Pt 7 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 7 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी चेती -- SGGS 210) रागु गउड़ी चेती महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥ जीति जनमु इहु रतनु अमोलकु साधसंगति जपि इक खिना ॥१॥ रहाउ ॥

सुत स्मपति बनिता बिनोद ॥ छोडि गए बहु लोग भोग ॥१॥

हैवर गैवर राज रंग ॥ तिआगि चलिओ है मूड़ नंग ॥२॥

चोआ चंदन देह फूलिआ ॥ सो तनु धर संगि रूलिआ ॥३॥

मोहि मोहिआ जानै दूरि है ॥ कहु नानक सदा हदूरि है ॥४॥१॥१३९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 210) गउड़ी महला ५ ॥
मन धर तरबे हरि नाम नो ॥ सागर लहरि संसा संसारु गुरु बोहिथु पार गरामनो ॥१॥ रहाउ ॥

कलि कालख अंधिआरीआ ॥ गुर गिआन दीपक उजिआरीआ ॥१॥

बिखु बिखिआ पसरी अति घनी ॥ उबरे जपि जपि हरि गुनी ॥२॥

मतवारो माइआ सोइआ ॥ गुर भेटत भ्रमु भउ खोइआ ॥३॥

कहु नानक एकु धिआइआ ॥ घटि घटि नदरी आइआ ॥४॥२॥१४०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 210) गउड़ी महला ५ ॥
दीबानु हमारो तुही एक ॥ सेवा थारी गुरहि टेक ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जुगति नही पाइआ ॥ गुरि चाकर लै लाइआ ॥१॥

मारे पंच बिखादीआ ॥ गुर किरपा ते दलु साधिआ ॥२॥

बखसीस वजहु मिलि एकु नाम ॥ सूख सहज आनंद बिस्राम ॥३॥

प्रभ के चाकर से भले ॥ नानक तिन मुख ऊजले ॥४॥३॥१४१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
जीअरे ओल्हा नाम का ॥ अवरु जि करन करावनो तिन महि भउ है जाम का ॥१॥ रहाउ ॥

अवर जतनि नही पाईऐ ॥ वडै भागि हरि धिआईऐ ॥१॥

लाख हिकमती जानीऐ ॥ आगै तिलु नही मानीऐ ॥२॥

अह्मबुधि करम कमावने ॥ ग्रिह बालू नीरि बहावने ॥३॥

प्रभु क्रिपालु किरपा करै ॥ नामु नानक साधू संगि मिलै ॥४॥४॥१४२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
बारनै बलिहारनै लख बरीआ ॥ नामो हो नामु साहिब को प्रान अधरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन तुही एक ॥ जीअ जंत की तुही टेक ॥१॥

राज जोबन प्रभ तूं धनी ॥ तूं निरगुन तूं सरगुनी ॥२॥

ईहा ऊहा तुम रखे ॥ गुर किरपा ते को लखे ॥३॥

अंतरजामी प्रभ सुजानु ॥ नानक तकीआ तुही ताणु ॥४॥५॥१४३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ ॥ संतसंगि हरि मनि वसै भरमु मोहु भउ साधीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुराण सिम्रिति भने ॥ सभ ऊच बिराजित जन सुने ॥१॥

सगल असथान भै भीत चीन ॥ राम सेवक भै रहत कीन ॥२॥

लख चउरासीह जोनि फिरहि ॥ गोबिंद लोक नही जनमि मरहि ॥३॥

बल बुधि सिआनप हउमै रही ॥ हरि साध सरणि नानक गही ॥४॥६॥१४४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
मन राम नाम गुन गाईऐ ॥ नीत नीत हरि सेवीऐ सासि सासि हरि धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संतसंगि हरि मनि वसै ॥ दुखु दरदु अनेरा भ्रमु नसै ॥१॥

संत प्रसादि हरि जापीऐ ॥ सो जनु दूखि न विआपीऐ ॥२॥

जा कउ गुरु हरि मंत्रु दे ॥ सो उबरिआ माइआ अगनि ते ॥३॥

नानक कउ प्रभ मइआ करि ॥ मेरै मनि तनि वासै नामु हरि ॥४॥७॥१४५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
रसना जपीऐ एकु नाम ॥ ईहा सुखु आनंदु घना आगै जीअ कै संगि काम ॥१॥ रहाउ ॥

