Pt 41 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 41 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सारंग -- SGGS 1213) सारग महला ५ ॥
रे मूड़्हे आन काहे कत जाई ॥ संगि मनोहरु अम्रितु है रे भूलि भूलि बिखु खाई ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ सुंदर चतुर अनूप बिधाते तिस सिउ रुच नही राई ॥ मोहनि सिउ बावर मनु मोहिओ झूठि ठगउरी पाई ॥१॥

भइओ दइआलु क्रिपालु दुख हरता संतन सिउ बनि आई ॥ सगल निधान घरै महि पाए कहु नानक जोति समाई ॥२॥२१॥४४॥

(राग सारंग -- SGGS 1213) सारग महला ५ ॥
ओअं प्रिअ प्रीति चीति पहिलरीआ ॥ जो तउ बचनु दीओ मेरे सतिगुर तउ मै साज सीगरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

हम भूलह तुम सदा अभूला हम पतित तुम पतित उधरीआ ॥ हम नीच बिरख तुम मैलागर लाज संगि संगि बसरीआ ॥१॥

तुम ग्मभीर धीर उपकारी हम किआ बपुरे जंतरीआ ॥ गुर क्रिपाल नानक हरि मेलिओ तउ मेरी सूखि सेजरीआ ॥२॥२२॥४५॥

(राग सारंग -- SGGS 1213) सारग महला ५ ॥
मन ओइ दिनस धंनि परवानां ॥ सफल ते घरी संजोग सुहावे सतिगुर संगि गिआनां ॥१॥ रहाउ ॥

धंनि सुभाग धंनि सोहागा धंनि देत जिनि मानां ॥ इहु तनु तुम्हरा सभु ग्रिहु धनु तुम्हरा हींउ कीओ कुरबानां ॥१॥

कोटि लाख राज सुख पाए इक निमख पेखि द्रिसटानां ॥ जउ कहहु मुखहु सेवक इह बैसीऐ सुख नानक अंतु न जानां ॥२॥२३॥४६॥

(राग सारंग -- SGGS 1213) सारग महला ५ ॥
अब मोरो सहसा दूखु गइआ ॥ अउर उपाव सगल तिआगि छोडे सतिगुर सरणि पइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सरब सिधि कारज सभि सवरे अहं रोग सगल ही खइआ ॥ कोटि पराध खिन महि खउ भई है गुर मिलि हरि हरि कहिआ ॥१॥

पंच दास गुरि वसगति कीने मन निहचल निरभइआ ॥ आइ न जावै न कत ही डोलै थिरु नानक राजइआ ॥२॥२४॥४७॥

(राग सारंग -- SGGS 1213) सारग महला ५ ॥
प्रभु मेरो इत उत सदा सहाई ॥ मनमोहनु मेरे जीअ को पिआरो कवन कहा गुन गाई ॥१॥ रहाउ ॥

खेलि खिलाइ लाड लाडावै सदा सदा अनदाई ॥ प्रतिपालै बारिक की निआई जैसे मात पिताई ॥१॥

तिसु बिनु निमख नही रहि सकीऐ बिसरि न कबहू जाई ॥ कहु नानक मिलि संतसंगति ते मगन भए लिव लाई ॥२॥२५॥४८॥

(राग सारंग -- SGGS 1214) सारग महला ५ ॥
अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥ आस न अवर काहू की कीजै सुखदाता प्रभु धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

सूख मंगल कलिआण जिसहि घरि तिस ही सरणी पाईऐ ॥ तिसहि तिआगि मानुखु जे सेवहु तउ लाज लोनु होइ जाईऐ ॥१॥

एक ओट पकरी ठाकुर की गुर मिलि मति बुधि पाईऐ ॥ गुण निधान नानक प्रभु मिलिआ सगल चुकी मुहताईऐ ॥२॥२६॥४९॥

(राग सारंग -- SGGS 1214) सारग महला ५ ॥
ओट सताणी प्रभ जीउ मेरै ॥ द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥१॥ रहाउ ॥

अंगीकारु कीओ प्रभि अपुनै काढि लीआ बिखु घेरै ॥ अम्रित नामु अउखधु मुखि दीनो जाइ पइआ गुर पैरै ॥१॥

