Pt 4 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 4 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी -- SGGS 309) मः ४ ॥
जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥ तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥ तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥ गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥ जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 309) पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥ गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥ नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥ विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥ से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥१५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 309) सलोक मः ४ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥ नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ ॥ कूक पुकार को न सुणे ओहु अउखा होइ होइ रोइआ ॥ ओनि हलतु पलतु सभु गवाइआ लाहा मूलु सभु खोइआ ॥ ओहु तेली संदा बलदु करि नित भलके उठि प्रभि जोइआ ॥ हरि वेखै सुणै नित सभु किछु तिदू किछु गुझा न होइआ ॥ जैसा बीजे सो लुणै जेहा पुरबि किनै बोइआ ॥ जिसु क्रिपा करे प्रभु आपणी तिसु सतिगुर के चरण धोइआ ॥ गुर सतिगुर पिछै तरि गइआ जिउ लोहा काठ संगोइआ ॥ जन नानक नामु धिआइ तू जपि हरि हरि नामि सुखु होइआ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 309) मः ४ ॥
वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥ अंतर जोति प्रगासीआ नानक नामि समाइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 309) पउड़ी ॥
इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥ गुहज रतन विचि लुकि रहे कोई गुरमुखि सेवकु कढै खोति ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ तां इकु रविआ इको ओति पोति ॥ इकु देखिआ इकु मंनिआ इको सुणिआ स्रवण सरोति ॥ जन नानक नामु सलाहि तू सचु सचे सेवा तेरी होति ॥१६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) सलोक मः ४ ॥
सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥ हरि दरगहि ते मुख उजले तिन कउ सभि देखण जाहि ॥ जिन निरभउ नामु धिआइआ तिन कउ भउ कोई नाहि ॥ हरि उतमु तिनी सरेविआ जिन कउ धुरि लिखिआ आहि ॥ ते हरि दरगहि पैनाईअहि जिन हरि वुठा मन माहि ॥ ओइ आपि तरे सभ कुट्मब सिउ तिन पिछै सभु जगतु छडाहि ॥ जन नानक कउ हरि मेलि जन तिन वेखि वेखि हम जीवाहि ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) मः ४ ॥
सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥ से जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ ॥ धनु धंनु पिता धनु धंनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥ धनु धंनु गुरू जिनि नामु अराधिआ आपि तरिआ जिनी डिठा तिना लए छडाइ ॥ हरि सतिगुरु मेलहु दइआ करि जनु नानकु धोवै पाइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) पउड़ी ॥
सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सचु सचा सतिगुरु पुरखु है जिनि कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥ जा डिठा पूरा सतिगुरू तां अंदरहु मनु साधारिआ ॥ बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमि वारिआ ॥ गुरमुखि जिता मनमुखि हारिआ ॥१७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) सलोक मः ४ ॥
करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥ सो करे जि सतिगुर भावसी गुरु पूरा घरी वसाइसी ॥ जिन अंदरि नामु निधानु है तिन का भउ सभु गवाइसी ॥ जिन रखण कउ हरि आपि होइ होर केती झखि झखि जाइसी ॥ जन नानक नामु धिआइ तू हरि हलति पलति छोडाइसी ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) मः ४ ॥
गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥ हरि राखहु पैज सतिगुरू की नित चड़ै सवाई ॥ गुर सतिगुर कै मनि पारब्रहमु है पारब्रहमु छडाई ॥ गुर सतिगुर ताणु दीबाणु हरि तिनि सभ आणि निवाई ॥ जिनी डिठा मेरा सतिगुरु भाउ करि तिन के सभि पाप गवाई ॥ हरि दरगह ते मुख उजले बहु सोभा पाई ॥ जनु नानकु मंगै धूड़ि तिन जो गुर के सिख मेरे भाई ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 310) पउड़ी ॥
हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाई ॥ सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥ इहु हरि रसु सेई जाणदे जिउ गूंगै मिठिआई खाई ॥ गुरि पूरै हरि प्रभु सेविआ मनि वजी वाधाई ॥१८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 311) सलोक मः ४ ॥
जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥ हरि जाणहि सेई बिरहु हउ तिन विटहु सद घुमि घोलीआ ॥ हरि मेलहु सजणु पुरखु मेरा सिरु तिन विटहु तल रोलीआ ॥ जो सिख गुर कार कमावहि हउ गुलमु तिना का गोलीआ ॥ हरि रंगि चलूलै जो रते तिन भिनी हरि रंगि चोलीआ ॥ करि किरपा नानक मेलि गुर पहि सिरु वेचिआ मोलीआ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 311) मः ४ ॥
अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥ गुरमुखि गुण वेहाझीअहि मलु हउमै कढै धोइ ॥ सचु वणंजहि रंग सिउ सचु सउदा होइ ॥ तोटा मूलि न आवई लाहा हरि भावै सोइ ॥ नानक तिन सचु वणंजिआ जिना धुरि लिखिआ परापति होइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 311) पउड़ी ॥
सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥ सचु सेवी सचु मनि वसै सचु सचा हरि रखवाले ॥ सचु सचा जिनी अराधिआ से जाइ रले सच नाले ॥ सचु सचा जिनी न सेविआ से मनमुख मूड़ बेताले ॥ ओह आलु पतालु मुहहु बोलदे जिउ पीतै मदि मतवाले ॥१९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 311) मः ४ ॥
सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥ ओइ पुरख प्राणी धंनि जन हहि उपदेसु करहि परउपकारिआ ॥ हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ ॥ गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ ॥ तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ ॥ तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ ॥ कोई विछुड़ि जाइ सतिगुरू पासहु तिसु काला मुहु जमि मारिआ ॥ तिसु अगै पिछै ढोई नाही गुरसिखी मनि वीचारिआ ॥ सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥ जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 312) पउड़ी ॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥ जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥ धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अम्रितु पिजै ॥ सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥ धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥२०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 312) सलोक मः ४ ॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥ जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥ गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥ ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥ ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥ जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥ हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥ जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 312) मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु अगमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥ सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥ सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥ जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥ एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 312) पउड़ी ॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥ से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥ जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥ जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥२१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 312) सलोकु मः ४ ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥ जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥ करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥ तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥ सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥ नानक ते मुख उजले जि नित उठि समालेनि ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) मः ४ ॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥ भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥ धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥ वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥ जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) पउड़ी ॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥ जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥ सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥ सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥ सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥२२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) सलोक मः ४ ॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥ बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) मः ४ ॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥ सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥ जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥ नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) पउड़ी ॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥ सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥ सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥२३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 313) सलोक मः ४ ॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥ विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥ तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥ सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥ सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥२४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 314) सलोकु मः ४ ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥ किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥ मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥ जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥ जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसमल भंने ॥ उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥ जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥ इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥२५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 314) पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥ ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥ ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥ विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥ कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥२६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 315) सलोक मः ४ ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥ अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥ पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥ जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥ भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥ सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥ महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥ बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥ अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥ हरि अंदरला पापु पंचा नो उघा करि वेखालिआ ॥ धरम राइ जमकंकरा नो आखि छडिआ एसु तपे नो तिथै खड़ि पाइहु जिथै महा महां हतिआरिआ ॥ फिरि एसु तपे दै मुहि कोई लगहु नाही एहु सतिगुरि है फिटकारिआ ॥ हरि कै दरि वरतिआ सु नानकि आखि सुणाइआ ॥ सो बूझै जु दयि सवारिआ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 316) मः ४ ॥
हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥ हरि कीरतनु भगत नित गांवदे हरि नामु सुखदाई ॥ हरि भगतां नो नित नावै दी वडिआई बखसीअनु नित चड़ै सवाई ॥ हरि भगतां नो थिरु घरी बहालिअनु अपणी पैज रखाई ॥ निंदकां पासहु हरि लेखा मंगसी बहु देइ सजाई ॥ जेहा निंदक अपणै जीइ कमावदे तेहो फलु पाई ॥ अंदरि कमाणा सरपर उघड़ै भावै कोई बहि धरती विचि कमाई ॥ जन नानकु देखि विगसिआ हरि की वडिआई ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 316) सलोक मः ४ ॥
मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥ झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करहि वीचारु ॥ सुधि मति करतै सभ हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥ दितै कितै न संतोखीअहि अंतरि तिसना बहु अगिआनु अंध्यारु ॥ नानक मनमुखा नालो तुटी भली जिन माइआ मोह पिआरु ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 316) मः ४ ॥
जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन्हा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥ ओहु आवै जाइ भवाईऐ सुपनै सुखु न कोइ ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु उचरै कूड़ि लगिआ कूड़ु होइ ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है दुखि बिनसै दुखु रोइ ॥ नानक धातु लिवै जोड़ु न आवई जे लोचै सभु कोइ ॥ जिन कउ पोतै पुंनु पइआ तिना गुर सबदी सुखु होइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 317) पउड़ी ॥
जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥ चबे तता लोह सारु विचि संघै पलते ॥ घति गलावां चालिआ तिनि दूति अमल ते ॥ काई आस न पुंनीआ नित पर मलु हिरते ॥ कीआ न जाणै अकिरतघण विचि जोनी फिरते ॥ सभे धिरां निखुटीअसु हिरि लईअसु धर ते ॥ विझण कलह न देवदा तां लइआ करते ॥ जो जो करते अहमेउ झड़ि धरती पड़ते ॥३२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 317) मः ४ ॥
सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥ गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥ सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥ विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥ गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥ जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥ ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥ जि विणु सतिगुर के मनु मंने कमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 317) पउड़ी ॥
तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥ जिसु तूं मेलहि सो तुधु मिलै तूं आपे बखसि लैहि लेखा छडे ॥ जिस नो तूं आपि मिलाइदा सो सतिगुरु सेवे मनु गड गडे ॥ तूं सचा साहिबु सचु तू सभु जीउ पिंडु चमु तेरा हडे ॥ जिउ भावै तिउ रखु तूं सचिआ नानक मनि आस तेरी वड वडे ॥३३॥१॥ सुधु ॥

