Pt 13 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 13 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग भैरउ -- SGGS 1135) भैरउ महला ४ ॥
ते साधू हरि मेलहु सुआमी जिन जपिआ गति होइ हमारी ॥ तिन का दरसु देखि मनु बिगसै खिनु खिनु तिन कउ हउ बलिहारी ॥१॥

हरि हिरदै जपि नामु मुरारी ॥ क्रिपा क्रिपा करि जगत पित सुआमी हम दासनि दास कीजै पनिहारी ॥१॥ रहाउ ॥

तिन मति ऊतम तिन पति ऊतम जिन हिरदै वसिआ बनवारी ॥ तिन की सेवा लाइ हरि सुआमी तिन सिमरत गति होइ हमारी ॥२॥

जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते हरि दरगह काढे मारी ॥ ते नर निंदक सोभ न पावहि तिन नक काटे सिरजनहारी ॥३॥

हरि आपि बुलावै आपे बोलै हरि आपि निरंजनु निरंकारु निराहारी ॥ हरि जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलसी जन नानक किआ एहि जंत विचारी ॥४॥२॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1135) भैरउ महला ४ ॥
सतसंगति साई हरि तेरी जितु हरि कीरति हरि सुनणे ॥ जिन हरि नामु सुणिआ मनु भीना तिन हम स्रेवह नित चरणे ॥१॥

जगजीवनु हरि धिआइ तरणे ॥ अनेक असंख नाम हरि तेरे न जाही जिहवा इतु गनणे ॥१॥ रहाउ ॥

गुरसिख हरि बोलहु हरि गावहु ले गुरमति हरि जपणे ॥ जो उपदेसु सुणे गुर केरा सो जनु पावै हरि सुख घणे ॥२॥

धंनु सु वंसु धंनु सु पिता धंनु सु माता जिनि जन जणे ॥ जिन सासि गिरासि धिआइआ मेरा हरि हरि से साची दरगह हरि जन बणे ॥३॥

हरि हरि अगम नाम हरि तेरे विचि भगता हरि धरणे ॥ नानक जनि पाइआ मति गुरमति जपि हरि हरि पारि पवणे ॥४॥३॥७॥

(राग बसंत -- SGGS 1177) रागु बसंतु महला ४ घरु १ इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥ तिउ घटि घटि रमईआ ओति पोति ॥१॥

एको हरि रविआ स्रब थाइ ॥ गुर सबदी मिलीऐ मेरी माइ ॥१॥ रहाउ ॥

घटि घटि अंतरि एको हरि सोइ ॥ गुरि मिलिऐ इकु प्रगटु होइ ॥२॥

एको एकु रहिआ भरपूरि ॥ साकत नर लोभी जाणहि दूरि ॥३॥

एको एकु वरतै हरि लोइ ॥ नानक हरि एको करे सु होइ ॥४॥१॥

(राग बसंत -- SGGS 1177) बसंतु महला ४ ॥
रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥ मन हरि सिमरहु अंति सदा रखि लए ॥१॥

हरि हरि चेति सदा मन मेरे ॥ सभु आलसु दूख भंजि प्रभु पाइआ गुरमति गावहु गुण प्रभ केरे ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख फिरि फिरि हउमै मुए ॥ कालि दैति संघारे जम पुरि गए ॥२॥

गुरमुखि हरि हरि हरि लिव लागे ॥ जनम मरण दोऊ दुख भागे ॥३॥

भगत जना कउ हरि किरपा धारी ॥ गुरु नानकु तुठा मिलिआ बनवारी ॥४॥२॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1178) बसंतु हिंडोल महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥ सतिगुरु मिलै त खोजीऐ मिलि जोती जोति समानी ॥१॥

माधो साधू जन देहु मिलाइ ॥ देखत दरसु पाप सभि नासहि पवित्र परम पदु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

पंच चोर मिलि लागे नगरीआ राम नाम धनु हिरिआ ॥ गुरमति खोज परे तब पकरे धनु साबतु रासि उबरिआ ॥२॥

पाखंड भरम उपाव करि थाके रिद अंतरि माइआ माइआ ॥ साधू पुरखु पुरखपति पाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥३॥

