Pt 39 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 39 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग भैरउ -- SGGS 1149) भैरउ महला ५ ॥
करण कारण समरथु गुरु मेरा ॥ जीअ प्राण सुखदाता नेरा ॥ भै भंजन अबिनासी राइ ॥ दरसनि देखिऐ सभु दुखु जाइ ॥१॥

जत कत पेखउ तेरी सरणा ॥ बलि बलि जाई सतिगुर चरणा ॥१॥ रहाउ ॥

पूरन काम मिले गुरदेव ॥ सभि फलदाता निरमल सेव ॥ करु गहि लीने अपुने दास ॥ राम नामु रिद दीओ निवास ॥२॥

सदा अनंदु नाही किछु सोगु ॥ दूखु दरदु नह बिआपै रोगु ॥ सभु किछु तेरा तू करणैहारु ॥ पारब्रहम गुर अगम अपार ॥३॥

निरमल सोभा अचरज बाणी ॥ पारब्रहम पूरन मनि भाणी ॥ जलि थलि महीअलि रविआ सोइ ॥ नानक सभु किछु प्रभ ते होइ ॥४॥३४॥४७॥

(राग भैरउ -- SGGS 1149) भैरउ महला ५ ॥
मनु तनु राता राम रंगि चरणे ॥ सरब मनोरथ पूरन करणे ॥ आठ पहर गावत भगवंतु ॥ सतिगुरि दीनो पूरा मंतु ॥१॥

सो वडभागी जिसु नामि पिआरु ॥ तिस कै संगि तरै संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

सोई गिआनी जि सिमरै एक ॥ सो धनवंता जिसु बुधि बिबेक ॥ सो कुलवंता जि सिमरै सुआमी ॥ सो पतिवंता जि आपु पछानी ॥२॥

गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥ गुण गोपाल दिनु रैनि धिआइआ ॥ तूटे बंधन पूरन आसा ॥ हरि के चरण रिद माहि निवासा ॥३॥

कहु नानक जा के पूरन करमा ॥ सो जनु आइआ प्रभ की सरना ॥ आपि पवितु पावन सभि कीने ॥ राम रसाइणु रसना चीन्हे ॥४॥३५॥४८॥

(राग भैरउ -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
नामु लैत किछु बिघनु न लागै ॥ नामु सुणत जमु दूरहु भागै ॥ नामु लैत सभ दूखह नासु ॥ नामु जपत हरि चरण निवासु ॥१॥

निरबिघन भगति भजु हरि हरि नाउ ॥ रसकि रसकि हरि के गुण गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि सिमरत किछु चाखु न जोहै ॥ हरि सिमरत दैत देउ न पोहै ॥ हरि सिमरत मोहु मानु न बधै ॥ हरि सिमरत गरभ जोनि न रुधै ॥२॥

हरि सिमरन की सगली बेला ॥ हरि सिमरनु बहु माहि इकेला ॥ जाति अजाति जपै जनु कोइ ॥ जो जापै तिस की गति होइ ॥३॥

हरि का नामु जपीऐ साधसंगि ॥ हरि के नाम का पूरन रंगु ॥ नानक कउ प्रभ किरपा धारि ॥ सासि सासि हरि देहु चितारि ॥४॥३६॥४९॥

(राग भैरउ -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
आपे सासतु आपे बेदु ॥ आपे घटि घटि जाणै भेदु ॥ जोति सरूप जा की सभ वथु ॥ करण कारण पूरन समरथु ॥१॥

प्रभ की ओट गहहु मन मेरे ॥ चरन कमल गुरमुखि आराधहु दुसमन दूखु न आवै नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

आपे वणु त्रिणु त्रिभवण सारु ॥ जा कै सूति परोइआ संसारु ॥ आपे सिव सकती संजोगी ॥ आपि निरबाणी आपे भोगी ॥२॥

जत कत पेखउ तत तत सोइ ॥ तिसु बिनु दूजा नाही कोइ ॥ सागरु तरीऐ नाम कै रंगि ॥ गुण गावै नानकु साधसंगि ॥३॥

मुकति भुगति जुगति वसि जा कै ॥ ऊणा नाही किछु जन ता कै ॥ करि किरपा जिसु होइ सुप्रसंन ॥ नानक दास सेई जन धंन ॥४॥३७॥५०॥

(राग भैरउ -- SGGS 1150) भैरउ महला ५ ॥
भगता मनि आनंदु गोबिंद ॥ असथिति भए बिनसी सभ चिंद ॥ भै भ्रम बिनसि गए खिन माहि ॥ पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥१॥

