै सजन सुहेला ॥ मरघट लउ सभु लोगु कुट्मबु भइओ आगै हंसु अकेला ॥३॥

कहतु कबीर सुनहु रे प्रानी परे काल ग्रस कूआ ॥ झूठी माइआ आपु बंधाइआ जिउ नलनी भ्रमि सूआ ॥४॥२॥

(राग सोरठि -- SGGS 654) बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥ काल ग्रसत सभ लोग सिआने उठि पंडित पै चले निरासा ॥१॥

मन रे सरिओ न एकै काजा ॥ भजिओ न रघुपति राजा ॥१॥ रहाउ ॥

बन खंड जाइ जोगु तपु कीनो कंद मूलु चुनि खाइआ ॥ नादी बेदी सबदी मोनी जम के पटै लिखाइआ ॥२॥

भगति नारदी रिदै न आई काछि कूछि तनु दीना ॥ राग रागनी डि्मभ होइ बैठा उनि हरि पहि किआ लीना ॥३॥

परिओ कालु सभै जग ऊपर माहि लिखे भ्रम गिआनी ॥ कहु कबीर जन भए खालसे प्रेम भगति जिह जानी ॥४॥३॥

(राग सोरठि -- SGGS 655) घरु २ ॥
दुइ दुइ लोचन पेखा ॥ हउ हरि बिनु अउरु न देखा ॥ नैन रहे रंगु लाई ॥ अब बे गल कहनु न जाई ॥१॥

हमरा भरमु गइआ भउ भागा ॥ जब राम नाम चितु लागा ॥१॥ रहाउ ॥

बाजीगर डंक बजाई ॥ सभ खलक तमासे आई ॥ बाजीगर स्वांगु सकेला ॥ अपने रंग रवै अकेला ॥२॥

कथनी कहि भरमु न जाई ॥ सभ कथि कथि रही लुकाई ॥ जा कउ गुरमुखि आपि बुझाई ॥ ता के हिरदै रहिआ समाई ॥३॥

गुर किंचत किरपा कीनी ॥ सभु तनु मनु देह हरि लीनी ॥ कहि कबीर रंगि राता ॥ मिलिओ जगजीवन दाता ॥४॥४॥

(राग सोरठि -- SGGS 655) जा के निगम दूध के ठाटा ॥ समुंदु बिलोवन कउ माटा ॥ ता की होहु बिलोवनहारी ॥ किउ मेटै गो छाछि तुहारी ॥१॥

चेरी तू रामु न करसि भतारा ॥ जगजीवन प्रान अधारा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरे गलहि तउकु पग बेरी ॥ तू घर घर रमईऐ फेरी ॥ तू अजहु न चेतसि चेरी ॥ तू जमि बपुरी है हेरी ॥२॥

प्रभ करन करावनहारी ॥ किआ चेरी हाथ बिचारी ॥ सोई सोई जागी ॥ जितु लाई तितु लागी ॥३॥

चेरी तै सुमति कहां ते पाई ॥ जा ते भ्रम की लीक मिटाई ॥ सु रसु कबीरै जानिआ ॥ मेरो गुर प्रसादि मनु मानिआ ॥४॥५॥

(राग सोरठि -- SGGS 655) जिह बाझु न जीआ जाई ॥ जउ मिलै त घाल अघाई ॥ सद जीवनु भलो कहांही ॥ मूए बिनु जीवनु नाही ॥१॥

अब किआ कथीऐ गिआनु बीचारा ॥ निज निरखत गत बिउहारा ॥१॥ रहाउ ॥

घसि कुंकम चंदनु गारिआ ॥ बिनु नैनहु जगतु निहारिआ ॥ पूति पिता इकु जाइआ ॥ बिनु ठाहर नगरु बसाइआ ॥२॥

जाचक जन दाता पाइआ ॥ सो दीआ न जाई खाइआ ॥ छोडिआ जाइ न मूका ॥ अउरन पहि जाना चूका ॥३॥

जो जीवन मरना जानै ॥ सो पंच सैल सुख मानै ॥ कबीरै सो धनु पाइआ ॥ हरि भेटत आपु मिटाइआ ॥४॥६॥

(राग सोरठि -- SGGS 655) किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥ किआ बेद पुरानां सुनीऐ ॥ पड़े सुने किआ होई ॥ जउ सहज न मिलिओ सोई ॥१॥

