Pt 44 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 44 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग कानड़ा -- SGGS 1305) कानड़ा महला ५ घरु ८
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगीऐ गुमानु मानु पेखता दइआल लाल हां हां मन चरन रेन ॥१॥ रहाउ ॥

हरि संत मंत गुपाल गिआन धिआन ॥१॥

हिरदै गोबिंद गाइ चरन कमल प्रीति लाइ दीन दइआल मोहना ॥ क्रिपाल दइआ मइआ धारि ॥ नानकु मागै नामु दानु ॥ तजि मोहु भरमु सगल अभिमानु ॥२॥१॥३८॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1305) कानड़ा महला ५ ॥
प्रभ कहन मलन दहन लहन गुर मिले आन नही उपाउ ॥१॥ रहाउ ॥

तटन खटन जटन होमन नाही डंडधार सुआउ ॥१॥

जतन भांतन तपन भ्रमन अनिक कथन कथते नही थाह पाई ठाउ ॥ सोधि सगर सोधना सुखु नानका भजु नाउ ॥२॥२॥३९॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1306) कानड़ा महला ५ घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥१॥ रहाउ ॥

नैन तिपते दरसु पेखि जसु तोखि सुनत करन ॥१॥

प्रान नाथ अनाथ दाते दीन गोबिद सरन ॥ आस पूरन दुख बिनासन गही ओट नानक हरि चरन ॥२॥१॥४०॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1306) कानड़ा महला ५ ॥
चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥ पतित पावन बिरदु सुआमी उधरते हरि धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥

सैसार गार बिकार सागर पतित मोह मान अंध ॥ बिकल माइआ संगि धंध ॥ करु गहे प्रभ आपि काढहु राखि लेहु गोबिंद राइ ॥१॥

अनाथ नाथ सनाथ संतन कोटि पाप बिनास ॥ मनि दरसनै की पिआस ॥ प्रभ पूरन गुनतास ॥ क्रिपाल दइआल गुपाल नानक हरि रसना गुन गाइ ॥२॥२॥४१॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1306) कानड़ा महला ५ ॥
वारि वारउ अनिक डारउ ॥ सुखु प्रिअ सुहाग पलक रात ॥१॥ रहाउ ॥

कनिक मंदर पाट सेज सखी मोहि नाहि इन सिउ तात ॥१॥

मुकत लाल अनिक भोग बिनु नाम नानक हात ॥ रूखो भोजनु भूमि सैन सखी प्रिअ संगि सूखि बिहात ॥२॥३॥४२॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1306) कानड़ा महला ५ ॥
अहं तोरो मुखु जोरो ॥ गुरु गुरु करत मनु लोरो ॥ प्रिअ प्रीति पिआरो मोरो ॥१॥ रहाउ ॥

ग्रिहि सेज सुहावी आगनि चैना तोरो री तोरो पंच दूतन सिउ संगु तोरो ॥१॥

आइ न जाइ बसे निज आसनि ऊंध कमल बिगसोरो ॥ छुटकी हउमै सोरो ॥ गाइओ री गाइओ प्रभ नानक गुनी गहेरो ॥२॥४॥४३॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1306) कानड़ा मः ५ घरु ९ ॥
तां ते जापि मना हरि जापि ॥ जो संत बेद कहत पंथु गाखरो मोह मगन अहं ताप ॥ रहाउ ॥ जो राते माते संगि बपुरी माइआ मोह संताप ॥१॥

नामु जपत सोऊ जनु उधरै जिसहि उधारहु आप ॥ बिनसि जाइ मोह भै भरमा नानक संत प्रताप ॥२॥५॥४४॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो दानु देहु जी संतहु जात जीउ बलिहारि ॥ मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम जोनि भ्रमिओ हारि परिओ दुआरि ॥१॥

किरपा गोबिंद भई मिलिओ नामु अधारु ॥ दुलभ जनमु सफलु नानक भव उतारि पारि ॥२॥१॥४५॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ घरु ११
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सहज सुभाए आपन आए ॥ कछू न जानौ कछू दिखाए ॥ प्रभु मिलिओ सुख बाले भोले ॥१॥ रहाउ ॥

संजोगि मिलाए साध संगाए ॥ कतहू न जाए घरहि बसाए ॥ गुन निधानु प्रगटिओ इह चोलै ॥१॥

चरन लुभाए आन तजाए ॥ थान थनाए सरब समाए ॥ रसकि रसकि नानकु गुन बोलै ॥२॥१॥४६॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
गोबिंद ठाकुर मिलन दुराईं ॥ परमिति रूपु अगम अगोचर रहिओ सरब समाई ॥१॥ रहाउ ॥

