Pt 6 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 6 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥ ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥१॥ रहाउ ॥

मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥ जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥१॥

बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥ गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥२॥

गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥ सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥३॥

नानक राम नामु जपि चीत ॥ सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥४॥९१॥१६०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥ राम रसाइणु पीवत बीर ॥१॥

हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥ जनम मरण ते होवत छोट ॥१॥ रहाउ ॥

सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥ राम रंगि निरमल परतापु ॥२॥

साधसंगि मिटि जात बिकार ॥ सभ ते ऊच एहो उपकार ॥३॥

प्रेम भगति राते गोपाल ॥ नानक जाचै साध रवाल ॥४॥९२॥१६१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥ मेलि लए पूरन वडभागी ॥१॥ रहाउ ॥

भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥ तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥१॥

पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥ ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥२॥

लोभी अनदु करै पेखि धना ॥ जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥३॥

बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥ नानक के प्रभ प्रान अधार ॥४॥९३॥१६२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥ चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥१॥ रहाउ ॥

आन रसा दीसहि सभि छारु ॥ नाम बिना निहफल संसार ॥१॥

अंध कूप ते काढे आपि ॥ गुण गोविंद अचरज परताप ॥२॥

वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥ ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥३॥

कहु नानक सा कथनी सारु ॥ मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥४॥९४॥१६३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥ झोलि महा रसु हरि अम्रितु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥ मजनु करत पूरन सभि काम ॥१॥

संतसंगि तह गोसटि होइ ॥ कोटि जनम के किलविख खोइ ॥२॥

सिमरहि साध करहि आनंदु ॥ मनि तनि रविआ परमानंदु ॥३॥

जिसहि परापति हरि चरण निधान ॥ नानक दास तिसहि कुरबान ॥४॥९५॥१६४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
सो किछु करि जितु मैलु न लागै ॥ हरि कीरतन महि एहु मनु जागै ॥१॥ रहाउ ॥

एको सिमरि न दूजा भाउ ॥ संतसंगि जपि केवल नाउ ॥१॥

करम धरम नेम ब्रत पूजा ॥ पारब्रहम बिनु जानु न दूजा ॥२॥

ता की पूरन होई घाल ॥ जा की प्रीति अपुने प्रभ नालि ॥३॥

सो बैसनो है अपर अपारु ॥ कहु नानक जिनि तजे बिकार ॥४॥९६॥१६५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
जीवत छाडि जाहि देवाने ॥ मुइआ उन ते को वरसांने ॥१॥

सिमरि गोविंदु मनि तनि धुरि लिखिआ ॥ काहू काज न आवत बिखिआ ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै ठगउरी जिनि जिनि खाई ॥ ता की त्रिसना कबहूं न जाई ॥२॥

दारन दुख दुतर संसारु ॥ राम नाम बिनु कैसे उतरसि पारि ॥३॥

साधसंगि मिलि दुइ कुल साधि ॥ राम नाम नानक आराधि ॥४॥९७॥१६६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
गरीबा उपरि जि खिंजै दाड़ी ॥ पारब्रहमि सा अगनि महि साड़ी ॥१॥

पूरा निआउ करे करतारु ॥ अपुने दास कउ राखनहारु ॥१॥ रहाउ ॥

आदि जुगादि प्रगटि परतापु ॥ निंदकु मुआ उपजि वड तापु ॥२॥

तिनि मारिआ जि रखै न कोइ ॥ आगै पाछै मंदी सोइ ॥३॥

अपुने दास राखै कंठि लाइ ॥ सरणि नानक हरि नामु धिआइ ॥४॥९८॥१६७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
महजरु झूठा कीतोनु आपि ॥ पापी कउ लागा संतापु ॥१॥

जिसहि सहाई गोबिदु मेरा ॥ तिसु कउ जमु नही आवै नेरा ॥१॥ रहाउ ॥

साची दरगह बोलै कूड़ु ॥ सिरु हाथ पछोड़ै अंधा मूड़ु ॥२॥

रोग बिआपे करदे पाप ॥ अदली होइ बैठा प्रभु आपि ॥३॥

अपन कमाइऐ आपे बाधे ॥ दरबु गइआ सभु जीअ कै साथै ॥४॥

नानक सरनि परे दरबारि ॥ राखी पैज मेरै करतारि ॥५॥९९॥१६८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
जन की धूरि मन मीठ खटानी ॥ पूरबि करमि लिखिआ धुरि प्रानी ॥१॥ रहाउ ॥