हरि का नामु न जपसि गवारा ॥ किआ सोचहि बारं बारा ॥१॥ रहाउ ॥

अंधिआरे दीपकु चहीऐ ॥ इक बसतु अगोचर लहीऐ ॥ बसतु अगोचर पाई ॥ घटि दीपकु रहिआ समाई ॥२॥

कहि कबीर अब जानिआ ॥ जब जानिआ तउ मनु मानिआ ॥ मन माने लोगु न पतीजै ॥ न पतीजै तउ किआ कीजै ॥३॥७॥

(राग सोरठि -- SGGS 656) ह्रिदै कपटु मुख गिआनी ॥ झूठे कहा बिलोवसि पानी ॥१॥

कांइआ मांजसि कउन गुनां ॥ जउ घट भीतरि है मलनां ॥१॥ रहाउ ॥

लउकी अठसठि तीरथ न्हाई ॥ कउरापनु तऊ न जाई ॥२॥

कहि कबीर बीचारी ॥ भव सागरु तारि मुरारी ॥३॥८॥

(राग सोरठि -- SGGS 656) सोरठि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥ सुत दारा पहि आनि लुटावै ॥१॥

मन मेरे भूले कपटु न कीजै ॥ अंति निबेरा तेरे जीअ पहि लीजै ॥१॥ रहाउ ॥

छिनु छिनु तनु छीजै जरा जनावै ॥ तब तेरी ओक कोई पानीओ न पावै ॥२॥

कहतु कबीरु कोई नही तेरा ॥ हिरदै रामु की न जपहि सवेरा ॥३॥९॥

(राग सोरठि -- SGGS 656) संतहु मन पवनै सुखु बनिआ ॥
किछु जोगु परापति गनिआ ॥ रहाउ ॥ गुरि दिखलाई मोरी ॥ जितु मिरग पड़त है चोरी ॥ मूंदि लीए दरवाजे ॥ बाजीअले अनहद बाजे ॥१॥

कु्मभ कमलु जलि भरिआ ॥ जलु मेटिआ ऊभा करिआ ॥ कहु कबीर जन जानिआ ॥ जउ जानिआ तउ मनु मानिआ ॥२॥१०॥

(राग सोरठि -- SGGS 656) रागु सोरठि ॥
भूखे भगति न कीजै ॥ यह माला अपनी लीजै ॥ हउ मांगउ संतन रेना ॥ मै नाही किसी का देना ॥१॥

माधो कैसी बनै तुम संगे ॥ आपि न देहु त लेवउ मंगे ॥ रहाउ ॥ दुइ सेर मांगउ चूना ॥ पाउ घीउ संगि लूना ॥ अध सेरु मांगउ दाले ॥ मो कउ दोनउ वखत जिवाले ॥२॥

खाट मांगउ चउपाई ॥ सिरहाना अवर तुलाई ॥ ऊपर कउ मांगउ खींधा ॥ तेरी भगति करै जनु थींधा ॥३॥

मै नाही कीता लबो ॥ इकु नाउ तेरा मै फबो ॥ कहि कबीर मनु मानिआ ॥ मनु मानिआ तउ हरि जानिआ ॥४॥११॥

(राग धनासरी -- SGGS 691) रागु धनासरी बाणी भगत कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सनक सनंद महेस समानां ॥ सेखनागि तेरो मरमु न जानां ॥१॥

संतसंगति रामु रिदै बसाई ॥१॥ रहाउ ॥

हनूमान सरि गरुड़ समानां ॥ सुरपति नरपति नही गुन जानां ॥२॥

चारि बेद अरु सिम्रिति पुरानां ॥ कमलापति कवला नही जानां ॥३॥

कहि कबीर सो भरमै नाही ॥ पग लगि राम रहै सरनांही ॥४॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 692) दिन ते पहर पहर ते घरीआं आव घटै तनु छीजै ॥ कालु अहेरी फिरै बधिक जिउ कहहु कवन बिधि कीजै ॥१॥

सो दिनु आवन लागा ॥ मात पिता भाई सुत बनिता कहहु कोऊ है का का ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु जोति काइआ महि बरतै आपा पसू न बूझै ॥ लालच करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥२॥

कहत कबीर सुनहु रे प्रानी छोडहु मन के भरमा ॥ केवल नामु जपहु रे प्रानी परहु एक की सरनां ॥३॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 692) जो जनु भाउ भगति कछु जानै ता कउ अचरजु काहो ॥ जिउ जलु जल महि पैसि न निकसै तिउ ढुरि मिलिओ जुलाहो ॥१॥