राम राम संत सदा सहाइ ॥ घरि बाहरि नाले परमेसरु रवि रहिआ पूरन सभ ठाइ ॥१॥ रहाउ ॥

धनु मालु जोबनु जुगति गोपाल ॥ जीअ प्राण नित सुख प्रतिपाल ॥ अपने दास कउ दे राखै हाथ ॥ निमख न छोडै सद ही साथ ॥२॥

हरि सा प्रीतमु अवरु न कोइ ॥ सारि सम्हाले साचा सोइ ॥ मात पिता सुत बंधु नराइणु ॥ आदि जुगादि भगत गुण गाइणु ॥३॥

तिस की धर प्रभ का मनि जोरु ॥ एक बिना दूजा नही होरु ॥ नानक कै मनि इहु पुरखारथु ॥ प्रभू हमारा सारे सुआरथु ॥४॥३८॥५१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥ सगल बिआधि मिटी त्रिहु गुण की दास के होए पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के लोक सदा गुण गावहि तिन कउ मिलिआ पूरन धाम ॥ जन का दरसु बांछै दिन राती होइ पुनीत धरम राइ जाम ॥१॥

काम क्रोध लोभ मद निंदा साधसंगि मिटिआ अभिमान ॥ ऐसे संत भेटहि वडभागी नानक तिन कै सद कुरबान ॥२॥३९॥५२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
पंच मजमी जो पंचन राखै ॥ मिथिआ रसना नित उठि भाखै ॥ चक्र बणाइ करै पाखंड ॥ झुरि झुरि पचै जैसे त्रिअ रंड ॥१॥

हरि के नाम बिना सभ झूठु ॥ बिनु गुर पूरे मुकति न पाईऐ साची दरगहि साकत मूठु ॥१॥ रहाउ ॥

सोई कुचीलु कुदरति नही जानै ॥ लीपिऐ थाइ न सुचि हरि मानै ॥ अंतरु मैला बाहरु नित धोवै ॥ साची दरगहि अपनी पति खोवै ॥२॥

माइआ कारणि करै उपाउ ॥ कबहि न घालै सीधा पाउ ॥ जिनि कीआ तिसु चीति न आणै ॥ कूड़ी कूड़ी मुखहु वखाणै ॥३॥

जिस नो करमु करे करतारु ॥ साधसंगि होइ तिसु बिउहारु ॥ हरि नाम भगति सिउ लागा रंगु ॥ कहु नानक तिसु जन नही भंगु ॥४॥४०॥५३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1151) भैरउ महला ५ ॥
निंदक कउ फिटके संसारु ॥ निंदक का झूठा बिउहारु ॥ निंदक का मैला आचारु ॥ दास अपुने कउ राखनहारु ॥१॥

निंदकु मुआ निंदक कै नालि ॥ पारब्रहम परमेसरि जन राखे निंदक कै सिरि कड़किओ कालु ॥१॥ रहाउ ॥

निंदक का कहिआ कोइ न मानै ॥ निंदक झूठु बोलि पछुताने ॥ हाथ पछोरहि सिरु धरनि लगाहि ॥ निंदक कउ दई छोडै नाहि ॥२॥

हरि का दासु किछु बुरा न मागै ॥ निंदक कउ लागै दुख सांगै ॥ बगुले जिउ रहिआ पंख पसारि ॥ मुख ते बोलिआ तां कढिआ बीचारि ॥३॥

अंतरजामी करता सोइ ॥ हरि जनु करै सु निहचलु होइ ॥ हरि का दासु साचा दरबारि ॥ जन नानक कहिआ ततु बीचारि ॥४॥४१॥५४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1152) भैरउ महला ५ ॥
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥ जीउ पिंडु धनु तिस की रासि ॥ सोई मेरा सुआमी करनैहारु ॥ कोटि बार जाई बलिहार ॥१॥

साधू धूरि पुनीत करी ॥ मन के बिकार मिटहि प्रभ सिमरत जनम जनम की मैलु हरी ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै ग्रिह महि सगल निधान ॥ जा की सेवा पाईऐ मानु ॥ सगल मनोरथ पूरनहार ॥ जीअ प्रान भगतन आधार ॥२॥

घट घट अंतरि सगल प्रगास ॥ जपि जपि जीवहि भगत गुणतास ॥ जा की सेव न बिरथी जाइ ॥ मन तन अंतरि एकु धिआइ ॥३॥

गुर उपदेसि दइआ संतोखु ॥ नामु निधानु निरमलु इहु थोकु ॥ करि किरपा लीजै लड़ि लाइ ॥ चरन कमल नानक नित धिआइ ॥४॥४२॥५५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1152) भैरउ महला ५ ॥
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥ कारजु आइआ सगला रासि ॥ मन तन अंतरि प्रभू धिआइआ ॥ गुर पूरे डरु सगल चुकाइआ ॥१॥