(राग आसा -- SGGS 348) आसा महला ४ ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥ सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥ सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥ हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥ हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥१॥

तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥ इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥ तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥ तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥ जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन्ह कुरबाणा ॥२॥

हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुख वासी ॥ से मुकतु से मुकतु भए जिन्ह हरि धिआइआ जीउ तिन टूटी जम की फासी ॥ जिन निरभउ जिन्ह हरि निरभउ धिआइआ जीउ तिन का भउ सभु गवासी ॥ जिन्ह सेविआ जिन्ह सेविआ मेरा हरि जीउ ते हरि हरि रूपि समासी ॥ से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जीउ जनु नानकु तिन बलि जासी ॥३॥

तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बेअंत बेअंता ॥ तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥ तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥ तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥ से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥४॥

तूं आदि पुरखु अपर्मपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥ तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥ तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥ जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥५॥२॥

(राग आसा -- SGGS 365) आसा महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥ जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥ जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥ गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥ तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥१॥

तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥ तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥ जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥२॥

जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥ हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥ जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥३॥

तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥१॥५३॥

(राग आसा -- SGGS 365) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु २ महला ४ ॥
किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥ किस ही धड़ा कीआ कुड़म सके नालि जवाई ॥ किस ही धड़ा कीआ सिकदार चउधरी नालि आपणै सुआई ॥ हमारा धड़ा हरि रहिआ समाई ॥१॥

हम हरि सिउ धड़ा कीआ मेरी हरि टेक ॥ मै हरि बिनु पखु धड़ा अवरु न कोई हउ हरि गुण गावा असंख अनेक ॥१॥ रहाउ ॥

