Pt 45 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 45 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(SGGS 1355) किरपंत हरीअं मति ततु गिआनं ॥ बिगसीध्यि बुधा कुसल थानं ॥ बस्यिंत रिखिअं तिआगि मानं ॥ सीतलंत रिदयं द्रिड़ु संत गिआनं ॥ रहंत जनमं हरि दरस लीणा ॥ बाजंत नानक सबद बीणां ॥१३॥

(SGGS 1355) कहंत बेदा गुणंत गुनीआ सुणंत बाला बहु बिधि प्रकारा ॥ द्रिड़ंत सुबिदिआ हरि हरि क्रिपाला ॥ नाम दानु जाचंत नानक दैनहार गुर गोपाला ॥१४॥

(SGGS 1355) नह चिंता मात पित भ्रातह नह चिंता कछु लोक कह ॥ नह चिंता बनिता सुत मीतह प्रविरति माइआ सनबंधनह ॥ दइआल एक भगवान पुरखह नानक सरब जीअ प्रतिपालकह ॥१५॥

(SGGS 1355) अनित्य वितं अनित्य चितं अनित्य आसा बहु बिधि प्रकारं ॥ अनित्य हेतं अहं बंधं भरम माइआ मलनं बिकारं ॥ फिरंत जोनि अनेक जठरागनि नह सिमरंत मलीण बुध्यं ॥ हे गोबिंद करत मइआ नानक पतित उधारण साध संगमह ॥१६॥

(SGGS 1355) गिरंत गिरि पतित पातालं जलंत देदीप्य बैस्वांतरह ॥ बहंति अगाह तोयं तरंगं दुखंत ग्रह चिंता जनमं त मरणह ॥ अनिक साधनं न सिध्यते नानक असथ्मभं असथ्मभं असथ्मभं सबद साध स्वजनह ॥१७॥

(SGGS 1355) घोर दुख्यं अनिक हत्यं जनम दारिद्रं महा बिख्यादं ॥ मिटंत सगल सिमरंत हरि नाम नानक जैसे पावक कासट भसमं करोति ॥१८॥

(SGGS 1355) अंधकार सिमरत प्रकासं गुण रमंत अघ खंडनह ॥ रिद बसंति भै भीत दूतह करम करत महा निरमलह ॥ जनम मरण रहंत स्रोता सुख समूह अमोघ दरसनह ॥ सरणि जोगं संत प्रिअ नानक सो भगवान खेमं करोति ॥१९॥

(SGGS 1355) पाछं करोति अग्रणीवह निरासं आस पूरनह ॥ निरधन भयं धनवंतह रोगीअं रोग खंडनह ॥ भगत्यं भगति दानं राम नाम गुण कीरतनह ॥ पारब्रहम पुरख दातारह नानक गुर सेवा किं न लभ्यते ॥२०॥

(SGGS 1355) अधरं धरं धारणह निरधनं धन नाम नरहरह ॥ अनाथ नाथ गोबिंदह बलहीण बल केसवह ॥ सरब भूत दयाल अचुत दीन बांधव दामोदरह ॥ सरबग्य पूरन पुरख भगवानह भगति वछल करुणा मयह ॥ घटि घटि बसंत बासुदेवह पारब्रहम परमेसुरह ॥ जाचंति नानक क्रिपाल प्रसादं नह बिसरंति नह बिसरंति नाराइणह ॥२१॥

(SGGS 1356) नह समरथं नह सेवकं नह प्रीति परम पुरखोतमं ॥ तव प्रसादि सिमरते नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरं ॥२२॥

(SGGS 1356) भरण पोखण करंत जीआ बिस्राम छादन देवंत दानं ॥ स्रिजंत रतन जनम चतुर चेतनह ॥ वरतंति सुख आनंद प्रसादह ॥ सिमरंत नानक हरि हरि हरे ॥ अनित्य रचना निरमोह ते ॥२३॥

(SGGS 1356) दानं परा पूरबेण भुंचंते महीपते ॥ बिपरीत बुध्यं मारत लोकह नानक चिरंकाल दुख भोगते ॥२४॥

(SGGS 1356) ब्रिथा अनुग्रहं गोबिंदह जस्य सिमरण रिदंतरह ॥ आरोग्यं महा रोग्यं बिसिम्रिते करुणा मयह ॥२५॥

(SGGS 1356) रमणं केवलं कीरतनं सुधरमं देह धारणह ॥ अम्रित नामु नाराइण नानक पीवतं संत न त्रिप्यते ॥२६॥

