Pt 42 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 42 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
त्रिसना चलत बहु परकारि ॥ पूरन होत न कतहु बातहि अंति परती हारि ॥१॥ रहाउ ॥

सांति सूख न सहजु उपजै इहै इसु बिउहारि ॥ आप पर का कछु न जानै काम क्रोधहि जारि ॥१॥

संसार सागरु दुखि बिआपिओ दास लेवहु तारि ॥ चरन कमल सरणाइ नानक सद सदा बलिहारि ॥२॥८४॥१०७॥

(राग सारंग -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
रे पापी तै कवन की मति लीन ॥ निमख घरी न सिमरि सुआमी जीउ पिंडु जिनि दीन ॥१॥ रहाउ ॥

खात पीवत सवंत सुखीआ नामु सिमरत खीन ॥ गरभ उदर बिललाट करता तहां होवत दीन ॥१॥

महा माद बिकार बाधा अनिक जोनि भ्रमीन ॥ गोबिंद बिसरे कवन दुख गनीअहि सुखु नानक हरि पद चीन्ह ॥२॥८५॥१०८॥

(राग सारंग -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री चरनह ओट गही ॥ दरसनु पेखि मेरा मनु मोहिओ दुरमति जात बही ॥१॥ रहाउ ॥

अगह अगाधि ऊच अबिनासी कीमति जात न कही ॥ जलि थलि पेखि पेखि मनु बिगसिओ पूरि रहिओ स्रब मही ॥१॥

दीन दइआल प्रीतम मनमोहन मिलि साधह कीनो सही ॥ सिमरि सिमरि जीवत हरि नानक जम की भीर न फही ॥२॥८६॥१०९॥

(राग सारंग -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री मनु मेरो मतवारो ॥ पेखि दइआल अनद सुख पूरन हरि रसि रपिओ खुमारो ॥१॥ रहाउ ॥

निरमल भए ऊजल जसु गावत बहुरि न होवत कारो ॥ चरन कमल सिउ डोरी राची भेटिओ पुरखु अपारो ॥१॥

करु गहि लीने सरबसु दीने दीपक भइओ उजारो ॥ नानक नामि रसिक बैरागी कुलह समूहां तारो ॥२॥८७॥११०॥

(राग सारंग -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥ तिआगि गोबिदु जीअन को दाता माइआ संगि लपटाहि ॥१॥ रहाउ ॥

नामु बिसारि चलहि अन मारगि नरक घोर महि पाहि ॥ अनिक सजांई गणत न आवै गरभै गरभि भ्रमाहि ॥१॥

से धनवंते से पतिवंते हरि की सरणि समाहि ॥ गुर प्रसादि नानक जगु जीतिओ बहुरि न आवहि जांहि ॥२॥८८॥१११॥

(राग सारंग -- SGGS 1225) सारग महला ५ ॥
हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥ भ्रम बन दहन भए खिन भीतरि राम नाम परहारि ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध निंदा परहरीआ काढे साधू कै संगि मारि ॥ जनमु पदारथु गुरमुखि जीतिआ बहुरि न जूऐ हारि ॥१॥

आठ पहर प्रभ के गुण गावह पूरन सबदि बीचारि ॥ नानक दासनि दासु जनु तेरा पुनह पुनह नमसकारि ॥२॥८९॥११२॥

(राग सारंग -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
पोथी परमेसर का थानु ॥ साधसंगि गावहि गुण गोबिंद पूरन ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

साधिक सिध सगल मुनि लोचहि बिरले लागै धिआनु ॥ जिसहि क्रिपालु होइ मेरा सुआमी पूरन ता को कामु ॥१॥

जा कै रिदै वसै भै भंजनु तिसु जानै सगल जहानु ॥ खिनु पलु बिसरु नही मेरे करते इहु नानकु मांगै दानु ॥२॥९०॥११३॥

(राग सारंग -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
वूठा सरब थाई मेहु ॥ अनद मंगल गाउ हरि जसु पूरन प्रगटिओ नेहु ॥१॥ रहाउ ॥

चारि कुंट दह दिसि जल निधि ऊन थाउ न केहु ॥ क्रिपा निधि गोबिंद पूरन जीअ दानु सभ देहु ॥१॥

सति सति हरि सति सुआमी सति साधसंगेहु ॥ सति ते जन जिन परतीति उपजी नानक नह भरमेहु ॥२॥९१॥११४॥