सभ ते वड समरथ गुरदेव ॥ सभि सुख पाई तिस की सेव ॥ रहाउ ॥ जा का कीआ सभु किछु होइ ॥ तिस का अमरु न मेटै कोइ ॥ पारब्रहमु परमेसरु अनूपु ॥ सफल मूरति गुरु तिस का रूपु ॥२॥

जा कै अंतरि बसै हरि नामु ॥ जो जो पेखै सु ब्रहम गिआनु ॥ बीस बिसुए जा कै मनि परगासु ॥ तिसु जन कै पारब्रहम का निवासु ॥३॥

तिसु गुर कउ सद करी नमसकार ॥ तिसु गुर कउ सद जाउ बलिहार ॥ सतिगुर के चरन धोइ धोइ पीवा ॥ गुर नानक जपि जपि सद जीवा ॥४॥४३॥५६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1153) रागु भैरउ महला ५ पड़ताल घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
परतिपाल प्रभ क्रिपाल कवन गुन गनी ॥ अनिक रंग बहु तरंग सरब को धनी ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक गिआन अनिक धिआन अनिक जाप जाप ताप ॥ अनिक गुनित धुनित ललित अनिक धार मुनी ॥१॥

अनिक नाद अनिक बाज निमख निमख अनिक स्वाद अनिक दोख अनिक रोग मिटहि जस सुनी ॥ नानक सेव अपार देव तटह खटह बरत पूजा गवन भवन जात्र करन सगल फल पुनी ॥२॥१॥५७॥८॥२१॥७॥५७॥९३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1155) भैरउ महला ५ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु पूरे काजा ॥ जिसु नामु रिदै तिनि कोटि धन पाए ॥ नाम बिना जनमु बिरथा जाए ॥१॥

तिसु सालाही जिसु हरि धनु रासि ॥ सो वडभागी जिसु गुर मसतकि हाथु ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु नामु रिदै तिसु कोट कई सैना ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सहज सुखैना ॥ जिसु नामु रिदै सो सीतलु हूआ ॥ नाम बिना ध्रिगु जीवणु मूआ ॥२॥

जिसु नामु रिदै सो जीवन मुकता ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सभ ही जुगता ॥ जिसु नामु रिदै तिनि नउ निधि पाई ॥ नाम बिना भ्रमि आवै जाई ॥३॥

जिसु नामु रिदै सो वेपरवाहा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सद ही लाहा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु वड परवारा ॥ नाम बिना मनमुख गावारा ॥४॥

जिसु नामु रिदै तिसु निहचल आसनु ॥ जिसु नामु रिदै तिसु तखति निवासनु ॥ जिसु नामु रिदै सो साचा साहु ॥ नामहीण नाही पति वेसाहु ॥५॥

जिसु नामु रिदै सो सभ महि जाता ॥ जिसु नामु रिदै सो पुरखु बिधाता ॥ जिसु नामु रिदै सो सभ ते ऊचा ॥ नाम बिना भ्रमि जोनी मूचा ॥६॥

जिसु नामु रिदै तिसु प्रगटि पहारा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु मिटिआ अंधारा ॥ जिसु नामु रिदै सो पुरखु परवाणु ॥ नाम बिना फिरि आवण जाणु ॥७॥

तिनि नामु पाइआ जिसु भइओ क्रिपाल ॥ साधसंगति महि लखे गोपाल ॥ आवण जाण रहे सुखु पाइआ ॥ कहु नानक ततै ततु मिलाइआ ॥८॥१॥४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1156) भैरउ महला ५ ॥
कोटि बिसन कीने अवतार ॥ कोटि ब्रहमंड जा के ध्रमसाल ॥ कोटि महेस उपाइ समाए ॥ कोटि ब्रहमे जगु साजण लाए ॥१॥

ऐसो धणी गुविंदु हमारा ॥ बरनि न साकउ गुण बिसथारा ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि माइआ जा कै सेवकाइ ॥ कोटि जीअ जा की सिहजाइ ॥ कोटि उपारजना तेरै अंगि ॥ कोटि भगत बसत हरि संगि ॥२॥

कोटि छत्रपति करत नमसकार ॥ कोटि इंद्र ठाढे है दुआर ॥ कोटि बैकुंठ जा की द्रिसटी माहि ॥ कोटि नाम जा की कीमति नाहि ॥३॥

कोटि पूरीअत है जा कै नाद ॥ कोटि अखारे चलित बिसमाद ॥ कोटि सकति सिव आगिआकार ॥ कोटि जीअ देवै आधार ॥४॥