जिन्ह सिउ धड़े करहि से जाहि ॥ झूठु धड़े करि पछोताहि ॥ थिरु न रहहि मनि खोटु कमाहि ॥ हम हरि सिउ धड़ा कीआ जिस का कोई समरथु नाहि ॥२॥

एह सभि धड़े माइआ मोह पसारी ॥ माइआ कउ लूझहि गावारी ॥ जनमि मरहि जूऐ बाजी हारी ॥ हमरै हरि धड़ा जि हलतु पलतु सभु सवारी ॥३॥

कलिजुग महि धड़े पंच चोर झगड़ाए ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु वधाए ॥ जिस नो क्रिपा करे तिसु सतसंगि मिलाए ॥ हमरा हरि धड़ा जिनि एह धड़े सभि गवाए ॥४॥

मिथिआ दूजा भाउ धड़े बहि पावै ॥ पराइआ छिद्रु अटकलै आपणा अहंकारु वधावै ॥ जैसा बीजै तैसा खावै ॥ जन नानक का हरि धड़ा धरमु सभ स्रिसटि जिणि आवै ॥५॥२॥५४॥

(राग आसा -- SGGS 366) आसा महला ४ ॥
हिरदै सुणि सुणि मनि अम्रितु भाइआ ॥ गुरबाणी हरि अलखु लखाइआ ॥१॥

गुरमुखि नामु सुनहु मेरी भैना ॥ एको रवि रहिआ घट अंतरि मुखि बोलहु गुर अम्रित बैना ॥१॥ रहाउ ॥

मै मनि तनि प्रेमु महा बैरागु ॥ सतिगुरु पुरखु पाइआ वडभागु ॥२॥

दूजै भाइ भवहि बिखु माइआ ॥ भागहीन नही सतिगुरु पाइआ ॥३॥

अम्रितु हरि रसु हरि आपि पीआइआ ॥ गुरि पूरै नानक हरि पाइआ ॥४॥३॥५५॥

(राग आसा -- SGGS 366) आसा महला ४ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥ नामु जपी नामो सुख सारु ॥१॥

नामु जपहु मेरे साजन सैना ॥ नाम बिना मै अवरु न कोई वडै भागि गुरमुखि हरि लैना ॥१॥ रहाउ ॥

नाम बिना नही जीविआ जाइ ॥ वडै भागि गुरमुखि हरि पाइ ॥२॥

नामहीन कालख मुखि माइआ ॥ नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु जीवाइआ ॥३॥

वडा वडा हरि भाग करि पाइआ ॥ नानक गुरमुखि नामु दिवाइआ ॥४॥४॥५६॥

(राग आसा -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
गुण गावा गुण बोली बाणी ॥ गुरमुखि हरि गुण आखि वखाणी ॥१॥

जपि जपि नामु मनि भइआ अनंदा ॥ सति सति सतिगुरि नामु दिड़ाइआ रसि गाए गुण परमानंदा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण गावै हरि जन लोगा ॥ वडै भागि पाए हरि निरजोगा ॥२॥

गुण विहूण माइआ मलु धारी ॥ विणु गुण जनमि मुए अहंकारी ॥३॥

सरीरि सरोवरि गुण परगटि कीए ॥ नानक गुरमुखि मथि ततु कढीए ॥४॥५॥५७॥

(राग आसा -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
नामु सुणी नामो मनि भावै ॥ वडै भागि गुरमुखि हरि पावै ॥१॥

नामु जपहु गुरमुखि परगासा ॥ नाम बिना मै धर नही काई नामु रविआ सभ सास गिरासा ॥१॥ रहाउ ॥