कटीऐ तेरा अहं रोगु ॥ तूं गुर प्रसादि करि राज जोगु ॥१॥

हरि रसु जिनि जनि चाखिआ ॥ ता की त्रिसना लाथीआ ॥२॥

हरि बिस्राम निधि पाइआ ॥ सो बहुरि न कत ही धाइआ ॥३॥

हरि हरि नामु जा कउ गुरि दीआ ॥ नानक ता का भउ गइआ ॥४॥८॥१४६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥ साधसंगति मिलि हरि रवहि से गुणी गहीर ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ गुरमुखि रिदै बुधि ॥ ता कै कर तल नव निधि सिधि ॥१॥

जो जानहि हरि प्रभ धनी ॥ किछु नाही ता कै कमी ॥२॥

करणैहारु पछानिआ ॥ सरब सूख रंग माणिआ ॥३॥

हरि धनु जा कै ग्रिहि वसै ॥ कहु नानक तिन संगि दुखु नसै ॥४॥९॥१४७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
गरबु बडो मूलु इतनो ॥ रहनु नही गहु कितनो ॥१॥ रहाउ ॥

बेबरजत बेद संतना उआहू सिउ रे हितनो ॥ हार जूआर जूआ बिधे इंद्री वसि लै जितनो ॥१॥

हरन भरन स्मपूरना चरन कमल रंगि रितनो ॥ नानक उधरे साधसंगि किरपा निधि मै दितनो ॥२॥१०॥१४८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
मोहि दासरो ठाकुर को ॥ धानु प्रभ का खाना ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसो है रे खसमु हमारा ॥ खिन महि साजि सवारणहारा ॥१॥

कामु करी जे ठाकुर भावा ॥ गीत चरित प्रभ के गुन गावा ॥२॥

सरणि परिओ ठाकुर वजीरा ॥ तिना देखि मेरा मनु धीरा ॥३॥

एक टेक एको आधारा ॥ जन नानक हरि की लागा कारा ॥४॥११॥१४९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥ इसु मीठी ते इहु मनु होरै ॥१॥ रहाउ ॥

अगिआनी मानुखु भइआ जो नाही सो लोरै ॥ रैणि अंधारी कारीआ कवन जुगति जितु भोरै ॥१॥

भ्रमतो भ्रमतो हारिआ अनिक बिधी करि टोरै ॥ कहु नानक किरपा भई साधसंगति निधि मोरै ॥२॥१२॥१५०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
चिंतामणि करुणा मए ॥१॥ रहाउ ॥

दीन दइआला पारब्रहम ॥ जा कै सिमरणि सुख भए ॥१॥

अकाल पुरख अगाधि बोध ॥ सुनत जसो कोटि अघ खए ॥२॥

किरपा निधि प्रभ मइआ धारि ॥ नानक हरि हरि नाम लए ॥३॥१३॥१५१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 212) गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥ जा दिनि बिसरै प्रान सुखदाता सो दिनु जात अजाए ॥१॥ रहाउ ॥

एक रैण के पाहुन तुम आए बहु जुग आस बधाए ॥ ग्रिह मंदर स्मपै जो दीसै जिउ तरवर की छाए ॥१॥

तनु मेरा स्मपै सभ मेरी बाग मिलख सभ जाए ॥ देवनहारा बिसरिओ ठाकुरु खिन महि होत पराए ॥२॥

पहिरै बागा करि इसनाना चोआ चंदन लाए ॥ निरभउ निरंकार नही चीनिआ जिउ हसती नावाए ॥३॥

जउ होइ क्रिपाल त सतिगुरु मेलै सभि सुख हरि के नाए ॥ मुकतु भइआ बंधन गुरि खोले जन नानक हरि गुण गाए ॥४॥१४॥१५२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 213) गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
मेरे मन गुरु गुरु गुरु सद करीऐ ॥ रतन जनमु सफलु गुरि कीआ दरसन कउ बलिहरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

जेते सास ग्रास मनु लेता तेते ही गुन गाईऐ ॥ जउ होइ दैआलु सतिगुरु अपुना ता इह मति बुधि पाईऐ ॥१॥

मेरे मन नामि लए जम बंध ते छूटहि सरब सुखा सुख पाईऐ ॥ सेवि सुआमी सतिगुरु दाता मन बंछत फल आईऐ ॥२॥

नामु इसटु मीत सुत करता मन संगि तुहारै चालै ॥ करि सेवा सतिगुर अपुने की गुर ते पाईऐ पालै ॥३॥

गुरि किरपालि क्रिपा प्रभि धारी बिनसे सरब अंदेसा ॥ नानक सुखु पाइआ हरि कीरतनि मिटिओ सगल कलेसा ॥४॥१५॥१५३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 213) रागु गउड़ी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
त्रिसना बिरले ही की बुझी हे ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जोरे लाख क्रोरे मनु न होरे ॥ परै परै ही कउ लुझी हे ॥१॥