(राग सारंग -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
गोबिद जीउ तू मेरे प्रान अधार ॥ साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥१॥ रहाउ ॥

करु मसतकि धारिओ मेरै माथै साधसंगि गुण गाए ॥ तुमरी क्रिपा ते सभ फल पाए रसकि राम नाम धिआए ॥१॥

अबिचल नीव धराई सतिगुरि कबहू डोलत नाही ॥ गुर नानक जब भए दइआरा सरब सुखा निधि पांही ॥२॥९२॥११५॥

(राग सारंग -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
निबही नाम की सचु खेप ॥ लाभु हरि गुण गाइ निधि धनु बिखै माहि अलेप ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत सगल संतोखे आपना प्रभु धिआइ ॥ रतन जनमु अपार जीतिओ बहुड़ि जोनि न पाइ ॥१॥

भए क्रिपाल दइआल गोबिद भइआ साधू संगु ॥ हरि चरन रासि नानक पाई लगा प्रभ सिउ रंगु ॥२॥९३॥११६॥

(राग सारंग -- SGGS 1226) सारग महला ५ ॥
माई री पेखि रही बिसमाद ॥ अनहद धुनी मेरा मनु मोहिओ अचरज ता के स्वाद ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता बंधप है सोई मनि हरि को अहिलाद ॥ साधसंगि गाए गुन गोबिंद बिनसिओ सभु परमाद ॥१॥

डोरी लपटि रही चरनह संगि भ्रम भै सगले खाद ॥ एकु अधारु नानक जन कीआ बहुरि न जोनि भ्रमाद ॥२॥९४॥११७॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माई री माती चरण समूह ॥ एकसु बिनु हउ आन न जानउ दुतीआ भाउ सभ लूह ॥१॥ रहाउ ॥

तिआगि गोपाल अवर जो करणा ते बिखिआ के खूह ॥ दरस पिआस मेरा मनु मोहिओ काढी नरक ते धूह ॥१॥

संत प्रसादि मिलिओ सुखदाता बिनसी हउमै हूह ॥ राम रंगि राते दास नानक मउलिओ मनु तनु जूह ॥२॥९५॥११८॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
बिनसे काच के बिउहार ॥ राम भजु मिलि साधसंगति इहै जग महि सार ॥१॥ रहाउ ॥

ईत ऊत न डोलि कतहू नामु हिरदै धारि ॥ गुर चरन बोहिथ मिलिओ भागी उतरिओ संसार ॥१॥

जलि थलि महीअलि पूरि रहिओ सरब नाथ अपार ॥ हरि नामु अम्रितु पीउ नानक आन रस सभि खार ॥२॥९६॥११९॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
ता ते करण पलाह करे ॥ महा बिकार मोह मद मातौ सिमरत नाहि हरे ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि जपते नाराइण तिन के दोख जरे ॥ सफल देह धंनि ओइ जनमे प्रभ कै संगि रले ॥१॥

चारि पदारथ असट दसा सिधि सभ ऊपरि साध भले ॥ नानक दास धूरि जन बांछै उधरहि लागि पले ॥२॥९७॥१२०॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
हरि के नाम के जन कांखी ॥ मनि तनि बचनि एही सुखु चाहत प्रभ दरसु देखहि कब आखी ॥१॥ रहाउ ॥

तू बेअंतु पारब्रहम सुआमी गति तेरी जाइ न लाखी ॥ चरन कमल प्रीति मनु बेधिआ करि सरबसु अंतरि राखी ॥१॥

बेद पुरान सिम्रिति साधू जन इह बाणी रसना भाखी ॥ जपि राम नामु नानक निसतरीऐ होरु दुतीआ बिरथी साखी ॥२॥९८॥१२१॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माखी राम की तू माखी ॥ जह दुरगंध तहा तू बैसहि महा बिखिआ मद चाखी ॥१॥ रहाउ ॥

कितहि असथानि तू टिकनु न पावहि इह बिधि देखी आखी ॥ संता बिनु तै कोइ न छाडिआ संत परे गोबिद की पाखी ॥१॥

जीअ जंत सगले तै मोहे बिनु संता किनै न लाखी ॥ नानक दासु हरि कीरतनि राता सबदु सुरति सचु साखी ॥२॥९९॥१२२॥

(राग सारंग -- SGGS 1227) सारग महला ५ ॥
माई री काटी जम की फास ॥ हरि हरि जपत सरब सुख पाए बीचे ग्रसत उदास ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥ संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥१॥

महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥ देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥२॥१००॥१२३॥

(राग सारंग -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥ दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥१॥ रहाउ ॥

प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥ ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥१॥

भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥ नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥२॥१०१॥१२४॥

(राग सारंग -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥ चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥१॥ रहाउ ॥

चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥ जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥१॥

परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥ रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥२॥१०२॥१२५॥

(राग सारंग -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
हरि के नाम की मति सार ॥ हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥ चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥१॥

करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥ दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥२॥१०३॥१२६॥

(राग सारंग -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥ साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥१॥ रहाउ ॥

धारि अनुग्रहु अपुनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥ सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥१॥

निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥ प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥२॥१०४॥१२७॥

(राग सारंग -- SGGS 1228) सारग महला ५ ॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥ तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥ तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥ तू बेअंतु अपर्मपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥१॥

बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥ जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥२॥१०५॥१२८॥

(राग सारंग -- SGGS 1229) सारंग महला ५ चउपदे घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि भजि आन करम बिकार ॥ मान मोहु न बुझत त्रिसना काल ग्रस संसार ॥१॥ रहाउ ॥

खात पीवत हसत सोवत अउध बिती असार ॥ नरक उदरि भ्रमंत जलतो जमहि कीनी सार ॥१॥

पर द्रोह करत बिकार निंदा पाप रत कर झार ॥ बिना सतिगुर बूझ नाही तम मोह महां अंधार ॥२॥

बिखु ठगउरी खाइ मूठो चिति न सिरजनहार ॥ गोबिंद गुपत होइ रहिओ निआरो मातंग मति अहंकार ॥३॥

करि क्रिपा प्रभ संत राखे चरन कमल अधार ॥ कर जोरि नानकु सरनि आइओ गोपाल पुरख अपार ॥४॥१॥१२९॥

(राग सारंग -- SGGS 1229) सारग महला ५ घरु ६ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥ किंकरी बिकार ॥ देखु री बीचार ॥ गुर सबदु धिआइ महलु पाइ ॥ हरि संगि रंग करती महा केल ॥१॥ रहाउ ॥

सुपन री संसारु ॥ मिथनी बिसथारु ॥ सखी काइ मोहि मोहिली प्रिअ प्रीति रिदै मेल ॥१॥

सरब री प्रीति पिआरु ॥ प्रभु सदा री दइआरु ॥ कांएं आन आन रुचीऐ ॥ हरि संगि संगि खचीऐ ॥ जउ साधसंग पाए ॥ कहु नानक हरि धिआए ॥ अब रहे जमहि मेल ॥२॥१॥१३०॥

(राग सारंग -- SGGS 1229) सारग महला ५ ॥
कंचना बहु दत करा ॥ भूमि दानु अरपि धरा ॥ मन अनिक सोच पवित्र करत ॥ नाही रे नाम तुलि मन चरन कमल लागे ॥१॥ रहाउ ॥

चारि बेद जिहव भने ॥ दस असट खसट स्रवन सुने ॥ नही तुलि गोबिद नाम धुने ॥ मन चरन कमल लागे ॥१॥

बरत संधि सोच चार ॥ क्रिआ कुंटि निराहार ॥ अपरस करत पाकसार ॥ निवली करम बहु बिसथार ॥ धूप दीप करते हरि नाम तुलि न लागे ॥ राम दइआर सुनि दीन बेनती ॥ देहु दरसु नैन पेखउ जन नानक नाम मिसट लागे ॥२॥२॥१३१॥

(राग सारंग -- SGGS 1229) सारग महला ५ ॥
राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

संतन कै चरन लागे काम क्रोध लोभ तिआगे गुर गोपाल भए क्रिपाल लबधि अपनी पाई ॥१॥

बिनसे भ्रम मोह अंध टूटे माइआ के बंध पूरन सरबत्र ठाकुर नह कोऊ बैराई ॥ सुआमी सुप्रसंन भए जनम मरन दोख गए संतन कै चरन लागि नानक गुन गाई ॥२॥३॥१३२॥

(राग सारंग -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवन सुनन भगति करन अनिक पातिक पुनहचरन ॥ सरन परन साधू आन बानि बिसारे ॥१॥

हरि चरन प्रीति नीत नीति पावना महि महा पुनीत ॥ सेवक भै दूरि करन कलिमल दोख जारे ॥ कहत मुकत सुनत मुकत रहत जनम रहते ॥ राम राम सार भूत नानक ततु बीचारे ॥२॥४॥१३३॥