(SGGS 1356) सहण सील संतं सम मित्रस्य दुरजनह ॥ नानक भोजन अनिक प्रकारेण निंदक आवध होइ उपतिसटते ॥२७॥

(SGGS 1356) तिरसकार नह भवंति नह भवंति मान भंगनह ॥ सोभा हीन नह भवंति नह पोहंति संसार दुखनह ॥ गोबिंद नाम जपंति मिलि साध संगह नानक से प्राणी सुख बासनह ॥२८॥

(SGGS 1356) सैना साध समूह सूर अजितं संनाहं तनि निम्रताह ॥ आवधह गुण गोबिंद रमणं ओट गुर सबद कर चरमणह ॥ आरूड़ते अस्व रथ नागह बुझंते प्रभ मारगह ॥ बिचरते निरभयं सत्रु सैना धायंते गोपाल कीरतनह ॥ जितते बिस्व संसारह नानक वस्यं करोति पंच तसकरह ॥२९॥

(SGGS 1356) म्रिग त्रिसना गंधरब नगरं द्रुम छाया रचि दुरमतिह ॥ ततह कुट्मब मोह मिथ्या सिमरंति नानक राम राम नामह ॥३०॥

(SGGS 1356) नच बिदिआ निधान निगमं नच गुणग्य नाम कीरतनह ॥ नच राग रतन कंठं नह चंचल चतुर चातुरह ॥ भाग उदिम लबध्यं माइआ नानक साधसंगि खल पंडितह ॥३१॥

(SGGS 1356) कंठ रमणीय राम राम माला हसत ऊच प्रेम धारणी ॥ जीह भणि जो उतम सलोक उधरणं नैन नंदनी ॥३२॥

(SGGS 1356) गुर मंत्र हीणस्य जो प्राणी ध्रिगंत जनम भ्रसटणह ॥ कूकरह सूकरह गरधभह काकह सरपनह तुलि खलह ॥३३॥

(SGGS 1356) चरणारबिंद भजनं रिदयं नाम धारणह ॥ कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥३४॥

(SGGS 1357) नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥ नच दुरलभं भोजनं बिंजनं नच दुरलभं स्वछ अ्मबरह ॥ नच दुरलभं सुत मित्र भ्रात बांधव नच दुरलभं बनिता बिलासह ॥ नच दुरलभं बिदिआ प्रबीणं नच दुरलभं चतुर चंचलह ॥ दुरलभं एक भगवान नामह नानक लबध्यिं साधसंगि क्रिपा प्रभं ॥३५॥

(SGGS 1357) जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥ सरबत्र रमणं गोबिंदह नानक लेप छेप न लिप्यते ॥३६॥

(SGGS 1357) बिखया भयंति अम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥ दुखं भयंति सुख्यं भै भीतं त निरभयह ॥ थान बिहून बिस्राम नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरह ॥३७॥

(SGGS 1357) सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥ सरब करतब ममं करता नानक लेप छेप न लिप्यते ॥३८॥

(SGGS 1357) नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥ नह सीतलं सीत रुतेण नानक सीतलं साध स्वजनह ॥३९॥

(SGGS 1357) मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥ ग्यानं सम दुख सुखं जुगति निरमल निरवैरणह ॥ दयालं सरबत्र जीआ पंच दोख बिवरजितह ॥ भोजनं गोपाल कीरतनं अलप माया जल कमल रहतह ॥ उपदेसं सम मित्र सत्रह भगवंत भगति भावनी ॥ पर निंदा नह स्रोति स्रवणं आपु त्यिागि सगल रेणुकह ॥ खट लख्यण पूरनं पुरखह नानक नाम साध स्वजनह ॥४०॥

(SGGS 1357) अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥ तत्र गते संसारह नानक सोग हरखं बिआपते ॥४१॥

(SGGS 1357) छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥ भरम मोहं मान अपमानं मदं माया बिआपितं ॥ म्रित्यु जनम भ्रमंति नरकह अनिक उपावं न सिध्यते ॥ निरमलं साध संगह जपंति नानक गोपाल नामं ॥ रमंति गुण गोबिंद नित प्रतह ॥४२॥

(SGGS 1357) तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥ करण कारण समरथह दानु देत प्रभु पूरनह ॥ निरास आस करणं सगल अरथ आलयह ॥ गुण निधान सिमरंति नानक सगल जाचंत जाचिकह ॥४३॥