सुंदर नारी अनिक परकारी पर ग्रिह बिकारी ॥ बुरा भला नही सुझी हे ॥२॥

अनिक बंधन माइआ भरमतु भरमाइआ गुण निधि नही गाइआ ॥ मन बिखै ही महि लुझी हे ॥३॥

जा कउ रे किरपा करै जीवत सोई मरै साधसंगि माइआ तरै ॥ नानक सो जनु दरि हरि सिझी हे ॥४॥१॥१५४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 213) गउड़ी महला ५ ॥
सभहू को रसु हरि हो ॥१॥ रहाउ ॥

काहू जोग काहू भोग काहू गिआन काहू धिआन ॥ काहू हो डंड धरि हो ॥१॥

काहू जाप काहू ताप काहू पूजा होम नेम ॥ काहू हो गउनु करि हो ॥२॥

काहू तीर काहू नीर काहू बेद बीचार ॥ नानका भगति प्रिअ हो ॥३॥२॥१५५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 213) गउड़ी महला ५ ॥
गुन कीरति निधि मोरी ॥१॥ रहाउ ॥

तूंही रस तूंही जस तूंही रूप तूही रंग ॥ आस ओट प्रभ तोरी ॥१॥

तूही मान तूंही धान तूही पति तूही प्रान ॥ गुरि तूटी लै जोरी ॥२॥

तूही ग्रिहि तूही बनि तूही गाउ तूही सुनि ॥ है नानक नेर नेरी ॥३॥३॥१५६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 214) गउड़ी महला ५ ॥
मातो हरि रंगि मातो ॥१॥ रहाउ ॥

ओही पीओ ओही खीओ गुरहि दीओ दानु कीओ ॥ उआहू सिउ मनु रातो ॥१॥

ओही भाठी ओही पोचा उही पिआरो उही रूचा ॥ मनि ओहो सुखु जातो ॥२॥

सहज केल अनद खेल रहे फेर भए मेल ॥ नानक गुर सबदि परातो ॥३॥४॥१५७॥

(राग गौड़ी मालवा -- SGGS 214) रागु गौड़ी मालवा महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि नामु लेहु मीता लेहु आगै बिखम पंथु भैआन ॥१॥ रहाउ ॥

सेवत सेवत सदा सेवि तेरै संगि बसतु है कालु ॥ करि सेवा तूं साध की हो काटीऐ जम जालु ॥१॥

होम जग तीरथ कीए बिचि हउमै बधे बिकार ॥ नरकु सुरगु दुइ भुंचना होइ बहुरि बहुरि अवतार ॥२॥

सिव पुरी ब्रहम इंद्र पुरी निहचलु को थाउ नाहि ॥ बिनु हरि सेवा सुखु नही हो साकत आवहि जाहि ॥३॥

जैसो गुरि उपदेसिआ मै तैसो कहिआ पुकारि ॥ नानकु कहै सुनि रे मना करि कीरतनु होइ उधारु ॥४॥१॥१५८॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 214) रागु गउड़ी माला महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाइओ बाल बुधि सुखु रे ॥ हरख सोग हानि मिरतु दूख सुख चिति समसरि गुर मिले ॥१॥ रहाउ ॥

जउ लउ हउ किछु सोचउ चितवउ तउ लउ दुखनु भरे ॥ जउ क्रिपालु गुरु पूरा भेटिआ तउ आनद सहजे ॥१॥

जेती सिआनप करम हउ कीए तेते बंध परे ॥ जउ साधू करु मसतकि धरिओ तब हम मुकत भए ॥२॥

जउ लउ मेरो मेरो करतो तउ लउ बिखु घेरे ॥ मनु तनु बुधि अरपी ठाकुर कउ तब हम सहजि सोए ॥३॥

जउ लउ पोट उठाई चलिअउ तउ लउ डान भरे ॥ पोट डारि गुरु पूरा मिलिआ तउ नानक निरभए ॥४॥१॥१५९॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 214) गउड़ी माला महला ५ ॥
भावनु तिआगिओ री तिआगिओ ॥ तिआगिओ मै गुर मिलि तिआगिओ ॥ सरब सुख आनंद मंगल रस मानि गोबिंदै आगिओ ॥१॥ रहाउ ॥

मानु अभिमानु दोऊ समाने मसतकु डारि गुर पागिओ ॥ स्मपत हरखु न आपत दूखा रंगु ठाकुरै लागिओ ॥१॥