नामै सुरति सुनी मनि भाई ॥ जो नामु सुनावै सो मेरा मीतु सखाई ॥२॥

नामहीण गए मूड़ नंगा ॥ पचि पचि मुए बिखु देखि पतंगा ॥३॥

आपे थापे थापि उथापे ॥ नानक नामु देवै हरि आपे ॥४॥६॥५८॥

(राग आसा -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
गुरमुखि हरि हरि वेलि वधाई ॥ फल लागे हरि रसक रसाई ॥१॥

हरि हरि नामु जपि अनत तरंगा ॥ जपि जपि नामु गुरमति सालाही मारिआ कालु जमकंकर भुइअंगा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि गुर महि भगति रखाई ॥ गुरु तुठा सिख देवै मेरे भाई ॥२॥

हउमै करम किछु बिधि नही जाणै ॥ जिउ कुंचरु नाइ खाकु सिरि छाणै ॥३॥

जे वड भाग होवहि वड ऊचे ॥ नानक नामु जपहि सचि सूचे ॥४॥७॥५९॥

(राग आसा -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
हरि हरि नाम की मनि भूख लगाई ॥ नामि सुनिऐ मनु त्रिपतै मेरे भाई ॥१॥

नामु जपहु मेरे गुरसिख मीता ॥ नामु जपहु नामे सुखु पावहु नामु रखहु गुरमति मनि चीता ॥१॥ रहाउ ॥

नामो नामु सुणी मनु सरसा ॥ नामु लाहा लै गुरमति बिगसा ॥२॥

नाम बिना कुसटी मोह अंधा ॥ सभ निहफल करम कीए दुखु धंधा ॥३॥

हरि हरि हरि जसु जपै वडभागी ॥ नानक गुरमति नामि लिव लागी ॥४॥८॥६०॥

(राग आसा -- SGGS 367) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
महला ४ रागु आसा घरु ६ के ३ ॥
हथि करि तंतु वजावै जोगी थोथर वाजै बेन ॥ गुरमति हरि गुण बोलहु जोगी इहु मनूआ हरि रंगि भेन ॥१॥

जोगी हरि देहु मती उपदेसु ॥ जुगु जुगु हरि हरि एको वरतै तिसु आगै हम आदेसु ॥१॥ रहाउ ॥

गावहि राग भाति बहु बोलहि इहु मनूआ खेलै खेल ॥ जोवहि कूप सिंचन कउ बसुधा उठि बैल गए चरि बेल ॥२॥

काइआ नगर महि करम हरि बोवहु हरि जामै हरिआ खेतु ॥ मनूआ असथिरु बैलु मनु जोवहु हरि सिंचहु गुरमति जेतु ॥३॥

जोगी जंगम स्रिसटि सभ तुमरी जो देहु मती तितु चेल ॥ जन नानक के प्रभ अंतरजामी हरि लावहु मनूआ पेल ॥४॥९॥६१॥

(राग आसा -- SGGS 368) आसा महला ४ ॥
कब को भालै घुंघरू ताला कब को बजावै रबाबु ॥ आवत जात बार खिनु लागै हउ तब लगु समारउ नामु ॥१॥

मेरै मनि ऐसी भगति बनि आई ॥ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे जल बिनु मीनु मरि जाई ॥१॥ रहाउ ॥

कब कोऊ मेलै पंच सत गाइण कब को राग धुनि उठावै ॥ मेलत चुनत खिनु पलु चसा लागै तब लगु मेरा मनु राम गुन गावै ॥२॥

कब को नाचै पाव पसारै कब को हाथ पसारै ॥ हाथ पाव पसारत बिलमु तिलु लागै तब लगु मेरा मनु राम सम्हारै ॥३॥

कब कोऊ लोगन कउ पतीआवै लोकि पतीणै ना पति होइ ॥ जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु ता जै जै करे सभु कोइ ॥४॥१०॥६२॥