कहनि भवनि नाही पाइओ पाइओ अनिक उकति चतुराई ॥१॥

जतन जतन अनिक उपाव रे तउ मिलिओ जउ किरपाई ॥ प्रभू दइआर क्रिपार क्रिपा निधि जन नानक संत रेनाई ॥२॥२॥४७॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
माई सिमरत राम राम राम ॥ प्रभ बिना नाही होरु ॥ चितवउ चरनारबिंद सासन निसि भोर ॥१॥ रहाउ ॥

लाइ प्रीति कीन आपन तूटत नही जोरु ॥ प्रान मनु धनु सरबसो हरि गुन निधे सुख मोर ॥१॥

ईत ऊत राम पूरनु निरखत रिद खोरि ॥ संत सरन तरन नानक बिनसिओ दुखु घोर ॥२॥३॥४८॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1307) कानड़ा महला ५ ॥
जन को प्रभु संगे असनेहु ॥ साजनो तू मीतु मेरा ग्रिहि तेरै सभु केहु ॥१॥ रहाउ ॥

मानु मांगउ तानु मांगउ धनु लखमी सुत देह ॥१॥

मुकति जुगति भुगति पूरन परमानंद परम निधान ॥ भै भाइ भगति निहाल नानक सदा सदा कुरबान ॥२॥४॥४९॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1308) कानड़ा महला ५ ॥
करत करत चरच चरच चरचरी ॥ जोग धिआन भेख गिआन फिरत फिरत धरत धरत धरचरी ॥१॥ रहाउ ॥

अहं अहं अहै अवर मूड़ मूड़ मूड़ बवरई ॥ जति जात जात जात सदा सदा सदा सदा काल हई ॥१॥

मानु मानु मानु तिआगि मिरतु मिरतु निकटि निकटि सदा हई ॥ हरि हरे हरे भाजु कहतु नानकु सुनहु रे मूड़ बिनु भजन भजन भजन अहिला जनमु गई ॥२॥५॥५०॥१२॥६२॥

(राग कानड़ा -- SGGS 1312) कानड़ा छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
से उधरे जिन राम धिआए ॥ जतन माइआ के कामि न आए ॥ राम धिआए सभि फल पाए धनि धंनि ते बडभागीआ ॥ सतसंगि जागे नामि लागे एक सिउ लिव लागीआ ॥ तजि मान मोह बिकार साधू लगि तरउ तिन कै पाए ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी बडभागि दरसनु पाए ॥१॥

मिलि साधू नित भजह नाराइण ॥ रसकि रसकि सुआमी गुण गाइण ॥ गुण गाइ जीवह हरि अमिउ पीवह जनम मरणा भागए ॥ सतसंगि पाईऐ हरि धिआईऐ बहुड़ि दूखु न लागए ॥ करि दइआ दाते पुरख बिधाते संत सेव कमाइण ॥ बिनवंति नानक जन धूरि बांछहि हरि दरसि सहजि समाइण ॥२॥

सगले जंत भजहु गोपालै ॥ जप तप संजम पूरन घालै ॥ नित भजहु सुआमी अंतरजामी सफल जनमु सबाइआ ॥ गोबिदु गाईऐ नित धिआईऐ परवाणु सोई आइआ ॥ जप ताप संजम हरि हरि निरंजन गोबिंद धनु संगि चालै ॥ बिनवंति नानक करि दइआ दीजै हरि रतनु बाधउ पालै ॥३॥

मंगलचार चोज आनंदा ॥ करि किरपा मिले परमानंदा ॥ प्रभ मिले सुआमी सुखहगामी इछ मन की पुंनीआ ॥ बजी बधाई सहजे समाई बहुड़ि दूखि न रुंनीआ ॥ ले कंठि लाए सुख दिखाए बिकार बिनसे मंदा ॥ बिनवंति नानक मिले सुआमी पुरख परमानंदा ॥४॥१॥

(राग कलिआन -- SGGS 1321) रागु कलिआनु महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हमारै एह किरपा कीजै ॥ अलि मकरंद चरन कमल सिउ मनु फेरि फेरि रीझै ॥१॥ रहाउ ॥