(SGGS 1357) दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥ दुरबचन भेद भरमं साकत पिसनं त सुरजनह ॥ असथितं सोग हरखं भै खीणं त निरभवह ॥ भै अटवीअं महा नगर बासं धरम लख्यण प्रभ मइआ ॥ साध संगम राम राम रमणं सरणि नानक हरि हरि दयाल चरणं ॥४४॥

(SGGS 1358) हे अजित सूर संग्रामं अति बलना बहु मरदनह ॥ गण गंधरब देव मानुख्यं पसु पंखी बिमोहनह ॥ हरि करणहारं नमसकारं सरणि नानक जगदीस्वरह ॥४५॥

(SGGS 1358) हे कामं नरक बिस्रामं बहु जोनी भ्रमावणह ॥ चित हरणं त्रै लोक गम्यं जप तप सील बिदारणह ॥ अलप सुख अवित चंचल ऊच नीच समावणह ॥ तव भै बिमुंचित साध संगम ओट नानक नाराइणह ॥४६॥

(SGGS 1358) हे कलि मूल क्रोधं कदंच करुणा न उपरजते ॥ बिखयंत जीवं वस्यं करोति निरत्यं करोति जथा मरकटह ॥ अनिक सासन ताड़ंति जमदूतह तव संगे अधमं नरह ॥ दीन दुख भंजन दयाल प्रभु नानक सरब जीअ रख्या करोति ॥४७॥

(SGGS 1358) हे लोभा ल्मपट संग सिरमोरह अनिक लहरी कलोलते ॥ धावंत जीआ बहु प्रकारं अनिक भांति बहु डोलते ॥ नच मित्रं नच इसटं नच बाधव नच मात पिता तव लजया ॥ अकरणं करोति अखाद्यि खाद्यं असाज्यं साजि समजया ॥ त्राहि त्राहि सरणि सुआमी बिग्याप्ति नानक हरि नरहरह ॥४८॥

(SGGS 1358) हे जनम मरण मूलं अहंकारं पापातमा ॥ मित्रं तजंति सत्रं द्रिड़ंति अनिक माया बिस्तीरनह ॥ आवंत जावंत थकंत जीआ दुख सुख बहु भोगणह ॥ भ्रम भयान उदिआन रमणं महा बिकट असाध रोगणह ॥ बैद्यं पारब्रहम परमेस्वर आराधि नानक हरि हरि हरे ॥४९॥

(SGGS 1358) हे प्राण नाथ गोबिंदह क्रिपा निधान जगद गुरो ॥ हे संसार ताप हरणह करुणा मै सभ दुख हरो ॥ हे सरणि जोग दयालह दीना नाथ मया करो ॥ सरीर स्वसथ खीण समए सिमरंति नानक राम दामोदर माधवह ॥५०॥

(SGGS 1358) चरण कमल सरणं रमणं गोपाल कीरतनह ॥ साध संगेण तरणं नानक महा सागर भै दुतरह ॥५१॥

(SGGS 1358) सिर मस्तक रख्या पारब्रहमं हस्त काया रख्या परमेस्वरह ॥ आतम रख्या गोपाल सुआमी धन चरण रख्या जगदीस्वरह ॥ सरब रख्या गुर दयालह भै दूख बिनासनह ॥ भगति वछल अनाथ नाथे सरणि नानक पुरख अचुतह ॥५२॥

(SGGS 1358) जेन कला धारिओ आकासं बैसंतरं कासट बेसटं ॥ जेन कला ससि सूर नख्यत्र जोत्यिं सासं सरीर धारणं ॥ जेन कला मात गरभ प्रतिपालं नह छेदंत जठर रोगणह ॥ तेन कला असथ्मभं सरोवरं नानक नह छिजंति तरंग तोयणह ॥५३॥

(SGGS 1359) गुसांई गरिस्ट रूपेण सिमरणं सरबत्र जीवणह ॥ लबध्यं संत संगेण नानक स्वछ मारग हरि भगतणह ॥५४॥

(SGGS 1359) मसकं भगनंत सैलं करदमं तरंत पपीलकह ॥ सागरं लंघंति पिंगं तम परगास अंधकह ॥ साध संगेणि सिमरंति गोबिंद सरणि नानक हरि हरि हरे ॥५५॥

(SGGS 1359) तिलक हीणं जथा बिप्रा अमर हीणं जथा राजनह ॥ आवध हीणं जथा सूरा नानक धरम हीणं तथा बैस्नवह ॥५६॥

