Pt 18 - गुरू नानक देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 18 - Guru Nanak Dev ji (Mahalla 1) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग मारू -- SGGS 1031) मारू महला १ ॥
सरणि परे गुरदेव तुमारी ॥ तू समरथु दइआलु मुरारी ॥ तेरे चोज न जाणै कोई तू पूरा पुरखु बिधाता हे ॥१॥

तू आदि जुगादि करहि प्रतिपाला ॥ घटि घटि रूपु अनूपु दइआला ॥ जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि सभु तेरो कीआ कमाता हे ॥२॥

अंतरि जोति भली जगजीवन ॥ सभि घट भोगै हरि रसु पीवन ॥ आपे लेवै आपे देवै तिहु लोई जगत पित दाता हे ॥३॥

जगतु उपाइ खेलु रचाइआ ॥ पवणै पाणी अगनी जीउ पाइआ ॥ देही नगरी नउ दरवाजे सो दसवा गुपतु रहाता हे ॥४॥

चारि नदी अगनी असराला ॥ कोई गुरमुखि बूझै सबदि निराला ॥ साकत दुरमति डूबहि दाझहि गुरि राखे हरि लिव राता हे ॥५॥

अपु तेजु वाइ प्रिथमी आकासा ॥ तिन महि पंच ततु घरि वासा ॥ सतिगुर सबदि रहहि रंगि राता तजि माइआ हउमै भ्राता हे ॥६॥

इहु मनु भीजै सबदि पतीजै ॥ बिनु नावै किआ टेक टिकीजै ॥ अंतरि चोरु मुहै घरु मंदरु इनि साकति दूतु न जाता हे ॥७॥

दुंदर दूत भूत भीहाले ॥ खिंचोताणि करहि बेताले ॥ सबद सुरति बिनु आवै जावै पति खोई आवत जाता हे ॥८॥

कूड़ु कलरु तनु भसमै ढेरी ॥ बिनु नावै कैसी पति तेरी ॥ बाधे मुकति नाही जुग चारे जमकंकरि कालि पराता हे ॥९॥

जम दरि बाधे मिलहि सजाई ॥ तिसु अपराधी गति नही काई ॥ करण पलाव करे बिललावै जिउ कुंडी मीनु पराता हे ॥१०॥

साकतु फासी पड़ै इकेला ॥ जम वसि कीआ अंधु दुहेला ॥ राम नाम बिनु मुकति न सूझै आजु कालि पचि जाता हे ॥११॥

सतिगुर बाझु न बेली कोई ॥ ऐथै ओथै राखा प्रभु सोई ॥ राम नामु देवै करि किरपा इउ सललै सलल मिलाता हे ॥१२॥

भूले सिख गुरू समझाए ॥ उझड़ि जादे मारगि पाए ॥ तिसु गुर सेवि सदा दिनु राती दुख भंजन संगि सखाता हे ॥१३॥

गुर की भगति करहि किआ प्राणी ॥ ब्रहमै इंद्रि महेसि न जाणी ॥ सतिगुरु अलखु कहहु किउ लखीऐ जिसु बखसे तिसहि पछाता हे ॥१४॥

अंतरि प्रेमु परापति दरसनु ॥ गुरबाणी सिउ प्रीति सु परसनु ॥ अहिनिसि निरमल जोति सबाई घटि दीपकु गुरमुखि जाता हे ॥१५॥

भोजन गिआनु महा रसु मीठा ॥ जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा ॥ दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे ॥१६॥

सतिगुरु सेवहि से परधाना ॥ तिन घट घट अंतरि ब्रहमु पछाना ॥ नानक हरि जसु हरि जन की संगति दीजै जिन सतिगुरु हरि प्रभु जाता हे ॥१७॥५॥११॥

(राग मारू -- SGGS 1032) मारू महला १ ॥
साचे साहिब सिरजणहारे ॥ जिनि धर चक्र धरे वीचारे ॥ आपे करता करि करि वेखै साचा वेपरवाहा हे ॥१॥

वेकी वेकी जंत उपाए ॥ दुइ पंदी दुइ राह चलाए ॥ गुर पूरे विणु मुकति न होई सचु नामु जपि लाहा हे ॥२॥

पड़हि मनमुख परु बिधि नही जाना ॥ नामु न बूझहि भरमि भुलाना ॥ लै कै वढी देनि उगाही दुरमति का गलि फाहा हे ॥३॥

सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥ वादु वखाणहि ततु न जाणा ॥ विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ सच सूचे सचु राहा हे ॥४॥

सभ सालाहे सुणि सुणि आखै ॥ आपे दाना सचु पराखै ॥ जिन कउ नदरि करे प्रभु अपनी गुरमुखि सबदु सलाहा हे ॥५॥