बास बासरी एकै सुआमी उदिआन द्रिसटागिओ ॥ निरभउ भए संत भ्रमु डारिओ पूरन सरबागिओ ॥२॥

जो किछु करतै कारणु कीनो मनि बुरो न लागिओ ॥ साधसंगति परसादि संतन कै सोइओ मनु जागिओ ॥३॥

जन नानक ओड़ि तुहारी परिओ आइओ सरणागिओ ॥ नाम रंग सहज रस माणे फिरि दूखु न लागिओ ॥४॥२॥१६०॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 215) गउड़ी माला महला ५ ॥
पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥ तनु सीतलु मनु सीतलु थीआ सतगुर सबदि समाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

लाथी भूख त्रिसन सभ लाथी चिंता सगल बिसारी ॥ करु मसतकि गुरि पूरै धरिओ मनु जीतो जगु सारी ॥१॥

त्रिपति अघाइ रहे रिद अंतरि डोलन ते अब चूके ॥ अखुटु खजाना सतिगुरि दीआ तोटि नही रे मूके ॥२॥

अचरजु एकु सुनहु रे भाई गुरि ऐसी बूझ बुझाई ॥ लाहि परदा ठाकुरु जउ भेटिओ तउ बिसरी ताति पराई ॥३॥

कहिओ न जाई एहु अच्मभउ सो जानै जिनि चाखिआ ॥ कहु नानक सच भए बिगासा गुरि निधानु रिदै लै राखिआ ॥४॥३॥१६१॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 215) गउड़ी माला महला ५ ॥
उबरत राजा राम की सरणी ॥ सरब लोक माइआ के मंडल गिरि गिरि परते धरणी ॥१॥ रहाउ ॥

सासत सिम्रिति बेद बीचारे महा पुरखन इउ कहिआ ॥ बिनु हरि भजन नाही निसतारा सूखु न किनहूं लहिआ ॥१॥

तीनि भवन की लखमी जोरी बूझत नाही लहरे ॥ बिनु हरि भगति कहा थिति पावै फिरतो पहरे पहरे ॥२॥

अनिक बिलास करत मन मोहन पूरन होत न कामा ॥ जलतो जलतो कबहू न बूझत सगल ब्रिथे बिनु नामा ॥३॥

हरि का नामु जपहु मेरे मीता इहै सार सुखु पूरा ॥ साधसंगति जनम मरणु निवारै नानक जन की धूरा ॥४॥४॥१६२॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 215) गउड़ी माला महला ५ ॥
मो कउ इह बिधि को समझावै ॥ करता होइ जनावै ॥१॥ रहाउ ॥

अनजानत किछु इनहि कमानो जप तप कछू न साधा ॥ दह दिसि लै इहु मनु दउराइओ कवन करम करि बाधा ॥१॥

मन तन धन भूमि का ठाकुरु हउ इस का इहु मेरा ॥ भरम मोह कछु सूझसि नाही इह पैखर पए पैरा ॥२॥

तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू न होता ॥ जब एक निरंजन निरंकार प्रभ सभु किछु आपहि करता ॥३॥

अपने करतब आपे जानै जिनि इहु रचनु रचाइआ ॥ कहु नानक करणहारु है आपे सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥५॥१६३॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 216) गउड़ी माला महला ५ ॥
हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥ जप तप संजम करम कमाणे इहि ओरै मूसे ॥१॥ रहाउ ॥

बरत नेम संजम महि रहता तिन का आढु न पाइआ ॥ आगै चलणु अउरु है भाई ऊंहा कामि न आइआ ॥१॥

तीरथि नाइ अरु धरनी भ्रमता आगै ठउर न पावै ॥ ऊहा कामि न आवै इह बिधि ओहु लोगन ही पतीआवै ॥२॥

चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ ॥ बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ ॥३॥

नानकु कहतो इहु बीचारा जि कमावै सु पार गरामी ॥ गुरु सेवहु अरु नामु धिआवहु तिआगहु मनहु गुमानी ॥४॥६॥१६४॥

(राग गउड़ी माला -- SGGS 216) गउड़ी माला ५ ॥
माधउ हरि हरि हरि मुखि कहीऐ ॥ हम ते कछू न होवै सुआमी जिउ राखहु तिउ रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

किआ किछु करै कि करणैहारा किआ इसु हाथि बिचारे ॥ जितु तुम लावहु तित ही लागा पूरन खसम हमारे ॥१॥

करहु क्रिपा सरब के दाते एक रूप लिव लावहु ॥ नानक की बेनंती हरि पहि अपुना नामु जपावहु ॥२॥७॥१६५॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 216) रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन दइआल दमोदर राइआ जीउ ॥ कोटि जना करि सेव लगाइआ जीउ ॥ भगत वछलु तेरा बिरदु रखाइआ जीउ ॥ पूरन सभनी जाई जीउ ॥१॥