कवन उपमा कहउ एक मुख निरगुण के दातेरै ॥ काटि सिलक जउ अपुना कीनो नानक सूख घनेरै ॥२॥२७॥५०॥

(राग सारंग -- SGGS 1214) सारग महला ५ ॥
प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥ भइओ क्रिपालु जीअ सुखदाता होई सगल खलासी ॥१॥ रहाउ ॥

अवरु न कोऊ सूझै प्रभ बिनु कहु को किसु पहि जासी ॥ जिउ जाणहु तिउ राखहु ठाकुर सभु किछु तुम ही पासी ॥१॥

हाथ देइ राखे प्रभि अपुने सद जीवन अबिनासी ॥ कहु नानक मनि अनदु भइआ है काटी जम की फासी ॥२॥२८॥५१॥

(राग सारंग -- SGGS 1214) सारग महला ५ ॥
मेरो मनु जत कत तुझहि सम्हारै ॥ हम बारिक दीन पिता प्रभ मेरे जिउ जानहि तिउ पारै ॥१॥ रहाउ ॥

जब भुखौ तब भोजनु मांगै अघाए सूख सघारै ॥ तब अरोग जब तुम संगि बसतौ छुटकत होइ रवारै ॥१॥

कवन बसेरो दास दासन को थापिउ थापनहारै ॥ नामु न बिसरै तब जीवनु पाईऐ बिनती नानक इह सारै ॥२॥२९॥५२॥

(राग सारंग -- SGGS 1214) सारग महला ५ ॥
मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥ लाल दइआल गुलाल लाडिले सहजि सहजि गुन गाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर बचनाति कमात क्रिपा ते बहुरि न कतहू धाइओ ॥ रहत उपाधि समाधि सुख आसन भगति वछलु ग्रिहि पाइओ ॥१॥

नाद बिनोद कोड आनंदा सहजे सहजि समाइओ ॥ करना आपि करावन आपे कहु नानक आपि आपाइओ ॥२॥३०॥५३॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
अम्रित नामु मनहि आधारो ॥ जिन दीआ तिस कै कुरबानै गुर पूरे नमसकारो ॥१॥ रहाउ ॥

बूझी त्रिसना सहजि सुहेला कामु क्रोधु बिखु जारो ॥ आइ न जाइ बसै इह ठाहर जह आसनु निरंकारो ॥१॥

एकै परगटु एकै गुपता एकै धुंधूकारो ॥ आदि मधि अंति प्रभु सोई कहु नानक साचु बीचारो ॥२॥३१॥५४॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
बिनु प्रभ रहनु न जाइ घरी ॥ सरब सूख ताहू कै पूरन जा कै सुखु है हरी ॥१॥ रहाउ ॥

मंगल रूप प्रान जीवन धन सिमरत अनद घना ॥ वड समरथु सदा सद संगे गुन रसना कवन भना ॥१॥

थान पवित्रा मान पवित्रा पवित्र सुनन कहनहारे ॥ कहु नानक ते भवन पवित्रा जा महि संत तुम्हारे ॥२॥३२॥५५॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
रसना जपती तूही तूही ॥ मात गरभ तुम ही प्रतिपालक म्रित मंडल इक तुही ॥१॥ रहाउ ॥

तुमहि पिता तुम ही फुनि माता तुमहि मीत हित भ्राता ॥ तुम परवार तुमहि आधारा तुमहि जीअ प्रानदाता ॥१॥

तुमहि खजीना तुमहि जरीना तुम ही माणिक लाला ॥ तुमहि पारजात गुर ते पाए तउ नानक भए निहाला ॥२॥३३॥५६॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
जाहू काहू अपुनो ही चिति आवै ॥ जो काहू को चेरो होवत ठाकुर ही पहि जावै ॥१॥ रहाउ ॥

अपने पहि दूख अपने पहि सूखा अपुने ही पहि बिरथा ॥ अपुने पहि मानु अपुने पहि ताना अपने ही पहि अरथा ॥१॥

किन ही राज जोबनु धन मिलखा किन ही बाप महतारी ॥ सरब थोक नानक गुर पाए पूरन आस हमारी ॥२॥३४॥५७॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
झूठो माइआ को मद मानु ॥ ध्रोह मोह दूरि करि बपुरे संगि गोपालहि जानु ॥१॥ रहाउ ॥

