Pt 14 - गुरू नानक देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 14 - Guru Nanak Dev ji (Mahalla 1) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग रामकली -- SGGS 903) रामकली महला १ ॥
खटु मटु देही मनु बैरागी ॥ सुरति सबदु धुनि अंतरि जागी ॥ वाजै अनहदु मेरा मनु लीणा ॥ गुर बचनी सचि नामि पतीणा ॥१॥

प्राणी राम भगति सुखु पाईऐ ॥ गुरमुखि हरि हरि मीठा लागै हरि हरि नामि समाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहु बिवरजि समाए ॥ सतिगुरु भेटै मेलि मिलाए ॥ नामु रतनु निरमोलकु हीरा ॥ तितु राता मेरा मनु धीरा ॥२॥

हउमै ममता रोगु न लागै ॥ राम भगति जम का भउ भागै ॥ जमु जंदारु न लागै मोहि ॥ निरमल नामु रिदै हरि सोहि ॥३॥

सबदु बीचारि भए निरंकारी ॥ गुरमति जागे दुरमति परहारी ॥ अनदिनु जागि रहे लिव लाई ॥ जीवन मुकति गति अंतरि पाई ॥४॥

अलिपत गुफा महि रहहि निरारे ॥ तसकर पंच सबदि संघारे ॥ पर घर जाइ न मनु डोलाए ॥ सहज निरंतरि रहउ समाए ॥५॥

गुरमुखि जागि रहे अउधूता ॥ सद बैरागी ततु परोता ॥ जगु सूता मरि आवै जाइ ॥ बिनु गुर सबद न सोझी पाइ ॥६॥

अनहद सबदु वजै दिनु राती ॥ अविगत की गति गुरमुखि जाती ॥ तउ जानी जा सबदि पछानी ॥ एको रवि रहिआ निरबानी ॥७॥

सुंन समाधि सहजि मनु राता ॥ तजि हउ लोभा एको जाता ॥ गुर चेले अपना मनु मानिआ ॥ नानक दूजा मेटि समानिआ ॥८॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 904) रामकली महला १ ॥
साहा गणहि न करहि बीचारु ॥ साहे ऊपरि एकंकारु ॥ जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥ गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥१॥

झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥ हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥ पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥ सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥ होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥२॥

नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥ बिनु हरि राते मैलो मैला ॥ गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥ मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥३॥

वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥ आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥ घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥४॥

गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥ गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥ करि अपराध सरणि हम आइआ ॥ गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥५॥

गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥ भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥ जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥ ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥६॥

इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥ दुबिधा राते महलु न पावहि ॥ जिसु गुर परसादी नामु अधारु ॥ कोटि मधे को जनु आपारु ॥७॥

एकु बुरा भला सचु एकै ॥ बूझु गिआनी सतगुर की टेकै ॥ गुरमुखि विरली एको जाणिआ ॥ आवणु जाणा मेटि समाणिआ ॥८॥

जिन कै हिरदै एकंकारु ॥ सरब गुणी साचा बीचारु ॥ गुर कै भाणै करम कमावै ॥ नानक साचे साचि समावै ॥९॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 905) रामकली महला १ ॥
हठु निग्रहु करि काइआ छीजै ॥ वरतु तपनु करि मनु नही भीजै ॥ राम नाम सरि अवरु न पूजै ॥१॥

गुरु सेवि मना हरि जन संगु कीजै ॥ जमु जंदारु जोहि नही साकै सरपनि डसि न सकै हरि का रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

वादु पड़ै रागी जगु भीजै ॥ त्रै गुण बिखिआ जनमि मरीजै ॥ राम नाम बिनु दूखु सहीजै ॥२॥

चाड़सि पवनु सिंघासनु भीजै ॥ निउली करम खटु करम करीजै ॥ राम नाम बिनु बिरथा सासु लीजै ॥३॥

अंतरि पंच अगनि किउ धीरजु धीजै ॥ अंतरि चोरु किउ सादु लहीजै ॥ गुरमुखि होइ काइआ गड़ु लीजै ॥४॥

अंतरि मैलु तीरथ भरमीजै ॥ मनु नही सूचा किआ सोच करीजै ॥ किरतु पइआ दोसु का कउ दीजै ॥५॥

अंनु न खाहि देही दुखु दीजै ॥ बिनु गुर गिआन त्रिपति नही थीजै ॥ मनमुखि जनमै जनमि मरीजै ॥६॥