अह्मबुधि मन पूरि थिधाई ॥ साध धूरि करि सुध मंजाई ॥१॥

अनिक जला जे धोवै देही ॥ मैलु न उतरै सुधु न तेही ॥२॥

सतिगुरु भेटिओ सदा क्रिपाल ॥ हरि सिमरि सिमरि काटिआ भउ काल ॥३॥

मुकति भुगति जुगति हरि नाउ ॥ प्रेम भगति नानक गुण गाउ ॥४॥१००॥१६९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
जीवन पदवी हरि के दास ॥ जिन मिलिआ आतम परगासु ॥१॥

हरि का सिमरनु सुनि मन कानी ॥ सुखु पावहि हरि दुआर परानी ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर धिआईऐ गोपालु ॥ नानक दरसनु देखि निहालु ॥२॥१०१॥१७०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥ ताप पाप बिनसे मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु नित रसन बखान ॥ बिनसे रोग भए कलिआन ॥१॥

पारब्रहम गुण अगम बीचार ॥ साधू संगमि है निसतार ॥२॥

निरमल गुण गावहु नित नीत ॥ गई बिआधि उबरे जन मीत ॥३॥

मन बच क्रम प्रभु अपना धिआई ॥ नानक दास तेरी सरणाई ॥४॥१०२॥१७१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥ भरम गए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥

सीतला ते रखिआ बिहारी ॥ पारब्रहम प्रभ किरपा धारी ॥१॥

नानक नामु जपै सो जीवै ॥ साधसंगि हरि अम्रितु पीवै ॥२॥१०३॥१७२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥ धनु ओइ भगत जिन तुम संगि हेत ॥१॥

नाम बिना कैसे सुखु लहीऐ ॥ रसना राम नाम जसु कहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

तिन ऊपरि जाईऐ कुरबाणु ॥ नानक जिनि जपिआ निरबाणु ॥२॥१०४॥१७३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥ तूहै राखहि सारि समालि ॥१॥

ऐसा रामु दीन दुनी सहाई ॥ दास की पैज रखै मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥

आगै आपि इहु थानु वसि जा कै ॥ आठ पहर मनु हरि कउ जापै ॥२॥

पति परवाणु सचु नीसाणु ॥ जा कउ आपि करहि फुरमानु ॥३॥

आपे दाता आपि प्रतिपालि ॥ नित नित नानक राम नामु समालि ॥४॥१०५॥१७४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥ हिरदै वसिआ सदा गुपालु ॥१॥

रामु रवत सद ही सुखु पाइआ ॥ मइआ करी पूरन हरि राइआ ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक जा के पूरे भाग ॥ हरि हरि नामु असथिरु सोहागु ॥२॥१०६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
धोती खोलि विछाए हेठि ॥ गरधप वांगू लाहे पेटि ॥१॥

बिनु करतूती मुकति न पाईऐ ॥ मुकति पदारथु नामु धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

पूजा तिलक करत इसनानां ॥ छुरी काढि लेवै हथि दाना ॥२॥

बेदु पड़ै मुखि मीठी बाणी ॥ जीआं कुहत न संगै पराणी ॥३॥

कहु नानक जिसु किरपा धारै ॥ हिरदा सुधु ब्रहमु बीचारै ॥४॥१०७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥ सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

दुसट दूत परमेसरि मारे ॥ जन की पैज रखी करतारे ॥१॥

बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥ अम्रित नाम महा रस पीने ॥२॥

निरभउ होइ भजहु भगवान ॥ साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥३॥

सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥ नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥४॥१०८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥ हरि संगि राते माइआ नही छलै ॥ हरि संगि राते नही डूबै जला ॥ हरि संगि राते सुफल फला ॥१॥