आन जला सिउ काजु न कछूऐ हरि बूंद चात्रिक कउ दीजै ॥१॥

बिनु मिलबे नाही संतोखा पेखि दरसनु नानकु जीजै ॥२॥१॥

(राग कलिआन -- SGGS 1321) कलिआन महला ५ ॥
जाचिकु नामु जाचै जाचै ॥ सरब धार सरब के नाइक सुख समूह के दाते ॥१॥ रहाउ ॥

केती केती मांगनि मागै भावनीआ सो पाईऐ ॥१॥

सफल सफल सफल दरसु रे परसि परसि गुन गाईऐ ॥ नानक तत तत सिउ मिलीऐ हीरै हीरु बिधाईऐ ॥२॥२॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआन महला ५ ॥
मेरे लालन की सोभा ॥ सद नवतन मन रंगी सोभा ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा भगति दानु जसु मंगी ॥१॥

जोग गिआन धिआन सेखनागै सगल जपहि तरंगी ॥ कहु नानक संतन बलिहारै जो प्रभ के सद संगी ॥२॥३॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआन महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरै मानि हरि हरि मानि ॥ नैन बैन स्रवन सुनीऐ अंग अंगे सुख प्रानि ॥१॥ रहाउ ॥

इत उत दह दिसि रविओ मेर तिनहि समानि ॥१॥

जत कता तत पेखीऐ हरि पुरख पति परधान ॥ साधसंगि भ्रम भै मिटे कथे नानक ब्रहम गिआन ॥२॥१॥४॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआन महला ५ ॥
गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥ कथत सुनत मुनि जना मिलि संत मंडली ॥१॥ रहाउ ॥

गिआन धिआन मान दान मन रसिक रसन नामु जपत तह पाप खंडली ॥१॥

जोग जुगति गिआन भुगति सुरति सबद तत बेते जपु तपु अखंडली ॥ ओति पोति मिलि जोति नानक कछू दुखु न डंडली ॥२॥२॥५॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआनु महला ५ ॥
कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥ धरत धिआनु गिआनु ससत्रगिआ अजर पदु कैसे जरउ ॥१॥ रहाउ ॥

बिसन महेस सिध मुनि इंद्रा कै दरि सरनि परउ ॥१॥

काहू पहि राजु काहू पहि सुरगा कोटि मधे मुकति कहउ ॥ कहु नानक नाम रसु पाईऐ साधू चरन गहउ ॥२॥३॥६॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआन महला ५ ॥
प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥ गरभ जोनि कलि काल जाल दुख बिनासनु हरि रखे ॥१॥ रहाउ ॥

नाम धारी सरनि तेरी ॥ प्रभ दइआल टेक मेरी ॥१॥

अनाथ दीन आसवंत ॥ नामु सुआमी मनहि मंत ॥२॥

तुझ बिना प्रभ किछू न जानू ॥ सरब जुग महि तुम पछानू ॥३॥

हरि मनि बसे निसि बासरो ॥ गोबिंद नानक आसरो ॥४॥४॥७॥

(राग कलिआन -- SGGS 1322) कलिआन महला ५ ॥
मनि तनि जापीऐ भगवान ॥ गुर पूरे सुप्रसंन भए सदा सूख कलिआन ॥१॥ रहाउ ॥

सरब कारज सिधि भए गाइ गुन गुपाल ॥ मिलि साधसंगति प्रभू सिमरे नाठिआ दुख काल ॥१॥

करि किरपा प्रभ मेरिआ करउ दिनु रैनि सेव ॥ नानक दास सरणागती हरि पुरख पूरन देव ॥२॥५॥८॥

(राग कलिआन -- SGGS 1323) कलिआनु महला ५ ॥
प्रभु मेरा अंतरजामी जाणु ॥ करि किरपा पूरन परमेसर निहचलु सचु सबदु नीसाणु ॥१॥ रहाउ ॥

हरि बिनु आन न कोई समरथु तेरी आस तेरा मनि ताणु ॥ सरब घटा के दाते सुआमी देहि सु पहिरणु खाणु ॥१॥

सुरति मति चतुराई सोभा रूपु रंगु धनु माणु ॥ सरब सूख आनंद नानक जपि राम नामु कलिआणु ॥२॥६॥९॥

(राग कलिआन -- SGGS 1323) कलिआनु महला ५ ॥
हरि चरन सरन कलिआन करन ॥ प्रभ नामु पतित पावनो ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि जपि निसंग जमकालु तिसु न खावनो ॥१॥