जगंनाथ जगदीस गुसाई करि किरपा साधु मिलावै ॥ नानक सांति होवै मन अंतरि नित हिरदै हरि गुण गावै ॥४॥१॥३॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1178) बसंतु महला ४ हिंडोल ॥
तुम्ह वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥ हरि दीन दइआल करहु प्रभ किरपा गुर सतिगुर चरण हम बनछे ॥१॥

गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि करि क्रिपछे ॥ जनम जनम के किलविख मलु भरिआ मिलि संगति करि प्रभ हनछे ॥१॥ रहाउ ॥

तुम्हरा जनु जाति अविजाता हरि जपिओ पतित पवीछे ॥ हरि कीओ सगल भवन ते ऊपरि हरि सोभा हरि प्रभ दिनछे ॥२॥

जाति अजाति कोई प्रभ धिआवै सभि पूरे मानस तिनछे ॥ से धंनि वडे वड पूरे हरि जन जिन्ह हरि धारिओ हरि उरछे ॥३॥

हम ढींढे ढीम बहुतु अति भारी हरि धारि क्रिपा प्रभ मिलछे ॥ जन नानक गुरु पाइआ हरि तूठे हम कीए पतित पवीछे ॥४॥२॥४॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1178) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥ जिउ बारिकु रसकि परिओ थनि माता थनि काढे बिलल बिलीधे ॥१॥

गोबिंद जीउ मेरे मन तन नाम हरि बीधे ॥ वडै भागि गुरु सतिगुरु पाइआ विचि काइआ नगर हरि सीधे ॥१॥ रहाउ ॥

जन के सास सास है जेते हरि बिरहि प्रभू हरि बीधे ॥ जिउ जल कमल प्रीति अति भारी बिनु जल देखे सुकलीधे ॥२॥

जन जपिओ नामु निरंजनु नरहरि उपदेसि गुरू हरि प्रीधे ॥ जनम जनम की हउमै मलु निकसी हरि अम्रिति हरि जलि नीधे ॥३॥

हमरे करम न बिचरहु ठाकुर तुम्ह पैज रखहु अपनीधे ॥ हरि भावै सुणि बिनउ बेनती जन नानक सरणि पवीधे ॥४॥३॥५॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1179) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
मनु खिनु खिनु भरमि भरमि बहु धावै तिलु घरि नही वासा पाईऐ ॥ गुरि अंकसु सबदु दारू सिरि धारिओ घरि मंदरि आणि वसाईऐ ॥१॥

गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि हरि धिआईऐ ॥ हउमै रोगु गइआ सुखु पाइआ हरि सहजि समाधि लगाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

घरि रतन लाल बहु माणक लादे मनु भ्रमिआ लहि न सकाईऐ ॥ जिउ ओडा कूपु गुहज खिन काढै तिउ सतिगुरि वसतु लहाईऐ ॥२॥

जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते ध्रिगु ध्रिगु नर जीवाईऐ ॥ जनमु पदारथु पुंनि फलु पाइआ कउडी बदलै जाईऐ ॥३॥

मधुसूदन हरि धारि प्रभ किरपा करि किरपा गुरू मिलाईऐ ॥ जन नानक निरबाण पदु पाइआ मिलि साधू हरि गुण गाईऐ ॥४॥४॥६॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1179) बसंतु हिंडोल महला ४ ॥
आवण जाणु भइआ दुखु बिखिआ देह मनमुख सुंञी सुंञु ॥ राम नामु खिनु पलु नही चेतिआ जमि पकरे कालि सलुंञु ॥१॥

गोबिंद जीउ बिखु हउमै ममता मुंञु ॥ सतसंगति गुर की हरि पिआरी मिलि संगति हरि रसु भुंञु ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगति साध दइआ करि मेलहु सरणागति साधू पंञु ॥ हम डुबदे पाथर काढि लेहु प्रभ तुम्ह दीन दइआल दुख भंञु ॥२॥

हरि उसतति धारहु रिद अंतरि सुआमी सतसंगति मिलि बुधि लंञु ॥ हरि नामै हम प्रीति लगानी हम हरि विटहु घुमि वंञु ॥३॥

जन के पूरि मनोरथ हरि प्रभ हरि नामु देवहु हरि लंञु ॥ जन नानक मनि तनि अनदु भइआ है गुरि मंत्रु दीओ हरि भंञु ॥४॥५॥७॥१२॥१८॥७॥३७॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1191) बसंतु हिंडोलु घरु २ महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कांइआ नगरि इकु बालकु वसिआ खिनु पलु थिरु न रहाई ॥ अनिक उपाव जतन करि थाके बारं बार भरमाई ॥१॥