सभ भै मिटहि तुमारै नाइ ॥ भेटत संगि हरि हरि गुन गाइ ॥ रहाउ ॥ हरि संगि राते मिटै सभ चिंता ॥ हरि सिउ सो रचै जिसु साध का मंता ॥ हरि संगि राते जम की नही त्रास ॥ हरि संगि राते पूरन आस ॥२॥

हरि संगि राते दूखु न लागै ॥ हरि संगि राता अनदिनु जागै ॥ हरि संगि राता सहज घरि वसै ॥ हरि संगि राते भ्रमु भउ नसै ॥३॥

हरि संगि राते मति ऊतम होइ ॥ हरि संगि राते निरमल सोइ ॥ कहु नानक तिन कउ बलि जाई ॥ जिन कउ प्रभु मेरा बिसरत नाही ॥४॥१०९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
उदमु करत सीतल मन भए ॥ मारगि चलत सगल दुख गए ॥ नामु जपत मनि भए अनंद ॥ रसि गाए गुन परमानंद ॥१॥

खेम भइआ कुसल घरि आए ॥ भेटत साधसंगि गई बलाए ॥ रहाउ ॥ नेत्र पुनीत पेखत ही दरस ॥ धनि मसतक चरन कमल ही परस ॥ गोबिंद की टहल सफल इह कांइआ ॥ संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥२॥

जन की कीनी आपि सहाइ ॥ सुखु पाइआ लगि दासह पाइ ॥ आपु गइआ ता आपहि भए ॥ क्रिपा निधान की सरनी पए ॥३॥

जो चाहत सोई जब पाइआ ॥ तब ढूंढन कहा को जाइआ ॥ असथिर भए बसे सुख आसन ॥ गुर प्रसादि नानक सुख बासन ॥४॥११०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 202) गउड़ी महला ५ ॥
कोटि मजन कीनो इसनान ॥ लाख अरब खरब दीनो दानु ॥ जा मनि वसिओ हरि को नामु ॥१॥

सगल पवित गुन गाइ गुपाल ॥ पाप मिटहि साधू सरनि दइआल ॥ रहाउ ॥ बहुतु उरध तप साधन साधे ॥ अनिक लाभ मनोरथ लाधे ॥ हरि हरि नाम रसन आराधे ॥२॥

सिम्रिति सासत बेद बखाने ॥ जोग गिआन सिध सुख जाने ॥ नामु जपत प्रभ सिउ मन माने ॥३॥

अगाधि बोधि हरि अगम अपारे ॥ नामु जपत नामु रिदे बीचारे ॥ नानक कउ प्रभ किरपा धारे ॥४॥१११॥

(राग गउड़ी -- SGGS 202) गउड़ी मः ५ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥ चरन कमल गुर रिदै बसाइआ ॥१॥

गुर गोबिंदु पारब्रहमु पूरा ॥ तिसहि अराधि मेरा मनु धीरा ॥ रहाउ ॥ अनदिनु जपउ गुरू गुर नाम ॥ ता ते सिधि भए सगल कांम ॥२॥

दरसन देखि सीतल मन भए ॥ जनम जनम के किलबिख गए ॥३॥

कहु नानक कहा भै भाई ॥ अपने सेवक की आपि पैज रखाई ॥४॥११२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 202) गउड़ी महला ५ ॥
अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥ नित प्रतिपारै बाप जैसे माई ॥१॥

प्रभ की सरनि उबरै सभ कोइ ॥ करन करावन पूरन सचु सोइ ॥ रहाउ ॥

अब मनि बसिआ करनैहारा ॥ भै बिनसे आतम सुख सारा ॥२॥

करि किरपा अपने जन राखे ॥ जनम जनम के किलबिख लाथे ॥३॥

कहनु न जाइ प्रभ की वडिआई ॥ नानक दास सदा सरनाई ॥४॥११३॥

(राग गउड़ी चेती -- SGGS 202) रागु गउड़ी चेती महला ५ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम को बलु पूरन भाई ॥ ता ते ब्रिथा न बिआपै काई ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो चितवै दासु हरि माई ॥ सो सो करता आपि कराई ॥१॥

निंदक की प्रभि पति गवाई ॥ नानक हरि गुण निरभउ गाई ॥२॥११४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 203) गउड़ी महला ५ ॥
भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवनि न सुरति नैन सुंदर नही आरत दुआरि रटत पिंगुरीआ ॥१॥