(राग सारंग -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥१॥ रहाउ ॥

प्रीति लाइ हरि धिआइ गुन गोबिंद सदा गाइ ॥ हरि जन की रेन बांछु दैनहार सुआमी ॥१॥

सरब कुसल सुख बिस्राम आनदा आनंद नाम जम की कछु नाहि त्रास सिमरि अंतरजामी ॥ एक सरन गोबिंद चरन संसार सगल ताप हरन ॥ नाव रूप साधसंग नानक पारगरामी ॥२॥५॥१३४॥

(राग सारंग -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
गुन लाल गावउ गुर देखे ॥ पंचा ते एकु छूटा जउ साधसंगि पग रउ ॥१॥ रहाउ ॥

द्रिसटउ कछु संगि न जाइ मानु तिआगि मोहा ॥ एकै हरि प्रीति लाइ मिलि साधसंगि सोहा ॥१॥

पाइओ है गुण निधानु सगल आस पूरी ॥ नानक मनि अनंद भए गुरि बिखम गार्ह तोरी ॥२॥६॥१३५॥

(राग सारंग -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥१॥ रहाउ ॥

साधू संतन सेवि कै प्रिउ हीअरै धिआइओ ॥ आनंद रूपी पेखि कै हउ महलु पावउगी ॥१॥

काम करी सभ तिआगि कै हउ सरणि परउगी ॥ नानक सुआमी गरि मिले हउ गुर मनावउगी ॥२॥७॥१३६॥

(राग सारंग -- SGGS 1230) सारग महला ५ ॥
ऐसी होइ परी ॥ जानते दइआर ॥१॥ रहाउ ॥

मातर पितर तिआगि कै मनु संतन पाहि बेचाइओ ॥ जाति जनम कुल खोईऐ हउ गावउ हरि हरी ॥१॥

लोक कुट्मब ते टूटीऐ प्रभ किरति किरति करी ॥ गुरि मो कउ उपदेसिआ नानक सेवि एक हरी ॥२॥८॥१३७॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) सारग महला ५ ॥
लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥ कीट हसति पाखाण जंत सरब मै प्रतिपाल तू ॥१॥ रहाउ ॥

नह दूरि पूरि हजूरि संगे ॥ सुंदर रसाल तू ॥१॥

नह बरन बरन नह कुलह कुल ॥ नानक प्रभ किरपाल तू ॥२॥९॥१३८॥

(राग सारंग -- SGGS 1231) सारग मः ५ ॥
करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥ उपजता बिकार दुंदर नउपरी झुनंतकार सुंदर अनिग भाउ करत फिरत बिनु गोपाल धोहे ॥ रहाउ ॥ तीनि भउने लपटाइ रही काच करमि न जात सही उनमत अंध धंध रचित जैसे महा सागर होहे ॥१॥

उधरे हरि संत दास काटि दीनी जम की फास पतित पावन नामु जा को सिमरि नानक ओहे ॥२॥१०॥१३९॥३॥१३॥१५५॥

(राग सारंग -- SGGS 1235) सारग महला ५ असटपदीआ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाईं परतापु तुहारो डीठा ॥ करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥१॥ रहाउ ॥

राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥ हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥१॥

उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥ बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥२॥

पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥ नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥३॥

घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥ जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥४॥

जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन्ही ॥ अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन्ही ॥५॥

हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥ जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़्हाई ॥६॥

मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥ तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥७॥

हम नान्हे नीच तुम्हे बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥ मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥८॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1235) सारग महला ५ असटपदी घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥ पारब्रहम की अचरज सभा ॥१॥ रहाउ ॥

सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥ गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥ मन भीतरि होवै परगासु ॥ गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥१॥

मिति नाही जा का बिसथारु ॥ सोभा ता की अपर अपार ॥ अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥ सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥२॥

अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥ अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥ अनिक पुरख अंसा अवतार ॥ अनिक इंद्र ऊभे दरबार ॥३॥

अनिक पवन पावक अरु नीर ॥ अनिक रतन सागर दधि खीर ॥ अनिक सूर ससीअर नखिआति ॥ अनिक देवी देवा बहु भांति ॥४॥

अनिक बसुधा अनिक कामधेन ॥ अनिक पारजात अनिक मुखि बेन ॥ अनिक अकास अनिक पाताल ॥ अनिक मुखी जपीऐ गोपाल ॥५॥