किउ पेखा प्रीतमु कवण सुकरणी जीउ ॥ संता दासी सेवा चरणी जीउ ॥ इहु जीउ वताई बलि बलि जाई जीउ ॥ तिसु निवि निवि लागउ पाई जीउ ॥२॥

पोथी पंडित बेद खोजंता जीउ ॥ होइ बैरागी तीरथि नावंता जीउ ॥ गीत नाद कीरतनु गावंता जीउ ॥ हरि निरभउ नामु धिआई जीउ ॥३॥

भए क्रिपाल सुआमी मेरे जीउ ॥ पतित पवित लगि गुर के पैरे जीउ ॥ भ्रमु भउ काटि कीए निरवैरे जीउ ॥ गुर मन की आस पूराई जीउ ॥४॥

जिनि नाउ पाइआ सो धनवंता जीउ ॥ जिनि प्रभु धिआइआ सु सोभावंता जीउ ॥ जिसु साधू संगति तिसु सभ सुकरणी जीउ ॥ जन नानक सहजि समाई जीउ ॥५॥१॥१६६॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 217) गउड़ी महला ५ माझ ॥
आउ हमारै राम पिआरे जीउ ॥ रैणि दिनसु सासि सासि चितारे जीउ ॥ संत देउ संदेसा पै चरणारे जीउ ॥ तुधु बिनु कितु बिधि तरीऐ जीउ ॥१॥

संगि तुमारै मै करे अनंदा जीउ ॥ वणि तिणि त्रिभवणि सुख परमानंदा जीउ ॥ सेज सुहावी इहु मनु बिगसंदा जीउ ॥ पेखि दरसनु इहु सुखु लहीऐ जीउ ॥२॥

चरण पखारि करी नित सेवा जीउ ॥ पूजा अरचा बंदन देवा जीउ ॥ दासनि दासु नामु जपि लेवा जीउ ॥ बिनउ ठाकुर पहि कहीऐ जीउ ॥३॥

इछ पुंनी मेरी मनु तनु हरिआ जीउ ॥ दरसन पेखत सभ दुख परहरिआ जीउ ॥ हरि हरि नामु जपे जपि तरिआ जीउ ॥ इहु अजरु नानक सुखु सहीऐ जीउ ॥४॥२॥१६७॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 217) गउड़ी माझ महला ५ ॥
सुणि सुणि साजन मन मित पिआरे जीउ ॥ मनु तनु तेरा इहु जीउ भि वारे जीउ ॥ विसरु नाही प्रभ प्राण अधारे जीउ ॥ सदा तेरी सरणाई जीउ ॥१॥

जिसु मिलिऐ मनु जीवै भाई जीउ ॥ गुर परसादी सो हरि हरि पाई जीउ ॥ सभ किछु प्रभ का प्रभ कीआ जाई जीउ ॥ प्रभ कउ सद बलि जाई जीउ ॥२॥

एहु निधानु जपै वडभागी जीउ ॥ नाम निरंजन एक लिव लागी जीउ ॥ गुरु पूरा पाइआ सभु दुखु मिटाइआ जीउ ॥ आठ पहर गुण गाइआ जीउ ॥३॥

रतन पदारथ हरि नामु तुमारा जीउ ॥ तूं सचा साहु भगतु वणजारा जीउ ॥ हरि धनु रासि सचु वापारा जीउ ॥ जन नानक सद बलिहारा जीउ ॥४॥३॥१६८॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 217) रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥ जोरि तुमारै सुखि वसा सचु सबदु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥

सभे गला जातीआ सुणि कै चुप कीआ ॥ कद ही सुरति न लधीआ माइआ मोहड़िआ ॥१॥

देइ बुझारत सारता से अखी डिठड़िआ ॥ कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥२॥

इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥ इकु अधु नाइ रसीअड़ा का विरली जाइ वुठी ॥३॥

भगत सचे दरि सोहदे अनद करहि दिन राति ॥ रंगि रते परमेसरै जन नानक तिन बलि जात ॥४॥१॥१६९॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 218) गउड़ी महला ५ मांझ ॥
दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥ आठ पहर आराधीऐ पूरन सतिगुर गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

जितु घटि वसै पारब्रहमु सोई सुहावा थाउ ॥ जम कंकरु नेड़ि न आवई रसना हरि गुण गाउ ॥१॥