दीना नाथ अनाथ करुणा मै साजन मीत पिता महतरीआ ॥ चरन कवल हिरदै गहि नानक भै सागर संत पारि उतरीआ ॥२॥२॥११५॥

(राग गउड़ी बैरागणि -- SGGS 203) रागु गउड़ी बैरागणि महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दय गुसाई मीतुला तूं संगि हमारै बासु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥ जीअ प्राण सुखदातिआ निमख निमख बलिहारि जी ॥१॥

हसत अल्मबनु देहु प्रभ गरतहु उधरु गोपाल ॥ मोहि निरगुन मति थोरीआ तूं सद ही दीन दइआल ॥२॥

किआ सुख तेरे समला कवन बिधी बीचार ॥ सरणि समाई दास हित ऊचे अगम अपार ॥३॥

सगल पदारथ असट सिधि नाम महा रस माहि ॥ सुप्रसंन भए केसवा से जन हरि गुण गाहि ॥४॥

मात पिता सुत बंधपो तूं मेरे प्राण अधार ॥ साधसंगि नानकु भजै बिखु तरिआ संसारु ॥५॥१॥११६॥

(राग गउड़ी बैरागणि -- SGGS 203) गउड़ी बैरागणि रहोए के छंत के घरि मः ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
है कोई राम पिआरो गावै ॥ सरब कलिआण सूख सचु पावै ॥ रहाउ ॥

बनु बनु खोजत फिरत बैरागी ॥ बिरले काहू एक लिव लागी ॥ जिनि हरि पाइआ से वडभागी ॥१॥

ब्रहमादिक सनकादिक चाहै ॥ जोगी जती सिध हरि आहै ॥ जिसहि परापति सो हरि गुण गाहै ॥२॥

ता की सरणि जिन बिसरत नाही ॥ वडभागी हरि संत मिलाही ॥ जनम मरण तिह मूले नाही ॥३॥

करि किरपा मिलु प्रीतम पिआरे ॥ बिनउ सुनहु प्रभ ऊच अपारे ॥ नानकु मांगतु नामु अधारे ॥४॥१॥११७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 204) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥

रूप हीन बुधि बल हीनी मोहि परदेसनि दूर ते आई ॥१॥

नाहिन दरबु न जोबन माती मोहि अनाथ की करहु समाई ॥२॥

खोजत खोजत भई बैरागनि प्रभ दरसन कउ हउ फिरत तिसाई ॥३॥

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ नानक साधसंगि मेरी जलनि बुझाई ॥४॥१॥११८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥ पाइ लगउ मोहि करउ बेनती कोऊ संतु मिलै बडभागी ॥१॥ रहाउ ॥

मनु अरपउ धनु राखउ आगै मन की मति मोहि सगल तिआगी ॥ जो प्रभ की हरि कथा सुनावै अनदिनु फिरउ तिसु पिछै विरागी ॥१॥

पूरब करम अंकुर जब प्रगटे भेटिओ पुरखु रसिक बैरागी ॥ मिटिओ अंधेरु मिलत हरि नानक जनम जनम की सोई जागी ॥२॥२॥११९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥ मिलि साधू सरणि गहु पूरन राम रतनु हीअरे संगि राखु ॥१॥ रहाउ ॥

भ्रम की कूई त्रिसना रस पंकज अति तीख्यण मोह की फास ॥ काटनहार जगत गुर गोबिद चरन कमल ता के करहु निवास ॥१॥

करि किरपा गोबिंद प्रभ प्रीतम दीना नाथ सुनहु अरदासि ॥ करु गहि लेहु नानक के सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरी रासि ॥२॥३॥१२०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥ आस पिआसी चितवउ दिनु रैनी है कोई संतु मिलावै नेरा ॥१॥ रहाउ ॥

सेवा करउ दास दासन की अनिक भांति तिसु करउ निहोरा ॥ तुला धारि तोले सुख सगले बिनु हरि दरस सभो ही थोरा ॥१॥