अनिक सासत्र सिम्रिति पुरान ॥ अनिक जुगति होवत बखिआन ॥ अनिक सरोते सुनहि निधान ॥ सरब जीअ पूरन भगवान ॥६॥

अनिक धरम अनिक कुमेर ॥ अनिक बरन अनिक कनिक सुमेर ॥ अनिक सेख नवतन नामु लेहि ॥ पारब्रहम का अंतु न तेहि ॥७॥

अनिक पुरीआ अनिक तह खंड ॥ अनिक रूप रंग ब्रहमंड ॥ अनिक बना अनिक फल मूल ॥ आपहि सूखम आपहि असथूल ॥८॥

अनिक जुगादि दिनस अरु राति ॥ अनिक परलउ अनिक उतपाति ॥ अनिक जीअ जा के ग्रिह माहि ॥ रमत राम पूरन स्रब ठांइ ॥९॥

अनिक माइआ जा की लखी न जाइ ॥ अनिक कला खेलै हरि राइ ॥ अनिक धुनित ललित संगीत ॥ अनिक गुपत प्रगटे तह चीत ॥१०॥

सभ ते ऊच भगत जा कै संगि ॥ आठ पहर गुन गावहि रंगि ॥ अनिक अनाहद आनंद झुनकार ॥ उआ रस का कछु अंतु न पार ॥११॥

सति पुरखु सति असथानु ॥ ऊच ते ऊच निरमल निरबानु ॥ अपुना कीआ जानहि आपि ॥ आपे घटि घटि रहिओ बिआपि ॥ क्रिपा निधान नानक दइआल ॥ जिनि जपिआ नानक ते भए निहाल ॥१२॥१॥२॥२॥३॥७॥

(राग सारंग -- SGGS 1236) सारग छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥ घटि घटि पूरन है अलिपाता ॥ घटि घटि पूरनु करि बिसथीरनु जल तरंग जिउ रचनु कीआ ॥ हभि रस माणे भोग घटाणे आन न बीआ को थीआ ॥ हरि रंगी इक रंगी ठाकुरु संतसंगि प्रभु जाता ॥ नानक दरसि लीना जिउ जल मीना सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥१॥

कउन उपमा देउ कवन बडाई ॥ पूरन पूरि रहिओ स्रब ठाई ॥ पूरन मनमोहन घट घट सोहन जब खिंचै तब छाई ॥ किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥ अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥ कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥२॥

पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥ हींउ अरापउं देहु सदेसा ॥ देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥ अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥ बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥ देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥३॥

करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥ धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥ चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥ भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥ दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥ कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥४॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1247) मः ५ ॥
धरति सुहावड़ी आकासु सुहंदा जपंदिआ हरि नाउ ॥ नानक नाम विहूणिआ तिन्ह तन खावहि काउ ॥२॥

(राग सारंग -- SGGS 1251) पउड़ी मः ५ ॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचु नामु अधारु ॥ गुरि पूरै मेलाइआ प्रभु देवणहारु ॥ भागु पूरा तिन जागिआ जपिआ निरंकारु ॥ साधू संगति लगिआ तरिआ संसारु ॥ नानक सिफति सलाह करि प्रभ का जैकारु ॥३५॥

(राग सारंग -- SGGS 1251) सलोक मः ५ ॥
सभे जीअ समालि अपणी मिहर करु ॥ अंनु पाणी मुचु उपाइ दुख दालदु भंनि तरु ॥ अरदासि सुणी दातारि होई सिसटि ठरु ॥ लेवहु कंठि लगाइ अपदा सभ हरु ॥ नानक नामु धिआइ प्रभ का सफलु घरु ॥१॥

(राग सारंग -- SGGS 1251) मः ५ ॥
वुठे मेघ सुहावणे हुकमु कीता करतारि ॥ रिजकु उपाइओनु अगला ठांढि पई संसारि ॥ तनु मनु हरिआ होइआ सिमरत अगम अपार ॥ करि किरपा प्रभ आपणी सचे सिरजणहार ॥ कीता लोड़हि सो करहि नानक सद बलिहार ॥२॥

सारंग महला ५ सूरदास ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संग बसे हरि लोक ॥ तनु मनु अरपि सरबसु सभु अरपिओ अनद सहज धुनि झोक ॥१॥ रहाउ ॥