मेरे ठाकुर बालकु इकतु घरि आणु ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ भजु राम नामु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मिरतकु मड़ा सरीरु है सभु जगु जितु राम नामु नही वसिआ ॥ राम नामु गुरि उदकु चुआइआ फिरि हरिआ होआ रसिआ ॥२॥

मै निरखत निरखत सरीरु सभु खोजिआ इकु गुरमुखि चलतु दिखाइआ ॥ बाहरु खोजि मुए सभि साकत हरि गुरमती घरि पाइआ ॥३॥

दीना दीन दइआल भए है जिउ क्रिसनु बिदर घरि आइआ ॥ मिलिओ सुदामा भावनी धारि सभु किछु आगै दालदु भंजि समाइआ ॥४॥

राम नाम की पैज वडेरी मेरे ठाकुरि आपि रखाई ॥ जे सभि साकत करहि बखीली इक रती तिलु न घटाई ॥५॥

जन की उसतति है राम नामा दह दिसि सोभा पाई ॥ निंदकु साकतु खवि न सकै तिलु अपणै घरि लूकी लाई ॥६॥

जन कउ जनु मिलि सोभा पावै गुण महि गुण परगासा ॥ मेरे ठाकुर के जन प्रीतम पिआरे जो होवहि दासनि दासा ॥७॥

आपे जलु अपर्मपरु करता आपे मेलि मिलावै ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलाए जिउ जलु जलहि समावै ॥८॥१॥९॥

(राग सारंग -- SGGS 1198) सारंग महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संत जना की हम धूरि ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ आतम रामु रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु संतु मिलै सांति पाईऐ किलविख दुख काटे सभि दूरि ॥ आतम जोति भई परफूलित पुरखु निरंजनु देखिआ हजूरि ॥१॥

वडै भागि सतसंगति पाई हरि हरि नामु रहिआ भरपूरि ॥ अठसठि तीरथ मजनु कीआ सतसंगति पग नाए धूरि ॥२॥

दुरमति बिकार मलीन मति होछी हिरदा कुसुधु लागा मोह कूरु ॥ बिनु करमा किउ संगति पाईऐ हउमै बिआपि रहिआ मनु झूरि ॥३॥

होहु दइआल क्रिपा करि हरि जी मागउ सतसंगति पग धूरि ॥ नानक संतु मिलै हरि पाईऐ जनु हरि भेटिआ रामु हजूरि ॥४॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1198) सारंग महला ४ ॥
गोबिंद चरनन कउ बलिहारी ॥ भवजलु जगतु न जाई तरणा जपि हरि हरि पारि उतारी ॥१॥ रहाउ ॥

हिरदै प्रतीति बनी प्रभ केरी सेवा सुरति बीचारी ॥ अनदिनु राम नामु जपि हिरदै सरब कला गुणकारी ॥१॥

प्रभु अगम अगोचरु रविआ स्रब ठाई मनि तनि अलख अपारी ॥ गुर किरपाल भए तब पाइआ हिरदै अलखु लखारी ॥२॥

अंतरि हरि नामु सरब धरणीधर साकत कउ दूरि भइआ अहंकारी ॥ त्रिसना जलत न कबहू बूझहि जूऐ बाजी हारी ॥३॥

ऊठत बैठत हरि गुन गावहि गुरि किंचत किरपा धारी ॥ नानक जिन कउ नदरि भई है तिन की पैज सवारी ॥४॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
हरि हरि अम्रित नामु देहु पिआरे ॥ जिन ऊपरि गुरमुखि मनु मानिआ तिन के काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

जो जन दीन भए गुर आगै तिन के दूख निवारे ॥ अनदिनु भगति करहि गुर आगै गुर कै सबदि सवारे ॥१॥

हिरदै नामु अम्रित रसु रसना रसु गावहि रसु बीचारे ॥ गुर परसादि अम्रित रसु चीन्हिआ ओइ पावहि मोख दुआरे ॥२॥

सतिगुरु पुरखु अचलु अचला मति जिसु द्रिड़ता नामु अधारे ॥ तिसु आगै जीउ देवउ अपुना हउ सतिगुर कै बलिहारे ॥३॥