संत प्रसादि गाए गुन सागर जनम जनम को जात बहोरा ॥ आनद सूख भेटत हरि नानक जनमु क्रितारथु सफलु सवेरा ॥२॥४॥१२१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 204) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥ कोई ऐसा संतु सहज सुखदाता मोहि मारगु देइ बताई ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि अलखु न जाई लखिआ विचि पड़दा हउमै पाई ॥ माइआ मोहि सभो जगु सोइआ इहु भरमु कहहु किउ जाई ॥१॥

एका संगति इकतु ग्रिहि बसते मिलि बात न करते भाई ॥ एक बसतु बिनु पंच दुहेले ओह बसतु अगोचर ठाई ॥२॥

जिस का ग्रिहु तिनि दीआ ताला कुंजी गुर सउपाई ॥ अनिक उपाव करे नही पावै बिनु सतिगुर सरणाई ॥३॥

जिन के बंधन काटे सतिगुर तिन साधसंगति लिव लाई ॥ पंच जना मिलि मंगलु गाइआ हरि नानक भेदु न भाई ॥४॥

मेरे राम राइ इन बिधि मिलै गुसाई ॥ सहजु भइआ भ्रमु खिन महि नाठा मिलि जोती जोति समाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
ऐसो परचउ पाइओ ॥ करी क्रिपा दइआल बीठुलै सतिगुर मुझहि बताइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जत कत देखउ तत तत तुम ही मोहि इहु बिसुआसु होइ आइओ ॥ कै पहि करउ अरदासि बेनती जउ सुनतो है रघुराइओ ॥१॥

लहिओ सहसा बंधन गुरि तोरे तां सदा सहज सुखु पाइओ ॥ होणा सा सोई फुनि होसी सुखु दुखु कहा दिखाइओ ॥२॥

खंड ब्रहमंड का एको ठाणा गुरि परदा खोलि दिखाइओ ॥ नउ निधि नामु निधानु इक ठाई तउ बाहरि कैठै जाइओ ॥३॥

एकै कनिक अनिक भाति साजी बहु परकार रचाइओ ॥ कहु नानक भरमु गुरि खोई है इव ततै ततु मिलाइओ ॥४॥२॥१२३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
अउध घटै दिनसु रैनारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥ ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥१॥

इहु संसारु बिकारु सहसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥ जिसहि जगाइ पीआए हरि रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥२॥

जा कउ आए सोई विहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥ निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥३॥

अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥ नानकु दासु इही सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥४॥३॥१२४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
राखु पिता प्रभ मेरे ॥ मोहि निरगुनु सभ गुन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

पंच बिखादी एकु गरीबा राखहु राखनहारे ॥ खेदु करहि अरु बहुतु संतावहि आइओ सरनि तुहारे ॥१॥

करि करि हारिओ अनिक बहु भाती छोडहि कतहूं नाही ॥ एक बात सुनि ताकी ओटा साधसंगि मिटि जाही ॥२॥

करि किरपा संत मिले मोहि तिन ते धीरजु पाइआ ॥ संती मंतु दीओ मोहि निरभउ गुर का सबदु कमाइआ ॥३॥

जीति लए ओइ महा बिखादी सहज सुहेली बाणी ॥ कहु नानक मनि भइआ परगासा पाइआ पदु निरबाणी ॥४॥४॥१२५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
ओहु अबिनासी राइआ ॥ निरभउ संगि तुमारै बसते इहु डरनु कहा ते आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

एक महलि तूं होहि अफारो एक महलि निमानो ॥ एक महलि तूं आपे आपे एक महलि गरीबानो ॥१॥

एक महलि तूं पंडितु बकता एक महलि खलु होता ॥ एक महलि तूं सभु किछु ग्राहजु एक महलि कछू न लेता ॥२॥

काठ की पुतरी कहा करै बपुरी खिलावनहारो जानै ॥ जैसा भेखु करावै बाजीगरु ओहु तैसो ही साजु आनै ॥३॥

अनिक कोठरी बहुतु भाति करीआ आपि होआ रखवारा ॥ जैसे महलि राखै तैसै रहना किआ इहु करै बिचारा ॥४॥