(SGGS 1359) न संखं न चक्रं न गदा न सिआमं ॥ अस्चरज रूपं रहंत जनमं ॥ नेत नेत कथंति बेदा ॥ ऊच मूच अपार गोबिंदह ॥ बसंति साध रिदयं अचुत बुझंति नानक बडभागीअह ॥५७॥

(SGGS 1359) उदिआन बसनं संसारं सनबंधी स्वान सिआल खरह ॥ बिखम सथान मन मोह मदिरं महां असाध पंच तसकरह ॥ हीत मोह भै भरम भ्रमणं अहं फांस तीख्यण कठिनह ॥ पावक तोअ असाध घोरं अगम तीर नह लंघनह ॥ भजु साधसंगि गोपाल नानक हरि चरण सरण उधरण क्रिपा ॥५८॥

(SGGS 1359) क्रिपा करंत गोबिंद गोपालह सगल्यं रोग खंडणह ॥ साध संगेणि गुण रमत नानक सरणि पूरन परमेसुरह ॥५९॥

(SGGS 1359) सिआमलं मधुर मानुख्यं रिदयं भूमि वैरणह ॥ निवंति होवंति मिथिआ चेतनं संत स्वजनह ॥६०॥

(SGGS 1359) अचेत मूड़ा न जाणंत घटंत सासा नित प्रते ॥ छिजंत महा सुंदरी कांइआ काल कंनिआ ग्रासते ॥ रचंति पुरखह कुट्मब लीला अनित आसा बिखिआ बिनोद ॥ भ्रमंति भ्रमंति बहु जनम हारिओ सरणि नानक करुणा मयह ॥६१॥

(SGGS 1359) हे जिहबे हे रसगे मधुर प्रिअ तुयं ॥ सत हतं परम बादं अवरत एथह सुध अछरणह ॥ गोबिंद दामोदर माधवे ॥६२॥

(SGGS 1359) गरबंति नारी मदोन मतं ॥ बलवंत बलात कारणह ॥ चरन कमल नह भजंत त्रिण समानि ध्रिगु जनमनह ॥ हे पपीलका ग्रसटे गोबिंद सिमरण तुयं धने ॥ नानक अनिक बार नमो नमह ॥६३॥

(SGGS 1359) त्रिणं त मेरं सहकं त हरीअं ॥ बूडं त तरीअं ऊणं त भरीअं ॥ अंधकार कोटि सूर उजारं ॥ बिनवंति नानक हरि गुर दयारं ॥६४॥

(SGGS 1360) ब्रहमणह संगि उधरणं ब्रहम करम जि पूरणह ॥ आतम रतं संसार गहं ते नर नानक निहफलह ॥६५॥

(SGGS 1360) पर दरब हिरणं बहु विघन करणं उचरणं सरब जीअ कह ॥ लउ लई त्रिसना अतिपति मन माए करम करत सि सूकरह ॥६६॥

(SGGS 1360) मते समेव चरणं उधरणं भै दुतरह ॥ अनेक पातिक हरणं नानक साध संगम न संसयह ॥६७॥४॥

(SGGS 1360) महला ५ गाथा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करपूर पुहप सुगंधा परस मानुख्य देहं मलीणं ॥ मजा रुधिर द्रुगंधा नानक अथि गरबेण अग्यानणो ॥१॥

(SGGS 1360) परमाणो परजंत आकासह दीप लोअ सिखंडणह ॥ गछेण नैण भारेण नानक बिना साधू न सिध्यते ॥२॥

(SGGS 1360) जाणो सति होवंतो मरणो द्रिसटेण मिथिआ ॥ कीरति साथि चलंथो भणंति नानक साध संगेण ॥३॥

(SGGS 1360) माया चित भरमेण इसट मित्रेखु बांधवह ॥ लबध्यं साध संगेण नानक सुख असथानं गोपाल भजणं ॥४॥

(SGGS 1360) मैलागर संगेण निमु बिरख सि चंदनह ॥ निकटि बसंतो बांसो नानक अहं बुधि न बोहते ॥५॥

(SGGS 1360) गाथा गु्मफ गोपाल कथं मथं मान मरदनह ॥ हतं पंच सत्रेण नानक हरि बाणे प्रहारणह ॥६॥

(SGGS 1360) बचन साध सुख पंथा लहंथा बड करमणह ॥ रहंता जनम मरणेन रमणं नानक हरि कीरतनह ॥७॥

