गुरू तेग बहादुर जी - सलोक बाणी शब्द, Guru Teg Bahadur ji (Mahalla 9) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी -- SGGS 219) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी महला ९ ॥
साधो मन का मानु तिआगउ ॥ कामु क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहिनिसि भागउ ॥१॥ रहाउ ॥

सुखु दुखु दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना ॥ हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना ॥१॥

उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना ॥ जन नानक इहु खेलु कठनु है किनहूं गुरमुखि जाना ॥२॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो रचना राम बनाई ॥ इकि बिनसै इक असथिरु मानै अचरजु लखिओ न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध मोह बसि प्रानी हरि मूरति बिसराई ॥ झूठा तनु साचा करि मानिओ जिउ सुपना रैनाई ॥१॥

जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाई ॥ जन नानक जगु जानिओ मिथिआ रहिओ राम सरनाई ॥२॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥ अहिनिसि मगनु रहै माइआ मै कहु कैसे गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥

पूत मीत माइआ ममता सिउ इह बिधि आपु बंधावै ॥ म्रिग त्रिसना जिउ झूठो इहु जग देखि तासि उठि धावै ॥१॥

भुगति मुकति का कारनु सुआमी मूड़ ताहि बिसरावै ॥ जन नानक कोटन मै कोऊ भजनु राम को पावै ॥२॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥ चंचल त्रिसना संगि बसतु है या ते थिरु न रहाई ॥१॥ रहाउ ॥

कठन करोध घट ही के भीतरि जिह सुधि सभ बिसराई ॥ रतनु गिआनु सभ को हिरि लीना ता सिउ कछु न बसाई ॥१॥

जोगी जतन करत सभि हारे गुनी रहे गुन गाई ॥ जन नानक हरि भए दइआला तउ सभ बिधि बनि आई ॥२॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥ मानस जनमु अमोलकु पाइओ बिरथा काहि गवावउ ॥१॥ रहाउ ॥

पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवउ ॥ गज को त्रासु मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावउ ॥१॥

तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ ॥ नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ ॥२॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥ बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥

दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥ माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥१॥

अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥२॥६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
साधो राम सरनि बिसरामा ॥ बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥१॥ रहाउ ॥

लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥ हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥१॥

सुरग नरक अम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥ उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥२॥

दुखु सुखु ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥३॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥ अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥१॥ रहाउ ॥

जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी ॥ इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥१॥

रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी ॥ निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥२॥

कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥ अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पदु नही पावै ॥३॥८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
नर अचेत पाप ते डरु रे ॥ दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे ॥ पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥१॥

मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥ नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥२॥९॥२५१॥

(राग आसा -- SGGS 411) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला ९ ॥
बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥ लोभि ग्रसिओ दस हू दिस धावत आसा लागिओ धन की ॥१॥ रहाउ ॥

सुख कै हेति बहुतु दुखु पावत सेव करत जन जन की ॥ दुआरहि दुआरि सुआन जिउ डोलत नह सुध राम भजन की ॥१॥

मानस जनम अकारथ खोवत लाज न लोक हसन की ॥ नानक हरि जसु किउ नही गावत कुमति बिनासै तन की ॥२॥१॥२३३॥

(राग देवगंधारी -- SGGS 536) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु देवगंधारी महला ९ ॥
यह मनु नैक न कहिओ करै ॥ सीख सिखाइ रहिओ अपनी सी दुरमति ते न टरै ॥१॥ रहाउ ॥

मदि माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै ॥ करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ॥१॥

सुआन पूछ जिउ होइ न सूधो कहिओ न कान धरै ॥ कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते काजु सरै ॥२॥१॥

(राग देवगंधारी -- SGGS 536) देवगंधारी महला ९ ॥
सभ किछु जीवत को बिवहार ॥ मात पिता भाई सुत बंधप अरु फुनि ग्रिह की नारि ॥१॥ रहाउ ॥

तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेति पुकारि ॥ आध घरी कोऊ नहि राखै घर ते देत निकारि ॥१॥

म्रिग त्रिसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदै बिचारि ॥ कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते होत उधार ॥२॥२॥

(राग देवगंधारी -- SGGS 536) देवगंधारी महला ९ ॥
जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥ अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत ॥१॥ रहाउ ॥