मनमुख भ्रमि दूजै भाइ लागे अंतरि अगिआन गुबारे ॥ सतिगुरु दाता नदरि न आवै ना उरवारि न पारे ॥४॥

सरबे घटि घटि रविआ सुआमी सरब कला कल धारे ॥ नानकु दासनि दासु कहत है करि किरपा लेहु उबारे ॥५॥३॥

(राग सारंग -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
गोबिद की ऐसी कार कमाइ ॥ जो किछु करे सु सति करि मानहु गुरमुखि नामि रहहु लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गोबिद प्रीति लगी अति मीठी अवर विसरि सभ जाइ ॥ अनदिनु रहसु भइआ मनु मानिआ जोती जोति मिलाइ ॥१॥

जब गुण गाइ तब ही मनु त्रिपतै सांति वसै मनि आइ ॥ गुर किरपाल भए तब पाइआ हरि चरणी चितु लाइ ॥२॥

मति प्रगास भई हरि धिआइआ गिआनि तति लिव लाइ ॥ अंतरि जोति प्रगटी मनु मानिआ हरि सहजि समाधि लगाइ ॥३॥

हिरदै कपटु नित कपटु कमावहि मुखहु हरि हरि सुणाइ ॥ अंतरि लोभु महा गुबारा तुह कूटै दुख खाइ ॥४॥

जब सुप्रसंन भए प्रभ मेरे गुरमुखि परचा लाइ ॥ नानक नाम निरंजनु पाइआ नामु जपत सुखु पाइ ॥५॥४॥

(राग सारंग -- SGGS 1199) सारग महला ४ ॥
मेरा मनु राम नामि मनु मानी ॥ मेरै हीअरै सतिगुरि प्रीति लगाई मनि हरि हरि कथा सुखानी ॥१॥ रहाउ ॥

दीन दइआल होवहु जन ऊपरि जन देवहु अकथ कहानी ॥ संत जना मिलि हरि रसु पाइआ हरि मनि तनि मीठ लगानी ॥१॥

हरि कै रंगि रते बैरागी जिन्ह गुरमति नामु पछानी ॥ पुरखै पुरखु मिलिआ सुखु पाइआ सभ चूकी आवण जानी ॥२॥

नैणी बिरहु देखा प्रभ सुआमी रसना नामु वखानी ॥ स्रवणी कीरतनु सुनउ दिनु राती हिरदै हरि हरि भानी ॥३॥

पंच जना गुरि वसगति आणे तउ उनमनि नामि लगानी ॥ जन नानक हरि किरपा धारी हरि रामै नामि समानी ॥४॥५॥

(राग सारंग -- SGGS 1200) सारग महला ४ ॥
जपि मन राम नामु पड़्हु सारु ॥ राम नाम बिनु थिरु नही कोई होरु निहफल सभु बिसथारु ॥१॥ रहाउ ॥

किआ लीजै किआ तजीऐ बउरे जो दीसै सो छारु ॥ जिसु बिखिआ कउ तुम्ह अपुनी करि जानहु सा छाडि जाहु सिरि भारु ॥१॥

तिलु तिलु पलु पलु अउध फुनि घाटै बूझि न सकै गवारु ॥ सो किछु करै जि साथि न चालै इहु साकत का आचारु ॥२॥

संत जना कै संगि मिलु बउरे तउ पावहि मोख दुआरु ॥ बिनु सतसंग सुखु किनै न पाइआ जाइ पूछहु बेद बीचारु ॥३॥

राणा राउ सभै कोऊ चालै झूठु छोडि जाइ पासारु ॥ नानक संत सदा थिरु निहचलु जिन राम नामु आधारु ॥४॥६॥

(राग सारंग -- SGGS 1200) सारग महला ४ घरु ३ दुपदा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे पूत झगरत हउ संगि बाप ॥ जिन के जणे बडीरे तुम हउ तिन सिउ झगरत पाप ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु धन का तुम गरबु करत हउ सो धनु किसहि न आप ॥ खिन महि छोडि जाइ बिखिआ रसु तउ लागै पछुताप ॥१॥

जो तुमरे प्रभ होते सुआमी हरि तिन के जापहु जाप ॥ उपदेसु करत नानक जन तुम कउ जउ सुनहु तउ जाइ संताप ॥२॥१॥७॥