(SGGS 1360) पत्र भुरिजेण झड़ीयं नह जड़ीअं पेड स्मपता ॥ नाम बिहूण बिखमता नानक बहंति जोनि बासरो रैणी ॥८॥

(SGGS 1360) भावनी साध संगेण लभंतं बड भागणह ॥ हरि नाम गुण रमणं नानक संसार सागर नह बिआपणह ॥९॥

(SGGS 1360) गाथा गूड़ अपारं समझणं बिरला जनह ॥ संसार काम तजणं नानक गोबिंद रमणं साध संगमह ॥१०॥

(SGGS 1360) सुमंत्र साध बचना कोटि दोख बिनासनह ॥ हरि चरण कमल ध्यानं नानक कुल समूह उधारणह ॥११॥

(SGGS 1360) सुंदर मंदर सैणह जेण मध्य हरि कीरतनह ॥ मुकते रमण गोबिंदह नानक लबध्यं बड भागणह ॥१२॥

(SGGS 1360) हरि लबधो मित्र सुमितो ॥ बिदारण कदे न चितो ॥ जा का असथलु तोलु अमितो ॥ सोई नानक सखा जीअ संगि कितो ॥१३॥

(SGGS 1360) अपजसं मिटंत सत पुत्रह ॥ सिमरतब्य रिदै गुर मंत्रणह ॥ प्रीतम भगवान अचुत ॥ नानक संसार सागर तारणह ॥१४॥

(SGGS 1361) मरणं बिसरणं गोबिंदह ॥ जीवणं हरि नाम ध्यावणह ॥ लभणं साध संगेण ॥ नानक हरि पूरबि लिखणह ॥१५॥

(SGGS 1361) दसन बिहून भुयंगं मंत्रं गारुड़ी निवारं ॥ ब्याधि उपाड़ण संतं ॥ नानक लबध करमणह ॥१६॥

(SGGS 1361) जथ कथ रमणं सरणं सरबत्र जीअणह ॥ तथ लगणं प्रेम नानक ॥ परसादं गुर दरसनह ॥१७॥

(SGGS 1361) चरणारबिंद मन बिध्यं ॥ सिध्यं सरब कुसलणह ॥ गाथा गावंति नानक भब्यं परा पूरबणह ॥१८॥

(SGGS 1361) सुभ बचन रमणं गवणं साध संगेण उधरणह ॥ संसार सागरं नानक पुनरपि जनम न लभ्यते ॥१९॥

(SGGS 1361) बेद पुराण सासत्र बीचारं ॥ एकंकार नाम उर धारं ॥ कुलह समूह सगल उधारं ॥ बडभागी नानक को तारं ॥२०॥

(SGGS 1361) सिमरणं गोबिंद नामं उधरणं कुल समूहणह ॥ लबधिअं साध संगेण नानक वडभागी भेटंति दरसनह ॥२१॥

(SGGS 1361) सरब दोख परंतिआगी सरब धरम द्रिड़ंतणः ॥ लबधेणि साध संगेणि नानक मसतकि लिख्यणः ॥२२॥

(SGGS 1361) होयो है होवंतो हरण भरण स्मपूरणः ॥ साधू सतम जाणो नानक प्रीति कारणं ॥२३॥

(SGGS 1361) सुखेण बैण रतनं रचनं कसु्मभ रंगणः ॥ रोग सोग बिओगं नानक सुखु न सुपनह ॥२४॥

(SGGS 1361) फुनहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हाथि कलम अगम मसतकि लेखावती ॥ उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥ उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥ मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥१॥

(SGGS 1361) संत सभा महि बैसि कि कीरति मै कहां ॥ अरपी सभु सीगारु एहु जीउ सभु दिवा ॥ आस पिआसी सेज सु कंति विछाईऐ ॥ हरिहां मसतकि होवै भागु त साजनु पाईऐ ॥२॥

(SGGS 1361) सखी काजल हार त्मबोल सभै किछु साजिआ ॥ सोलह कीए सीगार कि अंजनु पाजिआ ॥ जे घरि आवै कंतु त सभु किछु पाईऐ ॥ हरिहां कंतै बाझु सीगारु सभु बिरथा जाईऐ ॥३॥

(SGGS 1361) जिसु घरि वसिआ कंतु सा वडभागणे ॥ तिसु बणिआ हभु सीगारु साई सोहागणे ॥ हउ सुती होइ अचिंत मनि आस पुराईआ ॥ हरिहां जा घरि आइआ कंतु त सभु किछु पाईआ ॥४॥