मेरउ मेरउ सभै कहत है हित सिउ बाधिओ चीत ॥ अंति कालि संगी नह कोऊ इह अचरज है रीति ॥१॥

मन मूरख अजहू नह समझत सिख दै हारिओ नीत ॥ नानक भउजलु पारि परै जउ गावै प्रभ के गीत ॥२॥३॥६॥३८॥४७॥

(राग बिहागड़ा -- SGGS 537) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बिहागड़ा महला ९ ॥
हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥ जोगी जती तपी पचि हारे अरु बहु लोग सिआने ॥१॥ रहाउ ॥

छिन महि राउ रंक कउ करई राउ रंक करि डारे ॥ रीते भरे भरे सखनावै यह ता को बिवहारे ॥१॥

अपनी माइआ आपि पसारी आपहि देखनहारा ॥ नाना रूपु धरे बहु रंगी सभ ते रहै निआरा ॥२॥

अगनत अपारु अलख निरंजन जिह सभ जगु भरमाइओ ॥ सगल भरम तजि नानक प्राणी चरनि ताहि चितु लाइओ ॥३॥१॥२॥

(राग सोरठि -- SGGS 631) सोरठि महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥ स्रवन गोबिंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति ॥१॥ रहाउ ॥

करि साधसंगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीत ॥ कालु बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीत ॥१॥

आजु कालि फुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति ॥ कहै नानकु रामु भजि लै जातु अउसरु बीत ॥२॥१॥

(राग सोरठि -- SGGS 631) सोरठि महला ९ ॥
मन की मन ही माहि रही ॥ ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी कालि गही ॥१॥ रहाउ ॥

दारा मीत पूत रथ स्मपति धन पूरन सभ मही ॥ अवर सगल मिथिआ ए जानउ भजनु रामु को सही ॥१॥

फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही ॥ नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नही ॥२॥२॥

(राग सोरठि -- SGGS 631) सोरठि महला ९ ॥
मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥ पर दारा निंदिआ रस रचिओ राम भगति नहि कीनी ॥१॥ रहाउ ॥

मुकति पंथु जानिओ तै नाहनि धन जोरन कउ धाइआ ॥ अंति संग काहू नही दीना बिरथा आपु बंधाइआ ॥१॥

ना हरि भजिओ न गुर जनु सेविओ नह उपजिओ कछु गिआना ॥ घट ही माहि निरंजनु तेरै तै खोजत उदिआना ॥२॥

बहुतु जनम भरमत तै हारिओ असथिर मति नही पाई ॥ मानस देह पाइ पद हरि भजु नानक बात बताई ॥३॥३॥

(राग सोरठि -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥ जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥१॥ रहाउ ॥

अटल भइओ ध्रूअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥ दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥१॥

जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥ महमा नाम कहा लउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा ॥२॥

अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥ नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥३॥४॥

(राग सोरठि -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
प्रानी कउनु उपाउ करै ॥ जा ते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै ॥१॥ रहाउ ॥

कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई ॥ कउनु नामु गुर जा कै सिमरै भव सागर कउ तरई ॥१॥

कल मै एकु नामु किरपा निधि जाहि जपै गति पावै ॥ अउर धरम ता कै सम नाहनि इह बिधि बेदु बतावै ॥२॥

सुखु दुखु रहत सदा निरलेपी जा कउ कहत गुसाई ॥ सो तुम ही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई ॥३॥५॥

(राग सोरठि -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥ महा मोह अगिआनि तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥१॥ रहाउ ॥

सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥ बिखिआसकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥१॥

साधसंगु कबहू नही कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥ जन नानक मै नाहि कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥२॥६॥

(राग सोरठि -- SGGS 632) सोरठि महला ९ ॥
माई मनु मेरो बसि नाहि ॥ निस बासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान सिम्रिति के मत सुनि निमख न हीए बसावै ॥ पर धन पर दारा सिउ रचिओ बिरथा जनमु सिरावै ॥१॥

मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना ॥ घट ही भीतरि बसत निरंजनु ता को मरमु न जाना ॥२॥

जब ही सरनि साध की आइओ दुरमति सगल बिनासी ॥ तब नानक चेतिओ चिंतामनि काटी जम की फासी ॥३॥७॥

(राग सोरठि -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
रे नर इह साची जीअ धारि ॥ सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बार ॥१॥ रहाउ ॥

बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नही दिन चारि ॥ तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गवार ॥१॥