हरि के लोगा मै तउ मति का भोरा ॥ जउ तनु कासी तजहि कबीरा रमईऐ कहा निहोरा ॥१॥ रहाउ ॥

कहतु कबीरु सुनहु रे लोई भरमि न भूलहु कोई ॥ किआ कासी किआ ऊखरु मगहरु रामु रिदै जउ होई ॥२॥३॥

(राग धनासरी -- SGGS 692) इंद्र लोक सिव लोकहि जैबो ॥ ओछे तप करि बाहुरि ऐबो ॥१॥

किआ मांगउ किछु थिरु नाही ॥ राम नाम रखु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

सोभा राज बिभै बडिआई ॥ अंति न काहू संग सहाई ॥२॥

पुत्र कलत्र लछमी माइआ ॥ इन ते कहु कवनै सुखु पाइआ ॥३॥

कहत कबीर अवर नही कामा ॥ हमरै मन धन राम को नामा ॥४॥४॥

(राग धनासरी -- SGGS 692) राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥ राम नाम सिमरन बिनु बूडते अधिकाई ॥१॥ रहाउ ॥

बनिता सुत देह ग्रेह स्मपति सुखदाई ॥ इन्ह मै कछु नाहि तेरो काल अवध आई ॥१॥

अजामल गज गनिका पतित करम कीने ॥ तेऊ उतरि पारि परे राम नाम लीने ॥२॥

सूकर कूकर जोनि भ्रमे तऊ लाज न आई ॥ राम नाम छाडि अम्रित काहे बिखु खाई ॥३॥

तजि भरम करम बिधि निखेध राम नामु लेही ॥ गुर प्रसादि जन कबीर रामु करि सनेही ॥४॥५॥

(राग तिलंग -- SGGS 727) तिलंग बाणी भगता की कबीर जी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥ टुकु दमु करारी जउ करहु हाजिर हजूरि खुदाइ ॥१॥

बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरु परेसानी माहि ॥ इह जु दुनीआ सिहरु मेला दसतगीरी नाहि ॥१॥ रहाउ ॥

दरोगु पड़ि पड़ि खुसी होइ बेखबर बादु बकाहि ॥ हकु सचु खालकु खलक मिआने सिआम मूरति नाहि ॥२॥

असमान म्यिाने लहंग दरीआ गुसल करदन बूद ॥ करि फकरु दाइम लाइ चसमे जह तहा मउजूदु ॥३॥

अलाह पाकं पाक है सक करउ जे दूसर होइ ॥ कबीर करमु करीम का उहु करै जानै सोइ ॥४॥१॥

(राग सूही -- SGGS 792) रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥ राम को नामु न कबहू लीना ॥१॥

राम न जपहु कवन मति लागे ॥ मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥१॥ रहाउ ॥

दुख सुख करि कै कुट्मबु जीवाइआ ॥ मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥२॥

कंठ गहन तब करन पुकारा ॥ कहि कबीर आगे ते न सम्हारा ॥३॥१॥

(राग सूही -- SGGS 792) सूही कबीर जी ॥
थरहर क्मपै बाला जीउ ॥ ना जानउ किआ करसी पीउ ॥१॥

रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥ भवर गए बग बैठे आइ ॥१॥ रहाउ ॥

काचै करवै रहै न पानी ॥ हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥२॥

कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥ किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥३॥

काग उडावत भुजा पिरानी ॥ कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥४॥२॥

(राग सूही -- SGGS 792) सूही कबीर जीउ ॥
अमलु सिरानो लेखा देना ॥ आए कठिन दूत जम लेना ॥ किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥ चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥१॥

चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥ हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥ लेउ निबेरि आजु की राती ॥ किछु भी खरचु तुम्हारा सारउ ॥ सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥२॥

साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥ ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥ जनमु पदारथु जीति अमोले ॥३॥

जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥ मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥ कहु कबीर तेई नर भूले ॥ खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥४॥३॥

(राग सूही ललित -- SGGS 793) सूही कबीर जीउ ललित ॥
थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥ जरा हाक दी सभ मति थाकी एक न थाकसि माइआ ॥१॥

बावरे तै गिआन बीचारु न पाइआ ॥ बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

तब लगु प्रानी तिसै सरेवहु जब लगु घट महि सासा ॥ जे घटु जाइ त भाउ न जासी हरि के चरन निवासा ॥२॥

जिस कउ सबदु बसावै अंतरि चूकै तिसहि पिआसा ॥ हुकमै बूझै चउपड़ि खेलै मनु जिणि ढाले पासा ॥३॥