(SGGS 1362) आसा इती आस कि आस पुराईऐ ॥ सतिगुर भए दइआल त पूरा पाईऐ ॥ मै तनि अवगण बहुतु कि अवगण छाइआ ॥ हरिहां सतिगुर भए दइआल त मनु ठहराइआ ॥५॥

(SGGS 1362) कहु नानक बेअंतु बेअंतु धिआइआ ॥ दुतरु इहु संसारु सतिगुरू तराइआ ॥ मिटिआ आवा गउणु जां पूरा पाइआ ॥ हरिहां अम्रितु हरि का नामु सतिगुर ते पाइआ ॥६॥

(SGGS 1362) मेरै हाथि पदमु आगनि सुख बासना ॥ सखी मोरै कंठि रतंनु पेखि दुखु नासना ॥ बासउ संगि गुपाल सगल सुख रासि हरि ॥ हरिहां रिधि सिधि नव निधि बसहि जिसु सदा करि ॥७॥

(SGGS 1362) पर त्रिअ रावणि जाहि सेई ता लाजीअहि ॥ नितप्रति हिरहि पर दरबु छिद्र कत ढाकीअहि ॥ हरि गुण रमत पवित्र सगल कुल तारई ॥ हरिहां सुनते भए पुनीत पारब्रहमु बीचारई ॥८॥

(SGGS 1362) ऊपरि बनै अकासु तलै धर सोहती ॥ दह दिस चमकै बीजुलि मुख कउ जोहती ॥ खोजत फिरउ बिदेसि पीउ कत पाईऐ ॥ हरिहां जे मसतकि होवै भागु त दरसि समाईऐ ॥९॥

(SGGS 1362) डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ ॥ बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥ वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥ हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥१०॥

(SGGS 1362) चात्रिक चित सुचित सु साजनु चाहीऐ ॥ जिसु संगि लागे प्राण तिसै कउ आहीऐ ॥ बनु बनु फिरत उदास बूंद जल कारणे ॥ हरिहां तिउ हरि जनु मांगै नामु नानक बलिहारणे ॥११॥

(SGGS 1362) मित का चितु अनूपु मरमु न जानीऐ ॥ गाहक गुनी अपार सु ततु पछानीऐ ॥ चितहि चितु समाइ त होवै रंगु घना ॥ हरिहां चंचल चोरहि मारि त पावहि सचु धना ॥१२॥

(SGGS 1362) सुपनै ऊभी भई गहिओ की न अंचला ॥ सुंदर पुरख बिराजित पेखि मनु बंचला ॥ खोजउ ता के चरण कहहु कत पाईऐ ॥ हरिहां सोई जतंनु बताइ सखी प्रिउ पाईऐ ॥१३॥

(SGGS 1362) नैण न देखहि साध सि नैण बिहालिआ ॥ करन न सुनही नादु करन मुंदि घालिआ ॥ रसना जपै न नामु तिलु तिलु करि कटीऐ ॥ हरिहां जब बिसरै गोबिद राइ दिनो दिनु घटीऐ ॥१४॥

(SGGS 1362) पंकज फाथे पंक महा मद गु्मफिआ ॥ अंग संग उरझाइ बिसरते सु्मफिआ ॥ है कोऊ ऐसा मीतु जि तोरै बिखम गांठि ॥ नानक इकु स्रीधर नाथु जि टूटे लेइ सांठि ॥१५॥

(SGGS 1363) धावउ दसा अनेक प्रेम प्रभ कारणे ॥ पंच सतावहि दूत कवन बिधि मारणे ॥ तीखण बाण चलाइ नामु प्रभ ध्याईऐ ॥ हरिहां महां बिखादी घात पूरन गुरु पाईऐ ॥१६॥

(SGGS 1363) सतिगुर कीनी दाति मूलि न निखुटई ॥ खावहु भुंचहु सभि गुरमुखि छुटई ॥ अम्रितु नामु निधानु दिता तुसि हरि ॥ नानक सदा अराधि कदे न जांहि मरि ॥१७॥

(SGGS 1363) जिथै जाए भगतु सु थानु सुहावणा ॥ सगले होए सुख हरि नामु धिआवणा ॥ जीअ करनि जैकारु निंदक मुए पचि ॥ साजन मनि आनंदु नानक नामु जपि ॥१८॥