अजहू समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि ॥ कहु नानक निज मतु साधन कउ भाखिओ तोहि पुकारि ॥२॥८॥

(राग सोरठि -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥ सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥१॥ रहाउ ॥

दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥ जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥१॥

कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥ दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥२॥

सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥ नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥३॥९॥

(राग सोरठि -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥ कहा भइओ जउ मूडु मुडाइओ भगवउ कीनो भेसु ॥१॥ रहाउ ॥

साच छाडि कै झूठह लागिओ जनमु अकारथु खोइओ ॥ करि परपंच उदर निज पोखिओ पसु की निआई सोइओ ॥१॥

राम भजन की गति नही जानी माइआ हाथि बिकाना ॥ उरझि रहिओ बिखिअन संगि बउरा नामु रतनु बिसराना ॥२॥

रहिओ अचेतु न चेतिओ गोबिंद बिरथा अउध सिरानी ॥ कहु नानक हरि बिरदु पछानउ भूले सदा परानी ॥३॥१०॥

(राग सोरठि -- SGGS 633) सोरठि महला ९ ॥
जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥ सुख सनेहु अरु भै नही जा कै कंचन माटी मानै ॥१॥ रहाउ ॥

नह निंदिआ नह उसतति जा कै लोभु मोहु अभिमाना ॥ हरख सोग ते रहै निआरउ नाहि मान अपमाना ॥१॥

आसा मनसा सगल तिआगै जग ते रहै निरासा ॥ कामु क्रोधु जिह परसै नाहनि तिह घटि ब्रहमु निवासा ॥२॥

गुर किरपा जिह नर कउ कीनी तिह इह जुगति पछानी ॥ नानक लीन भइओ गोबिंद सिउ जिउ पानी संगि पानी ॥३॥११॥

(राग सोरठि -- SGGS 634) सोरठि महला ९ ॥
प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥ अपने सुख सिउ ही जगु फांधिओ को काहू को नाही ॥१॥ रहाउ ॥

सुख मै आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहू दिसि घेरै ॥ बिपति परी सभ ही संगु छाडित कोऊ न आवत नेरै ॥१॥

घर की नारि बहुतु हितु जा सिउ सदा रहत संग लागी ॥ जब ही हंस तजी इह कांइआ प्रेत प्रेत करि भागी ॥२॥

इह बिधि को बिउहारु बनिओ है जा सिउ नेहु लगाइओ ॥ अंत बार नानक बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥३॥१२॥१३९॥

(राग धनासरी -- SGGS 684) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनासरी महला ९ ॥
काहे रे बन खोजन जाई ॥ सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥१॥ रहाउ ॥

पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई ॥ तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहु भाई ॥१॥

बाहरि भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआनु बताई ॥ जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ॥२॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 684) धनासरी महला ९ ॥
साधो इहु जगु भरम भुलाना ॥ राम नाम का सिमरनु छोडिआ माइआ हाथि बिकाना ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता भाई सुत बनिता ता कै रसि लपटाना ॥ जोबनु धनु प्रभता कै मद मै अहिनिसि रहै दिवाना ॥१॥

दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ मनु न लगाना ॥ जन नानक कोटन मै किनहू गुरमुखि होइ पछाना ॥२॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 685) धनासरी महला ९ ॥
तिह जोगी कउ जुगति न जानउ ॥ लोभ मोह माइआ ममता फुनि जिह घटि माहि पछानउ ॥१॥ रहाउ ॥

पर निंदा उसतति नह जा कै कंचन लोह समानो ॥ हरख सोग ते रहै अतीता जोगी ताहि बखानो ॥१॥

चंचल मनु दह दिसि कउ धावत अचल जाहि ठहरानो ॥ कहु नानक इह बिधि को जो नरु मुकति ताहि तुम मानो ॥२॥३॥

(राग धनासरी -- SGGS 685) धनासरी महला ९ ॥
अब मै कउनु उपाउ करउ ॥ जिह बिधि मन को संसा चूकै भउ निधि पारि परउ ॥१॥ रहाउ ॥

जनमु पाइ कछु भलो न कीनो ता ते अधिक डरउ ॥ मन बच क्रम हरि गुन नही गाए यह जीअ सोच धरउ ॥१॥

गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ ॥ कहु नानक प्रभ बिरदु पछानउ तब हउ पतित तरउ ॥२॥४॥९॥९॥१३॥५८॥४॥९३॥