(राग आसा -- SGGS 368) आसा महला ४ ॥
सतसंगति मिलीऐ हरि साधू मिलि संगति हरि गुण गाइ ॥ गिआन रतनु बलिआ घटि चानणु अगिआनु अंधेरा जाइ ॥१॥

हरि जन नाचहु हरि हरि धिआइ ॥ ऐसे संत मिलहि मेरे भाई हम जन के धोवह पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपहु मन मेरे अनदिनु हरि लिव लाइ ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि भूख न लागै आइ ॥२॥

आपे हरि अपर्मपरु करता हरि आपे बोलि बुलाइ ॥ सेई संत भले तुधु भावहि जिन्ह की पति पावहि थाइ ॥३॥

नानकु आखि न राजै हरि गुण जिउ आखै तिउ सुखु पाइ ॥ भगति भंडार दीए हरि अपुने गुण गाहकु वणजि लै जाइ ॥४॥११॥६३॥

(राग आसा काफी -- SGGS 368) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु ८ के काफी महला ४ ॥
आइआ मरणु धुराहु हउमै रोईऐ ॥ गुरमुखि नामु धिआइ असथिरु होईऐ ॥१॥

गुर पूरे साबासि चलणु जाणिआ ॥ लाहा नामु सु सारु सबदि समाणिआ ॥१॥ रहाउ ॥

पूरबि लिखे डेह सि आए माइआ ॥ चलणु अजु कि कल्हि धुरहु फुरमाइआ ॥२॥

बिरथा जनमु तिना जिन्ही नामु विसारिआ ॥ जूऐ खेलणु जगि कि इहु मनु हारिआ ॥३॥

जीवणि मरणि सुखु होइ जिन्हा गुरु पाइआ ॥ नानक सचे सचि सचि समाइआ ॥४॥१२॥६४॥

(राग आसा -- SGGS 369) आसा महला ४ ॥
जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥ गुर परसादी बुझि सचि समाइआ ॥१॥

जिन्ह धुरि लिखिआ लेखु तिन्ही नामु कमाइआ ॥ दरि सचै सचिआर महलि बुलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि नामु निधानु गुरमुखि पाईऐ ॥ अनदिनु नामु धिआइ हरि गुण गाईऐ ॥२॥

अंतरि वसतु अनेक मनमुखि नही पाईऐ ॥ हउमै गरबै गरबु आपि खुआईऐ ॥३॥

नानक आपे आपि आपि खुआईऐ ॥ गुरमति मनि परगासु सचा पाईऐ ॥४॥१३॥६५॥

(राग आसावरी -- SGGS 369) रागु आसावरी घरु १६ के २ महला ४ सुधंग
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥ सतिगुरि मो कउ हरि नामु बताइआ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ ॥१॥ रहाउ ॥

हमरै स्रवणु सिमरनु हरि कीरतनु हउ हरि बिनु रहि न सकउ हउ इकु खिनु ॥ जैसे हंसु सरवर बिनु रहि न सकै तैसे हरि जनु किउ रहै हरि सेवा बिनु ॥१॥

किनहूं प्रीति लाई दूजा भाउ रिद धारि किनहूं प्रीति लाई मोह अपमान ॥ हरि जन प्रीति लाई हरि निरबाण पद नानक सिमरत हरि हरि भगवान ॥२॥१४॥६६॥

(राग आसावरी -- SGGS 369) आसावरी महला ४ ॥
माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे करहलु बेलि रीझाई ॥१॥ रहाउ ॥

हमरा मनु बैराग बिरकतु भइओ हरि दरसन मीत कै ताई ॥ जैसे अलि कमला बिनु रहि न सकै तैसे मोहि हरि बिनु रहनु न जाई ॥१॥

राखु सरणि जगदीसुर पिआरे मोहि सरधा पूरि हरि गुसाई ॥ जन नानक कै मनि अनदु होत है हरि दरसनु निमख दिखाई ॥२॥३९॥१३॥१५॥६७॥


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