(राग सारंग -- SGGS 1200) सारग महला ४ घरु ५ दुपदे पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन जगंनाथ जगदीसरो जगजीवनो मनमोहन सिउ प्रीति लागी मै हरि हरि हरि टेक सभ दिनसु सभ राति ॥१॥ रहाउ ॥

हरि की उपमा अनिक अनिक अनिक गुन गावत सुक नारद ब्रहमादिक तव गुन सुआमी गनिन न जाति ॥ तू हरि बेअंतु तू हरि बेअंतु तू हरि सुआमी तू आपे ही जानहि आपनी भांति ॥१॥

हरि कै निकटि निकटि हरि निकट ही बसते ते हरि के जन साधू हरि भगात ॥ ते हरि के जन हरि सिउ रलि मिले जैसे जन नानक सललै सलल मिलाति ॥२॥१॥८॥

(राग सारंग -- SGGS 1201) सारंग महला ४ ॥
जपि मन नरहरे नरहर सुआमी हरि सगल देव देवा स्री राम राम नामा हरि प्रीतमु मोरा ॥१॥ रहाउ ॥

जितु ग्रिहि गुन गावते हरि के गुन गावते राम गुन गावते तितु ग्रिहि वाजे पंच सबद वड भाग मथोरा ॥ तिन्ह जन के सभि पाप गए सभि दोख गए सभि रोग गए कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु गए तिन्ह जन के हरि मारि कढे पंच चोरा ॥१॥

हरि राम बोलहु हरि साधू हरि के जन साधू जगदीसु जपहु मनि बचनि करमि हरि हरि आराधू हरि के जन साधू ॥ हरि राम बोलि हरि राम बोलि सभि पाप गवाधू ॥ नित नित जागरणु करहु सदा सदा आनंदु जपि जगदीसोरा ॥ मन इछे फल पावहु सभै फल पावहु धरमु अरथु काम मोखु जन नानक हरि सिउ मिले हरि भगत तोरा ॥२॥२॥९॥

(राग सारंग -- SGGS 1201) सारग महला ४ ॥
जपि मन माधो मधुसूदनो हरि स्रीरंगो परमेसरो सति परमेसरो प्रभु अंतरजामी ॥ सभ दूखन को हंता सभ सूखन को दाता हरि प्रीतम गुन गाओ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि घटि घटे घटि बसता हरि जलि थले हरि बसता हरि थान थानंतरि बसता मै हरि देखन को चाओ ॥ कोई आवै संतो हरि का जनु संतो मेरा प्रीतम जनु संतो मोहि मारगु दिखलावै ॥ तिसु जन के हउ मलि मलि धोवा पाओ ॥१॥

हरि जन कउ हरि मिलिआ हरि सरधा ते मिलिआ गुरमुखि हरि मिलिआ ॥ मेरै मनि तनि आनंद भए मै देखिआ हरि राओ ॥ जन नानक कउ किरपा भई हरि की किरपा भई जगदीसुर किरपा भई ॥ मै अनदिनो सद सद सदा हरि जपिआ हरि नाओ ॥२॥३॥१०॥

(राग सारंग -- SGGS 1201) सारग महला ४ ॥
जपि मन निरभउ ॥ सति सति सदा सति ॥ निरवैरु अकाल मूरति ॥ आजूनी स्मभउ ॥ मेरे मन अनदिनो धिआइ निरंकारु निराहारी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि दरसन कउ हरि दरसन कउ कोटि कोटि तेतीस सिध जती जोगी तट तीरथ परभवन करत रहत निराहारी ॥ तिन जन की सेवा थाइ पई जिन्ह कउ किरपाल होवतु बनवारी ॥१॥

हरि के हो संत भले ते ऊतम भगत भले जो भावत हरि राम मुरारी ॥ जिन्ह का अंगु करै मेरा सुआमी तिन्ह की नानक हरि पैज सवारी ॥२॥४॥११॥

(राग सारंग -- SGGS 1202) सारग महला ४ पड़ताल ॥
जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का नामु अम्रितु हरि हरि हरे सो पीऐ जिसु रामु पिआसी ॥ हरि आपि दइआलु दइआ करि मेलै जिसु सतिगुरू सो जनु हरि हरि अम्रित नामु चखासी ॥१॥