जिनि किछु कीआ सोई जानै जिनि इह सभ बिधि साजी ॥ कहु नानक अपर्मपर सुआमी कीमति अपुने काजी ॥५॥५॥१२६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥ उरझि रहिओ रे बावर गावर जिउ किरखै हरिआइओ पसूआ ॥१॥ रहाउ ॥

जो जानहि तूं अपुने काजै सो संगि न चालै तेरै तसूआ ॥ नागो आइओ नाग सिधासी फेरि फिरिओ अरु कालि गरसूआ ॥१॥

पेखि पेखि रे कसु्मभ की लीला राचि माचि तिनहूं लउ हसूआ ॥ छीजत डोरि दिनसु अरु रैनी जीअ को काजु न कीनो कछूआ ॥२॥

करत करत इव ही बिरधानो हारिओ उकते तनु खीनसूआ ॥ जिउ मोहिओ उनि मोहनी बाला उस ते घटै नाही रुच चसूआ ॥३॥

जगु ऐसा मोहि गुरहि दिखाइओ तउ सरणि परिओ तजि गरबसूआ ॥ मारगु प्रभ को संति बताइओ द्रिड़ी नानक दास भगति हरि जसूआ ॥४॥६॥१२७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु हमारा ॥ मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥१॥ रहाउ ॥

अंतर की बिधि तुम ही जानी तुम ही सजन सुहेले ॥ सरब सुखा मै तुझ ते पाए मेरे ठाकुर अगह अतोले ॥१॥

बरनि न साकउ तुमरे रंगा गुण निधान सुखदाते ॥ अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥२॥

भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥ जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥३॥

चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥ जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥४॥७॥१२८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥ तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥१॥ रहाउ ॥

सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥ सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥१॥

पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥ गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥२॥८॥१२९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥ प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥ तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥१॥

सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥ तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥२॥

बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥ राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥३॥

जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥ करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥४॥९॥१३०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
हउ ता कै बलिहारी ॥ जा कै केवल नामु अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥ सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥१॥

जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥ उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥२॥

ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥ भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥३॥

राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥ नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥४॥१०॥१३१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥ मो कउ सतिगुर सबदि बुझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

नउ खंड प्रिथमी इसु तन महि रविआ निमख निमख नमसकारा ॥ दीखिआ गुर की मुंद्रा कानी द्रिड़िओ एकु निरंकारा ॥१॥

पंच चेले मिलि भए इकत्रा एकसु कै वसि कीए ॥ दस बैरागनि आगिआकारी तब निरमल जोगी थीए ॥२॥

भरमु जराइ चराई बिभूता पंथु एकु करि पेखिआ ॥ सहज सूख सो कीनी भुगता जो ठाकुरि मसतकि लेखिआ ॥३॥

जह भउ नाही तहा आसनु बाधिओ सिंगी अनहत बानी ॥ ततु बीचारु डंडा करि राखिओ जुगति नामु मनि भानी ॥४॥

ऐसा जोगी वडभागी भेटै माइआ के बंधन काटै ॥ सेवा पूज करउ तिसु मूरति की नानकु तिसु पग चाटै ॥५॥११॥१३२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥ हरि अउखधु जा कउ गुरि दीआ ता के निरमल चीता ॥१॥ रहाउ ॥

अंधकारु मिटिओ तिह तन ते गुरि सबदि दीपकु परगासा ॥ भ्रम की जाली ता की काटी जा कउ साधसंगति बिस्वासा ॥१॥

तारीले भवजलु तारू बिखड़ा बोहिथ साधू संगा ॥ पूरन होई मन की आसा गुरु भेटिओ हरि रंगा ॥२॥

नाम खजाना भगती पाइआ मन तन त्रिपति अघाए ॥ नानक हरि जीउ ता कउ देवै जा कउ हुकमु मनाए ॥३॥१२॥१३३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥ अंध कूप महि हाथ दे राखहु कछू सिआनप उकति न मोरी ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन सभ किछु तुम ही तुम समरथ नाही अन होरी ॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानी से सेवक जिन भाग मथोरी ॥१॥

अपुने सेवक संगि तुम प्रभ राते ओति पोति भगतन संगि जोरी ॥ प्रिउ प्रिउ नामु तेरा दरसनु चाहै जैसे द्रिसटि ओह चंद चकोरी ॥२॥