सुणि सुणि आखै केती बाणी ॥ सुणि कहीऐ को अंतु न जाणी ॥ जा कउ अलखु लखाए आपे अकथ कथा बुधि ताहा हे ॥६॥

जनमे कउ वाजहि वाधाए ॥ सोहिलड़े अगिआनी गाए ॥ जो जनमै तिसु सरपर मरणा किरतु पइआ सिरि साहा हे ॥७॥

संजोगु विजोगु मेरै प्रभि कीए ॥ स्रिसटि उपाइ दुखा सुख दीए ॥ दुख सुख ही ते भए निराले गुरमुखि सीलु सनाहा हे ॥८॥

नीके साचे के वापारी ॥ सचु सउदा लै गुर वीचारी ॥ सचा वखरु जिसु धनु पलै सबदि सचै ओमाहा हे ॥९॥

काची सउदी तोटा आवै ॥ गुरमुखि वणजु करे प्रभ भावै ॥ पूंजी साबतु रासि सलामति चूका जम का फाहा हे ॥१०॥

सभु को बोलै आपण भाणै ॥ मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥ अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥११॥

दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥ दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥ दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥१२॥

सची करणी गुर की सिरकारा ॥ आवणु जाणु नही जम धारा ॥ डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥१३॥

हरि के लोग नही जमु मारै ॥ ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥ राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥१४॥

ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥ जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥ दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥१५॥

किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥ अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥ नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥१६॥६॥१२॥

(राग मारू दखणी -- SGGS 1033) मारू महला १ दखणी ॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥ साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥ असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥१॥

अंदरि कोट छजे हटनाले ॥ आपे लेवै वसतु समाले ॥ बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥२॥

भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥ नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥ दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥३॥

पउण पाणी अगनी इक वासा ॥ आपे कीतो खेलु तमासा ॥ बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥४॥

धरति उपाइ धरी धरम साला ॥ उतपति परलउ आपि निराला ॥ पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥५॥

भार अठारह मालणि तेरी ॥ चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥ चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥६॥

पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥ सफलिओ बिरखु अम्रित फलु पावहि ॥ गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥७॥

झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥ सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥ अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥८॥

पसरी किरणि जोति उजिआला ॥ करि करि देखै आपि दइआला ॥ अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥९॥

अनहदु वाजै भ्रमु भउ भाजै ॥ सगल बिआपि रहिआ प्रभु छाजै ॥ सभ तेरी तू गुरमुखि जाता दरि सोहै गुण गाइदा ॥१०॥

आदि निरंजनु निरमलु सोई ॥ अवरु न जाणा दूजा कोई ॥ एकंकारु वसै मनि भावै हउमै गरबु गवाइदा ॥११॥

अम्रितु पीआ सतिगुरि दीआ ॥ अवरु न जाणा दूआ तीआ ॥ एको एकु सु अपर पर्मपरु परखि खजानै पाइदा ॥१२॥

गिआनु धिआनु सचु गहिर ग्मभीरा ॥ कोइ न जाणै तेरा चीरा ॥ जेती है तेती तुधु जाचै करमि मिलै सो पाइदा ॥१३॥

करमु धरमु सचु हाथि तुमारै ॥ वेपरवाह अखुट भंडारै ॥ तू दइआलु किरपालु सदा प्रभु आपे मेलि मिलाइदा ॥१४॥

आपे देखि दिखावै आपे ॥ आपे थापि उथापे आपे ॥ आपे जोड़ि विछोड़े करता आपे मारि जीवाइदा ॥१५॥

जेती है तेती तुधु अंदरि ॥ देखहि आपि बैसि बिज मंदरि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती हरि दरसनि सुखु पाइदा ॥१६॥१॥१३॥

(राग मारू -- SGGS 1034) मारू महला १ ॥
दरसनु पावा जे तुधु भावा ॥ भाइ भगति साचे गुण गावा ॥ तुधु भाणे तू भावहि करते आपे रसन रसाइदा ॥१॥

सोहनि भगत प्रभू दरबारे ॥ मुकतु भए हरि दास तुमारे ॥ आपु गवाइ तेरै रंगि राते अनदिनु नामु धिआइदा ॥२॥

ईसरु ब्रहमा देवी देवा ॥ इंद्र तपे मुनि तेरी सेवा ॥ जती सती केते बनवासी अंतु न कोई पाइदा ॥३॥

विणु जाणाए कोइ न जाणै ॥ जो किछु करे सु आपण भाणै ॥ लख चउरासीह जीअ उपाए भाणै साह लवाइदा ॥४॥

जो तिसु भावै सो निहचउ होवै ॥ मनमुखु आपु गणाए रोवै ॥ नावहु भुला ठउर न पाए आइ जाइ दुखु पाइदा ॥५॥

निरमल काइआ ऊजल हंसा ॥ तिसु विचि नामु निरंजन अंसा ॥ सगले दूख अम्रितु करि पीवै बाहुड़ि दूखु न पाइदा ॥६॥