मुकति जुगति अनिक सूख हरि भगति लवै न लावनो ॥ प्रभ दरस लुबध दास नानक बहुड़ि जोनि न धावनो ॥२॥७॥१०॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1337) प्रभाती महला ५ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनु हरि कीआ तनु सभु साजिआ ॥ पंच तत रचि जोति निवाजिआ ॥ सिहजा धरति बरतन कउ पानी ॥ निमख न विसारहु सेवहु सारिगपानी ॥१॥

मन सतिगुरु सेवि होइ परम गते ॥ हरख सोग ते रहहि निरारा तां तू पावहि प्रानपते ॥१॥ रहाउ ॥

कापड़ भोग रस अनिक भुंचाए ॥ मात पिता कुट्मब सगल बनाए ॥ रिजकु समाहे जलि थलि मीत ॥ सो हरि सेवहु नीता नीत ॥२॥

तहा सखाई जह कोइ न होवै ॥ कोटि अप्राध इक खिन महि धोवै ॥ दाति करै नही पछोतावै ॥ एका बखस फिरि बहुरि न बुलावै ॥३॥

किरत संजोगी पाइआ भालि ॥ साधसंगति महि बसे गुपाल ॥ गुर मिलि आए तुमरै दुआर ॥ जन नानक दरसनु देहु मुरारि ॥४॥१॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥ काम क्रोध मिटे तिसु लोभा ॥ नामु तेरा जन कै भंडारि ॥ गुन गावहि प्रभ दरस पिआरि ॥१॥

तुमरी भगति प्रभ तुमहि जनाई ॥ काटि जेवरी जन लीए छडाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो जनु राता प्रभ कै रंगि ॥ तिनि सुखु पाइआ प्रभ कै संगि ॥ जिसु रसु आइआ सोई जानै ॥ पेखि पेखि मन महि हैरानै ॥२॥

सो सुखीआ सभ ते ऊतमु सोइ ॥ जा कै ह्रिदै वसिआ प्रभु सोइ ॥ सोई निहचलु आवै न जाइ ॥ अनदिनु प्रभ के हरि गुण गाइ ॥३॥

ता कउ करहु सगल नमसकारु ॥ जा कै मनि पूरनु निरंकारु ॥ करि किरपा मोहि ठाकुर देवा ॥ नानकु उधरै जन की सेवा ॥४॥२॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
गुन गावत मनि होइ अनंद ॥ आठ पहर सिमरउ भगवंत ॥ जा कै सिमरनि कलमल जाहि ॥ तिसु गुर की हम चरनी पाहि ॥१॥

सुमति देवहु संत पिआरे ॥ सिमरउ नामु मोहि निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि गुरि कहिआ मारगु सीधा ॥ सगल तिआगि नामि हरि गीधा ॥ तिसु गुर कै सदा बलि जाईऐ ॥ हरि सिमरनु जिसु गुर ते पाईऐ ॥२॥

बूडत प्रानी जिनि गुरहि तराइआ ॥ जिसु प्रसादि मोहै नही माइआ ॥ हलतु पलतु जिनि गुरहि सवारिआ ॥ तिसु गुर ऊपरि सदा हउ वारिआ ॥३॥

महा मुगध ते कीआ गिआनी ॥ गुर पूरे की अकथ कहानी ॥ पारब्रहम नानक गुरदेव ॥ वडै भागि पाईऐ हरि सेव ॥४॥३॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥ करि किरपा अपनी सेवा लाए सगला दुरतु मिटाइआ ॥१॥

हम बारिक सरनि प्रभ दइआल ॥ अवगण काटि कीए प्रभि अपुने राखि लीए मेरै गुर गोपालि ॥१॥ रहाउ ॥

ताप पाप बिनसे खिन भीतरि भए क्रिपाल गुसाई ॥ सासि सासि पारब्रहमु अराधी अपुने सतिगुर कै बलि जाई ॥२॥

अगम अगोचरु बिअंतु सुआमी ता का अंतु न पाईऐ ॥ लाहा खाटि होईऐ धनवंता अपुना प्रभू धिआईऐ ॥३॥