सतिगुर पूछि संगति जन कीजै ॥ मनु हरि राचै नही जनमि मरीजै ॥ राम नाम बिनु किआ करमु कीजै ॥७॥

ऊंदर दूंदर पासि धरीजै ॥ धुर की सेवा रामु रवीजै ॥ नानक नामु मिलै किरपा प्रभ कीजै ॥८॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 905) रामकली महला १ ॥
अंतरि उतभुजु अवरु न कोई ॥ जो कहीऐ सो प्रभ ते होई ॥ जुगह जुगंतरि साहिबु सचु सोई ॥ उतपति परलउ अवरु न कोई ॥१॥

ऐसा मेरा ठाकुरु गहिर ग्मभीरु ॥ जिनि जपिआ तिन ही सुखु पाइआ हरि कै नामि न लगै जम तीरु ॥१॥ रहाउ ॥

नामु रतनु हीरा निरमोलु ॥ साचा साहिबु अमरु अतोलु ॥ जिहवा सूची साचा बोलु ॥ घरि दरि साचा नाही रोलु ॥२॥

इकि बन महि बैसहि डूगरि असथानु ॥ नामु बिसारि पचहि अभिमानु ॥ नाम बिना किआ गिआन धिआनु ॥ गुरमुखि पावहि दरगहि मानु ॥३॥

हठु अहंकारु करै नही पावै ॥ पाठ पड़ै ले लोक सुणावै ॥ तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥ नाम बिना कैसे सुखु पावै ॥४॥

जतन करै बिंदु किवै न रहाई ॥ मनूआ डोलै नरके पाई ॥ जम पुरि बाधो लहै सजाई ॥ बिनु नावै जीउ जलि बलि जाई ॥५॥

सिध साधिक केते मुनि देवा ॥ हठि निग्रहि न त्रिपतावहि भेवा ॥ सबदु वीचारि गहहि गुर सेवा ॥ मनि तनि निरमल अभिमान अभेवा ॥६॥

करमि मिलै पावै सचु नाउ ॥ तुम सरणागति रहउ सुभाउ ॥ तुम ते उपजिओ भगती भाउ ॥ जपु जापउ गुरमुखि हरि नाउ ॥७॥

हउमै गरबु जाइ मन भीनै ॥ झूठि न पावसि पाखंडि कीनै ॥ बिनु गुर सबद नही घरु बारु ॥ नानक गुरमुखि ततु बीचारु ॥८॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 906) रामकली महला १ ॥
जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥ जिउ रस भोग कीए तेता दुखु लागै नामु विसारि भवजलि पइआ ॥१॥

तनु धनु देखत गरबि गइआ ॥ कनिक कामनी सिउ हेतु वधाइहि की नामु विसारहि भरमि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जतु सतु संजमु सीलु न राखिआ प्रेत पिंजर महि कासटु भइआ ॥ पुंनु दानु इसनानु न संजमु साधसंगति बिनु बादि जइआ ॥२॥

लालचि लागै नामु बिसारिओ आवत जावत जनमु गइआ ॥ जा जमु धाइ केस गहि मारै सुरति नही मुखि काल गइआ ॥३॥

अहिनिसि निंदा ताति पराई हिरदै नामु न सरब दइआ ॥ बिनु गुर सबद न गति पति पावहि राम नाम बिनु नरकि गइआ ॥४॥

खिन महि वेस करहि नटूआ जिउ मोह पाप महि गलतु गइआ ॥ इत उत माइआ देखि पसारी मोह माइआ कै मगनु भइआ ॥५॥

करहि बिकार विथार घनेरे सुरति सबद बिनु भरमि पइआ ॥ हउमै रोगु महा दुखु लागा गुरमति लेवहु रोगु गइआ ॥६॥

सुख स्मपति कउ आवत देखै साकत मनि अभिमानु भइआ ॥ जिस का इहु तनु धनु सो फिरि लेवै अंतरि सहसा दूखु पइआ ॥७॥

अंति कालि किछु साथि न चालै जो दीसै सभु तिसहि मइआ ॥ आदि पुरखु अपर्मपरु सो प्रभु हरि नामु रिदै लै पारि पइआ ॥८॥

मूए कउ रोवहि किसहि सुणावहि भै सागर असरालि पइआ ॥ देखि कुट्मबु माइआ ग्रिह मंदरु साकतु जंजालि परालि पइआ ॥९॥

जा आए ता तिनहि पठाए चाले तिनै बुलाइ लइआ ॥ जो किछु करणा सो करि रहिआ बखसणहारै बखसि लइआ ॥१०॥