(राग जैतसरी -- SGGS 702) जैतसरी महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥ जो जो करम कीओ लालच लगि तिह तिह आपु बंधाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

समझ न परी बिखै रस रचिओ जसु हरि को बिसराइओ ॥ संगि सुआमी सो जानिओ नाहिन बनु खोजन कउ धाइओ ॥१॥

रतनु रामु घट ही के भीतरि ता को गिआनु न पाइओ ॥ जन नानक भगवंत भजन बिनु बिरथा जनमु गवाइओ ॥२॥१॥

(राग जैतसरी -- SGGS 703) जैतसरी महला ९ ॥
हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥ जम को त्रास भइओ उर अंतरि सरनि गही किरपा निधि तेरी ॥१॥ रहाउ ॥

महा पतित मुगध लोभी फुनि करत पाप अब हारा ॥ भै मरबे को बिसरत नाहिन तिह चिंता तनु जारा ॥१॥

कीए उपाव मुकति के कारनि दह दिसि कउ उठि धाइआ ॥ घट ही भीतरि बसै निरंजनु ता को मरमु न पाइआ ॥२॥

नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु तपु कउनु करमु अब कीजै ॥ नानक हारि परिओ सरनागति अभै दानु प्रभ दीजै ॥३॥२॥

(राग जैतसरी -- SGGS 703) जैतसरी महला ९ ॥
मन रे साचा गहो बिचारा ॥ राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इहु संसारा ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ जोगी खोजत हारे पाइओ नाहि तिह पारा ॥ सो सुआमी तुम निकटि पछानो रूप रेख ते निआरा ॥१॥

पावन नामु जगत मै हरि को कबहू नाहि स्मभारा ॥ नानक सरनि परिओ जग बंदन राखहु बिरदु तुहारा ॥२॥३॥

(राग टोडी -- SGGS 718) टोडी महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कहउ कहा अपनी अधमाई ॥ उरझिओ कनक कामनी के रस नह कीरति प्रभ गाई ॥१॥ रहाउ ॥

जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउ रुच उपजाई ॥ दीन बंध सिमरिओ नही कबहू होत जु संगि सहाई ॥१॥

मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई ॥ कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई ॥२॥१॥३१॥

(राग तिलंग काफी -- SGGS 726) तिलंग महला ९ काफी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥ छिनु छिनु अउध बिहातु है फूटै घट जिउ पानी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुन काहि न गावही मूरख अगिआना ॥ झूठै लालचि लागि कै नहि मरनु पछाना ॥१॥

अजहू कछु बिगरिओ नही जो प्रभ गुन गावै ॥ कहु नानक तिह भजन ते निरभै पदु पावै ॥२॥१॥

(राग तिलंग -- SGGS 726) तिलंग महला ९ ॥
जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥ जो तनु उपजिआ संग ही सो भी संगि न होइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता सुत बंध जन हितु जा सिउ कीना ॥ जीउ छूटिओ जब देह ते डारि अगनि मै दीना ॥१॥

जीवत लउ बिउहारु है जग कउ तुम जानउ ॥ नानक हरि गुन गाइ लै सभ सुफन समानउ ॥२॥२॥

(राग तिलंग -- SGGS 727) तिलंग महला ९ ॥
हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥ अउसरु बीतिओ जातु है कहिओ मान लै मेरो ॥१॥ रहाउ ॥

स्मपति रथ धन राज सिउ अति नेहु लगाइओ ॥ काल फास जब गलि परी सभ भइओ पराइओ ॥१॥

जानि बूझ कै बावरे तै काजु बिगारिओ ॥ पाप करत सुकचिओ नही नह गरबु निवारिओ ॥२॥

जिह बिधि गुर उपदेसिआ सो सुनु रे भाई ॥ नानक कहत पुकारि कै गहु प्रभ सरनाई ॥३॥३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 830) रागु बिलावलु महला ९ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥ अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥

गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥ नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥१॥

अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥ नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥२॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 830) बिलावलु महला ९ ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥ भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥

कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥ जोग जग निहफल तिह मानउ जो प्रभ जसु बिसरावै ॥१॥

मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥२॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 831) बिलावलु महला ९ ॥
जा मै भजनु राम को नाही ॥ तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥ निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥१॥

जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥ तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥२॥

कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेदु बतावै ॥ कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥३॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 901) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु रामकली महला ९ तिपदे ॥
रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥ जा कै सिमरनि दुरमति नासै पावहि पदु निरबाना ॥१॥ रहाउ ॥