आठ पहर पारब्रहमु धिआई सदा सदा गुन गाइआ ॥ कहु नानक मेरे पूरे मनोरथ पारब्रहमु गुरु पाइआ ॥४॥४॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
सिमरत नामु किलबिख सभि नासे ॥ सचु नामु गुरि दीनी रासे ॥ प्रभ की दरगह सोभावंते ॥ सेवक सेवि सदा सोहंते ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु मेरे भाई ॥ सगले रोग दोख सभि बिनसहि अगिआनु अंधेरा मन ते जाई ॥१॥ रहाउ ॥

जनम मरन गुरि राखे मीत ॥ हरि के नाम सिउ लागी प्रीति ॥ कोटि जनम के गए कलेस ॥ जो तिसु भावै सो भल होस ॥२॥

तिसु गुर कउ हउ सद बलि जाई ॥ जिसु प्रसादि हरि नामु धिआई ॥ ऐसा गुरु पाईऐ वडभागी ॥ जिसु मिलते राम लिव लागी ॥३॥

करि किरपा पारब्रहम सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥ आठ पहर अपुनी लिव लाइ ॥ जनु नानकु प्रभ की सरनाइ ॥४॥५॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
करि किरपा अपुने प्रभि कीए ॥ हरि का नामु जपन कउ दीए ॥ आठ पहर गुन गाइ गुबिंद ॥ भै बिनसे उतरी सभ चिंद ॥१॥

उबरे सतिगुर चरनी लागि ॥ जो गुरु कहै सोई भल मीठा मन की मति तिआगि ॥१॥ रहाउ ॥

मनि तनि वसिआ हरि प्रभु सोई ॥ कलि कलेस किछु बिघनु न होई ॥ सदा सदा प्रभु जीअ कै संगि ॥ उतरी मैलु नाम कै रंगि ॥२॥

चरन कमल सिउ लागो पिआरु ॥ बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ प्रभ मिलन का मारगु जानां ॥ भाइ भगति हरि सिउ मनु मानां ॥३॥

सुणि सजण संत मीत सुहेले ॥ नामु रतनु हरि अगह अतोले ॥ सदा सदा प्रभु गुण निधि गाईऐ ॥ कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥४॥६॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
से धनवंत सेई सचु साहा ॥ हरि की दरगह नामु विसाहा ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु मन मीत ॥ गुरु पूरा पाईऐ वडभागी निरमल पूरन रीति ॥१॥ रहाउ ॥

पाइआ लाभु वजी वाधाई ॥ संत प्रसादि हरि के गुन गाई ॥२॥

सफल जनमु जीवन परवाणु ॥ गुर परसादी हरि रंगु माणु ॥३॥

बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ नानक गुरमुखि उतरहि पारि ॥४॥७॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
गुरु पूरा पूरी ता की कला ॥ गुर का सबदु सदा सद अटला ॥ गुर की बाणी जिसु मनि वसै ॥ दूखु दरदु सभु ता का नसै ॥१॥

हरि रंगि राता मनु राम गुन गावै ॥ मुकतो साधू धूरी नावै ॥१॥ रहाउ ॥

गुर परसादी उतरे पारि ॥ भउ भरमु बिनसे बिकार ॥ मन तन अंतरि बसे गुर चरना ॥ निरभै साध परे हरि सरना ॥२॥

अनद सहज रस सूख घनेरे ॥ दुसमनु दूखु न आवै नेरे ॥ गुरि पूरै अपुने करि राखे ॥ हरि नामु जपत किलबिख सभि लाथे ॥३॥

संत साजन सिख भए सुहेले ॥ गुरि पूरै प्रभ सिउ लै मेले ॥ जनम मरन दुख फाहा काटिआ ॥ कहु नानक गुरि पड़दा ढाकिआ ॥४॥८॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
सतिगुरि पूरै नामु दीआ ॥ अनद मंगल कलिआण सदा सुखु कारजु सगला रासि थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कमल गुर के मनि वूठे ॥ दूख दरद भ्रम बिनसे झूठे ॥१॥

नित उठि गावहु प्रभ की बाणी ॥ आठ पहर हरि सिमरहु प्राणी ॥२॥

घरि बाहरि प्रभु सभनी थाई ॥ संगि सहाई जह हउ जाई ॥३॥

दुइ कर जोड़ि करी अरदासि ॥ सदा जपे नानकु गुणतासु ॥४॥९॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
पारब्रहमु प्रभु सुघड़ सुजाणु ॥ गुरु पूरा पाईऐ वडभागी दरसन कउ जाईऐ कुरबाणु ॥१॥ रहाउ ॥