जो जन जानि भजहि अबिगत कउ तिन का कछू न नासा ॥ कहु कबीर ते जन कबहु न हारहि ढालि जु जानहि पासा ॥४॥४॥

(राग सूही ललित -- SGGS 793) सूही ललित कबीर जीउ ॥
एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥ जिमी नाही मै किसी की बोई ऐसा देनु दुखाला ॥१॥

हरि के लोगा मो कउ नीति डसै पटवारी ॥ ऊपरि भुजा करि मै गुर पहि पुकारिआ तिनि हउ लीआ उबारी ॥१॥ रहाउ ॥

नउ डाडी दस मुंसफ धावहि रईअति बसन न देही ॥ डोरी पूरी मापहि नाही बहु बिसटाला लेही ॥२॥

बहतरि घर इकु पुरखु समाइआ उनि दीआ नामु लिखाई ॥ धरम राइ का दफतरु सोधिआ बाकी रिजम न काई ॥३॥

संता कउ मति कोई निंदहु संत रामु है एको ॥ कहु कबीर मै सो गुरु पाइआ जा का नाउ बिबेको ॥४॥५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 855) बिलावलु बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ की
ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥ सूधे सूधे रेगि चलहु तुम नतर कुधका दिवईहै रे ॥१॥ रहाउ ॥

बारे बूढे तरुने भईआ सभहू जमु लै जईहै रे ॥ मानसु बपुरा मूसा कीनो मीचु बिलईआ खईहै रे ॥१॥

धनवंता अरु निरधन मनई ता की कछू न कानी रे ॥ राजा परजा सम करि मारै ऐसो कालु बडानी रे ॥२॥

हरि के सेवक जो हरि भाए तिन्ह की कथा निरारी रे ॥ आवहि न जाहि न कबहू मरते पारब्रहम संगारी रे ॥३॥

पुत्र कलत्र लछिमी माइआ इहै तजहु जीअ जानी रे ॥ कहत कबीरु सुनहु रे संतहु मिलिहै सारिगपानी रे ॥४॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 855) बिलावलु ॥
बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥ हरि गुन कथत सुनत बउरानो ॥१॥

मेरे बाबा मै बउरा सभ खलक सैआनी मै बउरा ॥ मै बिगरिओ बिगरै मति अउरा ॥१॥ रहाउ ॥

आपि न बउरा राम कीओ बउरा ॥ सतिगुरु जारि गइओ भ्रमु मोरा ॥२॥

मै बिगरे अपनी मति खोई ॥ मेरे भरमि भूलउ मति कोई ॥३॥

सो बउरा जो आपु न पछानै ॥ आपु पछानै त एकै जानै ॥४॥

अबहि न माता सु कबहु न माता ॥ कहि कबीर रामै रंगि राता ॥५॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 855) बिलावलु ॥
ग्रिहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥ अजहु बिकार न छोडई पापी मनु मंदा ॥१॥

किउ छूटउ कैसे तरउ भवजल निधि भारी ॥ राखु राखु मेरे बीठुला जनु सरनि तुम्हारी ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै बिखै की बासना तजीअ नह जाई ॥ अनिक जतन करि राखीऐ फिरि फिरि लपटाई ॥२॥

जरा जीवन जोबनु गइआ किछु कीआ न नीका ॥ इहु जीअरा निरमोलको कउडी लगि मीका ॥३॥

कहु कबीर मेरे माधवा तू सरब बिआपी ॥ तुम समसरि नाही दइआलु मोहि समसरि पापी ॥४॥३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 856) बिलावलु ॥
नित उठि कोरी गागरि आनै लीपत जीउ गइओ ॥ ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रसि लपटिओ ॥१॥

हमारे कुल कउने रामु कहिओ ॥ जब की माला लई निपूते तब ते सुखु न भइओ ॥१॥ रहाउ ॥

सुनहु जिठानी सुनहु दिरानी अचरजु एकु भइओ ॥ सात सूत इनि मुडींए खोए इहु मुडीआ किउ न मुइओ ॥२॥

सरब सुखा का एकु हरि सुआमी सो गुरि नामु दइओ ॥ संत प्रहलाद की पैज जिनि राखी हरनाखसु नख बिदरिओ ॥३॥