दरसनु पेखि भए निरबिखई पाए है सगले थोक ॥ आन बसतु सिउ काजु न कछूऐ सुंदर बदन अलोक ॥१॥

सिआम सुंदर तजि आन जु चाहत जिउ कुसटी तनि जोक ॥ सूरदास मनु प्रभि हथि लीनो दीनो इहु परलोक ॥२॥१॥८॥

(राग मलार -- SGGS 1266) रागु मलार महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥ ता कउ कहहु परवाह काहू की जिह गोपाल सहाए ॥१॥

बरसै मेघु सखी घरि पाहुन आए ॥ मोहि दीन क्रिपा निधि ठाकुर नव निधि नामि समाए ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक प्रकार भोजन बहु कीए बहु बिंजन मिसटाए ॥ करी पाकसाल सोच पवित्रा हुणि लावहु भोगु हरि राए ॥२॥

दुसट बिदारे साजन रहसे इहि मंदिर घर अपनाए ॥ जउ ग्रिहि लालु रंगीओ आइआ तउ मै सभि सुख पाए ॥३॥

संत सभा ओट गुर पूरे धुरि मसतकि लेखु लिखाए ॥ जन नानक कंतु रंगीला पाइआ फिरि दूखु न लागै आए ॥४॥१॥

(राग मलार -- SGGS 1266) मलार महला ५ ॥
खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥ सारि सम्हालि माता मुखि नीरै तब ओहु त्रिपति अघाई ॥१॥

हम बारिक पिता प्रभु दाता ॥ भूलहि बारिक अनिक लख बरीआ अन ठउर नाही जह जाता ॥१॥ रहाउ ॥

चंचल मति बारिक बपुरे की सरप अगनि कर मेलै ॥ माता पिता कंठि लाइ राखै अनद सहजि तब खेलै ॥२॥

जिस का पिता तू है मेरे सुआमी तिसु बारिक भूख कैसी ॥ नव निधि नामु निधानु ग्रिहि तेरै मनि बांछै सो लैसी ॥३॥

पिता क्रिपालि आगिआ इह दीनी बारिकु मुखि मांगै सो देना ॥ नानक बारिकु दरसु प्रभ चाहै मोहि ह्रिदै बसहि नित चरना ॥४॥२॥

(राग मलार -- SGGS 1266) मलार महला ५ ॥
सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥ कारजु सगल अर्मभिओ घर का ठाकुर का भारोसा ॥१॥

सुनीऐ बाजै बाज सुहावी ॥ भोरु भइआ मै प्रिअ मुख पेखे ग्रिहि मंगल सुहलावी ॥१॥ रहाउ ॥

मनूआ लाइ सवारे थानां पूछउ संता जाए ॥ खोजत खोजत मै पाहुन मिलिओ भगति करउ निवि पाए ॥२॥

जब प्रिअ आइ बसे ग्रिहि आसनि तब हम मंगलु गाइआ ॥ मीत साजन मेरे भए सुहेले प्रभु पूरा गुरू मिलाइआ ॥३॥

सखी सहेली भए अनंदा गुरि कारज हमरे पूरे ॥ कहु नानक वरु मिलिआ सुखदाता छोडि न जाई दूरे ॥४॥३॥

(राग मलार -- SGGS 1267) मलार महला ५ ॥
राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥ क्रिपा निधि छोडि आन कउ पूजहि आतम घाती हरते ॥१॥

हरि बिसरत ते दुखि दुखि मरते ॥ अनिक बार भ्रमहि बहु जोनी टेक न काहू धरते ॥१॥ रहाउ ॥

तिआगि सुआमी आन कउ चितवत मूड़ मुगध खल खर ते ॥ कागर नाव लंघहि कत सागरु ब्रिथा कथत हम तरते ॥२॥

सिव बिरंचि असुर सुर जेते काल अगनि महि जरते ॥ नानक सरनि चरन कमलन की तुम्ह न डारहु प्रभ करते ॥३॥४॥

(राग मलार -- SGGS 1267) रागु मलार महला ५ दुपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥ हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सकउ प्रीति हमारी लागी ॥१॥ रहाउ ॥

उन कै संगि मोहि प्रभु चिति आवै संत प्रसादि मोहि जागी ॥ सुनि उपदेसु भए मन निरमल गुन गाए रंगि रांगी ॥१॥