किलबिख मेटे सबदि संतोखु ॥ नामु अराधन होआ जोगु ॥ साधसंगि होआ परगासु ॥ चरन कमल मन माहि निवासु ॥१॥

जिनि कीआ तिनि लीआ राखि ॥ प्रभु पूरा अनाथ का नाथु ॥ जिसहि निवाजे किरपा धारि ॥ पूरन करम ता के आचार ॥२॥

गुण गावै नित नित नित नवे ॥ लख चउरासीह जोनि न भवे ॥ ईहां ऊहां चरण पूजारे ॥ मुखु ऊजलु साचे दरबारे ॥३॥

जिसु मसतकि गुरि धरिआ हाथु ॥ कोटि मधे को विरला दासु ॥ जलि थलि महीअलि पेखै भरपूरि ॥ नानक उधरसि तिसु जन की धूरि ॥४॥१०॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
कुरबाणु जाई गुर पूरे अपने ॥ जिसु प्रसादि हरि हरि जपु जपने ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित बाणी सुणत निहाल ॥ बिनसि गए बिखिआ जंजाल ॥१॥

साच सबद सिउ लागी प्रीति ॥ हरि प्रभु अपुना आइआ चीति ॥२॥

नामु जपत होआ परगासु ॥ गुर सबदे कीना रिदै निवासु ॥३॥

गुर समरथ सदा दइआल ॥ हरि जपि जपि नानक भए निहाल ॥४॥११॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥ दीन दइआल भए किरपाला अपणा नामु आपि जपाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

संतसंगति मिलि भइआ प्रगास ॥ हरि हरि जपत पूरन भई आस ॥१॥

सरब कलिआण सूख मनि वूठे ॥ हरि गुण गाए गुर नानक तूठे ॥२॥१२॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ घरु २ बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरु न दूजा ठाउ ॥ नाही बिनु हरि नाउ ॥ सरब सिधि कलिआन ॥ पूरन होहि सगल काम ॥१॥

हरि को नामु जपीऐ नीत ॥ काम क्रोध अहंकारु बिनसै लगै एकै प्रीति ॥१॥ रहाउ ॥

नामि लागै दूखु भागै सरनि पालन जोगु ॥ सतिगुरु भेटै जमु न तेटै जिसु धुरि होवै संजोगु ॥२॥

रैनि दिनसु धिआइ हरि हरि तजहु मन के भरम ॥ साधसंगति हरि मिलै जिसहि पूरन करम ॥३॥

जनम जनम बिखाद बिनसे राखि लीने आपि ॥ मात पिता मीत भाई जन नानक हरि हरि जापि ॥४॥१॥१३॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ बिभास पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रम राम राम राम जाप ॥ कलि कलेस लोभ मोह बिनसि जाइ अहं ताप ॥१॥ रहाउ ॥

आपु तिआगि संत चरन लागि मनु पवितु जाहि पाप ॥१॥

नानकु बारिकु कछू न जानै राखन कउ प्रभु माई बाप ॥२॥१॥१४॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1341) प्रभाती महला ५ ॥
चरन कमल सरनि टेक ॥ ऊच मूच बेअंतु ठाकुरु सरब ऊपरि तुही एक ॥१॥ रहाउ ॥

प्रान अधार दुख बिदार दैनहार बुधि बिबेक ॥१॥

नमसकार रखनहार मनि अराधि प्रभू मेक ॥ संत रेनु करउ मजनु नानक पावै सुख अनेक ॥२॥२॥१५॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1347) बिभास प्रभाती महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मात पिता भाई सुतु बनिता ॥ चूगहि चोग अनंद सिउ जुगता ॥ उरझि परिओ मन मीठ मोहारा ॥ गुन गाहक मेरे प्रान अधारा ॥१॥

एकु हमारा अंतरजामी ॥ धर एका मै टिक एकसु की सिरि साहा वड पुरखु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

छल नागनि सिउ मेरी टूटनि होई ॥ गुरि कहिआ इह झूठी धोही ॥ मुखि मीठी खाई कउराइ ॥ अम्रित नामि मनु रहिआ अघाइ ॥२॥

लोभ मोह सिउ गई विखोटि ॥ गुरि क्रिपालि मोहि कीनी छोटि ॥ इह ठगवारी बहुतु घर गाले ॥ हम गुरि राखि लीए किरपाले ॥३॥