सेवा सुरति न जाणीआ ना जापै आराधि ॥ ओट तेरी जगजीवना मेरे ठाकुर अगम अगाधि ॥२॥

भए क्रिपाल गुसाईआ नठे सोग संताप ॥ तती वाउ न लगई सतिगुरि रखे आपि ॥३॥

गुरु नाराइणु दयु गुरु गुरु सचा सिरजणहारु ॥ गुरि तुठै सभ किछु पाइआ जन नानक सद बलिहार ॥४॥२॥१७०॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 218) गउड़ी माझ महला ५ ॥
हरि राम राम राम रामा ॥ जपि पूरन होए कामा ॥१॥ रहाउ ॥

राम गोबिंद जपेदिआ होआ मुखु पवित्रु ॥ हरि जसु सुणीऐ जिस ते सोई भाई मित्रु ॥१॥

सभि पदारथ सभि फला सरब गुणा जिसु माहि ॥ किउ गोबिंदु मनहु विसारीऐ जिसु सिमरत दुख जाहि ॥२॥

जिसु लड़ि लगिऐ जीवीऐ भवजलु पईऐ पारि ॥ मिलि साधू संगि उधारु होइ मुख ऊजल दरबारि ॥३॥

जीवन रूप गोपाल जसु संत जना की रासि ॥ नानक उबरे नामु जपि दरि सचै साबासि ॥४॥३॥१७१॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 218) गउड़ी माझ महला ५ ॥
मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥ सचे सेती रतिआ मिलिआ निथावे थाउ ॥१॥ रहाउ ॥

होरि साद सभि फिकिआ तनु मनु फिका होइ ॥ विणु परमेसर जो करे फिटु सु जीवणु सोइ ॥१॥

अंचलु गहि कै साध का तरणा इहु संसारु ॥ पारब्रहमु आराधीऐ उधरै सभ परवारु ॥२॥

साजनु बंधु सुमित्रु सो हरि नामु हिरदै देइ ॥ अउगण सभि मिटाइ कै परउपकारु करेइ ॥३॥

मालु खजाना थेहु घरु हरि के चरण निधान ॥ नानकु जाचकु दरि तेरै प्रभ तुधनो मंगै दानु ॥४॥४॥१७२॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 235) रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
जब इहु मन महि करत गुमाना ॥ तब इहु बावरु फिरत बिगाना ॥ जब इहु हूआ सगल की रीना ॥ ता ते रमईआ घटि घटि चीना ॥१॥

सहज सुहेला फलु मसकीनी ॥ सतिगुर अपुनै मोहि दानु दीनी ॥१॥ रहाउ ॥

जब किस कउ इहु जानसि मंदा ॥ तब सगले इसु मेलहि फंदा ॥ मेर तेर जब इनहि चुकाई ॥ ता ते इसु संगि नही बैराई ॥२॥

जब इनि अपुनी अपनी धारी ॥ तब इस कउ है मुसकलु भारी ॥ जब इनि करणैहारु पछाता ॥ तब इस नो नाही किछु ताता ॥३॥

जब इनि अपुनो बाधिओ मोहा ॥ आवै जाइ सदा जमि जोहा ॥ जब इस ते सभ बिनसे भरमा ॥ भेदु नाही है पारब्रहमा ॥४॥

जब इनि किछु करि माने भेदा ॥ तब ते दूख डंड अरु खेदा ॥ जब इनि एको एकी बूझिआ ॥ तब ते इस नो सभु किछु सूझिआ ॥५॥

जब इहु धावै माइआ अरथी ॥ नह त्रिपतावै नह तिस लाथी ॥ जब इस ते इहु होइओ जउला ॥ पीछै लागि चली उठि कउला ॥६॥

करि किरपा जउ सतिगुरु मिलिओ ॥ मन मंदर महि दीपकु जलिओ ॥ जीत हार की सोझी करी ॥ तउ इसु घर की कीमति परी ॥७॥

करन करावन सभु किछु एकै ॥ आपे बुधि बीचारि बिबेकै ॥ दूरि न नेरै सभ कै संगा ॥ सचु सालाहणु नानक हरि रंगा ॥८॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 236) गउड़ी महला ५ ॥
गुर सेवा ते नामे लागा ॥ तिस कउ मिलिआ जिसु मसतकि भागा ॥ तिस कै हिरदै रविआ सोइ ॥ मनु तनु सीतलु निहचलु होइ ॥१॥

ऐसा कीरतनु करि मन मेरे ॥ ईहा ऊहा जो कामि तेरै ॥१॥ रहाउ ॥

जासु जपत भउ अपदा जाइ ॥ धावत मनूआ आवै ठाइ ॥ जासु जपत फिरि दूखु न लागै ॥ जासु जपत इह हउमै भागै ॥२॥