बडभागी तिह जन कउ जानहु जो हरि के गुन गावै ॥ जनम जनम के पाप खोइ कै फुनि बैकुंठि सिधावै ॥१॥

अजामल कउ अंत काल महि नाराइन सुधि आई ॥ जां गति कउ जोगीसुर बाछत सो गति छिन महि पाई ॥२॥

नाहिन गुनु नाहिन कछु बिदिआ धरमु कउनु गजि कीना ॥ नानक बिरदु राम का देखहु अभै दानु तिह दीना ॥३॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 902) रामकली महला ९ ॥
साधो कउन जुगति अब कीजै ॥ जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥

मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझै नह कछु गिआना ॥ कउनु नामु जगु जा कै सिमरै पावै पदु निरबाना ॥१॥

भए दइआल क्रिपाल संत जन तब इह बात बताई ॥ सरब धरम मानो तिह कीए जिह प्रभ कीरति गाई ॥२॥

राम नामु नरु निसि बासुर महि निमख एक उरि धारै ॥ जम को त्रासु मिटै नानक तिह अपुनो जनमु सवारै ॥३॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 902) रामकली महला ९ ॥
प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥ छिनु छिनु अउध घटै निसि बासुर ब्रिथा जातु है देह ॥१॥ रहाउ ॥

तरनापो बिखिअन सिउ खोइओ बालपनु अगिआना ॥ बिरधि भइओ अजहू नही समझै कउन कुमति उरझाना ॥१॥

मानस जनमु दीओ जिह ठाकुरि सो तै किउ बिसराइओ ॥ मुकतु होत नर जा कै सिमरै निमख न ता कउ गाइओ ॥२॥

माइआ को मदु कहा करतु है संगि न काहू जाई ॥ नानकु कहतु चेति चिंतामनि होइ है अंति सहाई ॥३॥३॥८१॥

(राग मारू -- SGGS 1008) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मारू महला ९ ॥
हरि को नामु सदा सुखदाई ॥ जा कउ सिमरि अजामलु उधरिओ गनिका हू गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

पंचाली कउ राज सभा महि राम नाम सुधि आई ॥ ता को दूखु हरिओ करुणा मै अपनी पैज बढाई ॥१॥

जिह नर जसु किरपा निधि गाइओ ता कउ भइओ सहाई ॥ कहु नानक मै इही भरोसै गही आनि सरनाई ॥२॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1008) मारू महला ९ ॥
अब मै कहा करउ री माई ॥ सगल जनमु बिखिअन सिउ खोइआ सिमरिओ नाहि कन्हाई ॥१॥ रहाउ ॥

काल फास जब गर महि मेली तिह सुधि सभ बिसराई ॥ राम नाम बिनु या संकट महि को अब होत सहाई ॥१॥

जो स्मपति अपनी करि मानी छिन महि भई पराई ॥ कहु नानक यह सोच रही मनि हरि जसु कबहू न गाई ॥२॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1008) मारू महला ९ ॥
माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥ माइआ के मदि जनमु सिराइओ राम भजनि नही लागिओ ॥१॥ रहाउ ॥

जम को डंडु परिओ सिर ऊपरि तब सोवत तै जागिओ ॥ कहा होत अब कै पछुताए छूटत नाहिन भागिओ ॥१॥

इह चिंता उपजी घट महि जब गुर चरनन अनुरागिओ ॥ सुफलु जनमु नानक तब हूआ जउ प्रभ जस महि पागिओ ॥२॥३॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1186) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बसंतु हिंडोल महला ९ ॥
साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥ या भीतरि जो रामु बसतु है साचो ताहि पछानो ॥१॥ रहाउ ॥

इहु जगु है स्मपति सुपने की देखि कहा ऐडानो ॥ संगि तिहारै कछू न चालै ताहि कहा लपटानो ॥१॥

उसतति निंदा दोऊ परहरि हरि कीरति उरि आनो ॥ जन नानक सभ ही मै पूरन एक पुरख भगवानो ॥२॥१॥

(राग बसंत -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥ मनु चंचलु या ते गहिओ न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जोगी जंगम अरु संनिआस ॥ सभ ही परि डारी इह फास ॥१॥