(SGGS 1363) पावन पतित पुनीत कतह नही सेवीऐ ॥ झूठै रंगि खुआरु कहां लगु खेवीऐ ॥ हरिचंदउरी पेखि काहे सुखु मानिआ ॥ हरिहां हउ बलिहारी तिंन जि दरगहि जानिआ ॥१९॥

(SGGS 1363) कीने करम अनेक गवार बिकार घन ॥ महा द्रुगंधत वासु सठ का छारु तन ॥ फिरतउ गरब गुबारि मरणु नह जानई ॥ हरिहां हरिचंदउरी पेखि काहे सचु मानई ॥२०॥

(SGGS 1363) जिस की पूजै अउध तिसै कउणु राखई ॥ बैदक अनिक उपाव कहां लउ भाखई ॥ एको चेति गवार काजि तेरै आवई ॥ हरिहां बिनु नावै तनु छारु ब्रिथा सभु जावई ॥२१॥

(SGGS 1363) अउखधु नामु अपारु अमोलकु पीजई ॥ मिलि मिलि खावहि संत सगल कउ दीजई ॥ जिसै परापति होइ तिसै ही पावणे ॥ हरिहां हउ बलिहारी तिंन्ह जि हरि रंगु रावणे ॥२२॥

(SGGS 1363) वैदा संदा संगु इकठा होइआ ॥ अउखद आए रासि विचि आपि खलोइआ ॥ जो जो ओना करम सुकरम होइ पसरिआ ॥ हरिहां दूख रोग सभि पाप तन ते खिसरिआ ॥२३॥

(SGGS 1363) चउबोले महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
समन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥ रावन हुते सु रंक नहि जिनि सिर दीने काटि ॥१॥

(SGGS 1363) प्रीति प्रेम तनु खचि रहिआ बीचु न राई होत ॥ चरन कमल मनु बेधिओ बूझनु सुरति संजोग ॥२॥

(SGGS 1364) सागर मेर उदिआन बन नव खंड बसुधा भरम ॥ मूसन प्रेम पिरम कै गनउ एक करि करम ॥३॥

(SGGS 1364) मूसन मसकर प्रेम की रही जु अ्मबरु छाइ ॥ बीधे बांधे कमल महि भवर रहे लपटाइ ॥४॥

(SGGS 1364) जप तप संजम हरख सुख मान महत अरु गरब ॥ मूसन निमखक प्रेम परि वारि वारि देंउ सरब ॥५॥

(SGGS 1364) मूसन मरमु न जानई मरत हिरत संसार ॥ प्रेम पिरम न बेधिओ उरझिओ मिथ बिउहार ॥६॥

(SGGS 1364) घबु दबु जब जारीऐ बिछुरत प्रेम बिहाल ॥ मूसन तब ही मूसीऐ बिसरत पुरख दइआल ॥७॥

(SGGS 1364) जा को प्रेम सुआउ है चरन चितव मन माहि ॥ नानक बिरही ब्रहम के आन न कतहू जाहि ॥८॥

(SGGS 1364) लख घाटीं ऊंचौ घनो चंचल चीत बिहाल ॥ नीच कीच निम्रित घनी करनी कमल जमाल ॥९॥

(SGGS 1364) कमल नैन अंजन सिआम चंद्र बदन चित चार ॥ मूसन मगन मरम सिउ खंड खंड करि हार ॥१०॥

(SGGS 1364) मगनु भइओ प्रिअ प्रेम सिउ सूध न सिमरत अंग ॥ प्रगटि भइओ सभ लोअ महि नानक अधम पतंग ॥११॥

(SGGS 1375) महला ५ ॥
कबीर कूकरु भउकना करंग पिछै उठि धाइ ॥ करमी सतिगुरु पाइआ जिनि हउ लीआ छडाइ ॥२०९॥

(SGGS 1375) महला ५ ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥ धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥२१०॥

(SGGS 1375) महला ५ ॥
कबीर चावल कारने तुख कउ मुहली लाइ ॥ संगि कुसंगी बैसते तब पूछै धरम राइ ॥२११॥

(SGGS 1376) महला ५ ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥ जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥२१४॥

(SGGS 1376) मः ५ ॥
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥ पाप करंता मरि गइआ अउध पुनी खिन माहि ॥२२१॥

(SGGS 1381) महला ५ ॥
फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥ मंदा किस नो आखीऐ जां तिसु बिनु कोई नाहि ॥७५॥

