Pt 37 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 37 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग मारू -- SGGS 1097) डखणे मः ५ ॥
जिना पिछै हउ गई से मै पिछै भी रविआसु ॥ जिना की मै आसड़ी तिना महिजी आस ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1097) मः ५ ॥
गिली गिली रोडड़ी भउदी भवि भवि आइ ॥ जो बैठे से फाथिआ उबरे भाग मथाइ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1097) मः ५ ॥
डिठा हभ मझाहि खाली कोइ न जाणीऐ ॥ तै सखी भाग मथाहि जिनी मेरा सजणु राविआ ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1097) पउड़ी ॥
हउ ढाढी दरि गुण गावदा जे हरि प्रभ भावै ॥ प्रभु मेरा थिर थावरी होर आवै जावै ॥ सो मंगा दानु गोसाईआ जितु भुख लहि जावै ॥ प्रभ जीउ देवहु दरसनु आपणा जितु ढाढी त्रिपतावै ॥ अरदासि सुणी दातारि प्रभि ढाढी कउ महलि बुलावै ॥ प्रभ देखदिआ दुख भुख गई ढाढी कउ मंगणु चिति न आवै ॥ सभे इछा पूरीआ लगि प्रभ कै पावै ॥ हउ निरगुणु ढाढी बखसिओनु प्रभि पुरखि वेदावै ॥९॥

(राग मारू -- SGGS 1097) डखणे मः ५ ॥
जा छुटे ता खाकु तू सुंञी कंतु न जाणही ॥ दुरजन सेती नेहु तू कै गुणि हरि रंगु माणही ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1097) मः ५ ॥
नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥ तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1097) मः ५ ॥
रते रंगि पारब्रहम कै मनु तनु अति गुलालु ॥ नानक विणु नावै आलूदिआ जिती होरु खिआलु ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1097) पवड़ी ॥
हरि जीउ जा तू मेरा मित्रु है ता किआ मै काड़ा ॥ जिनी ठगी जगु ठगिआ से तुधु मारि निवाड़ा ॥ गुरि भउजलु पारि लंघाइआ जिता पावाड़ा ॥ गुरमती सभि रस भोगदा वडा आखाड़ा ॥ सभि इंद्रीआ वसि करि दितीओ सतवंता साड़ा ॥ जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥ जो इछी सो फलु पाइदा गुरि अंदरि वाड़ा ॥ गुरु नानकु तुठा भाइरहु हरि वसदा नेड़ा ॥१०॥

(राग मारू -- SGGS 1098) डखणे मः ५ ॥
जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥ नानक मन ही मंझि रंगावला पिरी तहिजा नाउ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥ खाकु लोड़ेदा तंनि खे जो रते दीदार ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥ थीउ संतन की रेणु जितु लभी सुख दातारु ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1098) पउड़ी ॥
विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥ धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥ अहि करु करे सु अहि करु पाए इक घड़ी मुहतु न लगै ॥ चारे जुग मै सोधिआ विणु संगति अहंकारु न भगै ॥ हउमै मूलि न छुटई विणु साधू सतसंगै ॥ तिचरु थाह न पावई जिचरु साहिब सिउ मन भंगै ॥ जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिसु घरि दीबाणु अभगै ॥ हरि किरपा ते सुखु पाइआ गुर सतिगुर चरणी लगै ॥११॥

(राग मारू -- SGGS 1098) डखणे मः ५ ॥
लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥ हठ मंझाहू सो धणी चउदो मुखि अलाइ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥ हिआउ महिजा ठंढड़ा मुखहु सचु अलाइ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥ जे डेखै हिक वार ता सुख कीमा हू बाहरे ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1098) पउड़ी ॥
मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥ मै लख विड़ते साहिबा जे बिंद बोलाईआ ॥ मै चारे कुंडा भालीआ तुधु जेवडु न साईआ ॥ मै दसिहु मारगु संतहो किउ प्रभू मिलाईआ ॥ मनु अरपिहु हउमै तजहु इतु पंथि जुलाईआ ॥ नित सेविहु साहिबु आपणा सतसंगि मिलाईआ ॥ सभे आसा पूरीआ गुर महलि बुलाईआ ॥ तुधु जेवडु होरु न सुझई मेरे मित्र गोसाईआ ॥१२॥