घर के देव पितर की छोडी गुर को सबदु लइओ ॥ कहत कबीरु सगल पाप खंडनु संतह लै उधरिओ ॥४॥४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 856) बिलावलु ॥
कोऊ हरि समानि नही राजा ॥ ए भूपति सभ दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरो जनु होइ सोइ कत डोलै तीनि भवन पर छाजा ॥ हाथु पसारि सकै को जन कउ बोलि सकै न अंदाजा ॥१॥

चेति अचेत मूड़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा ॥ कहि कबीर संसा भ्रमु चूको ध्रू प्रहिलाद निवाजा ॥२॥५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 856) बिलावलु ॥
राखि लेहु हम ते बिगरी ॥ सीलु धरमु जपु भगति न कीनी हउ अभिमान टेढ पगरी ॥१॥ रहाउ ॥

अमर जानि संची इह काइआ इह मिथिआ काची गगरी ॥ जिनहि निवाजि साजि हम कीए तिसहि बिसारि अवर लगरी ॥१॥

संधिक तोहि साध नही कहीअउ सरनि परे तुमरी पगरी ॥ कहि कबीर इह बिनती सुनीअहु मत घालहु जम की खबरी ॥२॥६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 856) बिलावलु ॥
दरमादे ठाढे दरबारि ॥ तुझ बिनु सुरति करै को मेरी दरसनु दीजै खोल्हि किवार ॥१॥ रहाउ ॥

तुम धन धनी उदार तिआगी स्रवनन्ह सुनीअतु सुजसु तुम्हार ॥ मागउ काहि रंक सभ देखउ तुम्ह ही ते मेरो निसतारु ॥१॥

जैदेउ नामा बिप सुदामा तिन कउ क्रिपा भई है अपार ॥ कहि कबीर तुम सम्रथ दाते चारि पदारथ देत न बार ॥२॥७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 856) बिलावलु ॥
डंडा मुंद्रा खिंथा आधारी ॥ भ्रम कै भाइ भवै भेखधारी ॥१॥

आसनु पवन दूरि करि बवरे ॥ छोडि कपटु नित हरि भजु बवरे ॥१॥ रहाउ ॥

जिह तू जाचहि सो त्रिभवन भोगी ॥ कहि कबीर केसौ जगि जोगी ॥२॥८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 857) बिलावलु ॥
इन्हि माइआ जगदीस गुसाई तुम्हरे चरन बिसारे ॥ किंचत प्रीति न उपजै जन कउ जन कहा करहि बेचारे ॥१॥ रहाउ ॥

ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु ध्रिगु इह माइआ ध्रिगु ध्रिगु मति बुधि फंनी ॥ इस माइआ कउ द्रिड़ु करि राखहु बांधे आप बचंनी ॥१॥

किआ खेती किआ लेवा देई परपंच झूठु गुमाना ॥ कहि कबीर ते अंति बिगूते आइआ कालु निदाना ॥२॥९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 857) बिलावलु ॥
सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥ परम जोति पुरखोतमो जा कै रेख न रूप ॥१॥

रे मन हरि भजु भ्रमु तजहु जगजीवन राम ॥१॥ रहाउ ॥

आवत कछू न दीसई नह दीसै जात ॥ जह उपजै बिनसै तही जैसे पुरिवन पात ॥२॥

मिथिआ करि माइआ तजी सुख सहज बीचारि ॥ कहि कबीर सेवा करहु मन मंझि मुरारि ॥३॥१०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 857) बिलावलु ॥
जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥ जीवत सुंनि समानिआ गुर साखी जागी ॥१॥ रहाउ ॥

कासी ते धुनि ऊपजै धुनि कासी जाई ॥ कासी फूटी पंडिता धुनि कहां समाई ॥१॥

त्रिकुटी संधि मै पेखिआ घट हू घट जागी ॥ ऐसी बुधि समाचरी घट माहि तिआगी ॥२॥

आपु आप ते जानिआ तेज तेजु समाना ॥ कहु कबीर अब जानिआ गोबिद मनु माना ॥३॥११॥

(राग बिलावलु -- SGGS 857) बिलावलु ॥
चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥ मानौ सभ सुख नउ निधि ता कै सहजि सहजि जसु बोलै देव ॥ रहाउ ॥ तब इह मति जउ सभ महि पेखै कुटिल गांठि जब खोलै देव ॥ बारं बार माइआ ते अटकै लै नरजा मनु तोलै देव ॥१॥

जह उहु जाइ तही सुखु पावै माइआ तासु न झोलै देव ॥ कहि कबीर मेरा मनु मानिआ राम प्रीति कीओ लै देव ॥२॥१२॥


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