(SGGS 1382) महला ५ ॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥ जो जन पीरि निवाजिआ तिंन्हा अंच न लाग ॥८२॥

(SGGS 1382) महला ५ ॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥ विरले केई पाईअनि जिंन्हा पिआरे नेह ॥८३॥

(SGGS 1383) मः ५ ॥
फरीदा गरबु जिन्हा वडिआईआ धनि जोबनि आगाह ॥ खाली चले धणी सिउ टिबे जिउ मीहाहु ॥१०५॥

(SGGS 1383) मः ५ ॥
फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुहताजु ॥ अलह सेती रतिआ एहु सचावां साजु ॥१०८॥

(SGGS 1383) मः ५ ॥
फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु ॥ अलह भावै सो भला तां लभी दरबारु ॥१०९॥

(SGGS 1383) मः ५ ॥
फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजहि नालि ॥ सोई जीउ न वजदा जिसु अलहु करदा सार ॥११०॥

(SGGS 1383) मः ५ ॥
फरीदा दिलु रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कमि ॥ मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पूर करमि ॥१११॥

(SGGS 1385) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥
आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥ सरब रहिओ भरपूरि सगल घट रहिओ बिआपे ॥ ब्यापतु देखीऐ जगति जानै कउनु तेरी गति सरब की रख्या करै आपे हरि पति ॥ अबिनासी अबिगत आपे आपि उतपति ॥ एकै तूही एकै अन नाही तुम भति ॥ हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥१॥

(SGGS 1385) अम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥ आपुनो भावनु करि मंत्रि न दूसरो धरि ओपति परलौ एकै निमख तु घरि ॥ आन नाही समसरि उजीआरो निरमरि कोटि पराछत जाहि नाम लीए हरि हरि ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥२॥

(SGGS 1385) सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥ हरि गुन नाही अंत पारे जीअ जंत सभि थारे सगल को दाता एकै अलख मुरारे ॥ आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥३॥

(SGGS 1386) सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥ मनु धनु तेरो प्रानं एकै सूति है जहानं कवन उपमा देउ बडे ते बडानं ॥ जानै कउनु तेरो भेउ अलख अपार देउ अकल कला है प्रभ सरब को धानं ॥ जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥ हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥४॥

(SGGS 1386) निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥ हरखवंत आनंत रूप निरमल बिगासी ॥ गुण गावहि बेअंत अंतु इकु तिलु नही पासी ॥ जा कउ होंहि क्रिपाल सु जनु प्रभ तुमहि मिलासी ॥ धंनि धंनि ते धंनि जन जिह क्रिपालु हरि हरि भयउ ॥ हरि गुरु नानकु जिन परसिअउ सि जनम मरण दुह थे रहिओ ॥५॥

(SGGS 1386) सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥ दूसर आन न अवरु पुरखु पऊरातनु सुणीऐ ॥ अम्रितु हरि को नामु लैत मनि सभ सुख पाए ॥ जेह रसन चाखिओ तेह जन त्रिपति अघाए ॥ जिह ठाकुरु सुप्रसंनु भयो सतसंगति तिह पिआरु ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ तिन्ह सभ कुल कीओ उधारु ॥६॥

(SGGS 1386) सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥ सचै तखति निवासु सचु तपावसु करिओ ॥ सचि सिरज्यिउ संसारु आपि आभुलु न भुलउ ॥ रतन नामु अपारु कीम नहु पवै अमुलउ ॥ जिह क्रिपालु होयउ गोबिंदु सरब सुख तिनहू पाए ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ ते बहुड़ि फिरि जोनि न आए ॥७॥

(SGGS 1386) कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥ सिध साधिक तेतीस कोरि तिरु कीम न परीऐ ॥ ब्रहमादिक सनकादि सेख गुण अंतु न पाए ॥ अगहु गहिओ नही जाइ पूरि स्रब रहिओ समाए ॥ जिह काटी सिलक दयाल प्रभि सेइ जन लगे भगते ॥ हरि गुरु नानकु जिन्ह परसिओ ते इत उत सदा मुकते ॥८॥

(SGGS 1386) प्रभ दातउ दातार परि्यउ जाचकु इकु सरना ॥ मिलै दानु संत रेन जेह लगि भउजलु तरना ॥ बिनति करउ अरदासि सुनहु जे ठाकुर भावै ॥ देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥ बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥ प्रगटु सगल हरि भवन महि जनु नानकु गुरु पारब्रहम ॥९॥


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