जो जन सेवहि सद सदा मेरा हरि हरे तिन का सभु दूखु भरमु भउ जासी ॥ जनु नानकु नामु लए तां जीवै जिउ चात्रिकु जलि पीऐ त्रिपतासी ॥२॥५॥१२॥

(राग सारंग -- SGGS 1202) सारग महला ४ ॥
जपि मन सिरी रामु ॥ राम रमत रामु ॥ सति सति रामु ॥ बोलहु भईआ सद राम रामु रामु रवि रहिआ सरबगे ॥१॥ रहाउ ॥

रामु आपे आपि आपे सभु करता रामु आपे आपि आपि सभतु जगे ॥ जिसु आपि क्रिपा करे मेरा राम राम राम राइ सो जनु राम नाम लिव लागे ॥१॥

राम नाम की उपमा देखहु हरि संतहु जो भगत जनां की पति राखै विचि कलिजुग अगे ॥ जन नानक का अंगु कीआ मेरै राम राइ दुसमन दूख गए सभि भगे ॥२॥६॥१३॥

(राग सारंग -- SGGS 1237) सारंग की वार महला ४ राइ महमे हसने की धुनि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

(राग सारंग -- SGGS 1237) पउड़ी ॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥ आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥ त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥ गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥ नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1238) पउड़ी ॥
गुरमुखि चलतु रचाइओनु गुण परगटी आइआ ॥ गुरबाणी सद उचरै हरि मंनि वसाइआ ॥ सकति गई भ्रमु कटिआ सिव जोति जगाइआ ॥ जिन कै पोतै पुंनु है गुरु पुरखु मिलाइआ ॥ नानक सहजे मिलि रहे हरि नामि समाइआ ॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1238) पउड़ी ॥
मनमुखि दूजा भरमु है दूजै लोभाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ो आलाइआ ॥ पुत्र कलत्रु मोहु हेतु है सभु दुखु सबाइआ ॥ जम दरि बधे मारीअहि भरमहि भरमाइआ ॥ मनमुखि जनमु गवाइआ नानक हरि भाइआ ॥३॥

(राग सारंग -- SGGS 1239) पउड़ी ॥
हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥ नामु निरंजनु उचरां पति सिउ घरि जांई ॥ गुरमुखि बाणी नामु है नामु रिदै वसाई ॥ मति पंखेरू वसि होइ सतिगुरू धिआईं ॥ नानक आपि दइआलु होइ नामे लिव लाई ॥४॥

(राग सारंग -- SGGS 1239) पउड़ी ॥
नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥ सुणि सुणि मंनि वसाईऐ बूझै जनु कोई ॥ बहदिआ उठदिआ न विसरै साचा सचु सोई ॥ भगता कउ नाम अधारु है नामे सुखु होई ॥ नानक मनि तनि रवि रहिआ गुरमुखि हरि सोई ॥५॥

(राग सारंग -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥ नाइ सुणिऐ मनु त्रिपतीऐ सभ दुख गवाई ॥ नाइ सुणिऐ नाउ ऊपजै नामे वडिआई ॥ नामे ही सभ जाति पति नामे गति पाई ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ नानक लिव लाई ॥६॥

(राग सारंग -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥ नाइ सुणिऐ नउ निधि मिलै मन चिंदिआ पावै ॥ नाइ सुणिऐ संतोखु होइ कवला चरन धिआवै ॥ नाइ सुणिऐ सहजु ऊपजै सहजे सुखु पावै ॥ गुरमती नाउ पाईऐ नानक गुण गावै ॥७॥

(राग सारंग -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥ नाइ सुणिऐ घटि चानणा आन्हेरु गवावै ॥ नाइ सुणिऐ आपु बुझीऐ लाहा नाउ पावै ॥ नाइ सुणिऐ पाप कटीअहि निरमल सचु पावै ॥ नानक नाइ सुणिऐ मुख उजले नाउ गुरमुखि धिआवै ॥८॥

(राग सारंग -- SGGS 1241) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥ नाइ मंनिऐ पति पाईऐ हिरदै हरि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भवजलु लंघीऐ फिरि बिघनु न होई ॥ नाइ मंनिऐ पंथु परगटा नामे सभ लोई ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥९॥