जासु जपत वसि आवहि पंचा ॥ जासु जपत रिदै अम्रितु संचा ॥ जासु जपत इह त्रिसना बुझै ॥ जासु जपत हरि दरगह सिझै ॥३॥

जासु जपत कोटि मिटहि अपराध ॥ जासु जपत हरि होवहि साध ॥ जासु जपत मनु सीतलु होवै ॥ जासु जपत मलु सगली खोवै ॥४॥

जासु जपत रतनु हरि मिलै ॥ बहुरि न छोडै हरि संगि हिलै ॥ जासु जपत कई बैकुंठ वासु ॥ जासु जपत सुख सहजि निवासु ॥५॥

जासु जपत इह अगनि न पोहत ॥ जासु जपत इहु कालु न जोहत ॥ जासु जपत तेरा निरमल माथा ॥ जासु जपत सगला दुखु लाथा ॥६॥

जासु जपत मुसकलु कछू न बनै ॥ जासु जपत सुणि अनहत धुनै ॥ जासु जपत इह निरमल सोइ ॥ जासु जपत कमलु सीधा होइ ॥७॥

गुरि सुभ द्रिसटि सभ ऊपरि करी ॥ जिस कै हिरदै मंत्रु दे हरी ॥ अखंड कीरतनु तिनि भोजनु चूरा ॥ कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥८॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 236) गउड़ी महला ५ ॥
गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥ पंच जना सिउ संगु निवारै ॥ दस इंद्री करि राखै वासि ॥ ता कै आतमै होइ परगासु ॥१॥

ऐसी द्रिड़ता ता कै होइ ॥ जा कउ दइआ मइआ प्रभ सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

साजनु दुसटु जा कै एक समानै ॥ जेता बोलणु तेता गिआनै ॥ जेता सुनणा तेता नामु ॥ जेता पेखनु तेता धिआनु ॥२॥

सहजे जागणु सहजे सोइ ॥ सहजे होता जाइ सु होइ ॥ सहजि बैरागु सहजे ही हसना ॥ सहजे चूप सहजे ही जपना ॥३॥

सहजे भोजनु सहजे भाउ ॥ सहजे मिटिओ सगल दुराउ ॥ सहजे होआ साधू संगु ॥ सहजि मिलिओ पारब्रहमु निसंगु ॥४॥

सहजे ग्रिह महि सहजि उदासी ॥ सहजे दुबिधा तन की नासी ॥ जा कै सहजि मनि भइआ अनंदु ॥ ता कउ भेटिआ परमानंदु ॥५॥

सहजे अम्रितु पीओ नामु ॥ सहजे कीनो जीअ को दानु ॥ सहज कथा महि आतमु रसिआ ॥ ता कै संगि अबिनासी वसिआ ॥६॥

सहजे आसणु असथिरु भाइआ ॥ सहजे अनहत सबदु वजाइआ ॥ सहजे रुण झुणकारु सुहाइआ ॥ ता कै घरि पारब्रहमु समाइआ ॥७॥

सहजे जा कउ परिओ करमा ॥ सहजे गुरु भेटिओ सचु धरमा ॥ जा कै सहजु भइआ सो जाणै ॥ नानक दास ता कै कुरबाणै ॥८॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 237) गउड़ी महला ५ ॥
प्रथमे गरभ वास ते टरिआ ॥ पुत्र कलत्र कुट्मब संगि जुरिआ ॥ भोजनु अनिक प्रकार बहु कपरे ॥ सरपर गवनु करहिगे बपुरे ॥१॥

कवनु असथानु जो कबहु न टरै ॥ कवनु सबदु जितु दुरमति हरै ॥१॥ रहाउ ॥

इंद्र पुरी महि सरपर मरणा ॥ ब्रहम पुरी निहचलु नही रहणा ॥ सिव पुरी का होइगा काला ॥ त्रै गुण माइआ बिनसि बिताला ॥२॥

गिरि तर धरणि गगन अरु तारे ॥ रवि ससि पवणु पावकु नीरारे ॥ दिनसु रैणि बरत अरु भेदा ॥ सासत सिम्रिति बिनसहिगे बेदा ॥३॥

तीरथ देव देहुरा पोथी ॥ माला तिलकु सोच पाक होती ॥ धोती डंडउति परसादन भोगा ॥ गवनु करैगो सगलो लोगा ॥४॥

जाति वरन तुरक अरु हिंदू ॥ पसु पंखी अनिक जोनि जिंदू ॥ सगल पासारु दीसै पासारा ॥ बिनसि जाइगो सगल आकारा ॥५॥