जिहि जिहि हरि को नामु सम्हारि ॥ ते भव सागर उतरे पारि ॥२॥

जन नानक हरि की सरनाइ ॥ दीजै नामु रहै गुन गाइ ॥३॥२॥

(राग बसंत -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥ मनु मेरो धावन ते छूटिओ करि बैठो बिसरामु ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ ममता तन ते भागी उपजिओ निरमल गिआनु ॥ लोभ मोह एह परसि न साकै गही भगति भगवान ॥१॥

जनम जनम का संसा चूका रतनु नामु जब पाइआ ॥ त्रिसना सकल बिनासी मन ते निज सुख माहि समाइआ ॥२॥

जा कउ होत दइआलु किरपा निधि सो गोबिंद गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि की स्मपै कोऊ गुरमुखि पावै ॥३॥३॥

(राग बसंत -- SGGS 1186) बसंतु महला ९ ॥
मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥ तनु बिनसै जम सिउ परै कामु ॥१॥ रहाउ ॥

इहु जगु धूए का पहार ॥ तै साचा मानिआ किह बिचारि ॥१॥

धनु दारा स्मपति ग्रेह ॥ कछु संगि न चालै समझ लेह ॥२॥

इक भगति नाराइन होइ संगि ॥ कहु नानक भजु तिह एक रंगि ॥३॥४॥

(राग बसंत -- SGGS 1187) बसंतु महला ९ ॥
कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥ कछु बिगरिओ नाहिन अजहु जाग ॥१॥ रहाउ ॥

सम सुपनै कै इहु जगु जानु ॥ बिनसै छिन मै साची मानु ॥१॥

संगि तेरै हरि बसत नीत ॥ निस बासुर भजु ताहि मीत ॥२॥

बार अंत की होइ सहाइ ॥ कहु नानक गुन ता के गाइ ॥३॥५॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सारंग महला ९ ॥
हरि बिनु तेरो को न सहाई ॥ कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ॥१॥ रहाउ ॥

धनु धरनी अरु स्मपति सगरी जो मानिओ अपनाई ॥ तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ॥१॥

दीन दइआल सदा दुख भंजन ता सिउ रुचि न बढाई ॥ नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ॥२॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥ या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥१॥ रहाउ ॥

कां को तनु धनु स्मपति कां की का सिउ नेहु लगाही ॥ जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥१॥

तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥ जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥२॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
कहा नर अपनो जनमु गवावै ॥ माइआ मदि बिखिआ रसि रचिओ राम सरनि नही आवै ॥१॥ रहाउ ॥

इहु संसारु सगल है सुपनो देखि कहा लोभावै ॥ जो उपजै सो सगल बिनासै रहनु न कोऊ पावै ॥१॥

मिथिआ तनु साचो करि मानिओ इह बिधि आपु बंधावै ॥ जन नानक सोऊ जनु मुकता राम भजन चितु लावै ॥२॥३॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) सारंग महला ९ ॥
मन करि कबहू न हरि गुन गाइओ ॥ बिखिआसकत रहिओ निसि बासुर कीनो अपनो भाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर उपदेसु सुनिओ नहि काननि पर दारा लपटाइओ ॥ पर निंदा कारनि बहु धावत समझिओ नह समझाइओ ॥१॥

कहा कहउ मै अपुनी करनी जिह बिधि जनमु गवाइओ ॥ कहि नानक सभ अउगन मो महि राखि लेहु सरनाइओ ॥२॥४॥३॥१३॥१३९॥४॥१५९॥

(राग जैजावंती -- SGGS 1352) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु जैजावंती महला ९ ॥
रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरै काजि है ॥ माइआ को संगु तिआगु प्रभ जू की सरनि लागु ॥ जगत सुख मानु मिथिआ झूठो सभ साजु है ॥१॥ रहाउ ॥

सुपने जिउ धनु पछानु काहे परि करत मानु ॥ बारू की भीति जैसे बसुधा को राजु है ॥१॥

नानकु जनु कहतु बात बिनसि जैहै तेरो गातु ॥ छिनु छिनु करि गइओ कालु तैसे जातु आजु है ॥२॥१॥

(राग जैजावंती -- SGGS 1352) जैजावंती महला ९ ॥
रामु भजु रामु भजु जनमु सिरातु है ॥ कहउ कहा बार बार समझत नह किउ गवार ॥ बिनसत नह लगै बार ओरे सम गातु है ॥१॥ रहाउ ॥