बहु सादहु दूखु परापति होवै ॥ भोगहु रोग सु अंति विगोवै ॥ हरखहु सोगु न मिटई कबहू विणु भाणे भरमाइदा ॥७॥

गिआन विहूणी भवै सबाई ॥ साचा रवि रहिआ लिव लाई ॥ निरभउ सबदु गुरू सचु जाता जोती जोति मिलाइदा ॥८॥

अटलु अडोलु अतोलु मुरारे ॥ खिन महि ढाहे फेरि उसारे ॥ रूपु न रेखिआ मिति नही कीमति सबदि भेदि पतीआइदा ॥९॥

हम दासन के दास पिआरे ॥ साधिक साच भले वीचारे ॥ मंने नाउ सोई जिणि जासी आपे साचु द्रिड़ाइदा ॥१०॥

पलै साचु सचे सचिआरा ॥ साचे भावै सबदु पिआरा ॥ त्रिभवणि साचु कला धरि थापी साचे ही पतीआइदा ॥११॥

वडा वडा आखै सभु कोई ॥ गुर बिनु सोझी किनै न होई ॥ साचि मिलै सो साचे भाए ना वीछुड़ि दुखु पाइदा ॥१२॥

धुरहु विछुंने धाही रुंने ॥ मरि मरि जनमहि मुहलति पुंने ॥ जिसु बखसे तिसु दे वडिआई मेलि न पछोताइदा ॥१३॥

आपे करता आपे भुगता ॥ आपे त्रिपता आपे मुकता ॥ आपे मुकति दानु मुकतीसरु ममता मोहु चुकाइदा ॥१४॥

दाना कै सिरि दानु वीचारा ॥ करण कारण समरथु अपारा ॥ करि करि वेखै कीता अपणा करणी कार कराइदा ॥१५॥

से गुण गावहि साचे भावहि ॥ तुझ ते उपजहि तुझ माहि समावहि ॥ नानकु साचु कहै बेनंती मिलि साचे सुखु पाइदा ॥१६॥२॥१४॥

(राग मारू -- SGGS 1035) मारू महला १ ॥
अरबद नरबद धुंधूकारा ॥ धरणि न गगना हुकमु अपारा ॥ ना दिनु रैनि न चंदु न सूरजु सुंन समाधि लगाइदा ॥१॥

खाणी न बाणी पउण न पाणी ॥ ओपति खपति न आवण जाणी ॥ खंड पताल सपत नही सागर नदी न नीरु वहाइदा ॥२॥

ना तदि सुरगु मछु पइआला ॥ दोजकु भिसतु नही खै काला ॥ नरकु सुरगु नही जमणु मरणा ना को आइ न जाइदा ॥३॥

ब्रहमा बिसनु महेसु न कोई ॥ अवरु न दीसै एको सोई ॥ नारि पुरखु नही जाति न जनमा ना को दुखु सुखु पाइदा ॥४॥

ना तदि जती सती बनवासी ॥ ना तदि सिध साधिक सुखवासी ॥ जोगी जंगम भेखु न कोई ना को नाथु कहाइदा ॥५॥

जप तप संजम ना ब्रत पूजा ॥ ना को आखि वखाणै दूजा ॥ आपे आपि उपाइ विगसै आपे कीमति पाइदा ॥६॥

ना सुचि संजमु तुलसी माला ॥ गोपी कानु न गऊ गोआला ॥ तंतु मंतु पाखंडु न कोई ना को वंसु वजाइदा ॥७॥

करम धरम नही माइआ माखी ॥ जाति जनमु नही दीसै आखी ॥ ममता जालु कालु नही माथै ना को किसै धिआइदा ॥८॥

निंदु बिंदु नही जीउ न जिंदो ॥ ना तदि गोरखु ना माछिंदो ॥ ना तदि गिआनु धिआनु कुल ओपति ना को गणत गणाइदा ॥९॥

वरन भेख नही ब्रहमण खत्री ॥ देउ न देहुरा गऊ गाइत्री ॥ होम जग नही तीरथि नावणु ना को पूजा लाइदा ॥१०॥

ना को मुला ना को काजी ॥ ना को सेखु मसाइकु हाजी ॥ रईअति राउ न हउमै दुनीआ ना को कहणु कहाइदा ॥११॥

भाउ न भगती ना सिव सकती ॥ साजनु मीतु बिंदु नही रकती ॥ आपे साहु आपे वणजारा साचे एहो भाइदा ॥१२॥

बेद कतेब न सिम्रिति सासत ॥ पाठ पुराण उदै नही आसत ॥ कहता बकता आपि अगोचरु आपे अलखु लखाइदा ॥१३॥

जा तिसु भाणा ता जगतु उपाइआ ॥ बाझु कला आडाणु रहाइआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए माइआ मोहु वधाइदा ॥१४॥