काम क्रोध सिउ ठाटु न बनिआ ॥ गुर उपदेसु मोहि कानी सुनिआ ॥ जह देखउ तह महा चंडाल ॥ राखि लीए अपुनै गुरि गोपाल ॥४॥

दस नारी मै करी दुहागनि ॥ गुरि कहिआ एह रसहि बिखागनि ॥ इन सनबंधी रसातलि जाइ ॥ हम गुरि राखे हरि लिव लाइ ॥५॥

अहमेव सिउ मसलति छोडी ॥ गुरि कहिआ इहु मूरखु होडी ॥ इहु नीघरु घरु कही न पाए ॥ हम गुरि राखि लीए लिव लाए ॥६॥

इन लोगन सिउ हम भए बैराई ॥ एक ग्रिह महि दुइ न खटांई ॥ आए प्रभ पहि अंचरि लागि ॥ करहु तपावसु प्रभ सरबागि ॥७॥

प्रभ हसि बोले कीए निआंएं ॥ सगल दूत मेरी सेवा लाए ॥ तूं ठाकुरु इहु ग्रिहु सभु तेरा ॥ कहु नानक गुरि कीआ निबेरा ॥८॥१॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1347) प्रभाती महला ५ ॥
मन महि क्रोधु महा अहंकारा ॥ पूजा करहि बहुतु बिसथारा ॥ करि इसनानु तनि चक्र बणाए ॥ अंतर की मलु कब ही न जाए ॥१॥

इतु संजमि प्रभु किन ही न पाइआ ॥ भगउती मुद्रा मनु मोहिआ माइआ ॥१॥ रहाउ ॥

पाप करहि पंचां के बसि रे ॥ तीरथि नाइ कहहि सभि उतरे ॥ बहुरि कमावहि होइ निसंक ॥ जम पुरि बांधि खरे कालंक ॥२॥

घूघर बाधि बजावहि ताला ॥ अंतरि कपटु फिरहि बेताला ॥ वरमी मारी सापु न मूआ ॥ प्रभु सभ किछु जानै जिनि तू कीआ ॥३॥

पूंअर ताप गेरी के बसत्रा ॥ अपदा का मारिआ ग्रिह ते नसता ॥ देसु छोडि परदेसहि धाइआ ॥ पंच चंडाल नाले लै आइआ ॥४॥

कान फराइ हिराए टूका ॥ घरि घरि मांगै त्रिपतावन ते चूका ॥ बनिता छोडि बद नदरि पर नारी ॥ वेसि न पाईऐ महा दुखिआरी ॥५॥

बोलै नाही होइ बैठा मोनी ॥ अंतरि कलप भवाईऐ जोनी ॥ अंन ते रहता दुखु देही सहता ॥ हुकमु न बूझै विआपिआ ममता ॥६॥

बिनु सतिगुर किनै न पाई परम गते ॥ पूछहु सगल बेद सिम्रिते ॥ मनमुख करम करै अजाई ॥ जिउ बालू घर ठउर न ठाई ॥७॥

जिस नो भए गोबिंद दइआला ॥ गुर का बचनु तिनि बाधिओ पाला ॥ कोटि मधे कोई संतु दिखाइआ ॥ नानकु तिन कै संगि तराइआ ॥८॥

जे होवै भागु ता दरसनु पाईऐ ॥ आपि तरै सभु कुट्मबु तराईऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥२॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1348) प्रभाती महला ५ ॥
सिमरत नामु किलबिख सभि काटे ॥ धरम राइ के कागर फाटे ॥ साधसंगति मिलि हरि रसु पाइआ ॥ पारब्रहमु रिद माहि समाइआ ॥१॥

राम रमत हरि हरि सुखु पाइआ ॥ तेरे दास चरन सरनाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

चूका गउणु मिटिआ अंधिआरु ॥ गुरि दिखलाइआ मुकति दुआरु ॥ हरि प्रेम भगति मनु तनु सद राता ॥ प्रभू जनाइआ तब ही जाता ॥२॥

घटि घटि अंतरि रविआ सोइ ॥ तिसु बिनु बीजो नाही कोइ ॥ बैर बिरोध छेदे भै भरमां ॥ प्रभि पुंनि आतमै कीने धरमा ॥३॥

महा तरंग ते कांढै लागा ॥ जनम जनम का टूटा गांढा ॥ जपु तपु संजमु नामु सम्हालिआ ॥ अपुनै ठाकुरि नदरि निहालिआ ॥४॥