(राग सारंग -- SGGS 1241) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुट्मबु सबाइआ ॥ नाइ मंनिऐ संगति उधरै जिन रिदै वसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सुणि उधरे जिन रसन रसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ दुख भुख गई जिन नामि चितु लाइआ ॥ नानक नामु तिनी सालाहिआ जिन गुरू मिलाइआ ॥१०॥

(राग सारंग -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ दुरमति गई मति परगटी आइआ ॥ नाउ मंनिऐ हउमै गई सभि रोग गवाइआ ॥ नाइ मंनिऐ नामु ऊपजै सहजे सुखु पाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सांति ऊपजै हरि मंनि वसाइआ ॥ नानक नामु रतंनु है गुरमुखि हरि धिआइआ ॥११॥

(राग सारंग -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुरति ऊपजै नामे मति होई ॥ नाइ मंनिऐ गुण उचरै नामे सुखि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भ्रमु कटीऐ फिरि दुखु न होई ॥ नाइ मंनिऐ सालाहीऐ पापां मति धोई ॥ नानक पूरे गुर ते नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥१२॥

(राग सारंग -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥ नामु निरंजन नालि है किउ पाईऐ भाई ॥ नामु निरंजन वरतदा रविआ सभ ठांई ॥ गुर पूरे ते पाईऐ हिरदै देइ दिखाई ॥ नानक नदरी करमु होइ गुर मिलीऐ भाई ॥१३॥

(राग सारंग -- SGGS 1243) पउड़ी ॥
बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥ खिंथा झोली बहु भेख करे दुरमति अहंकारी ॥ साहिब सबदु न ऊचरै माइआ मोह पसारी ॥ अंतरि लालचु भरमु है भरमै गावारी ॥ नानक नामु न चेतई जूऐ बाजी हारी ॥१४॥

(राग सारंग -- SGGS 1243) पउड़ी ॥
जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ु परगटी आइआ ॥ अंदरि होइ सु निकलै नह छपै छपाइआ ॥ कूड़ै लालचि लगिआ फिरि जूनी पाइआ ॥ नानक जो बीजै सो खावणा करतै लिखि पाइआ ॥१५॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
निमु बिरखु बहु संचीऐ अम्रित रसु पाइआ ॥ बिसीअरु मंत्रि विसाहीऐ बहु दूधु पीआइआ ॥ मनमुखु अभिंनु न भिजई पथरु नावाइआ ॥ बिखु महि अम्रितु सिंचीऐ बिखु का फलु पाइआ ॥ नानक संगति मेलि हरि सभ बिखु लहि जाइआ ॥१६॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥ महा करूप दुखीए सदा काले मुह माइआ ॥ भलके उठि नित पर दरबु हिरहि हरि नामु चुराइआ ॥ हरि जीउ तिन की संगति मत करहु रखि लेहु हरि राइआ ॥ नानक पइऐ किरति कमावदे मनमुखि दुखु पाइआ ॥१७॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) सलोक मः ४ ॥
सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का ता सचु पावै कोइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ बुरा न दीसै कोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सहिला आइआ सोइ ॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) मः ४ ॥
सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥ नानक सबदि मिले न विछुड़हि जिना सेविआ हरि दातारु ॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ ॥ जप तप तीरथ संजम करे मेरे प्रभ भाइआ ॥ हिरदा सुधु हरि सेवदे सोहहि गुण गाइआ ॥ मेरे हरि जीउ एवै भावदा गुरमुखि तराइआ ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु हरि दरि सोहाइआ ॥१८॥

(राग सारंग -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥ गुर परसादी घटि चानणा आन्हेरु गवाइआ ॥ लोहा पारसि भेटीऐ कंचनु होइ आइआ ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाईऐ मिलि नामु धिआइआ ॥ जिन्ह कै पोतै पुंनु है तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१९॥

(राग सारंग -- SGGS 1245) पउड़ी ॥
सतिगुरु अम्रित बिरखु है अम्रित रसि फलिआ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर सबदी मिलिआ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै हरि सेती रलिआ ॥ जमकालु जोहि न सकई घटि चानणु बलिआ ॥ नानक बखसि मिलाइअनु फिरि गरभि न गलिआ ॥२०॥

(राग सारंग -- SGGS 1245) पउड़ी ॥
भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥ करि करि हेतु वधाइदे पर दरबु चुराइआ ॥ पुत्र कलत्र न विसहहि बहु प्रीति लगाइआ ॥ वेखदिआ ही माइआ धुहि गई पछुतहि पछुताइआ ॥ जम दरि बधे मारीअहि नानक हरि भाइआ ॥२१॥