विरले कउ गुरि सबदु सुणाइआ ॥ करि करि देखै हुकमु सबाइआ ॥ खंड ब्रहमंड पाताल अर्मभे गुपतहु परगटी आइदा ॥१५॥

ता का अंतु न जाणै कोई ॥ पूरे गुर ते सोझी होई ॥ नानक साचि रते बिसमादी बिसम भए गुण गाइदा ॥१६॥३॥१५॥

(राग मारू -- SGGS 1036) मारू महला १ ॥
आपे आपु उपाइ निराला ॥ साचा थानु कीओ दइआला ॥ पउण पाणी अगनी का बंधनु काइआ कोटु रचाइदा ॥१॥

नउ घर थापे थापणहारै ॥ दसवै वासा अलख अपारै ॥ साइर सपत भरे जलि निरमलि गुरमुखि मैलु न लाइदा ॥२॥

रवि ससि दीपक जोति सबाई ॥ आपे करि वेखै वडिआई ॥ जोति सरूप सदा सुखदाता सचे सोभा पाइदा ॥३॥

गड़ महि हाट पटण वापारा ॥ पूरै तोलि तोलै वणजारा ॥ आपे रतनु विसाहे लेवै आपे कीमति पाइदा ॥४॥

कीमति पाई पावणहारै ॥ वेपरवाह पूरे भंडारै ॥ सरब कला ले आपे रहिआ गुरमुखि किसै बुझाइदा ॥५॥

नदरि करे पूरा गुरु भेटै ॥ जम जंदारु न मारै फेटै ॥ जिउ जल अंतरि कमलु बिगासी आपे बिगसि धिआइदा ॥६॥

आपे वरखै अम्रित धारा ॥ रतन जवेहर लाल अपारा ॥ सतिगुरु मिलै त पूरा पाईऐ प्रेम पदारथु पाइदा ॥७॥

प्रेम पदारथु लहै अमोलो ॥ कब ही न घाटसि पूरा तोलो ॥ सचे का वापारी होवै सचो सउदा पाइदा ॥८॥

सचा सउदा विरला को पाए ॥ पूरा सतिगुरु मिलै मिलाए ॥ गुरमुखि होइ सु हुकमु पछाणै मानै हुकमु समाइदा ॥९॥

हुकमे आइआ हुकमि समाइआ ॥ हुकमे दीसै जगतु उपाइआ ॥ हुकमे सुरगु मछु पइआला हुकमे कला रहाइदा ॥१०॥

हुकमे धरती धउल सिरि भारं ॥ हुकमे पउण पाणी गैणारं ॥ हुकमे सिव सकती घरि वासा हुकमे खेल खेलाइदा ॥११॥

हुकमे आडाणे आगासी ॥ हुकमे जल थल त्रिभवण वासी ॥ हुकमे सास गिरास सदा फुनि हुकमे देखि दिखाइदा ॥१२॥

हुकमि उपाए दस अउतारा ॥ देव दानव अगणत अपारा ॥ मानै हुकमु सु दरगह पैझै साचि मिलाइ समाइदा ॥१३॥

हुकमे जुग छतीह गुदारे ॥ हुकमे सिध साधिक वीचारे ॥ आपि नाथु नथीं सभ जा की बखसे मुकति कराइदा ॥१४॥

काइआ कोटु गड़ै महि राजा ॥ नेब खवास भला दरवाजा ॥ मिथिआ लोभु नाही घरि वासा लबि पापि पछुताइदा ॥१५॥

सतु संतोखु नगर महि कारी ॥ जतु सतु संजमु सरणि मुरारी ॥ नानक सहजि मिलै जगजीवनु गुर सबदी पति पाइदा ॥१६॥४॥१६॥

(राग मारू -- SGGS 1037) मारू महला १ ॥
सुंन कला अपर्मपरि धारी ॥ आपि निरालमु अपर अपारी ॥ आपे कुदरति करि करि देखै सुंनहु सुंनु उपाइदा ॥१॥

पउणु पाणी सुंनै ते साजे ॥ स्रिसटि उपाइ काइआ गड़ राजे ॥ अगनि पाणी जीउ जोति तुमारी सुंने कला रहाइदा ॥२॥

सुंनहु ब्रहमा बिसनु महेसु उपाए ॥ सुंने वरते जुग सबाए ॥ इसु पद वीचारे सो जनु पूरा तिसु मिलीऐ भरमु चुकाइदा ॥३॥

सुंनहु सपत सरोवर थापे ॥ जिनि साजे वीचारे आपे ॥ तितु सत सरि मनूआ गुरमुखि नावै फिरि बाहुड़ि जोनि न पाइदा ॥४॥

सुंनहु चंदु सूरजु गैणारे ॥ तिस की जोति त्रिभवण सारे ॥ सुंने अलख अपार निरालमु सुंने ताड़ी लाइदा ॥५॥

सुंनहु धरति अकासु उपाए ॥ बिनु थमा राखे सचु कल पाए ॥ त्रिभवण साजि मेखुली माइआ आपि उपाइ खपाइदा ॥६॥

सुंनहु खाणी सुंनहु बाणी ॥ सुंनहु उपजी सुंनि समाणी ॥ उतभुजु चलतु कीआ सिरि करतै बिसमादु सबदि देखाइदा ॥७॥

सुंनहु राति दिनसु दुइ कीए ॥ ओपति खपति सुखा दुख दीए ॥ सुख दुख ही ते अमरु अतीता गुरमुखि निज घरु पाइदा ॥८॥

साम वेदु रिगु जुजरु अथरबणु ॥ ब्रहमे मुखि माइआ है त्रै गुण ॥ ता की कीमति कहि न सकै को तिउ बोले जिउ बोलाइदा ॥९॥

सुंनहु सपत पाताल उपाए ॥ सुंनहु भवण रखे लिव लाए ॥ आपे कारणु कीआ अपर्मपरि सभु तेरो कीआ कमाइदा ॥१०॥

रज तम सत कल तेरी छाइआ ॥ जनम मरण हउमै दुखु पाइआ ॥ जिस नो क्रिपा करे हरि गुरमुखि गुणि चउथै मुकति कराइदा ॥११॥

सुंनहु उपजे दस अवतारा ॥ स्रिसटि उपाइ कीआ पासारा ॥ देव दानव गण गंधरब साजे सभि लिखिआ करम कमाइदा ॥१२॥

गुरमुखि समझै रोगु न होई ॥ इह गुर की पउड़ी जाणै जनु कोई ॥ जुगह जुगंतरि मुकति पराइण सो मुकति भइआ पति पाइदा ॥१३॥

पंच ततु सुंनहु परगासा ॥ देह संजोगी करम अभिआसा ॥ बुरा भला दुइ मसतकि लीखे पापु पुंनु बीजाइदा ॥१४॥

ऊतम सतिगुर पुरख निराले ॥ सबदि रते हरि रसि मतवाले ॥ रिधि बुधि सिधि गिआनु गुरू ते पाईऐ पूरै भागि मिलाइदा ॥१५॥

इसु मन माइआ कउ नेहु घनेरा ॥ कोई बूझहु गिआनी करहु निबेरा ॥ आसा मनसा हउमै सहसा नरु लोभी कूड़ु कमाइदा ॥१६॥

सतिगुर ते पाए वीचारा ॥ सुंन समाधि सचे घर बारा ॥ नानक निरमल नादु सबद धुनि सचु रामै नामि समाइदा ॥१७॥५॥१७॥

(राग मारू -- SGGS 1038) मारू महला १ ॥
जह देखा तह दीन दइआला ॥ आइ न जाई प्रभु किरपाला ॥ जीआ अंदरि जुगति समाई रहिओ निरालमु राइआ ॥१॥

जगु तिस की छाइआ जिसु बापु न माइआ ॥ ना तिसु भैण न भराउ कमाइआ ॥ ना तिसु ओपति खपति कुल जाती ओहु अजरावरु मनि भाइआ ॥२॥

तू अकाल पुरखु नाही सिरि काला ॥ तू पुरखु अलेख अगम निराला ॥ सत संतोखि सबदि अति सीतलु सहज भाइ लिव लाइआ ॥३॥

त्रै वरताइ चउथै घरि वासा ॥ काल बिकाल कीए इक ग्रासा ॥ निरमल जोति सरब जगजीवनु गुरि अनहद सबदि दिखाइआ ॥४॥

ऊतम जन संत भले हरि पिआरे ॥ हरि रस माते पारि उतारे ॥ नानक रेण संत जन संगति हरि गुर परसादी पाइआ ॥५॥

तू अंतरजामी जीअ सभि तेरे ॥ तू दाता हम सेवक तेरे ॥ अम्रित नामु क्रिपा करि दीजै गुरि गिआन रतनु दीपाइआ ॥६॥

पंच ततु मिलि इहु तनु कीआ ॥ आतम राम पाए सुखु थीआ ॥ करम करतूति अम्रित फलु लागा हरि नाम रतनु मनि पाइआ ॥७॥

ना तिसु भूख पिआस मनु मानिआ ॥ सरब निरंजनु घटि घटि जानिआ ॥ अम्रित रसि राता केवल बैरागी गुरमति भाइ सुभाइआ ॥८॥

अधिआतम करम करे दिनु राती ॥ निरमल जोति निरंतरि जाती ॥ सबदु रसालु रसन रसि रसना बेणु रसालु वजाइआ ॥९॥

बेणु रसाल वजावै सोई ॥ जा की त्रिभवण सोझी होई ॥ नानक बूझहु इह बिधि गुरमति हरि राम नामि लिव लाइआ ॥१०॥

ऐसे जन विरले संसारे ॥ गुर सबदु वीचारहि रहहि निरारे ॥ आपि तरहि संगति कुल तारहि तिन सफल जनमु जगि आइआ ॥११॥

घरु दरु मंदरु जाणै सोई ॥ जिसु पूरे गुर ते सोझी होई ॥ काइआ गड़ महल महली प्रभु साचा सचु साचा तखतु रचाइआ ॥१२॥

चतुर दस हाट दीवे दुइ साखी ॥ सेवक पंच नाही बिखु चाखी ॥ अंतरि वसतु अनूप निरमोलक गुरि मिलिऐ हरि धनु पाइआ ॥१३॥

तखति बहै तखतै की लाइक ॥ पंच समाए गुरमति पाइक ॥ आदि जुगादी है भी होसी सहसा भरमु चुकाइआ ॥१४॥

तखति सलामु होवै दिनु राती ॥ इहु साचु वडाई गुरमति लिव जाती ॥ नानक रामु जपहु तरु तारी हरि अंति सखाई पाइआ ॥१५॥१॥१८॥

(राग मारू -- SGGS 1039) मारू महला १ ॥
हरि धनु संचहु रे जन भाई ॥ सतिगुर सेवि रहहु सरणाई ॥ तसकरु चोरु न लागै ता कउ धुनि उपजै सबदि जगाइआ ॥१॥

तू एकंकारु निरालमु राजा ॥ तू आपि सवारहि जन के काजा ॥ अमरु अडोलु अपारु अमोलकु हरि असथिर थानि सुहाइआ ॥२॥

देही नगरी ऊतम थाना ॥ पंच लोक वसहि परधाना ॥ ऊपरि एकंकारु निरालमु सुंन समाधि लगाइआ ॥३॥

देही नगरी नउ दरवाजे ॥ सिरि सिरि करणैहारै साजे ॥ दसवै पुरखु अतीतु निराला आपे अलखु लखाइआ ॥४॥

पुरखु अलेखु सचे दीवाना ॥ हुकमि चलाए सचु नीसाना ॥ नानक खोजि लहहु घरु अपना हरि आतम राम नामु पाइआ ॥५॥

सरब निरंजन पुरखु सुजाना ॥ अदलु करे गुर गिआन समाना ॥ कामु क्रोधु लै गरदनि मारे हउमै लोभु चुकाइआ ॥६॥

सचै थानि वसै निरंकारा ॥ आपि पछाणै सबदु वीचारा ॥ सचै महलि निवासु निरंतरि आवण जाणु चुकाइआ ॥७॥

ना मनु चलै न पउणु उडावै ॥ जोगी सबदु अनाहदु वावै ॥ पंच सबद झुणकारु निरालमु प्रभि आपे वाइ सुणाइआ ॥८॥

भउ बैरागा सहजि समाता ॥ हउमै तिआगी अनहदि राता ॥ अंजनु सारि निरंजनु जाणै सरब निरंजनु राइआ ॥९॥

दुख भै भंजनु प्रभु अबिनासी ॥ रोग कटे काटी जम फासी ॥ नानक हरि प्रभु सो भउ भंजनु गुरि मिलिऐ हरि प्रभु पाइआ ॥१०॥

कालै कवलु निरंजनु जाणै ॥ बूझै करमु सु सबदु पछाणै ॥ आपे जाणै आपि पछाणै सभु तिस का चोजु सबाइआ ॥११॥

आपे साहु आपे वणजारा ॥ आपे परखे परखणहारा ॥ आपे कसि कसवटी लाए आपे कीमति पाइआ ॥१२॥

आपि दइआलि दइआ प्रभि धारी ॥ घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥ पुरखु अतीतु वसै निहकेवलु गुर पुरखै पुरखु मिलाइआ ॥१३॥

प्रभु दाना बीना गरबु गवाए ॥ दूजा मेटै एकु दिखाए ॥ आसा माहि निरालमु जोनी अकुल निरंजनु गाइआ ॥१४॥

हउमै मेटि सबदि सुखु होई ॥ आपु वीचारे गिआनी सोई ॥ नानक हरि जसु हरि गुण लाहा सतसंगति सचु फलु पाइआ ॥१५॥२॥१९॥

(राग मारू -- SGGS 1040) मारू महला १ ॥
सचु कहहु सचै घरि रहणा ॥ जीवत मरहु भवजलु जगु तरणा ॥ गुरु बोहिथु गुरु बेड़ी तुलहा मन हरि जपि पारि लंघाइआ ॥१॥

हउमै ममता लोभ बिनासनु ॥ नउ दर मुकते दसवै आसनु ॥ ऊपरि परै परै अपर्मपरु जिनि आपे आपु उपाइआ ॥२॥

गुरमति लेवहु हरि लिव तरीऐ ॥ अकलु गाइ जम ते किआ डरीऐ ॥ जत जत देखउ तत तत तुम ही अवरु न दुतीआ गाइआ ॥३॥

सचु हरि नामु सचु है सरणा ॥ सचु गुर सबदु जितै लगि तरणा ॥ अकथु कथै देखै अपर्मपरु फुनि गरभि न जोनी जाइआ ॥४॥

सच बिनु सतु संतोखु न पावै ॥ बिनु गुर मुकति न आवै जावै ॥ मूल मंत्रु हरि नामु रसाइणु कहु नानक पूरा पाइआ ॥५॥

सच बिनु भवजलु जाइ न तरिआ ॥ एहु समुंदु अथाहु महा बिखु भरिआ ॥ रहै अतीतु गुरमति ले ऊपरि हरि निरभउ कै घरि पाइआ ॥६॥

झूठी जग हित की चतुराई ॥ बिलम न लागै आवै जाई ॥ नामु विसारि चलहि अभिमानी उपजै बिनसि खपाइआ ॥७॥

उपजहि बिनसहि बंधन बंधे ॥ हउमै माइआ के गलि फंधे ॥ जिसु राम नामु नाही मति गुरमति सो जम पुरि बंधि चलाइआ ॥८॥

गुर बिनु मोख मुकति किउ पाईऐ ॥ बिनु गुर राम नामु किउ धिआईऐ ॥ गुरमति लेहु तरहु भव दुतरु मुकति भए सुखु पाइआ ॥९॥

गुरमति क्रिसनि गोवरधन धारे ॥ गुरमति साइरि पाहण तारे ॥ गुरमति लेहु परम पदु पाईऐ नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥१०॥

गुरमति लेहु तरहु सचु तारी ॥ आतम चीनहु रिदै मुरारी ॥ जम के फाहे काटहि हरि जपि अकुल निरंजनु पाइआ ॥११॥

गुरमति पंच सखे गुर भाई ॥ गुरमति अगनि निवारि समाई ॥ मनि मुखि नामु जपहु जगजीवन रिद अंतरि अलखु लखाइआ ॥१२॥

गुरमुखि बूझै सबदि पतीजै ॥ उसतति निंदा किस की कीजै ॥ चीनहु आपु जपहु जगदीसरु हरि जगंनाथु मनि भाइआ ॥१३॥

जो ब्रहमंडि खंडि सो जाणहु ॥ गुरमुखि बूझहु सबदि पछाणहु ॥ घटि घटि भोगे भोगणहारा रहै अतीतु सबाइआ ॥१४॥

गुरमति बोलहु हरि जसु सूचा ॥ गुरमति आखी देखहु ऊचा ॥ स्रवणी नामु सुणै हरि बाणी नानक हरि रंगि रंगाइआ ॥१५॥३॥२०॥

(राग मारू -- SGGS 1041) मारू महला १ ॥
कामु क्रोधु परहरु पर निंदा ॥ लबु लोभु तजि होहु निचिंदा ॥ भ्रम का संगलु तोड़ि निराला हरि अंतरि हरि रसु पाइआ ॥१॥

निसि दामनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै ॥ अहिनिसि जोति निरंतरि पेखै ॥ आनंद रूपु अनूपु सरूपा गुरि पूरै देखाइआ ॥२॥

सतिगुर मिलहु आपे प्रभु तारे ॥ ससि घरि सूरु दीपकु गैणारे ॥ देखि अदिसटु रहहु लिव लागी सभु त्रिभवणि ब्रहमु सबाइआ ॥३॥

अम्रित रसु पाए त्रिसना भउ जाए ॥ अनभउ पदु पावै आपु गवाए ॥ ऊची पदवी ऊचो ऊचा निरमल सबदु कमाइआ ॥४॥

अद्रिसट अगोचरु नामु अपारा ॥ अति रसु मीठा नामु पिआरा ॥ नानक कउ जुगि जुगि हरि जसु दीजै हरि जपीऐ अंतु न पाइआ ॥५॥

अंतरि नामु परापति हीरा ॥ हरि जपते मनु मन ते धीरा ॥ दुघट घट भउ भंजनु पाईऐ बाहुड़ि जनमि न जाइआ ॥६॥

भगति हेति गुर सबदि तरंगा ॥ हरि जसु नामु पदारथु मंगा ॥ हरि भावै गुर मेलि मिलाए हरि तारे जगतु सबाइआ ॥७॥

जिनि जपु जपिओ सतिगुर मति वा के ॥ जमकंकर कालु सेवक पग ता के ॥ ऊतम संगति गति मिति ऊतम जगु भउजलु पारि तराइआ ॥८॥

इहु भवजलु जगतु सबदि गुर तरीऐ ॥ अंतर की दुबिधा अंतरि जरीऐ ॥ पंच बाण ले जम कउ मारै गगनंतरि धणखु चड़ाइआ ॥९॥

साकत नरि सबद सुरति किउ पाईऐ ॥ सबद सुरति बिनु आईऐ जाईऐ ॥ नानक गुरमुखि मुकति पराइणु हरि पूरै भागि मिलाइआ ॥१०॥

निरभउ सतिगुरु है रखवाला ॥ भगति परापति गुर गोपाला ॥ धुनि अनंद अनाहदु वाजै गुर सबदि निरंजनु पाइआ ॥११॥

निरभउ सो सिरि नाही लेखा ॥ आपि अलेखु कुदरति है देखा ॥ आपि अतीतु अजोनी स्मभउ नानक गुरमति सो पाइआ ॥१२॥

अंतर की गति सतिगुरु जाणै ॥ सो निरभउ गुर सबदि पछाणै ॥ अंतरु देखि निरंतरि बूझै अनत न मनु डोलाइआ ॥१३॥

निरभउ सो अभ अंतरि वसिआ ॥ अहिनिसि नामि निरंजन रसिआ ॥ नानक हरि जसु संगति पाईऐ हरि सहजे सहजि मिलाइआ ॥१४॥

अंतरि बाहरि सो प्रभु जाणै ॥ रहै अलिपतु चलते घरि आणै ॥ ऊपरि आदि सरब तिहु लोई सचु नानक अम्रित रसु पाइआ ॥१५॥४॥२१॥

(राग मारू -- SGGS 1042) मारू महला १ ॥
कुदरति करनैहार अपारा ॥ कीते का नाही किहु चारा ॥ जीअ उपाइ रिजकु दे आपे सिरि सिरि हुकमु चलाइआ ॥१॥

हुकमु चलाइ रहिआ भरपूरे ॥ किसु नेड़ै किसु आखां दूरे ॥ गुपत प्रगट हरि घटि घटि देखहु वरतै ताकु सबाइआ ॥२॥

जिस कउ मेले सुरति समाए ॥ गुर सबदी हरि नामु धिआए ॥ आनद रूप अनूप अगोचर गुर मिलिऐ भरमु जाइआ ॥३॥

मन तन धन ते नामु पिआरा ॥ अंति सखाई चलणवारा ॥ मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥४॥

जिस कउ नदरि करे गुरु पूरा ॥ सबदि मिलाए गुरमति सूरा ॥ नानक गुर के चरन सरेवहु जिनि भूला मारगि पाइआ ॥५॥

संत जनां हरि धनु जसु पिआरा ॥ गुरमति पाइआ नामु तुमारा ॥ जाचिकु सेव करे दरि हरि कै हरि दरगह जसु गाइआ ॥६॥

सतिगुरु मिलै त महलि बुलाए ॥ साची दरगह गति पति पाए ॥ साकत ठउर नाही हरि मंदर जनम मरै दुखु पाइआ ॥७॥

सेवहु सतिगुर समुंदु अथाहा ॥ पावहु नामु रतनु धनु लाहा ॥ बिखिआ मलु जाइ अम्रित सरि नावहु गुर सर संतोखु पाइआ ॥८॥

सतिगुर सेवहु संक न कीजै ॥ आसा माहि निरासु रहीजै ॥ संसा दूख बिनासनु सेवहु फिरि बाहुड़ि रोगु न लाइआ ॥९॥

साचे भावै तिसु वडीआए ॥ कउनु सु दूजा तिसु समझाए ॥ हरि गुर मूरति एका वरतै नानक हरि गुर भाइआ ॥१०॥

वाचहि पुसतक वेद पुरानां ॥ इक बहि सुनहि सुनावहि कानां ॥ अजगर कपटु कहहु किउ खुल्है बिनु सतिगुर ततु न पाइआ ॥११॥

करहि बिभूति लगावहि भसमै ॥ अंतरि क्रोधु चंडालु सु हउमै ॥ पाखंड कीने जोगु न पाईऐ बिनु सतिगुर अलखु न पाइआ ॥१२॥

तीरथ वरत नेम करहि उदिआना ॥ जतु सतु संजमु कथहि गिआना ॥ राम नाम बिनु किउ सुखु पाईऐ बिनु सतिगुर भरमु न जाइआ ॥१३॥

निउली करम भुइअंगम भाठी ॥ रेचक कु्मभक पूरक मन हाठी ॥ पाखंड धरमु प्रीति नही हरि सउ गुर सबद महा रसु पाइआ ॥१४॥

कुदरति देखि रहे मनु मानिआ ॥ गुर सबदी सभु ब्रहमु पछानिआ ॥ नानक आतम रामु सबाइआ गुर सतिगुर अलखु लखाइआ ॥१५॥५॥२२॥

सलोकु मः १ ॥ विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥ गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥ गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥ मोलि अमोलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥ नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥१॥


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