इहु मनु देइ कीए संत मीता क्रिपाल भए बडभागीं ॥ महा सुखु पाइआ बरनि न साकउ रेनु नानक जन पागी ॥२॥१॥५॥

(राग मलार -- SGGS 1267) मलार महला ५ ॥
माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥ सगल सहेली सुख भरि सूती जिह घरि लालु बसाई ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि अवगन प्रभु सदा दइआला मोहि निरगुनि किआ चतुराई ॥ करउ बराबरि जो प्रिअ संगि रातीं इह हउमै की ढीठाई ॥१॥

भई निमाणी सरनि इक ताकी गुर सतिगुर पुरख सुखदाई ॥ एक निमख महि मेरा सभु दुखु काटिआ नानक सुखि रैनि बिहाई ॥२॥२॥६॥

(राग मलार -- SGGS 1267) मलार महला ५ ॥
बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥ बरसु पिआरे मनहि सधारे होइ अनदु सदा मनि चाउ ॥१॥ रहाउ ॥

हम तेरी धर सुआमीआ मेरे तू किउ मनहु बिसारे ॥ इसत्री रूप चेरी की निआई सोभ नही बिनु भरतारे ॥१॥

बिनउ सुनिओ जब ठाकुर मेरै बेगि आइओ किरपा धारे ॥ कहु नानक मेरो बनिओ सुहागो पति सोभा भले अचारे ॥२॥३॥७॥

(राग मलार -- SGGS 1268) मलार महला ५ ॥
प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥ दूख दरद बिनसै भव सागरु गुर की मूरति रिदै बसाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दुसमन हते दोखी सभि विआपे हरि सरणाई आइआ ॥ राखनहारै हाथ दे राखिओ नामु पदारथु पाइआ ॥१॥

करि किरपा किलविख सभि काटे नामु निरमलु मनि दीआ ॥ गुण निधानु नानक मनि वसिआ बाहुड़ि दूख न थीआ ॥२॥४॥८॥

(राग मलार -- SGGS 1268) मलार महला ५ ॥
प्रभ मेरे प्रीतम प्रान पिआरे ॥ प्रेम भगति अपनो नामु दीजै दइआल अनुग्रहु धारे ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरउ चरन तुहारे प्रीतम रिदै तुहारी आसा ॥ संत जना पहि करउ बेनती मनि दरसन की पिआसा ॥१॥

बिछुरत मरनु जीवनु हरि मिलते जन कउ दरसनु दीजै ॥ नाम अधारु जीवन धनु नानक प्रभ मेरे किरपा कीजै ॥२॥५॥९॥

(राग मलार -- SGGS 1268) मलार महला ५ ॥
अब अपने प्रीतम सिउ बनि आई ॥ राजा रामु रमत सुखु पाइओ बरसु मेघ सुखदाई ॥१॥ रहाउ ॥

इकु पलु बिसरत नही सुख सागरु नामु नवै निधि पाई ॥ उदौतु भइओ पूरन भावी को भेटे संत सहाई ॥१॥

सुख उपजे दुख सगल बिनासे पारब्रहम लिव लाई ॥ तरिओ संसारु कठिन भै सागरु हरि नानक चरन धिआई ॥२॥६॥१०॥

(राग मलार -- SGGS 1268) मलार महला ५ ॥
घनिहर बरसि सगल जगु छाइआ ॥ भए क्रिपाल प्रीतम प्रभ मेरे अनद मंगल सुख पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मिटे कलेस त्रिसन सभ बूझी पारब्रहमु मनि धिआइआ ॥ साधसंगि जनम मरन निवारे बहुरि न कतहू धाइआ ॥१॥

मनु तनु नामि निरंजनि रातउ चरन कमल लिव लाइआ ॥ अंगीकारु कीओ प्रभि अपनै नानक दास सरणाइआ ॥२॥७॥११॥

(राग मलार -- SGGS 1268) मलार महला ५ ॥
बिछुरत किउ जीवे ओइ जीवन ॥ चितहि उलास आस मिलबे की चरन कमल रस पीवन ॥१॥ रहाउ ॥

जिन कउ पिआस तुमारी प्रीतम तिन कउ अंतरु नाही ॥ जिन कउ बिसरै मेरो रामु पिआरा से मूए मरि जांहीं ॥१॥

मनि तनि रवि रहिआ जगदीसुर पेखत सदा हजूरे ॥ नानक रवि रहिओ सभ अंतरि सरब रहिआ भरपूरे ॥२॥८॥१२॥


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