जिनि एहु चाखिआ राम रसाइणु तिन की संगति खोजु भइआ ॥ रिधि सिधि बुधि गिआनु गुरू ते पाइआ मुकति पदारथु सरणि पइआ ॥११॥

दुखु सुखु गुरमुखि सम करि जाणा हरख सोग ते बिरकतु भइआ ॥ आपु मारि गुरमुखि हरि पाए नानक सहजि समाइ लइआ ॥१२॥७॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 907) रामकली दखणी महला १ ॥
जतु सतु संजमु साचु द्रिड़ाइआ साच सबदि रसि लीणा ॥१॥

मेरा गुरु दइआलु सदा रंगि लीणा ॥ अहिनिसि रहै एक लिव लागी साचे देखि पतीणा ॥१॥ रहाउ ॥

रहै गगन पुरि द्रिसटि समैसरि अनहत सबदि रंगीणा ॥२॥

सतु बंधि कुपीन भरिपुरि लीणा जिहवा रंगि रसीणा ॥३॥

मिलै गुर साचे जिनि रचु राचे किरतु वीचारि पतीणा ॥४॥

एक महि सरब सरब महि एका एह सतिगुरि देखि दिखाई ॥५॥

जिनि कीए खंड मंडल ब्रहमंडा सो प्रभु लखनु न जाई ॥६॥

दीपक ते दीपकु परगासिआ त्रिभवण जोति दिखाई ॥७॥

सचै तखति सच महली बैठे निरभउ ताड़ी लाई ॥८॥

मोहि गइआ बैरागी जोगी घटि घटि किंगुरी वाई ॥९॥

नानक सरणि प्रभू की छूटे सतिगुर सचु सखाई ॥१०॥८॥

(राग रामकली -- SGGS 907) रामकली महला १ ॥
अउहठि हसत मड़ी घरु छाइआ धरणि गगन कल धारी ॥१॥

गुरमुखि केती सबदि उधारी संतहु ॥१॥ रहाउ ॥

ममता मारि हउमै सोखै त्रिभवणि जोति तुमारी ॥२॥

मनसा मारि मनै महि राखै सतिगुर सबदि वीचारी ॥३॥

सिंङी सुरति अनाहदि वाजै घटि घटि जोति तुमारी ॥४॥

परपंच बेणु तही मनु राखिआ ब्रहम अगनि परजारी ॥५॥

पंच ततु मिलि अहिनिसि दीपकु निरमल जोति अपारी ॥६॥

रवि ससि लउके इहु तनु किंगुरी वाजै सबदु निरारी ॥७॥

सिव नगरी महि आसणु अउधू अलखु अगमु अपारी ॥८॥

काइआ नगरी इहु मनु राजा पंच वसहि वीचारी ॥९॥

सबदि रवै आसणि घरि राजा अदलु करे गुणकारी ॥१०॥

कालु बिकालु कहे कहि बपुरे जीवत मूआ मनु मारी ॥११॥

ब्रहमा बिसनु महेस इक मूरति आपे करता कारी ॥१२॥

काइआ सोधि तरै भव सागरु आतम ततु वीचारी ॥१३॥

गुर सेवा ते सदा सुखु पाइआ अंतरि सबदु रविआ गुणकारी ॥१४॥

आपे मेलि लए गुणदाता हउमै त्रिसना मारी ॥१५॥

त्रै गुण मेटे चउथै वरतै एहा भगति निरारी ॥१६॥

गुरमुखि जोग सबदि आतमु चीनै हिरदै एकु मुरारी ॥१७॥

मनूआ असथिरु सबदे राता एहा करणी सारी ॥१८॥

बेदु बादु न पाखंडु अउधू गुरमुखि सबदि बीचारी ॥१९॥

गुरमुखि जोगु कमावै अउधू जतु सतु सबदि वीचारी ॥२०॥

सबदि मरै मनु मारे अउधू जोग जुगति वीचारी ॥२१॥

माइआ मोहु भवजलु है अवधू सबदि तरै कुल तारी ॥२२॥

सबदि सूर जुग चारे अउधू बाणी भगति वीचारी ॥२३॥

एहु मनु माइआ मोहिआ अउधू निकसै सबदि वीचारी ॥२४॥

आपे बखसे मेलि मिलाए नानक सरणि तुमारी ॥२५॥९॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 929) रामकली महला १ दखणी ओअंकारु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥ ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥ ओअंकारि सैल जुग भए ॥ ओअंकारि बेद निरमए ॥ ओअंकारि सबदि उधरे ॥ ओअंकारि गुरमुखि तरे ॥ ओनम अखर सुणहु बीचारु ॥ ओनम अखरु त्रिभवण सारु ॥१॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) सुणि पाडे किआ लिखहु जंजाला ॥ लिखु राम नाम गुरमुखि गोपाला ॥१॥ रहाउ ॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) ससै सभु जगु सहजि उपाइआ तीनि भवन इक जोती ॥ गुरमुखि वसतु परापति होवै चुणि लै माणक मोती ॥ समझै सूझै पड़ि पड़ि बूझै अंति निरंतरि साचा ॥ गुरमुखि देखै साचु समाले बिनु साचे जगु काचा ॥२॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) धधै धरमु धरे धरमा पुरि गुणकारी मनु धीरा ॥ धधै धूलि पड़ै मुखि मसतकि कंचन भए मनूरा ॥ धनु धरणीधरु आपि अजोनी तोलि बोलि सचु पूरा ॥ करते की मिति करता जाणै कै जाणै गुरु सूरा ॥३॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) ङिआनु गवाइआ दूजा भाइआ गरबि गले बिखु खाइआ ॥ गुर रसु गीत बाद नही भावै सुणीऐ गहिर ग्मभीरु गवाइआ ॥ गुरि सचु कहिआ अम्रितु लहिआ मनि तनि साचु सुखाइआ ॥ आपे गुरमुखि आपे देवै आपे अम्रितु पीआइआ ॥४॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) एको एकु कहै सभु कोई हउमै गरबु विआपै ॥ अंतरि बाहरि एकु पछाणै इउ घरु महलु सिञापै ॥ प्रभु नेड़ै हरि दूरि न जाणहु एको स्रिसटि सबाई ॥ एकंकारु अवरु नही दूजा नानक एकु समाई ॥५॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) इसु करते कउ किउ गहि राखउ अफरिओ तुलिओ न जाई ॥ माइआ के देवाने प्राणी झूठि ठगउरी पाई ॥ लबि लोभि मुहताजि विगूते इब तब फिरि पछुताई ॥ एकु सरेवै ता गति मिति पावै आवणु जाणु रहाई ॥६॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) एकु अचारु रंगु इकु रूपु ॥ पउण पाणी अगनी असरूपु ॥ एको भवरु भवै तिहु लोइ ॥ एको बूझै सूझै पति होइ ॥ गिआनु धिआनु ले समसरि रहै ॥ गुरमुखि एकु विरला को लहै ॥ जिस नो देइ किरपा ते सुखु पाए ॥ गुरू दुआरै आखि सुणाए ॥७॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) ऊरम धूरम जोति उजाला ॥ तीनि भवण महि गुर गोपाला ॥ ऊगविआ असरूपु दिखावै ॥ करि किरपा अपुनै घरि आवै ॥ ऊनवि बरसै नीझर धारा ॥ ऊतम सबदि सवारणहारा ॥ इसु एके का जाणै भेउ ॥ आपे करता आपे देउ ॥८॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 930) उगवै सूरु असुर संघारै ॥ ऊचउ देखि सबदि बीचारै ॥ ऊपरि आदि अंति तिहु लोइ ॥ आपे करै कथै सुणै सोइ ॥ ओहु बिधाता मनु तनु देइ ॥ ओहु बिधाता मनि मुखि सोइ ॥ प्रभु जगजीवनु अवरु न कोइ ॥ नानक नामि रते पति होइ ॥९॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) राजन राम रवै हितकारि ॥ रण महि लूझै मनूआ मारि ॥ राति दिनंति रहै रंगि राता ॥ तीनि भवन जुग चारे जाता ॥ जिनि जाता सो तिस ही जेहा ॥ अति निरमाइलु सीझसि देहा ॥ रहसी रामु रिदै इक भाइ ॥ अंतरि सबदु साचि लिव लाइ ॥१०॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) रोसु न कीजै अम्रितु पीजै रहणु नही संसारे ॥ राजे राइ रंक नही रहणा आइ जाइ जुग चारे ॥ रहण कहण ते रहै न कोई किसु पहि करउ बिनंती ॥ एकु सबदु राम नाम निरोधरु गुरु देवै पति मती ॥११॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) लाज मरंती मरि गई घूघटु खोलि चली ॥ सासु दिवानी बावरी सिर ते संक टली ॥ प्रेमि बुलाई रली सिउ मन महि सबदु अनंदु ॥ लालि रती लाली भई गुरमुखि भई निचिंदु ॥१२॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) लाहा नामु रतनु जपि सारु ॥ लबु लोभु बुरा अहंकारु ॥ लाड़ी चाड़ी लाइतबारु ॥ मनमुखु अंधा मुगधु गवारु ॥ लाहे कारणि आइआ जगि ॥ होइ मजूरु गइआ ठगाइ ठगि ॥ लाहा नामु पूंजी वेसाहु ॥ नानक सची पति सचा पातिसाहु ॥१३॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) आइ विगूता जगु जम पंथु ॥ आई न मेटण को समरथु ॥ आथि सैल नीच घरि होइ ॥ आथि देखि निवै जिसु दोइ ॥ आथि होइ ता मुगधु सिआना ॥ भगति बिहूना जगु बउराना ॥ सभ महि वरतै एको सोइ ॥ जिस नो किरपा करे तिसु परगटु होइ ॥१४॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) जुगि जुगि थापि सदा निरवैरु ॥ जनमि मरणि नही धंधा धैरु ॥ जो दीसै सो आपे आपि ॥ आपि उपाइ आपे घट थापि ॥ आपि अगोचरु धंधै लोई ॥ जोग जुगति जगजीवनु सोई ॥ करि आचारु सचु सुखु होई ॥ नाम विहूणा मुकति किव होई ॥१५॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) विणु नावै वेरोधु सरीर ॥ किउ न मिलहि काटहि मन पीर ॥ वाट वटाऊ आवै जाइ ॥ किआ ले आइआ किआ पलै पाइ ॥ विणु नावै तोटा सभ थाइ ॥ लाहा मिलै जा देइ बुझाइ ॥ वणजु वापारु वणजै वापारी ॥ विणु नावै कैसी पति सारी ॥१६॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 931) गुण वीचारे गिआनी सोइ ॥ गुण महि गिआनु परापति होइ ॥ गुणदाता विरला संसारि ॥ साची करणी गुर वीचारि ॥ अगम अगोचरु कीमति नही पाइ ॥ ता मिलीऐ जा लए मिलाइ ॥ गुणवंती गुण सारे नीत ॥ नानक गुरमति मिलीऐ मीत ॥१७॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) कामु क्रोधु काइआ कउ गालै ॥ जिउ कंचन सोहागा ढालै ॥ कसि कसवटी सहै सु ताउ ॥ नदरि सराफ वंनी सचड़ाउ ॥ जगतु पसू अहं कालु कसाई ॥ करि करतै करणी करि पाई ॥ जिनि कीती तिनि कीमति पाई ॥ होर किआ कहीऐ किछु कहणु न जाई ॥१८॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) खोजत खोजत अम्रितु पीआ ॥ खिमा गही मनु सतगुरि दीआ ॥ खरा खरा आखै सभु कोइ ॥ खरा रतनु जुग चारे होइ ॥ खात पीअंत मूए नही जानिआ ॥ खिन महि मूए जा सबदु पछानिआ ॥ असथिरु चीतु मरनि मनु मानिआ ॥ गुर किरपा ते नामु पछानिआ ॥१९॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) गगन ग्मभीरु गगनंतरि वासु ॥ गुण गावै सुख सहजि निवासु ॥ गइआ न आवै आइ न जाइ ॥ गुर परसादि रहै लिव लाइ ॥ गगनु अगमु अनाथु अजोनी ॥ असथिरु चीतु समाधि सगोनी ॥ हरि नामु चेति फिरि पवहि न जूनी ॥ गुरमति सारु होर नाम बिहूनी ॥२०॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) घर दर फिरि थाकी बहुतेरे ॥ जाति असंख अंत नही मेरे ॥ केते मात पिता सुत धीआ ॥ केते गुर चेले फुनि हूआ ॥ काचे गुर ते मुकति न हूआ ॥ केती नारि वरु एकु समालि ॥ गुरमुखि मरणु जीवणु प्रभ नालि ॥ दह दिस ढूढि घरै महि पाइआ ॥ मेलु भइआ सतिगुरू मिलाइआ ॥२१॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) गुरमुखि गावै गुरमुखि बोलै ॥ गुरमुखि तोलि तोलावै तोलै ॥ गुरमुखि आवै जाइ निसंगु ॥ परहरि मैलु जलाइ कलंकु ॥ गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥ गुरमुखि मजनु चजु अचारु ॥ गुरमुखि सबदु अम्रितु है सारु ॥ नानक गुरमुखि पावै पारु ॥२२॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) चंचलु चीतु न रहई ठाइ ॥ चोरी मिरगु अंगूरी खाइ ॥ चरन कमल उर धारे चीत ॥ चिरु जीवनु चेतनु नित नीत ॥ चिंतत ही दीसै सभु कोइ ॥ चेतहि एकु तही सुखु होइ ॥ चिति वसै राचै हरि नाइ ॥ मुकति भइआ पति सिउ घरि जाइ ॥२३॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 932) छीजै देह खुलै इक गंढि ॥ छेआ नित देखहु जगि हंढि ॥ धूप छाव जे सम करि जाणै ॥ बंधन काटि मुकति घरि आणै ॥ छाइआ छूछी जगतु भुलाना ॥ लिखिआ किरतु धुरे परवाना ॥ छीजै जोबनु जरूआ सिरि कालु ॥ काइआ छीजै भई सिबालु ॥२४॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) जापै आपि प्रभू तिहु लोइ ॥ जुगि जुगि दाता अवरु न कोइ ॥ जिउ भावै तिउ राखहि राखु ॥ जसु जाचउ देवै पति साखु ॥ जागतु जागि रहा तुधु भावा ॥ जा तू मेलहि ता तुझै समावा ॥ जै जै कारु जपउ जगदीस ॥ गुरमति मिलीऐ बीस इकीस ॥२५॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) झखि बोलणु किआ जग सिउ वादु ॥ झूरि मरै देखै परमादु ॥ जनमि मूए नही जीवण आसा ॥ आइ चले भए आस निरासा ॥ झुरि झुरि झखि माटी रलि जाइ ॥ कालु न चांपै हरि गुण गाइ ॥ पाई नव निधि हरि कै नाइ ॥ आपे देवै सहजि सुभाइ ॥२६॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) ञिआनो बोलै आपे बूझै ॥ आपे समझै आपे सूझै ॥ गुर का कहिआ अंकि समावै ॥ निरमल सूचे साचो भावै ॥ गुरु सागरु रतनी नही तोट ॥ लाल पदारथ साचु अखोट ॥ गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥ गुर की करणी काहे धावहु ॥ नानक गुरमति साचि समावहु ॥२७॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) टूटै नेहु कि बोलहि सही ॥ टूटै बाह दुहू दिस गही ॥ टूटि परीति गई बुर बोलि ॥ दुरमति परहरि छाडी ढोलि ॥ टूटै गंठि पड़ै वीचारि ॥ गुर सबदी घरि कारजु सारि ॥ लाहा साचु न आवै तोटा ॥ त्रिभवण ठाकुरु प्रीतमु मोटा ॥२८॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) ठाकहु मनूआ राखहु ठाइ ॥ ठहकि मुई अवगुणि पछुताइ ॥ ठाकुरु एकु सबाई नारि ॥ बहुते वेस करे कूड़िआरि ॥ पर घरि जाती ठाकि रहाई ॥ महलि बुलाई ठाक न पाई ॥ सबदि सवारी साचि पिआरी ॥ साई सोहागणि ठाकुरि धारी ॥२९॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) डोलत डोलत हे सखी फाटे चीर सीगार ॥ डाहपणि तनि सुखु नही बिनु डर बिणठी डार ॥ डरपि मुई घरि आपणै डीठी कंति सुजाणि ॥ डरु राखिआ गुरि आपणै निरभउ नामु वखाणि ॥ डूगरि वासु तिखा घणी जब देखा नही दूरि ॥ तिखा निवारी सबदु मंनि अम्रितु पीआ भरपूरि ॥ देहि देहि आखै सभु कोई जै भावै तै देइ ॥ गुरू दुआरै देवसी तिखा निवारै सोइ ॥३०॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 933) ढंढोलत ढूढत हउ फिरी ढहि ढहि पवनि करारि ॥ भारे ढहते ढहि पए हउले निकसे पारि ॥ अमर अजाची हरि मिले तिन कै हउ बलि जाउ ॥ तिन की धूड़ि अघुलीऐ संगति मेलि मिलाउ ॥ मनु दीआ गुरि आपणै पाइआ निरमल नाउ ॥ जिनि नामु दीआ तिसु सेवसा तिसु बलिहारै जाउ ॥ जो उसारे सो ढाहसी तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी तिसु सम्हला ता तनि दूखु न होइ ॥३१॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) णा को मेरा किसु गही णा को होआ न होगु ॥ आवणि जाणि विगुचीऐ दुबिधा विआपै रोगु ॥ णाम विहूणे आदमी कलर कंध गिरंति ॥ विणु नावै किउ छूटीऐ जाइ रसातलि अंति ॥ गणत गणावै अखरी अगणतु साचा सोइ ॥ अगिआनी मतिहीणु है गुर बिनु गिआनु न होइ ॥ तूटी तंतु रबाब की वाजै नही विजोगि ॥ विछुड़िआ मेलै प्रभू नानक करि संजोग ॥३२॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) तरवरु काइआ पंखि मनु तरवरि पंखी पंच ॥ ततु चुगहि मिलि एकसे तिन कउ फास न रंच ॥ उडहि त बेगुल बेगुले ताकहि चोग घणी ॥ पंख तुटे फाही पड़ी अवगुणि भीड़ बणी ॥ बिनु साचे किउ छूटीऐ हरि गुण करमि मणी ॥ आपि छडाए छूटीऐ वडा आपि धणी ॥ गुर परसादी छूटीऐ किरपा आपि करेइ ॥ अपणै हाथि वडाईआ जै भावै तै देइ ॥३३॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) थर थर क्मपै जीअड़ा थान विहूणा होइ ॥ थानि मानि सचु एकु है काजु न फीटै कोइ ॥ थिरु नाराइणु थिरु गुरू थिरु साचा बीचारु ॥ सुरि नर नाथह नाथु तू निधारा आधारु ॥ सरबे थान थनंतरी तू दाता दातारु ॥ जह देखा तह एकु तू अंतु न पारावारु ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ गुर सबदी वीचारि ॥ अणमंगिआ दानु देवसी वडा अगम अपारु ॥३४॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) दइआ दानु दइआलु तू करि करि देखणहारु ॥ दइआ करहि प्रभ मेलि लैहि खिन महि ढाहि उसारि ॥ दाना तू बीना तुही दाना कै सिरि दानु ॥ दालद भंजन दुख दलण गुरमुखि गिआनु धिआनु ॥३५॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) धनि गइऐ बहि झूरीऐ धन महि चीतु गवार ॥ धनु विरली सचु संचिआ निरमलु नामु पिआरि ॥ धनु गइआ ता जाण देहि जे राचहि रंगि एक ॥ मनु दीजै सिरु सउपीऐ भी करते की टेक ॥ धंधा धावत रहि गए मन महि सबदु अनंदु ॥ दुरजन ते साजन भए भेटे गुर गोविंद ॥ बनु बनु फिरती ढूढती बसतु रही घरि बारि ॥ सतिगुरि मेली मिलि रही जनम मरण दुखु निवारि ॥३६॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 934) नाना करत न छूटीऐ विणु गुण जम पुरि जाहि ॥ ना तिसु एहु न ओहु है अवगुणि फिरि पछुताहि ॥ ना तिसु गिआनु न धिआनु है ना तिसु धरमु धिआनु ॥ विणु नावै निरभउ कहा किआ जाणा अभिमानु ॥ थाकि रही किव अपड़ा हाथ नही ना पारु ॥ ना साजन से रंगुले किसु पहि करी पुकार ॥ नानक प्रिउ प्रिउ जे करी मेले मेलणहारु ॥ जिनि विछोड़ी सो मेलसी गुर कै हेति अपारि ॥३७॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 935) पापु बुरा पापी कउ पिआरा ॥ पापि लदे पापे पासारा ॥ परहरि पापु पछाणै आपु ॥ ना तिसु सोगु विजोगु संतापु ॥ नरकि पड़ंतउ किउ रहै किउ बंचै जमकालु ॥ किउ आवण जाणा वीसरै झूठु बुरा खै कालु ॥ मनु जंजाली वेड़िआ भी जंजाला माहि ॥ विणु नावै किउ छूटीऐ पापे पचहि पचाहि ॥३८॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 935) फिरि फिरि फाही फासै कऊआ ॥ फिरि पछुताना अब किआ हूआ ॥ फाथा चोग चुगै नही बूझै ॥ सतगुरु मिलै त आखी सूझै ॥ जिउ मछुली फाथी जम जालि ॥ विणु गुर दाते मुकति न भालि ॥ फिरि फिरि आवै फिरि फिरि जाइ ॥ इक रंगि रचै रहै लिव लाइ ॥ इव छूटै फिरि फास न पाइ ॥३९॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 935) बीरा बीरा करि रही बीर भए बैराइ ॥ बीर चले घरि आपणै बहिण बिरहि जलि जाइ ॥ बाबुल कै घरि बेटड़ी बाली बालै नेहि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी सतिगुरु सेवहि तेहि ॥ बिरलो गिआनी बूझणउ सतिगुरु साचि मिलेइ ॥ ठाकुर हाथि वडाईआ जै भावै तै देइ ॥ बाणी बिरलउ बीचारसी जे को गुरमुखि होइ ॥ इह बाणी महा पुरख की निज घरि वासा होइ ॥४०॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 935) भनि भनि घड़ीऐ घड़ि घड़ि भजै ढाहि उसारै उसरे ढाहै ॥ सर भरि सोखै भी भरि पोखै समरथ वेपरवाहै ॥ भरमि भुलाने भए दिवाने विणु भागा किआ पाईऐ ॥ गुरमुखि गिआनु डोरी प्रभि पकड़ी जिन खिंचै तिन जाईऐ ॥ हरि गुण गाइ सदा रंगि राते बहुड़ि न पछोताईऐ ॥ भभै भालहि गुरमुखि बूझहि ता निज घरि वासा पाईऐ ॥ भभै भउजलु मारगु विखड़ा आस निरासा तरीऐ ॥ गुर परसादी आपो चीन्है जीवतिआ इव मरीऐ ॥४१॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 935) माइआ माइआ करि मुए माइआ किसै न साथि ॥ हंसु चलै उठि डुमणो माइआ भूली आथि ॥ मनु झूठा जमि जोहिआ अवगुण चलहि नालि ॥ मन महि मनु उलटो मरै जे गुण होवहि नालि ॥ मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥ गड़ मंदर महला कहा जिउ बाजी दीबाणु ॥ नानक सचे नाम विणु झूठा आवण जाणु ॥ आपे चतुरु सरूपु है आपे जाणु सुजाणु ॥४२॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 936) जो आवहि से जाहि फुनि आइ गए पछुताहि ॥ लख चउरासीह मेदनी घटै न वधै उताहि ॥ से जन उबरे जिन हरि भाइआ ॥ धंधा मुआ विगूती माइआ ॥ जो दीसै सो चालसी किस कउ मीतु करेउ ॥ जीउ समपउ आपणा तनु मनु आगै देउ ॥ असथिरु करता तू धणी तिस ही की मै ओट ॥ गुण की मारी हउ मुई सबदि रती मनि चोट ॥४३॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 936) राणा राउ न को रहै रंगु न तुंगु फकीरु ॥ वारी आपो आपणी कोइ न बंधै धीर ॥ राहु बुरा भीहावला सर डूगर असगाह ॥ मै तनि अवगण झुरि मुई विणु गुण किउ घरि जाह ॥ गुणीआ गुण ले प्रभ मिले किउ तिन मिलउ पिआरि ॥ तिन ही जैसी थी रहां जपि जपि रिदै मुरारि ॥ अवगुणी भरपूर है गुण भी वसहि नालि ॥ विणु सतगुर गुण न जापनी जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥४४॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 936) लसकरीआ घर समले आए वजहु लिखाइ ॥ कार कमावहि सिरि धणी लाहा पलै पाइ ॥ लबु लोभु बुरिआईआ छोडे मनहु विसारि ॥ गड़ि दोही पातिसाह की कदे न आवै हारि ॥ चाकरु कहीऐ खसम का सउहे उतर देइ ॥ वजहु गवाए आपणा तखति न बैसहि सेइ ॥ प्रीतम हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥ आपि करे किसु आखीऐ अवरु न कोइ करेइ ॥४५॥

(राग रामकली दखणी -- SGGS 936) बीजउ सूझै को नही बहै दुलीचा पाइ ॥ नरक निवारणु नरह नरु साचउ साचै नाइ ॥ वणु त्रिणु ढूढत फिरि रही मन महि करउ बीचारु ॥ लाल रतन बहु माणकी सतिगुर हाथि भंडारु ॥ ऊतमु होवा प्रभु मिलै इक मनि एकै भाइ ॥ नानक प्रीतम रसि मिले लाहा लै परथाइ ॥ रचना राचि जिनि रची जिनि सिरिआ आकारु ॥ गुरमुखि बेअंतु धिआईऐ अंतु न पारावारु ॥४६॥


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