(राग सारंग -- SGGS 1246) पउड़ी ॥
गुरमुखि सभ पवितु है धनु स्मपै माइआ ॥ हरि अरथि जो खरचदे देंदे सुखु पाइआ ॥ जो हरि नामु धिआइदे तिन तोटि न आइआ ॥ गुरमुखां नदरी आवदा माइआ सुटि पाइआ ॥ नानक भगतां होरु चिति न आवई हरि नामि समाइआ ॥२२॥

(राग सारंग -- SGGS 1246) सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥ सचै सबदि जिन्हा एक लिव लागी ॥ गिरह कुट्मब महि सहजि समाधी ॥ नानक नामि रते से सचे बैरागी ॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1246) मः ४ ॥
गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥ सबदै सादु न आइओ सचि न लगो भाउ ॥ सतिगुरु पिआरा न लगई मनहठि आवै जाइ ॥ जे इक विख अगाहा भरे तां दस विखां पिछाहा जाइ ॥ सतिगुर की सेवा चाकरी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ आपु गवाइ सतिगुरू नो मिलै सहजे रहै समाइ ॥ नानक तिन्हा नामु न वीसरै सचे मेलि मिलाइ ॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1246) पउड़ी ॥
खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥ गड़्ह मंदर गच गीरीआ किछु साथि न जाई ॥ सोइन साखति पउण वेग ध्रिगु ध्रिगु चतुराई ॥ छतीह अम्रित परकार करहि बहु मैलु वधाई ॥ नानक जो देवै तिसहि न जाणन्ही मनमुखि दुखु पाई ॥२३॥

(राग सारंग -- SGGS 1247) पउड़ी ॥
गड़्हि काइआ सीगार बहु भांति बणाई ॥ रंग परंग कतीफिआ पहिरहि धर माई ॥ लाल सुपेद दुलीचिआ बहु सभा बणाई ॥ दुखु खाणा दुखु भोगणा गरबै गरबाई ॥ नानक नामु न चेतिओ अंति लए छडाई ॥२४॥

(राग सारंग -- SGGS 1247) पउड़ी ॥
नामु सलाहनि नामु मंनि असथिरु जगि सोई ॥ हिरदै हरि हरि चितवै दूजा नही कोई ॥ रोमि रोमि हरि उचरै खिनु खिनु हरि सोई ॥ गुरमुखि जनमु सकारथा निरमलु मलु खोई ॥ नानक जीवदा पुरखु धिआइआ अमरा पदु होई ॥२५॥

(राग सारंग -- SGGS 1247) पउड़ी ॥
नामु सलाहनि भाउ करि निज महली वासा ॥ ओइ बाहुड़ि जोनि न आवनी फिरि होहि न बिनासा ॥ हरि सेती रंगि रवि रहे सभ सास गिरासा ॥ हरि का रंगु कदे न उतरै गुरमुखि परगासा ॥ ओइ किरपा करि कै मेलिअनु नानक हरि पासा ॥२६॥

(राग सारंग -- SGGS 1247) पउड़ी ॥
सभु को लेखे विचि है मनमुखु अहंकारी ॥ हरि नामु कदे न चेतई जमकालु सिरि मारी ॥ पाप बिकार मनूर सभि लदे बहु भारी ॥ मारगु बिखमु डरावणा किउ तरीऐ तारी ॥ नानक गुरि राखे से उबरे हरि नामि उधारी ॥२७॥

(राग सारंग -- SGGS 1248) पउड़ी ॥
लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥ पुछि न सकै कोइ हरि दरि सद ढोई ॥ जमकालु मिलै दे भेट सेवकु नित होई ॥ पूरे गुर ते महलु पाइआ पति परगटु लोई ॥ नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिआ हरि सोई ॥२८॥

(राग सारंग -- SGGS 1248) पउड़ी ॥
मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥ हरि दरसन की पिआस है दरसनि त्रिपताइ ॥ खिनु पलु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरां माइ ॥ सतिगुरि नालि दिखालिआ रवि रहिआ सभ थाइ ॥ सुतिआ आपि उठालि देइ नानक लिव लाइ ॥२९॥


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