सहज सिफति भगति ततु गिआना ॥ सदा अनंदु निहचलु सचु थाना ॥ तहा संगति साध गुण रसै ॥ अनभउ नगरु तहा सद वसै ॥६॥

तह भउ भरमा सोगु न चिंता ॥ आवणु जावणु मिरतु न होता ॥ तह सदा अनंद अनहत आखारे ॥ भगत वसहि कीरतन आधारे ॥७॥

पारब्रहम का अंतु न पारु ॥ कउणु करै ता का बीचारु ॥ कहु नानक जिसु किरपा करै ॥ निहचल थानु साधसंगि तरै ॥८॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 237) गउड़ी महला ५ ॥
जो इसु मारे सोई सूरा ॥ जो इसु मारे सोई पूरा ॥ जो इसु मारे तिसहि वडिआई ॥ जो इसु मारे तिस का दुखु जाई ॥१॥

ऐसा कोइ जि दुबिधा मारि गवावै ॥ इसहि मारि राज जोगु कमावै ॥१॥ रहाउ ॥

जो इसु मारे तिस कउ भउ नाहि ॥ जो इसु मारे सु नामि समाहि ॥ जो इसु मारे तिस की त्रिसना बुझै ॥ जो इसु मारे सु दरगह सिझै ॥२॥

जो इसु मारे सो धनवंता ॥ जो इसु मारे सो पतिवंता ॥ जो इसु मारे सोई जती ॥ जो इसु मारे तिसु होवै गती ॥३॥

जो इसु मारे तिस का आइआ गनी ॥ जो इसु मारे सु निहचलु धनी ॥ जो इसु मारे सो वडभागा ॥ जो इसु मारे सु अनदिनु जागा ॥४॥

जो इसु मारे सु जीवन मुकता ॥ जो इसु मारे तिस की निरमल जुगता ॥ जो इसु मारे सोई सुगिआनी ॥ जो इसु मारे सु सहज धिआनी ॥५॥

इसु मारी बिनु थाइ न परै ॥ कोटि करम जाप तप करै ॥ इसु मारी बिनु जनमु न मिटै ॥ इसु मारी बिनु जम ते नही छुटै ॥६॥

इसु मारी बिनु गिआनु न होई ॥ इसु मारी बिनु जूठि न धोई ॥ इसु मारी बिनु सभु किछु मैला ॥ इसु मारी बिनु सभु किछु जउला ॥७॥

जा कउ भए क्रिपाल क्रिपा निधि ॥ तिसु भई खलासी होई सगल सिधि ॥ गुरि दुबिधा जा की है मारी ॥ कहु नानक सो ब्रहम बीचारी ॥८॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 238) गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिउ जुरै त सभु को मीतु ॥ हरि सिउ जुरै त निहचलु चीतु ॥ हरि सिउ जुरै न विआपै काड़्हा ॥ हरि सिउ जुरै त होइ निसतारा ॥१॥

रे मन मेरे तूं हरि सिउ जोरु ॥ काजि तुहारै नाही होरु ॥१॥ रहाउ ॥

वडे वडे जो दुनीआदार ॥ काहू काजि नाही गावार ॥ हरि का दासु नीच कुलु सुणहि ॥ तिस कै संगि खिन महि उधरहि ॥२॥

कोटि मजन जा कै सुणि नाम ॥ कोटि पूजा जा कै है धिआन ॥ कोटि पुंन सुणि हरि की बाणी ॥ कोटि फला गुर ते बिधि जाणी ॥३॥

मन अपुने महि फिरि फिरि चेत ॥ बिनसि जाहि माइआ के हेत ॥ हरि अबिनासी तुमरै संगि ॥ मन मेरे रचु राम कै रंगि ॥४॥

जा कै कामि उतरै सभ भूख ॥ जा कै कामि न जोहहि दूत ॥ जा कै कामि तेरा वड गमरु ॥ जा कै कामि होवहि तूं अमरु ॥५॥

जा के चाकर कउ नही डान ॥ जा के चाकर कउ नही बान ॥ जा कै दफतरि पुछै न लेखा ॥ ता की चाकरी करहु बिसेखा ॥६॥

जा कै ऊन नाही काहू बात ॥ एकहि आपि अनेकहि भाति ॥ जा की द्रिसटि होइ सदा निहाल ॥ मन मेरे करि ता की घाल ॥७॥

ना को चतुरु नाही को मूड़ा ॥ ना को हीणु नाही को सूरा ॥ जितु को लाइआ तित ही लागा ॥ सो सेवकु नानक जिसु भागा ॥८॥६॥


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