सगल भरम डारि देहि गोबिंद को नामु लेहि ॥ अंति बार संगि तेरै इहै एकु जातु है ॥१॥

बिखिआ बिखु जिउ बिसारि प्रभ कौ जसु हीए धारि ॥ नानक जन कहि पुकारि अउसरु बिहातु है ॥२॥२॥

(राग जैजावंती -- SGGS 1352) जैजावंती महला ९ ॥
रे मन कउन गति होइ है तेरी ॥ इह जग महि राम नामु सो तउ नही सुनिओ कानि ॥ बिखिअन सिउ अति लुभानि मति नाहिन फेरी ॥१॥ रहाउ ॥

मानस को जनमु लीनु सिमरनु नह निमख कीनु ॥ दारा सुख भइओ दीनु पगहु परी बेरी ॥१॥

नानक जन कहि पुकारि सुपनै जिउ जग पसारु ॥ सिमरत नह किउ मुरारि माइआ जा की चेरी ॥२॥३॥

(राग जैजावंती -- SGGS 1352) जैजावंती महला ९ ॥
बीत जैहै बीत जैहै जनमु अकाजु रे ॥ निसि दिनु सुनि कै पुरान समझत नह रे अजान ॥ कालु तउ पहूचिओ आनि कहा जैहै भाजि रे ॥१॥ रहाउ ॥

असथिरु जो मानिओ देह सो तउ तेरउ होइ है खेह ॥ किउ न हरि को नामु लेहि मूरख निलाज रे ॥१॥

राम भगति हीए आनि छाडि दे तै मन को मानु ॥ नानक जन इह बखानि जग महि बिराजु रे ॥२॥४॥

(SGGS 1426) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला ९ ॥

गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥ कहु नानक हरि भजु मना जिह बिधि जल कउ मीनु ॥१॥

बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥ कहु नानक भजु हरि मना परै न जम की फास ॥२॥

तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥ कहु नानक भजु हरि मना अउध जातु है बीति ॥३॥

बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥ कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु ॥४॥

धनु दारा स्मपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥ इन मै कछु संगी नही नानक साची जानि ॥५॥

पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥ कहु नानक तिह जानीऐ सदा बसतु तुम साथि ॥६॥

तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥ कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन ॥७॥

तनु धनु स्मपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥ कहु नानक सुनु रे मना सिमरत काहि न रामु ॥८॥

सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥ कहु नानक सुनि रे मना तिह सिमरत गति होइ ॥९॥

जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥ कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥१०॥

पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥ जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥११॥

घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥ कहु नानक तिह भजु मना भउ निधि उतरहि पारि ॥१२॥

सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥ कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥१३॥

उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥ कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥१४॥

हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥ कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥१५॥

भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥ कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥१६॥

जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥ कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥१७॥

जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥ कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥१८॥

जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥ कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥१९॥

भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥ निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥२०॥

जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥ कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥२१॥

जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥ कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥२२॥

जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥ इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥२३॥

निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥ कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥२४॥

जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥ जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥२५॥

प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥ कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥२६॥

जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥ कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥२७॥

माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥ कहु नानक बिनु हरि भजन बिरथा जनमु सिरान ॥२८॥

जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥ हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥२९॥

मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥ कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥३०॥

प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥ कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥३१॥

सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥ कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥३२॥

जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥ कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥३३॥

जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥ दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥३४॥

बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥ कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥३५॥

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥ नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥३६॥

मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥ नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥३७॥

नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥ चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥३८॥

जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥ कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥३९॥

जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥ कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥४०॥

झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥ इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥४१॥

गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥ जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥४२॥

जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥ तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥४३॥

एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥ जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥४४॥

सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥ नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥४५॥

तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥ नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥४६॥

सिरु क्मपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥ कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥४७॥

निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥ नानक थिरु हरि भगति है तिह राखो मन माहि ॥४८॥

जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥ कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति ॥४९॥

रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥ कहु नानक थिरु कछु नही सुपने जिउ संसारु ॥५०॥

चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥ इहु मारगु संसार को नानक थिरु नही कोइ ॥५१॥

जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥ नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥५२॥

दोहरा ॥

बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥ कहु नानक अब ओट हरि गज जिउ होहु सहाइ ॥५३॥

बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥ नानक सभु किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ ॥५४॥

संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥ कहु नानक इह बिपति मै टेक एक रघुनाथ ॥५५॥

नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥ कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ॥५६॥

राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥ जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइ ॥५७॥१॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates