Pt 23 - गुरू नानक देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 23 - Guru Nanak Dev ji (Mahalla 1) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग प्रभाती दखणी -- SGGS 1344) प्रभाती महला १ दखणी ॥
गोतमु तपा अहिलिआ इसत्री तिसु देखि इंद्रु लुभाइआ ॥ सहस सरीर चिहन भग हूए ता मनि पछोताइआ ॥१॥

कोई जाणि न भूलै भाई ॥ सो भूलै जिसु आपि भुलाए बूझै जिसै बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

तिनि हरी चंदि प्रिथमी पति राजै कागदि कीम न पाई ॥ अउगणु जाणै त पुंन करे किउ किउ नेखासि बिकाई ॥२॥

करउ अढाई धरती मांगी बावन रूपि बहानै ॥ किउ पइआलि जाइ किउ छलीऐ जे बलि रूपु पछानै ॥३॥

राजा जनमेजा दे मतीं बरजि बिआसि पड़्हाइआ ॥ तिन्हि करि जग अठारह घाए किरतु न चलै चलाइआ ॥४॥

गणत न गणीं हुकमु पछाणा बोली भाइ सुभाई ॥ जो किछु वरतै तुधै सलाहीं सभ तेरी वडिआई ॥५॥

गुरमुखि अलिपतु लेपु कदे न लागै सदा रहै सरणाई ॥ मनमुखु मुगधु आगै चेतै नाही दुखि लागै पछुताई ॥६॥

आपे करे कराए करता जिनि एह रचना रचीऐ ॥ हरि अभिमानु न जाई जीअहु अभिमाने पै पचीऐ ॥७॥

भुलण विचि कीआ सभु कोई करता आपि न भुलै ॥ नानक सचि नामि निसतारा को गुर परसादि अघुलै ॥८॥४॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1344) प्रभाती महला १ ॥
आखणा सुनणा नामु अधारु ॥ धंधा छुटकि गइआ वेकारु ॥ जिउ मनमुखि दूजै पति खोई ॥ बिनु नावै मै अवरु न कोई ॥१॥

सुणि मन अंधे मूरख गवार ॥ आवत जात लाज नही लागै बिनु गुर बूडै बारो बार ॥१॥ रहाउ ॥

इसु मन माइआ मोहि बिनासु ॥ धुरि हुकमु लिखिआ तां कहीऐ कासु ॥ गुरमुखि विरला चीन्है कोई ॥ नाम बिहूना मुकति न होई ॥२॥

भ्रमि भ्रमि डोलै लख चउरासी ॥ बिनु गुर बूझे जम की फासी ॥ इहु मनूआ खिनु खिनु ऊभि पइआलि ॥ गुरमुखि छूटै नामु सम्हालि ॥३॥

आपे सदे ढिल न होइ ॥ सबदि मरै सहिला जीवै सोइ ॥ बिनु गुर सोझी किसै न होइ ॥ आपे करै करावै सोइ ॥४॥

झगड़ु चुकावै हरि गुण गावै ॥ पूरा सतिगुरु सहजि समावै ॥ इहु मनु डोलत तउ ठहरावै ॥ सचु करणी करि कार कमावै ॥५॥

अंतरि जूठा किउ सुचि होइ ॥ सबदी धोवै विरला कोइ ॥ गुरमुखि कोई सचु कमावै ॥ आवणु जाणा ठाकि रहावै ॥६॥

भउ खाणा पीणा सुखु सारु ॥ हरि जन संगति पावै पारु ॥ सचु बोलै बोलावै पिआरु ॥ गुर का सबदु करणी है सारु ॥७॥

हरि जसु करमु धरमु पति पूजा ॥ काम क्रोध अगनी महि भूंजा ॥ हरि रसु चाखिआ तउ मनु भीजा ॥ प्रणवति नानकु अवरु न दूजा ॥८॥५॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1345) प्रभाती महला १ ॥
राम नामु जपि अंतरि पूजा ॥ गुर सबदु वीचारि अवरु नही दूजा ॥१॥

एको रवि रहिआ सभ ठाई ॥ अवरु न दीसै किसु पूज चड़ाई ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु आगै जीअड़ा तुझ पासि ॥ जिउ भावै तिउ रखहु अरदासि ॥२॥

सचु जिहवा हरि रसन रसाई ॥ गुरमति छूटसि प्रभ सरणाई ॥३॥

करम धरम प्रभि मेरै कीए ॥ नामु वडाई सिरि करमां कीए ॥४॥

सतिगुर कै वसि चारि पदारथ ॥ तीनि समाए एक क्रितारथ ॥५॥

सतिगुरि दीए मुकति धिआनां ॥ हरि पदु चीन्हि भए परधाना ॥६॥

मनु तनु सीतलु गुरि बूझ बुझाई ॥ प्रभु निवाजे किनि कीमति पाई ॥७॥

कहु नानक गुरि बूझ बुझाई ॥ नाम बिना गति किनै न पाई ॥८॥६॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1345) प्रभाती महला १ ॥
इकि धुरि बखसि लए गुरि पूरै सची बणत बणाई ॥ हरि रंग राते सदा रंगु साचा दुख बिसरे पति पाई ॥१॥

झूठी दुरमति की चतुराई ॥ बिनसत बार न लागै काई ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख कउ दुखु दरदु विआपसि मनमुखि दुखु न जाई ॥ सुख दुख दाता गुरमुखि जाता मेलि लए सरणाई ॥२॥

मनमुख ते अभ भगति न होवसि हउमै पचहि दिवाने ॥ इहु मनूआ खिनु ऊभि पइआली जब लगि सबद न जाने ॥३॥

भूख पिआसा जगु भइआ तिपति नही बिनु सतिगुर पाए ॥ सहजै सहजु मिलै सुखु पाईऐ दरगह पैधा जाए ॥४॥

दरगह दाना बीना इकु आपे निरमल गुर की बाणी ॥ आपे सुरता सचु वीचारसि आपे बूझै पदु निरबाणी ॥५॥

जलु तरंग अगनी पवनै फुनि त्रै मिलि जगतु उपाइआ ॥ ऐसा बलु छलु तिन कउ दीआ हुकमी ठाकि रहाइआ ॥६॥

ऐसे जन विरले जग अंदरि परखि खजानै पाइआ ॥ जाति वरन ते भए अतीता ममता लोभु चुकाइआ ॥७॥

नामि रते तीरथ से निरमल दुखु हउमै मैलु चुकाइआ ॥ नानकु तिन के चरन पखालै जिना गुरमुखि साचा भाइआ ॥८॥७॥

(SGGS 1353) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सलोक सहसक्रिती महला १ ॥
पड़्हि पुस्तक संधिआ बादं ॥ सिल पूजसि बगुल समाधं ॥ मुखि झूठु बिभूखन सारं ॥ त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥ गलि माला तिलक लिलाटं ॥ दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥ जो जानसि ब्रहमं करमं ॥ सभ फोकट निसचै करमं ॥ कहु नानक निसचौ िध्यावै ॥ बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥१॥

(SGGS 1353) निहफलं तस्य जनमस्य जावद ब्रहम न बिंदते ॥ सागरं संसारस्य गुर परसादी तरहि के ॥ करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥ कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥२॥

(SGGS 1353) जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं त ब्राहमणह ॥ ख्यत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥ सरब सबदं त एक सबदं जे को जानसि भेउ ॥ नानक ता को दासु है सोई निरंजन देउ ॥३॥

(SGGS 1353) एक क्रिस्नं त सरब देवा देव देवा त आतमह ॥ आतमं स्री बास्वदेवस्य जे कोई जानसि भेव ॥ नानक ता को दासु है सोई निरंजन देव ॥४॥

(SGGS 1410) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सलोक वारां ते वधीक ॥
महला १ ॥
उतंगी पैओहरी गहिरी ग्मभीरी ॥ ससुड़ि सुहीआ किव करी निवणु न जाइ थणी ॥ गचु जि लगा गिड़वड़ी सखीए धउलहरी ॥ से भी ढहदे डिठु मै मुंध न गरबु थणी ॥१॥

(SGGS 1410) सुणि मुंधे हरणाखीए गूड़ा वैणु अपारु ॥ पहिला वसतु सिञाणि कै तां कीचै वापारु ॥ दोही दिचै दुरजना मित्रां कूं जैकारु ॥ जितु दोही सजण मिलनि लहु मुंधे वीचारु ॥ तनु मनु दीजै सजणा ऐसा हसणु सारु ॥ तिस सउ नेहु न कीचई जि दिसै चलणहारु ॥ नानक जिन्ही इव करि बुझिआ तिन्हा विटहु कुरबाणु ॥२॥

(SGGS 1410) जे तूं तारू पाणि ताहू पुछु तिड़ंन्ह कल ॥ ताहू खरे सुजाण वंञा एन्ही कपरी ॥३॥

(SGGS 1410) झड़ झखड़ ओहाड़ लहरी वहनि लखेसरी ॥ सतिगुर सिउ आलाइ बेड़े डुबणि नाहि भउ ॥४॥

(SGGS 1410) नानक दुनीआ कैसी होई ॥ सालकु मितु न रहिओ कोई ॥ भाई बंधी हेतु चुकाइआ ॥ दुनीआ कारणि दीनु गवाइआ ॥५॥

(SGGS 1410) है है करि कै ओहि करेनि ॥ गल्हा पिटनि सिरु खोहेनि ॥ नाउ लैनि अरु करनि समाइ ॥ नानक तिन बलिहारै जाइ ॥६॥

(SGGS 1410) रे मन डीगि न डोलीऐ सीधै मारगि धाउ ॥ पाछै बाघु डरावणो आगै अगनि तलाउ ॥ सहसै जीअरा परि रहिओ मा कउ अवरु न ढंगु ॥ नानक गुरमुखि छुटीऐ हरि प्रीतम सिउ संगु ॥७॥

(SGGS 1410) बाघु मरै मनु मारीऐ जिसु सतिगुर दीखिआ होइ ॥ आपु पछाणै हरि मिलै बहुड़ि न मरणा होइ ॥ कीचड़ि हाथु न बूडई एका नदरि निहालि ॥ नानक गुरमुखि उबरे गुरु सरवरु सची पालि ॥८॥

(SGGS 1411) अगनि मरै जलु लोड़ि लहु विणु गुर निधि जलु नाहि ॥ जनमि मरै भरमाईऐ जे लख करम कमाहि ॥ जमु जागाति न लगई जे चलै सतिगुर भाइ ॥ नानक निरमलु अमर पदु गुरु हरि मेलै मेलाइ ॥९॥

(SGGS 1411) कलर केरी छपड़ी कऊआ मलि मलि नाइ ॥ मनु तनु मैला अवगुणी चिंजु भरी गंधी आइ ॥ सरवरु हंसि न जाणिआ काग कुपंखी संगि ॥ साकत सिउ ऐसी प्रीति है बूझहु गिआनी रंगि ॥ संत सभा जैकारु करि गुरमुखि करम कमाउ ॥ निरमलु न्हावणु नानका गुरु तीरथु दरीआउ ॥१०॥

(SGGS 1411) जनमे का फलु किआ गणी जां हरि भगति न भाउ ॥ पैधा खाधा बादि है जां मनि दूजा भाउ ॥ वेखणु सुनणा झूठु है मुखि झूठा आलाउ ॥ नानक नामु सलाहि तू होरु हउमै आवउ जाउ ॥११॥

(SGGS 1411) हैनि विरले नाही घणे फैल फकड़ु संसारु ॥१२॥

नानक लगी तुरि मरै जीवण नाही ताणु ॥ चोटै सेती जो मरै लगी सा परवाणु ॥ जिस नो लाए तिसु लगै लगी ता परवाणु ॥ पिरम पैकामु न निकलै लाइआ तिनि सुजाणि ॥१३॥

(SGGS 1411) भांडा धोवै कउणु जि कचा साजिआ ॥ धातू पंजि रलाइ कूड़ा पाजिआ ॥ भांडा आणगु रासि जां तिसु भावसी ॥ परम जोति जागाइ वाजा वावसी ॥१४॥

(SGGS 1411) मनहु जि अंधे घूप कहिआ बिरदु न जाणनी ॥ मनि अंधै ऊंधै कवल दिसनि खरे करूप ॥ इकि कहि जाणनि कहिआ बुझनि ते नर सुघड़ सरूप ॥ इकना नादु न बेदु न गीअ रसु रसु कसु न जाणंति ॥ इकना सिधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥ नानक ते नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंत ॥१५॥

(SGGS 1411) सो ब्रहमणु जो बिंदै ब्रहमु ॥ जपु तपु संजमु कमावै करमु ॥ सील संतोख का रखै धरमु ॥ बंधन तोड़ै होवै मुकतु ॥ सोई ब्रहमणु पूजण जुगतु ॥१६॥

(SGGS 1411) खत्री सो जु करमा का सूरु ॥ पुंन दान का करै सरीरु ॥ खेतु पछाणै बीजै दानु ॥ सो खत्री दरगह परवाणु ॥ लबु लोभु जे कूड़ु कमावै ॥ अपणा कीता आपे पावै ॥१७॥

(SGGS 1411) तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥ सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी सम्हालि ॥१८॥

(SGGS 1412) सभनी घटी सहु वसै सह बिनु घटु न कोइ ॥ नानक ते सोहागणी जिन्हा गुरमुखि परगटु होइ ॥१९॥

(SGGS 1412) जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ ॥ सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥ इतु मारगि पैरु धरीजै ॥ सिरु दीजै काणि न कीजै ॥२०॥

(SGGS 1412) नालि किराड़ा दोसती कूड़ै कूड़ी पाइ ॥ मरणु न जापै मूलिआ आवै कितै थाइ ॥२१॥

(SGGS 1412) गिआन हीणं अगिआन पूजा ॥ अंध वरतावा भाउ दूजा ॥२२॥

(SGGS 1412) गुर बिनु गिआनु धरम बिनु धिआनु ॥ सच बिनु साखी मूलो न बाकी ॥२३॥

(SGGS 1412) माणू घलै उठी चलै ॥ सादु नाही इवेही गलै ॥२४॥

(SGGS 1412) रामु झुरै दल मेलवै अंतरि बलु अधिकार ॥ बंतर की सैना सेवीऐ मनि तनि जुझु अपारु ॥ सीता लै गइआ दहसिरो लछमणु मूओ सरापि ॥ नानक करता करणहारु करि वेखै थापि उथापि ॥२५॥

(SGGS 1412) मन महि झूरै रामचंदु सीता लछमण जोगु ॥ हणवंतरु आराधिआ आइआ करि संजोगु ॥ भूला दैतु न समझई तिनि प्रभ कीए काम ॥ नानक वेपरवाहु सो किरतु न मिटई राम ॥२६॥

लाहौर सहरु जहरु कहरु सवा पहरु ॥२७॥

(SGGS 1412) महला १ ॥
उदोसाहै किआ नीसानी तोटि न आवै अंनी ॥ उदोसीअ घरे ही वुठी कुड़िईं रंनी धमी ॥ सती रंनी घरे सिआपा रोवनि कूड़ी कमी ॥ जो लेवै सो देवै नाही खटे दम सहमी ॥२९॥

(SGGS 1412) पबर तूं हरीआवला कवला कंचन वंनि ॥ कै दोखड़ै सड़िओहि काली होईआ देहुरी नानक मै तनि भंगु ॥ जाणा पाणी ना लहां जै सेती मेरा संगु ॥ जितु डिठै तनु परफुड़ै चड़ै चवगणि वंनु ॥३०॥

(SGGS 1412) रजि न कोई जीविआ पहुचि न चलिआ कोइ ॥ गिआनी जीवै सदा सदा सुरती ही पति होइ ॥ सरफै सरफै सदा सदा एवै गई विहाइ ॥ नानक किस नो आखीऐ विणु पुछिआ ही लै जाइ ॥३१॥

(SGGS 1412) दोसु न देअहु राइ नो मति चलै जां बुढा होवै ॥ गलां करे घणेरीआ तां अंन्हे पवणा खाती टोवै ॥३२॥

(SGGS 1412) पूरे का कीआ सभ किछु पूरा घटि वधि किछु नाही ॥ नानक गुरमुखि ऐसा जाणै पूरे मांहि समांही ॥३३॥


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