मंगल सूख कलिआण तिथाईं ॥ जह सेवक गोपाल गुसाई ॥ प्रभ सुप्रसंन भए गोपाल ॥ जनम जनम के मिटे बिताल ॥५॥

होम जग उरध तप पूजा ॥ कोटि तीरथ इसनानु करीजा ॥ चरन कमल निमख रिदै धारे ॥ गोबिंद जपत सभि कारज सारे ॥६॥

ऊचे ते ऊचा प्रभ थानु ॥ हरि जन लावहि सहजि धिआनु ॥ दास दासन की बांछउ धूरि ॥ सरब कला प्रीतम भरपूरि ॥७॥

मात पिता हरि प्रीतमु नेरा ॥ मीत साजन भरवासा तेरा ॥ करु गहि लीने अपुने दास ॥ जपि जीवै नानकु गुणतास ॥८॥३॥२॥७॥१२॥

(SGGS 1353) सलोक सहसक्रिती महला ५
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥ कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥ कतंच भ्रात मीत हित बंधव कतंच मोह कुट्मब्यते ॥ कतंच चपल मोहनी रूपं पेखंते तिआगं करोति ॥ रहंत संग भगवान सिमरण नानक लबध्यं अचुत तनह ॥१॥

(SGGS 1354) ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥ ध्रिग स्नेहं बनिता बिलास सुतह ॥ ध्रिग स्नेहं ग्रिहारथ कह ॥ साधसंग स्नेह सत्यिं सुखयं बसंति नानकह ॥२॥

(SGGS 1354) मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥ बरधंति जरूआ हित्यंत माइआ ॥ अत्यंत आसा आथित्य भवनं ॥ गनंत स्वासा भैयान धरमं ॥ पतंति मोह कूप दुरलभ्य देहं तत आस्रयं नानक ॥ गोबिंद गोबिंद गोबिंद गोपाल क्रिपा ॥३॥

(SGGS 1354) काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥ नवंत दुआरं भीत रहितं बाइ रूपं असथ्मभनह ॥ गोबिंद नामं नह सिमरंति अगिआनी जानंति असथिरं ॥ दुरलभ देह उधरंत साध सरण नानक ॥ हरि हरि हरि हरि हरि हरे जपंति ॥४॥

(SGGS 1354) सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥ ग्मभीरं ऊचै सरबगि अपारा ॥ भ्रितिआ प्रिअं बिस्राम चरणं ॥ अनाथ नाथे नानक सरणं ॥५॥

(SGGS 1354) म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥ अहो जस्य रखेण गोपालह नानक रोम न छेद्यते ॥६॥

(SGGS 1354) बहु जतन करता बलवंत कारी सेवंत सूरा चतुर दिसह ॥ बिखम थान बसंत ऊचह नह सिमरंत मरणं कदांचह ॥ होवंति आगिआ भगवान पुरखह नानक कीटी सास अकरखते ॥७॥

(SGGS 1354) सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥ मिटंति तत्रागत भरम मोहं ॥ भगवान रमणं सरबत्र थान्यिं ॥ द्रिसट तुयं अमोघ दरसनं बसंत साध रसना ॥ हरि हरि हरि हरे नानक प्रिअं जापु जपना ॥८॥

(SGGS 1354) घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥ घटंत बसुधा गिरि तर सिखंडं ॥ घटंत ललना सुत भ्रात हीतं ॥ घटंत कनिक मानिक माइआ स्वरूपं ॥ नह घटंत केवल गोपाल अचुत ॥ असथिरं नानक साध जन ॥९॥

(SGGS 1354) नह बिल्मब धरमं बिल्मब पापं ॥ द्रिड़ंत नामं तजंत लोभं ॥ सरणि संतं किलबिख नासं प्रापतं धरम लख्यिण ॥ नानक जिह सुप्रसंन माधवह ॥१०॥

(SGGS 1354) मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥ जौबन बहिक्रम कनिक कुंडलह ॥ बचित्र मंदिर सोभंति बसत्रा इत्यंत माइआ ब्यापितं ॥ हे अचुत सरणि संत नानक भो भगवानए नमह ॥११॥

(SGGS 1354) जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥ ऊचं त नीचं नान्हा सु मूचं ॥ राजं त मानं अभिमानं त हीनं ॥ प्रविरति मारगं वरतंति बिनासनं ॥ गोबिंद भजन साध संगेण असथिरं नानक भगवंत भजनासनं ॥१२॥


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