राम संत महि भेदु किछु नाही एकु जनु कई महि लाख करोरी ॥ जा कै हीऐ प्रगटु प्रभु होआ अनदिनु कीरतनु रसन रमोरी ॥३॥

तुम समरथ अपार अति ऊचे सुखदाते प्रभ प्रान अधोरी ॥ नानक कउ प्रभ कीजै किरपा उन संतन कै संगि संगोरी ॥४॥१३॥१३४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
तुम हरि सेती राते संतहु ॥ निबाहि लेहु मो कउ पुरख बिधाते ओड़ि पहुचावहु दाते ॥१॥ रहाउ ॥

तुमरा मरमु तुमा ही जानिआ तुम पूरन पुरख बिधाते ॥ राखहु सरणि अनाथ दीन कउ करहु हमारी गाते ॥१॥

तरण सागर बोहिथ चरण तुमारे तुम जानहु अपुनी भाते ॥ करि किरपा जिसु राखहु संगे ते ते पारि पराते ॥२॥

ईत ऊत प्रभ तुम समरथा सभु किछु तुमरै हाथे ॥ ऐसा निधानु देहु मो कउ हरि जन चलै हमारै साथे ॥३॥

निरगुनीआरे कउ गुनु कीजै हरि नामु मेरा मनु जापे ॥ संत प्रसादि नानक हरि भेटे मन तन सीतल ध्रापे ॥४॥१४॥१३५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
सहजि समाइओ देव ॥ मो कउ सतिगुर भए दइआल देव ॥१॥ रहाउ ॥

काटि जेवरी कीओ दासरो संतन टहलाइओ ॥ एक नाम को थीओ पूजारी मो कउ अचरजु गुरहि दिखाइओ ॥१॥

भइओ प्रगासु सरब उजीआरा गुर गिआनु मनहि प्रगटाइओ ॥ अम्रितु नामु पीओ मनु त्रिपतिआ अनभै ठहराइओ ॥२॥

मानि आगिआ सरब सुख पाए दूखह ठाउ गवाइओ ॥ जउ सुप्रसंन भए प्रभ ठाकुर सभु आनद रूपु दिखाइओ ॥३॥

ना किछु आवत ना किछु जावत सभु खेलु कीओ हरि राइओ ॥ कहु नानक अगम अगम है ठाकुर भगत टेक हरि नाइओ ॥४॥१५॥१३६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥ जिनि धारे ब्रहमंड खंड हरि ता को नामु जपीजै रे ॥१॥ रहाउ ॥

मन की मति तिआगहु हरि जन हुकमु बूझि सुखु पाईऐ रे ॥ जो प्रभु करै सोई भल मानहु सुखि दुखि ओही धिआईऐ रे ॥१॥

कोटि पतित उधारे खिन महि करते बार न लागै रे ॥ दीन दरद दुख भंजन सुआमी जिसु भावै तिसहि निवाजै रे ॥२॥

सभ को मात पिता प्रतिपालक जीअ प्रान सुख सागरु रे ॥ देंदे तोटि नाही तिसु करते पूरि रहिओ रतनागरु रे ॥३॥

जाचिकु जाचै नामु तेरा सुआमी घट घट अंतरि सोई रे ॥ नानकु दासु ता की सरणाई जा ते ब्रिथा न कोई रे ॥४॥१६॥१३७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 210) रागु गउड़ी पूरबी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥ ईहा ऊहा सरब सुखदाता सगल घटा प्रतिपारे ॥१॥ रहाउ ॥

महा कसट काटै खिन भीतरि रसना नामु चितारे ॥ सीतल सांति सूख हरि सरणी जलती अगनि निवारे ॥१॥

गरभ कुंड नरक ते राखै भवजलु पारि उतारे ॥ चरन कमल आराधत मन महि जम की त्रास बिदारे ॥२॥

पूरन पारब्रहम परमेसुर ऊचा अगम अपारे ॥ गुण गावत धिआवत सुख सागर जूए जनमु न हारे ॥३॥

कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीनो निरगुण के दातारे ॥ करि किरपा अपुनो नामु दीजै नानक सद बलिहारे ॥४॥१॥१३८॥


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