कोटि तीरथ जा के चरन मझार ॥ कोटि पवित्र जपत नाम चार ॥ कोटि पूजारी करते पूजा ॥ कोटि बिसथारनु अवरु न दूजा ॥५॥

कोटि महिमा जा की निरमल हंस ॥ कोटि उसतति जा की करत ब्रहमंस ॥ कोटि परलउ ओपति निमख माहि ॥ कोटि गुणा तेरे गणे न जाहि ॥६॥

कोटि गिआनी कथहि गिआनु ॥ कोटि धिआनी धरत धिआनु ॥ कोटि तपीसर तप ही करते ॥ कोटि मुनीसर मोनि महि रहते ॥७॥

अविगत नाथु अगोचर सुआमी ॥ पूरि रहिआ घट अंतरजामी ॥ जत कत देखउ तेरा वासा ॥ नानक कउ गुरि कीओ प्रगासा ॥८॥२॥५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1157) भैरउ महला ५ ॥
सतिगुरि मो कउ कीनो दानु ॥ अमोल रतनु हरि दीनो नामु ॥ सहज बिनोद चोज आनंता ॥ नानक कउ प्रभु मिलिओ अचिंता ॥१॥

कहु नानक कीरति हरि साची ॥ बहुरि बहुरि तिसु संगि मनु राची ॥१॥ रहाउ ॥

अचिंत हमारै भोजन भाउ ॥ अचिंत हमारै लीचै नाउ ॥ अचिंत हमारै सबदि उधार ॥ अचिंत हमारै भरे भंडार ॥२॥

अचिंत हमारै कारज पूरे ॥ अचिंत हमारै लथे विसूरे ॥ अचिंत हमारै बैरी मीता ॥ अचिंतो ही इहु मनु वसि कीता ॥३॥

अचिंत प्रभू हम कीआ दिलासा ॥ अचिंत हमारी पूरन आसा ॥ अचिंत हम्हा कउ सगल सिधांतु ॥ अचिंतु हम कउ गुरि दीनो मंतु ॥४॥

अचिंत हमारे बिनसे बैर ॥ अचिंत हमारे मिटे अंधेर ॥ अचिंतो ही मनि कीरतनु मीठा ॥ अचिंतो ही प्रभु घटि घटि डीठा ॥५॥

अचिंत मिटिओ है सगलो भरमा ॥ अचिंत वसिओ मनि सुख बिस्रामा ॥ अचिंत हमारै अनहत वाजै ॥ अचिंत हमारै गोबिंदु गाजै ॥६॥

अचिंत हमारै मनु पतीआना ॥ निहचल धनी अचिंतु पछाना ॥ अचिंतो उपजिओ सगल बिबेका ॥ अचिंत चरी हथि हरि हरि टेका ॥७॥

अचिंत प्रभू धुरि लिखिआ लेखु ॥ अचिंत मिलिओ प्रभु ठाकुरु एकु ॥ चिंत अचिंता सगली गई ॥ प्रभ नानक नानक नानक मई ॥८॥३॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1160) महला ५ ॥
जो पाथर कउ कहते देव ॥ ता की बिरथा होवै सेव ॥ जो पाथर की पांई पाइ ॥ तिस की घाल अजांई जाइ ॥१॥

ठाकुरु हमरा सद बोलंता ॥ सरब जीआ कउ प्रभु दानु देता ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि देउ न जानै अंधु ॥ भ्रम का मोहिआ पावै फंधु ॥ न पाथरु बोलै ना किछु देइ ॥ फोकट करम निहफल है सेव ॥२॥

जे मिरतक कउ चंदनु चड़ावै ॥ उस ते कहहु कवन फल पावै ॥ जे मिरतक कउ बिसटा माहि रुलाई ॥ तां मिरतक का किआ घटि जाई ॥३॥

कहत कबीर हउ कहउ पुकारि ॥ समझि देखु साकत गावार ॥ दूजै भाइ बहुतु घर गाले ॥ राम भगत है सदा सुखाले ॥४॥४॥१२॥

(राग बसंत -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ घरु १ दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सेवउ करि नमसकार ॥ आजु हमारै मंगलचार ॥ आजु हमारै महा अनंद ॥ चिंत लथी भेटे गोबिंद ॥१॥

आजु हमारै ग्रिहि बसंत ॥ गुन गाए प्रभ तुम्ह बेअंत ॥१॥ रहाउ ॥

आजु हमारै बने फाग ॥ प्रभ संगी मिलि खेलन लाग ॥ होली कीनी संत सेव ॥ रंगु लागा अति लाल देव ॥२॥

मनु तनु मउलिओ अति अनूप ॥ सूकै नाही छाव धूप ॥ सगली रूती हरिआ होइ ॥ सद बसंत गुर मिले देव ॥३॥

बिरखु जमिओ है पारजात ॥ फूल लगे फल रतन भांति ॥ त्रिपति अघाने हरि गुणह गाइ ॥ जन नानक हरि हरि हरि धिआइ ॥४॥१॥

(राग बसंत -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ ॥
हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥ जूआरी जूए माहि चीतु ॥ अमली जीवै अमलु खाइ ॥ तिउ हरि जनु जीवै हरि धिआइ ॥१॥

अपनै रंगि सभु को रचै ॥ जितु प्रभि लाइआ तितु तितु लगै ॥१॥ रहाउ ॥

मेघ समै मोर निरतिकार ॥ चंद देखि बिगसहि कउलार ॥ माता बारिक देखि अनंद ॥ तिउ हरि जन जीवहि जपि गोबिंद ॥२॥

सिंघ रुचै सद भोजनु मास ॥ रणु देखि सूरे चित उलास ॥ किरपन कउ अति धन पिआरु ॥ हरि जन कउ हरि हरि आधारु ॥३॥

सरब रंग इक रंग माहि ॥ सरब सुखा सुख हरि कै नाइ ॥ तिसहि परापति इहु निधानु ॥ नानक गुरु जिसु करे दानु ॥४॥२॥

(राग बसंत -- SGGS 1180) बसंतु महला ५ ॥
तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥ तिसु बसंतु जिसु गुरु दइआलु ॥ मंगलु तिस कै जिसु एकु कामु ॥ तिसु सद बसंतु जिसु रिदै नामु ॥१॥

ग्रिहि ता के बसंतु गनी ॥ जा कै कीरतनु हरि धुनी ॥१॥ रहाउ ॥

प्रीति पारब्रहम मउलि मना ॥ गिआनु कमाईऐ पूछि जनां ॥ सो तपसी जिसु साधसंगु ॥ सद धिआनी जिसु गुरहि रंगु ॥२॥

से निरभउ जिन्ह भउ पइआ ॥ सो सुखीआ जिसु भ्रमु गइआ ॥ सो इकांती जिसु रिदा थाइ ॥ सोई निहचलु साच ठाइ ॥३॥

एका खोजै एक प्रीति ॥ दरसन परसन हीत चीति ॥ हरि रंग रंगा सहजि माणु ॥ नानक दास तिसु जन कुरबाणु ॥४॥३॥

(राग बसंत -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
जीअ प्राण तुम्ह पिंड दीन्ह ॥ मुगध सुंदर धारि जोति कीन्ह ॥ सभि जाचिक प्रभ तुम्ह दइआल ॥ नामु जपत होवत निहाल ॥१॥

मेरे प्रीतम कारण करण जोग ॥ हउ पावउ तुम ते सगल थोक ॥१॥ रहाउ ॥

नामु जपत होवत उधार ॥ नामु जपत सुख सहज सार ॥ नामु जपत पति सोभा होइ ॥ नामु जपत बिघनु नाही कोइ ॥२॥

जा कारणि इह दुलभ देह ॥ सो बोलु मेरे प्रभू देहि ॥ साधसंगति महि इहु बिस्रामु ॥ सदा रिदै जपी प्रभ तेरो नामु ॥३॥

तुझ बिनु दूजा कोइ नाहि ॥ सभु तेरो खेलु तुझ महि समाहि ॥ जिउ भावै तिउ राखि ले ॥ सुखु नानक पूरा गुरु मिले ॥४॥४॥

(राग बसंत -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥ जिसहि देखि हउ जीवा माइ ॥ जा कै सिमरनि दुखु न होइ ॥ करि दइआ मिलावहु तिसहि मोहि ॥१॥

मेरे प्रीतम प्रान अधार मन ॥ जीउ प्रान सभु तेरो धन ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ खोजहि सुरि नर देव ॥ मुनि जन सेख न लहहि भेव ॥ जा की गति मिति कही न जाइ ॥ घटि घटि घटि घटि रहिआ समाइ ॥२॥

जा के भगत आनंद मै ॥ जा के भगत कउ नाही खै ॥ जा के भगत कउ नाही भै ॥ जा के भगत कउ सदा जै ॥३॥

कउन उपमा तेरी कही जाइ ॥ सुखदाता प्रभु रहिओ समाइ ॥ नानकु जाचै एकु दानु ॥ करि किरपा मोहि देहु नामु ॥४॥५॥

(राग बसंत -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥ साधसंगति तिउ हउमै छूट ॥ जैसी दासे धीर मीर ॥ तैसे उधारन गुरह पीर ॥१॥

तुम दाते प्रभ देनहार ॥ निमख निमख तिसु नमसकार ॥१॥ रहाउ ॥

जिसहि परापति साधसंगु ॥ तिसु जन लागा पारब्रहम रंगु ॥ ते बंधन ते भए मुकति ॥ भगत अराधहि जोग जुगति ॥२॥

नेत्र संतोखे दरसु पेखि ॥ रसना गाए गुण अनेक ॥ त्रिसना बूझी गुर प्रसादि ॥ मनु आघाना हरि रसहि सुआदि ॥३॥

सेवकु लागो चरण सेव ॥ आदि पुरख अपर्मपर देव ॥ सगल उधारण तेरो नामु ॥ नानक पाइओ इहु निधानु ॥४॥६॥

(राग बसंत -- SGGS 1181) बसंतु महला ५ ॥
तुम बड दाते दे रहे ॥ जीअ प्राण महि रवि रहे ॥ दीने सगले भोजन खान ॥ मोहि निरगुन इकु गुनु न जान ॥१॥

हउ कछू न जानउ तेरी सार ॥ तू करि गति मेरी प्रभ दइआर ॥१॥ रहाउ ॥

जाप न ताप न करम कीति ॥ आवै नाही कछू रीति ॥ मन महि राखउ आस एक ॥ नाम तेरे की तरउ टेक ॥२॥

सरब कला प्रभ तुम्ह प्रबीन ॥ अंतु न पावहि जलहि मीन ॥ अगम अगम ऊचह ते ऊच ॥ हम थोरे तुम बहुत मूच ॥३॥

जिन तू धिआइआ से गनी ॥ जिन तू पाइआ से धनी ॥ जिनि तू सेविआ सुखी से ॥ संत सरणि नानक परे ॥४॥७॥

(राग बसंत -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥ तिसु अराधि जिनि जीउ दीआ ॥ तिस का चाकरु होहि फिरि डानु न लागै ॥ तिस की करि पोतदारी फिरि दूखु न लागै ॥१॥

एवड भाग होहि जिसु प्राणी ॥ सो पाए इहु पदु निरबाणी ॥१॥ रहाउ ॥

दूजी सेवा जीवनु बिरथा ॥ कछू न होई है पूरन अरथा ॥ माणस सेवा खरी दुहेली ॥ साध की सेवा सदा सुहेली ॥२॥

जे लोड़हि सदा सुखु भाई ॥ साधू संगति गुरहि बताई ॥ ऊहा जपीऐ केवल नाम ॥ साधू संगति पारगराम ॥३॥

सगल तत महि ततु गिआनु ॥ सरब धिआन महि एकु धिआनु ॥ हरि कीरतन महि ऊतम धुना ॥ नानक गुर मिलि गाइ गुना ॥४॥८॥

(राग बसंत -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥ जिसु सिमरत निरमल है सोइ ॥ जिसु अराधे जमु किछु न कहै ॥ जिस की सेवा सभु किछु लहै ॥१॥

राम राम बोलि राम राम ॥ तिआगहु मन के सगल काम ॥१॥ रहाउ ॥

जिस के धारे धरणि अकासु ॥ घटि घटि जिस का है प्रगासु ॥ जिसु सिमरत पतित पुनीत होइ ॥ अंत कालि फिरि फिरि न रोइ ॥२॥

सगल धरम महि ऊतम धरम ॥ करम करतूति कै ऊपरि करम ॥ जिस कउ चाहहि सुरि नर देव ॥ संत सभा की लगहु सेव ॥३॥

आदि पुरखि जिसु कीआ दानु ॥ तिस कउ मिलिआ हरि निधानु ॥ तिस की गति मिति कही न जाइ ॥ नानक जन हरि हरि धिआइ ॥४॥९॥

(राग बसंत -- SGGS 1182) बसंतु महला ५ ॥
मन तन भीतरि लागी पिआस ॥ गुरि दइआलि पूरी मेरी आस ॥ किलविख काटे साधसंगि ॥ नामु जपिओ हरि नाम रंगि ॥१॥

गुर परसादि बसंतु बना ॥ चरन कमल हिरदै उरि धारे सदा सदा हरि जसु सुना ॥१॥ रहाउ ॥

समरथ सुआमी कारण करण ॥ मोहि अनाथ प्रभ तेरी सरण ॥ जीअ जंत तेरे आधारि ॥ करि किरपा प्रभ लेहि निसतारि ॥२॥

भव खंडन दुख नास देव ॥ सुरि नर मुनि जन ता की सेव ॥ धरणि अकासु जा की कला माहि ॥ तेरा दीआ सभि जंत खाहि ॥३॥

अंतरजामी प्रभ दइआल ॥ अपणे दास कउ नदरि निहालि ॥ करि किरपा मोहि देहु दानु ॥ जपि जीवै नानकु तेरो नामु ॥४॥१०॥

(राग बसंत -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
राम रंगि सभ गए पाप ॥ राम जपत कछु नही संताप ॥ गोबिंद जपत सभि मिटे अंधेर ॥ हरि सिमरत कछु नाहि फेर ॥१॥

बसंतु हमारै राम रंगु ॥ संत जना सिउ सदा संगु ॥१॥ रहाउ ॥

संत जनी कीआ उपदेसु ॥ जह गोबिंद भगतु सो धंनि देसु ॥ हरि भगतिहीन उदिआन थानु ॥ गुर प्रसादि घटि घटि पछानु ॥२॥

हरि कीरतन रस भोग रंगु ॥ मन पाप करत तू सदा संगु ॥ निकटि पेखु प्रभु करणहार ॥ ईत ऊत प्रभ कारज सार ॥३॥

चरन कमल सिउ लगो धिआनु ॥ करि किरपा प्रभि कीनो दानु ॥ तेरिआ संत जना की बाछउ धूरि ॥ जपि नानक सुआमी सद हजूरि ॥४॥११॥

(राग बसंत -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
सचु परमेसरु नित नवा ॥ गुर किरपा ते नित चवा ॥ प्रभ रखवाले माई बाप ॥ जा कै सिमरणि नही संताप ॥१॥

खसमु धिआई इक मनि इक भाइ ॥ गुर पूरे की सदा सरणाई साचै साहिबि रखिआ कंठि लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

अपणे जन प्रभि आपि रखे ॥ दुसट दूत सभि भ्रमि थके ॥ बिनु गुर साचे नही जाइ ॥ दुखु देस दिसंतरि रहे धाइ ॥२॥

किरतु ओन्हा का मिटसि नाहि ॥ ओइ अपणा बीजिआ आपि खाहि ॥ जन का रखवाला आपि सोइ ॥ जन कउ पहुचि न सकसि कोइ ॥३॥

प्रभि दास रखे करि जतनु आपि ॥ अखंड पूरन जा को प्रतापु ॥ गुण गोबिंद नित रसन गाइ ॥ नानकु जीवै हरि चरण धिआइ ॥४॥१२॥

(राग बसंत -- SGGS 1183) बसंतु महला ५ ॥
गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥ पारब्रहमि प्रभि करी मइआ ॥ सरब मनोरथ पूरन काम ॥ जपि जीवै नानकु राम नाम ॥१॥

सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥ बिनु सतिगुर दीसै बिललांती साकतु फिरि फिरि आवै जावै ॥१॥ रहाउ ॥

से धनवंत जिन हरि प्रभु रासि ॥ काम क्रोध गुर सबदि नासि ॥ भै बिनसे निरभै पदु पाइआ ॥ गुर मिलि नानकि खसमु धिआइआ ॥२॥

साधसंगति प्रभि कीओ निवास ॥ हरि जपि जपि होई पूरन आस ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ ॥ गुर मिलि नानकि हरि हरि कहिआ ॥३॥

असट सिधि नव निधि एह ॥ करमि परापति जिसु नामु देह ॥ प्रभ जपि जपि जीवहि तेरे दास ॥ गुर मिलि नानक कमल प्रगास ॥४॥१३॥

(राग बसंत -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ घरु १ इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल इछा जपि पुंनीआ ॥ प्रभि मेले चिरी विछुंनिआ ॥१॥

तुम रवहु गोबिंदै रवण जोगु ॥ जितु रविऐ सुख सहज भोगु ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा नदरि निहालिआ ॥ अपणा दासु आपि सम्हालिआ ॥२॥

सेज सुहावी रसि बनी ॥ आइ मिले प्रभ सुख धनी ॥३॥

मेरा गुणु अवगणु न बीचारिआ ॥ प्रभ नानक चरण पूजारिआ ॥४॥१॥१४॥

(राग बसंत -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥ अनदिन उपजी सहज धुना ॥१॥

मनु मउलिओ हरि चरन संगि ॥ करि किरपा साधू जन भेटे नित रातौ हरि नाम रंगि ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा प्रगटे गोपाल ॥ लड़ि लाइ उधारे दीन दइआल ॥२॥

इहु मनु होआ साध धूरि ॥ नित देखै सुआमी हजूरि ॥३॥

काम क्रोध त्रिसना गई ॥ नानक प्रभ किरपा भई ॥४॥२॥१५॥

(राग बसंत -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
रोग मिटाए प्रभू आपि ॥ बालक राखे अपने कर थापि ॥१॥

सांति सहज ग्रिहि सद बसंतु ॥ गुर पूरे की सरणी आए कलिआण रूप जपि हरि हरि मंतु ॥१॥ रहाउ ॥

सोग संताप कटे प्रभि आपि ॥ गुर अपुने कउ नित नित जापि ॥२॥

जो जनु तेरा जपे नाउ ॥ सभि फल पाए निहचल गुण गाउ ॥३॥

नानक भगता भली रीति ॥ सुखदाता जपदे नीत नीति ॥४॥३॥१६॥

(राग बसंत -- SGGS 1184) बसंतु महला ५ ॥
हुकमु करि कीन्हे निहाल ॥ अपने सेवक कउ भइआ दइआलु ॥१॥

गुरि पूरै सभु पूरा कीआ ॥ अम्रित नामु रिद महि दीआ ॥१॥ रहाउ ॥

करमु धरमु मेरा कछु न बीचारिओ ॥ बाह पकरि भवजलु निसतारिओ ॥२॥

प्रभि काटि मैलु निरमल करे ॥ गुर पूरे की सरणी परे ॥३॥

आपि करहि आपि करणैहारे ॥ करि किरपा नानक उधारे ॥४॥४॥१७॥

(राग बसंत -- SGGS 1185) बसंतु महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देखु फूल फूल फूले ॥ अहं तिआगि तिआगे ॥ चरन कमल पागे ॥ तुम मिलहु प्रभ सभागे ॥ हरि चेति मन मेरे ॥ रहाउ ॥ सघन बासु कूले ॥ इकि रहे सूकि कठूले ॥ बसंत रुति आई ॥ परफूलता रहे ॥१॥

अब कलू आइओ रे ॥ इकु नामु बोवहु बोवहु ॥ अन रूति नाही नाही ॥ मतु भरमि भूलहु भूलहु ॥ गुर मिले हरि पाए ॥ जिसु मसतकि है लेखा ॥ मन रुति नाम रे ॥ गुन कहे नानक हरि हरे हरि हरे ॥२॥१८॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1185) बसंतु महला ५ घरु २ हिंडोल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥ हरि नामै के होवहु जोड़ी गुरमुखि बैसहु सफा विछाइ ॥१॥

इन्ह बिधि पासा ढालहु बीर ॥ गुरमुखि नामु जपहु दिनु राती अंत कालि नह लागै पीर ॥१॥ रहाउ ॥

करम धरम तुम्ह चउपड़ि साजहु सतु करहु तुम्ह सारी ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु जीतहु ऐसी खेल हरि पिआरी ॥२॥

उठि इसनानु करहु परभाते सोए हरि आराधे ॥ बिखड़े दाउ लंघावै मेरा सतिगुरु सुख सहज सेती घरि जाते ॥३॥

हरि आपे खेलै आपे देखै हरि आपे रचनु रचाइआ ॥ जन नानक गुरमुखि जो नरु खेलै सो जिणि बाजी घरि आइआ ॥४॥१॥१९॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1185) बसंतु महला ५ हिंडोल ॥
तेरी कुदरति तूहै जाणहि अउरु न दूजा जाणै ॥ जिस नो क्रिपा करहि मेरे पिआरे सोई तुझै पछाणै ॥१॥

तेरिआ भगता कउ बलिहारा ॥ थानु सुहावा सदा प्रभ तेरा रंग तेरे आपारा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरी सेवा तुझ ते होवै अउरु न दूजा करता ॥ भगतु तेरा सोई तुधु भावै जिस नो तू रंगु धरता ॥२॥

तू वड दाता तू वड दाना अउरु नही को दूजा ॥ तू समरथु सुआमी मेरा हउ किआ जाणा तेरी पूजा ॥३॥

तेरा महलु अगोचरु मेरे पिआरे बिखमु तेरा है भाणा ॥ कहु नानक ढहि पइआ दुआरै रखि लेवहु मुगध अजाणा ॥४॥२॥२०॥

(राग बसंतु हिंडोल -- SGGS 1186) बसंतु हिंडोल महला ५ ॥
मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥१॥

पिता पारब्रहम प्रभ धनी ॥ मोहि निसतारहु निरगुनी ॥१॥ रहाउ ॥

ओपति परलउ प्रभ ते होवै इह बीचारी हरि जनी ॥२॥

नाम प्रभू के जो रंगि राते कलि महि सुखीए से गनी ॥३॥

अवरु उपाउ न कोई सूझै नानक तरीऐ गुर बचनी ॥४॥३॥२१॥


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