मिथिआ राज जोबन अरु उमरे मीर मलक अरु खान ॥ मिथिआ कापर सुगंध चतुराई मिथिआ भोजन पान ॥१॥

दीन बंधरो दास दासरो संतह की सारान ॥ मांगनि मांगउ होइ अचिंता मिलु नानक के हरि प्रान ॥२॥३५॥५८॥

(राग सारंग -- SGGS 1215) सारग महला ५ ॥
अपुनी इतनी कछू न सारी ॥ अनिक काज अनिक धावरता उरझिओ आन जंजारी ॥१॥ रहाउ ॥

दिउस चारि के दीसहि संगी ऊहां नाही जह भारी ॥ तिन सिउ राचि माचि हितु लाइओ जो कामि नही गावारी ॥१॥

हउ नाही नाही किछु मेरा ना हमरो बसु चारी ॥ करन करावन नानक के प्रभ संतन संगि उधारी ॥२॥३६॥५९॥

(राग सारंग -- SGGS 1216) सारग महला ५ ॥
मोहनी मोहत रहै न होरी ॥ साधिक सिध सगल की पिआरी तुटै न काहू तोरी ॥१॥ रहाउ ॥

खटु सासत्र उचरत रसनागर तीरथ गवन न थोरी ॥ पूजा चक्र बरत नेम तपीआ ऊहा गैलि न छोरी ॥१॥

अंध कूप महि पतित होत जगु संतहु करहु परम गति मोरी ॥ साधसंगति नानकु भइओ मुकता दरसनु पेखत भोरी ॥२॥३७॥६०॥

(राग सारंग -- SGGS 1216) सारग महला ५ ॥
कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥ पवनि अफार तोर चामरो अति जजरी तेरी रे माटुली ॥१॥ रहाउ ॥

ऊही ते हरिओ ऊहा ले धरिओ जैसे बासा मास देत झाटुली ॥ देवनहारु बिसारिओ अंधुले जिउ सफरी उदरु भरै बहि हाटुली ॥१॥

साद बिकार बिकार झूठ रस जह जानो तह भीर बाटुली ॥ कहु नानक समझु रे इआने आजु कालि खुल्है तेरी गांठुली ॥२॥३८॥६१॥

(राग सारंग -- SGGS 1216) सारग महला ५ ॥
गुर जीउ संगि तुहारै जानिओ ॥ कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥१॥ रहाउ ॥

कवन मूलु प्रानी का कहीऐ कवन रूपु द्रिसटानिओ ॥ जोति प्रगास भई माटी संगि दुलभ देह बखानिओ ॥१॥

तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ ॥ करु मसतकि धरि कटी जेवरी नानक दास दसानिओ ॥२॥३९॥६२॥

(राग सारंग -- SGGS 1216) सारग महला ५ ॥
हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥ मानसु का को बपुरो भाई जा को राखा राम ॥१॥ रहाउ ॥

आपि महा जनु आपे पंचा आपि सेवक कै काम ॥ आपे सगले दूत बिदारे ठाकुर अंतरजाम ॥१॥

आपे पति राखी सेवक की आपि कीओ बंधान ॥ आदि जुगादि सेवक की राखै नानक को प्रभु जान ॥२॥४०॥६३॥

(राग सारंग -- SGGS 1216) सारग महला ५ ॥
तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥ मनु धनु जीउ पिंडु सभु तुमरा इहु तनु सीतो तुमरै धान ॥१॥ रहाउ ॥

तुम ही दीए अनिक प्रकारा तुम ही दीए मान ॥ सदा सदा तुम ही पति राखहु अंतरजामी जान ॥१॥

जिन संतन जानिआ तू ठाकुर ते आए परवान ॥ जन का संगु पाईऐ वडभागी नानक संतन कै कुरबान ॥२॥४१॥६४॥

(राग सारंग -- SGGS 1217) सारग महला ५ ॥
करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥ तुम समरथ कारन करना तूटी तुम ही जोरी ॥१॥ रहाउ ॥

जनम जनम के बिखई तुम तारे सुमति संगि तुमारै पाई ॥ अनिक जोनि भ्रमते प्रभ बिसरत सासि सासि हरि गाई ॥१॥

जो जो संगि मिले साधू कै ते ते पतित पुनीता ॥ कहु नानक जा के वडभागा तिनि जनमु पदारथु जीता ॥२॥४२॥६५॥

(राग सारंग -- SGGS 1217) सारग महला ५ ॥
ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥ सरब सूख आनंद सहज रस सुनत तुहारो नाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

क्रिपा निधान सूख के सागर जसु सभ महि जा को छाइओ ॥ संतसंगि रंग तुम कीए अपना आपु द्रिसटाइओ ॥१॥

नैनहु संगि संतन की सेवा चरन झारी केसाइओ ॥ आठ पहर दरसनु संतन का सुखु नानक इहु पाइओ ॥२॥४३॥६६॥

(राग सारंग -- SGGS 1217) सारग महला ५ ॥
जा की राम नाम लिव लागी ॥ सजनु सुरिदा सुहेला सहजे सो कहीऐ बडभागी ॥१॥ रहाउ ॥

रहित बिकार अलप माइआ ते अह्मबुधि बिखु तिआगी ॥ दरस पिआस आस एकहि की टेक हीऐं प्रिअ पागी ॥१॥

अचिंत सोइ जागनु उठि बैसनु अचिंत हसत बैरागी ॥ कहु नानक जिनि जगतु ठगाना सु माइआ हरि जन ठागी ॥२॥४४॥६७॥

(राग सारंग -- SGGS 1217) सारग महला ५ ॥
अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥ पूकारन कउ जो उदमु करता गुरु परमेसरु ता कउ मारै ॥१॥ रहाउ ॥

निरवैरै संगि वैरु रचावै हरि दरगह ओहु हारै ॥ आदि जुगादि प्रभ की वडिआई जन की पैज सवारै ॥१॥

निरभउ भए सगल भउ मिटिआ चरन कमल आधारै ॥ गुर कै बचनि जपिओ नाउ नानक प्रगट भइओ संसारै ॥२॥४५॥६८॥

(राग सारंग -- SGGS 1217) सारग महला ५ ॥
हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥ जिउ जानहु तिउ रखहु गुसाई पेखि जीवां परतापु ॥१॥ रहाउ ॥

गुर उपदेसि साध की संगति बिनसिओ सगल संतापु ॥ मित्र सत्र पेखि समतु बीचारिओ सगल स्मभाखन जापु ॥१॥

तपति बुझी सीतल आघाने सुनि अनहद बिसम भए बिसमाद ॥ अनदु भइआ नानक मनि साचा पूरन पूरे नाद ॥२॥४६॥६९॥

(राग सारंग -- SGGS 1218) सारग महला ५ ॥
मेरै गुरि मोरो सहसा उतारिआ ॥ तिसु गुर कै जाईऐ बलिहारी सदा सदा हउ वारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर का नामु जपिओ दिनु राती गुर के चरन मनि धारिआ ॥ गुर की धूरि करउ नित मजनु किलविख मैलु उतारिआ ॥१॥

गुर पूरे की करउ नित सेवा गुरु अपना नमसकारिआ ॥ सरब फला दीन्हे गुरि पूरै नानक गुरि निसतारिआ ॥२॥४७॥७०॥

(राग सारंग -- SGGS 1218) सारग महला ५ ॥
सिमरत नामु प्रान गति पावै ॥ मिटहि कलेस त्रास सभ नासै साधसंगि हितु लावै ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि हरि हरि मनि आराधे रसना हरि जसु गावै ॥ तजि अभिमानु काम क्रोधु निंदा बासुदेव रंगु लावै ॥१॥

दामोदर दइआल आराधहु गोबिंद करत सोहावै ॥ कहु नानक सभ की होइ रेना हरि हरि दरसि समावै ॥२॥४८॥७१॥

(राग सारंग -- SGGS 1218) सारग महला ५ ॥
अपुने गुर पूरे बलिहारै ॥ प्रगट प्रतापु कीओ नाम को राखे राखनहारै ॥१॥ रहाउ ॥

निरभउ कीए सेवक दास अपने सगले दूख बिदारै ॥ आन उपाव तिआगि जन सगले चरन कमल रिद धारै ॥१॥

प्रान अधार मीत साजन प्रभ एकै एकंकारै ॥ सभ ते ऊच ठाकुरु नानक का बार बार नमसकारै ॥२॥४९॥७२॥

(राग सारंग -- SGGS 1218) सारग महला ५ ॥
बिनु हरि है को कहा बतावहु ॥ सुख समूह करुणा मै करता तिसु प्रभ सदा धिआवहु ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै सूति परोए जंता तिसु प्रभ का जसु गावहु ॥ सिमरि ठाकुरु जिनि सभु किछु दीना आन कहा पहि जावहु ॥१॥

सफल सेवा सुआमी मेरे की मन बांछत फल पावहु ॥ कहु नानक लाभु लाहा लै चालहु सुख सेती घरि जावहु ॥२॥५०॥७३॥

(राग सारंग -- SGGS 1218) सारग महला ५ ॥
ठाकुर तुम्ह सरणाई आइआ ॥ उतरि गइओ मेरे मन का संसा जब ते दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनबोलत मेरी बिरथा जानी अपना नामु जपाइआ ॥ दुख नाठे सुख सहजि समाए अनद अनद गुण गाइआ ॥१॥

बाह पकरि कढि लीने अपुने ग्रिह अंध कूप ते माइआ ॥ कहु नानक गुरि बंधन काटे बिछुरत आनि मिलाइआ ॥२॥५१॥७४॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
हरि के नाम की गति ठांढी ॥ बेद पुरान सिम्रिति साधू जन खोजत खोजत काढी ॥१॥ रहाउ ॥

सिव बिरंच अरु इंद्र लोक ता महि जलतौ फिरिआ ॥ सिमरि सिमरि सुआमी भए सीतल दूखु दरदु भ्रमु हिरिआ ॥१॥

जो जो तरिओ पुरातनु नवतनु भगति भाइ हरि देवा ॥ नानक की बेनंती प्रभ जीउ मिलै संत जन सेवा ॥२॥५२॥७५॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
जिहवे अम्रित गुण हरि गाउ ॥ हरि हरि बोलि कथा सुनि हरि की उचरहु प्रभ को नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु रतन धनु संचहु मनि तनि लावहु भाउ ॥ आन बिभूत मिथिआ करि मानहु साचा इहै सुआउ ॥१॥

जीअ प्रान मुकति को दाता एकस सिउ लिव लाउ ॥ कहु नानक ता की सरणाई देत सगल अपिआउ ॥२॥५३॥७६॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
होती नही कवन कछु करणी ॥ इहै ओट पाई मिलि संतह गोपाल एक की सरणी ॥१॥ रहाउ ॥

पंच दोख छिद्र इआ तन महि बिखै बिआधि की करणी ॥ आस अपार दिनस गणि राखे ग्रसत जात बलु जरणी ॥१॥

अनाथह नाथ दइआल सुख सागर सरब दोख भै हरणी ॥ मनि बांछत चितवत नानक दास पेखि जीवा प्रभ चरणी ॥२॥५४॥७७॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
फीके हरि के नाम बिनु साद ॥ अम्रित रसु कीरतनु हरि गाईऐ अहिनिसि पूरन नाद ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरत सांति महा सुखु पाईऐ मिटि जाहि सगल बिखाद ॥ हरि हरि लाभु साधसंगि पाईऐ घरि लै आवहु लादि ॥१॥

सभ ते ऊच ऊच ते ऊचो अंतु नही मरजाद ॥ बरनि न साकउ नानक महिमा पेखि रहे बिसमाद ॥२॥५५॥७८॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
आइओ सुनन पड़न कउ बाणी ॥ नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥१॥ रहाउ ॥

समझु अचेत चेति मन मेरे कथी संतन अकथ कहाणी ॥ लाभु लैहु हरि रिदै अराधहु छुटकै आवण जाणी ॥१॥

उदमु सकति सिआणप तुम्हरी देहि त नामु वखाणी ॥ सेई भगत भगति से लागे नानक जो प्रभ भाणी ॥२॥५६॥७९॥

(राग सारंग -- SGGS 1219) सारग महला ५ ॥
धनवंत नाम के वणजारे ॥ सांझी करहु नाम धनु खाटहु गुर का सबदु वीचारे ॥१॥ रहाउ ॥

छोडहु कपटु होइ निरवैरा सो प्रभु संगि निहारे ॥ सचु धनु वणजहु सचु धनु संचहु कबहू न आवहु हारे ॥१॥

खात खरचत किछु निखुटत नाही अगनत भरे भंडारे ॥ कहु नानक सोभा संगि जावहु पारब्रहम कै दुआरे ॥२॥५७॥८०॥

(राग सारंग -- SGGS 1220) सारग महला ५ ॥
प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥ कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥ सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥१॥

कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥ साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥२॥५८॥८१॥

(राग सारंग -- SGGS 1220) सारग महला ५ ॥
आवै राम सरणि वडभागी ॥ एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥१॥ रहाउ ॥

मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥ अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥१॥

करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥ साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥२॥५९॥८२॥

(राग सारंग -- SGGS 1220) सारग महला ५ ॥
जा ते साधू सरणि गही ॥ सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥१॥ रहाउ ॥

होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥ आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥१॥

जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥ कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥२॥६०॥८३॥

(राग सारंग -- SGGS 1220) सारग महला ५ ॥
रसना राम को जसु गाउ ॥ आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥ साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥१॥

जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥ सासि सासि सम्हालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥२॥६१॥८४॥

(राग सारंग -- SGGS 1220) सारग महला ५ ॥
बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥ मुकति पदारथु साधू संगति अम्रितु हरि का नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥ आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥१॥

सोधत सोधत ततु बीचारिओ भगति सरेसट पूरी ॥ कहु नानक इक राम नाम बिनु अवर सगल बिधि ऊरी ॥२॥६२॥८५॥

(राग सारंग -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
साचे सतिगुरू दातारा ॥ दरसनु देखि सगल दुख नासहि चरन कमल बलिहारा ॥१॥ रहाउ ॥

सति परमेसरु सति साध जन निहचलु हरि का नाउ ॥ भगति भावनी पारब्रहम की अबिनासी गुण गाउ ॥१॥

अगमु अगोचरु मिति नही पाईऐ सगल घटा आधारु ॥ नानक वाहु वाहु कहु ता कउ जा का अंतु न पारु ॥२॥६३॥८६॥

(राग सारंग -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
गुर के चरन बसे मन मेरै ॥ पूरि रहिओ ठाकुरु सभ थाई निकटि बसै सभ नेरै ॥१॥ रहाउ ॥

बंधन तोरि राम लिव लाई संतसंगि बनि आई ॥ जनमु पदारथु भइओ पुनीता इछा सगल पुजाई ॥१॥

जा कउ क्रिपा करहु प्रभ मेरे सो हरि का जसु गावै ॥ आठ पहर गोबिंद गुन गावै जनु नानकु सद बलि जावै ॥२॥६४॥८७॥

(राग सारंग -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
जीवनु तउ गनीऐ हरि पेखा ॥ करहु क्रिपा प्रीतम मनमोहन फोरि भरम की रेखा ॥१॥ रहाउ ॥

कहत सुनत किछु सांति न उपजत बिनु बिसास किआ सेखां ॥ प्रभू तिआगि आन जो चाहत ता कै मुखि लागै कालेखा ॥१॥

जा कै रासि सरब सुख सुआमी आन न मानत भेखा ॥ नानक दरस मगन मनु मोहिओ पूरन अरथ बिसेखा ॥२॥६५॥८८॥

(राग सारंग -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
सिमरन राम को इकु नाम ॥ कलमल दगध होहि खिन अंतरि कोटि दान इसनान ॥१॥ रहाउ ॥

आन जंजार ब्रिथा स्रमु घालत बिनु हरि फोकट गिआन ॥ जनम मरन संकट ते छूटै जगदीस भजन सुख धिआन ॥१॥

तेरी सरनि पूरन सुख सागर करि किरपा देवहु दान ॥ सिमरि सिमरि नानक प्रभ जीवै बिनसि जाइ अभिमान ॥२॥६६॥८९॥

(राग सारंग -- SGGS 1221) सारग महला ५ ॥
धूरतु सोई जि धुर कउ लागै ॥ सोई धुरंधरु सोई बसुंधरु हरि एक प्रेम रस पागै ॥१॥ रहाउ ॥

बलबंच करै न जानै लाभै सो धूरतु नही मूड़्हा ॥ सुआरथु तिआगि असारथि रचिओ नह सिमरै प्रभु रूड़ा ॥१॥

सोई चतुरु सिआणा पंडितु सो सूरा सो दानां ॥ साधसंगि जिनि हरि हरि जपिओ नानक सो परवाना ॥२॥६७॥९०॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि हरि संत जना की जीवनि ॥ बिखै रस भोग अम्रित सुख सागर राम नाम रसु पीवनि ॥१॥ रहाउ ॥

संचनि राम नाम धनु रतना मन तन भीतरि सीवनि ॥ हरि रंग रांग भए मन लाला राम नाम रस खीवनि ॥१॥

जिउ मीना जल सिउ उरझानो राम नाम संगि लीवनि ॥ नानक संत चात्रिक की निआई हरि बूंद पान सुख थीवनि ॥२॥६८॥९१॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन बेताल ॥ जेता करन करावन तेता सभि बंधन जंजाल ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु प्रभ सेव करत अन सेवा बिरथा काटै काल ॥ जब जमु आइ संघारै प्रानी तब तुमरो कउनु हवाल ॥१॥

राखि लेहु दास अपुने कउ सदा सदा किरपाल ॥ सुख निधान नानक प्रभु मेरा साधसंगि धन माल ॥२॥६९॥९२॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
मनि तनि राम को बिउहारु ॥ प्रेम भगति गुन गावन गीधे पोहत नह संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवणी कीरतनु सिमरनु सुआमी इहु साध को आचारु ॥ चरन कमल असथिति रिद अंतरि पूजा प्रान को आधारु ॥१॥

प्रभ दीन दइआल सुनहु बेनंती किरपा अपनी धारु ॥ नामु निधानु उचरउ नित रसना नानक सद बलिहारु ॥२॥७०॥९३॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
हरि के नामहीन मति थोरी ॥ सिमरत नाहि सिरीधर ठाकुर मिलत अंध दुख घोरी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के नाम सिउ प्रीति न लागी अनिक भेख बहु जोरी ॥ तूटत बार न लागै ता कउ जिउ गागरि जल फोरी ॥१॥

करि किरपा भगति रसु दीजै मनु खचित प्रेम रस खोरी ॥ नानक दास तेरी सरणाई प्रभ बिनु आन न होरी ॥२॥७१॥९४॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
चितवउ वा अउसर मन माहि ॥ होइ इकत्र मिलहु संत साजन गुण गोबिंद नित गाहि ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु हरि भजन जेते काम करीअहि तेते बिरथे जांहि ॥ पूरन परमानंद मनि मीठो तिसु बिनु दूसर नाहि ॥१॥

जप तप संजम करम सुख साधन तुलि न कछूऐ लाहि ॥ चरन कमल नानक मनु बेधिओ चरनह संगि समाहि ॥२॥७२॥९५॥

(राग सारंग -- SGGS 1222) सारग महला ५ ॥
मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥ आगै कुसल पाछै खेम सूखा सिमरत नामु सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

साजन मीत सखा हरि मेरै गुन गोपाल हरि राइआ ॥ बिसरि न जाई निमख हिरदै ते पूरै गुरू मिलाइआ ॥१॥

करि किरपा राखे दास अपने जीअ जंत वसि जा कै ॥ एका लिव पूरन परमेसुर भउ नही नानक ता कै ॥२॥७३॥९६॥

(राग सारंग -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
जा कै राम को बलु होइ ॥ सगल मनोरथ पूरन ताहू के दूखु न बिआपै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

जो जनु भगतु दासु निजु प्रभ का सुणि जीवां तिसु सोइ ॥ उदमु करउ दरसनु पेखन कौ करमि परापति होइ ॥१॥

गुर परसादी द्रिसटि निहारउ दूसर नाही कोइ ॥ दानु देहि नानक अपने कउ चरन जीवां संत धोइ ॥२॥७४॥९७॥

(राग सारंग -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
जीवतु राम के गुण गाइ ॥ करहु क्रिपा गोपाल बीठुले बिसरि न कब ही जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु धनु सभु तुमरा सुआमी आन न दूजी जाइ ॥ जिउ तू राखहि तिव ही रहणा तुम्हरा पैन्है खाइ ॥१॥

साधसंगति कै बलि बलि जाई बहुड़ि न जनमा धाइ ॥ नानक दास तेरी सरणाई जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥७५॥९८॥

(राग सारंग -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
मन रे नाम को सुख सार ॥ आन काम बिकार माइआ सगल दीसहि छार ॥१॥ रहाउ ॥

ग्रिहि अंध कूप पतित प्राणी नरक घोर गुबार ॥ अनिक जोनी भ्रमत हारिओ भ्रमत बारं बार ॥१॥

पतित पावन भगति बछल दीन किरपा धार ॥ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै साधसंगि उधार ॥२॥७६॥९९॥

(राग सारंग -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
बिराजित राम को परताप ॥ आधि बिआधि उपाधि सभ नासी बिनसे तीनै ताप ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिसना बुझी पूरन सभ आसा चूके सोग संताप ॥ गुण गावत अचुत अबिनासी मन तन आतम ध्राप ॥१॥

काम क्रोध लोभ मद मतसर साधू कै संगि खाप ॥ भगति वछल भै काटनहारे नानक के माई बाप ॥२॥७७॥१००॥

(राग सारंग -- SGGS 1223) सारग महला ५ ॥
आतुरु नाम बिनु संसार ॥ त्रिपति न होवत कूकरी आसा इतु लागो बिखिआ छार ॥१॥ रहाउ ॥

पाइ ठगउरी आपि भुलाइओ जनमत बारो बार ॥ हरि का सिमरनु निमख न सिमरिओ जमकंकर करत खुआर ॥१॥

होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन तेरिआ संतह की रावार ॥ नानक दासु दरसु प्रभ जाचै मन तन को आधार ॥२॥७८॥१०१॥

(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
मैला हरि के नाम बिनु जीउ ॥ तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम भ्रमतौ बहु भांती थिति नही कतहू पाई ॥ पूरा सतिगुरु सहजि न भेटिआ साकतु आवै जाई ॥१॥

राखि लेहु प्रभ सम्रिथ दाते तुम प्रभ अगम अपार ॥ नानक दास तेरी सरणाई भवजलु उतरिओ पार ॥२॥७९॥१०२॥

(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
रमण कउ राम के गुण बाद ॥ साधसंगि धिआईऐ परमेसरु अम्रित जा के सुआद ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरत एकु अचुत अबिनासी बिनसे माइआ माद ॥ सहज अनद अनहद धुनि बाणी बहुरि न भए बिखाद ॥१॥

सनकादिक ब्रहमादिक गावत गावत सुक प्रहिलाद ॥ पीवत अमिउ मनोहर हरि रसु जपि नानक हरि बिसमाद ॥२॥८०॥१०३॥

(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
कीन्हे पाप के बहु कोट ॥ दिनसु रैनी थकत नाही कतहि नाही छोट ॥१॥ रहाउ ॥

महा बजर बिख बिआधी सिरि उठाई पोट ॥ उघरि गईआं खिनहि भीतरि जमहि ग्रासे झोट ॥१॥

पसु परेत उसट गरधभ अनिक जोनी लेट ॥ भजु साधसंगि गोबिंद नानक कछु न लागै फेट ॥२॥८१॥१०४॥

(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥ नैन स्रवन सरीरु सभु हुटिओ सासु गइओ तत घाट ॥१॥ रहाउ ॥

अनाथ रञाणि उदरु ले पोखहि माइआ गईआ हाटि ॥ किलबिख करत करत पछुतावहि कबहु न साकहि छांटि ॥१॥

निंदकु जमदूती आइ संघारिओ देवहि मूंड उपरि मटाक ॥ नानक आपन कटारी आपस कउ लाई मनु अपना कीनो फाट ॥२॥८२॥१०५॥

(राग सारंग -- SGGS 1224) सारग महला ५ ॥
टूटी निंदक की अध बीच ॥ जन का राखा आपि सुआमी बेमुख कउ आइ पहूची मीच ॥१॥ रहाउ ॥

उस का कहिआ कोइ न सुणई कही न बैसणु पावै ॥ ईहां दुखु आगै नरकु भुंचै बहु जोनी भरमावै ॥१॥

प्रगटु भइआ खंडी ब्रहमंडी कीता अपणा पाइआ ॥ नानक सरणि निरभउ करते की अनद मंगल गुण गाइआ ॥२॥८३॥१०६॥


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