(राग मारू -- SGGS 1098) डखणे मः ५ ॥
मू थीआऊ तखतु पिरी महिंजे पातिसाह ॥ पाव मिलावे कोलि कवल जिवै बिगसावदो ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥ जाणु मिठाई इख बेई पीड़े ना हुटै ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1098) मः ५ ॥
ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥ सुख घटाऊ डूइ इसु पंधाणू घर घणे ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1098) पउड़ी ॥
अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥ खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥ वरत करहि चंद्राइणा से कितै न लेखं ॥ बेद पड़हि स्मपूरना ततु सार न पेखं ॥ तिलकु कढहि इसनानु करि अंतरि कालेखं ॥ भेखी प्रभू न लभई विणु सची सिखं ॥ भूला मारगि सो पवै जिसु धुरि मसतकि लेखं ॥ तिनि जनमु सवारिआ आपणा जिनि गुरु अखी देखं ॥१३॥

(राग मारू -- SGGS 1099) डखणे मः ५ ॥
सो निवाहू गडि जो चलाऊ न थीऐ ॥ कार कूड़ावी छडि समलु सचु धणी ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥ परगटु थीआ आपि नानक मसतकि लिखिआ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥ नानक दरगह मंनीअहि मिली निथावे थाउ ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1099) पउड़ी ॥
बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥ इकसु हरि जीउ बाहरी सभ फिरै निकामी ॥ मनु रता कुट्मब सिउ नित गरबि फिरामी ॥ फिरहि गुमानी जग महि किआ गरबहि दामी ॥ चलदिआ नालि न चलई खिन जाइ बिलामी ॥ बिचरदे फिरहि संसार महि हरि जी हुकामी ॥ करमु खुला गुरु पाइआ हरि मिलिआ सुआमी ॥ जो जनु हरि का सेवको हरि तिस की कामी ॥१४॥

(राग मारू -- SGGS 1099) डखणे मः ५ ॥
मुखहु अलाए हभ मरणु पछाणंदो कोइ ॥ नानक तिना खाकु जिना यकीना हिक सिउ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥ तै तनि पड़दा नाहि नानक जै गुरु भेटिआ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥ मू तनि प्रेमु अथाह पसण कू सचा धणी ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1099) पउड़ी ॥
निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥ आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनी नचा ॥ बचनु करे तै खिसकि जाइ बोले सभु कचा ॥ अंदरहु थोथा कूड़िआरु कूड़ी सभ खचा ॥ वैरु करे निरवैर नालि झूठे लालचा ॥ मारिआ सचै पातिसाहि वेखि धुरि करमचा ॥ जमदूती है हेरिआ दुख ही महि पचा ॥ होआ तपावसु धरम का नानक दरि सचा ॥१५॥

(राग मारू -- SGGS 1099) डखणे मः ५ ॥
परभाते प्रभ नामु जपि गुर के चरण धिआइ ॥ जनम मरण मलु उतरै सचे के गुण गाइ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥ नानक सफल जनमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1099) मः ५ ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥ नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1100) पउड़ी ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥ ओहु आपि तरिआ कुट्मब सिउ सभु जगतु तराई ॥ ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥ ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥ ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥ ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥ होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥१६॥

(राग मारू -- SGGS 1100) डखणे मः ५ ॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥ नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1100) मः ५ ॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥ सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1100) मः ५ ॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥ मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1100) पउड़ी ॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥ बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥ रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥ काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥ पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥ रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥ लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥ निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥१७॥

(राग मारू -- SGGS 1100) डखणे मः ५ ॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥ आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1100) मः ५ ॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥ आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1100) मः ५ ॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥ बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1100) पउड़ी ॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥ कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥ सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥ पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥ जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥ मुनि जोगी दिग्मबरा जमै सणु जासी ॥ जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥ थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥१८॥

(राग मारू -- SGGS 1100) सलोक डखणे मः ५ ॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥ डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥ नानक हभो रोगु मिरतक नाम विहूणिआ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥ नानक आसड़ी निबाहि मानुख परथाई लजीवदो ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1101) पउड़ी ॥
निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥ निहचलु नामु निधानु है जिसु सिमरत हरि लाधा ॥ निहचलु कीरतनु गुण गोबिंद गुरमुखि गावाधा ॥ सचु धरमु तपु निहचलो दिनु रैनि अराधा ॥ दइआ धरमु तपु निहचलो जिसु करमि लिखाधा ॥ निहचलु मसतकि लेखु लिखिआ सो टलै न टलाधा ॥ निहचल संगति साध जन बचन निहचलु गुर साधा ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सदा सदा आराधा ॥१९॥

(राग मारू -- SGGS 1101) सलोक डखणे मः ५ ॥
जो डुबंदो आपि सो तराए किन्ह खे ॥ तारेदड़ो भी तारि नानक पिर सिउ रतिआ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥ मूं जुलाऊं तथि नानक पिरी पसंदो हरिओ थीओसि ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥ नानक नाम विहूणीआ निमुणीआदी देह ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1101) पउड़ी ॥
नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥ पैरी मारगि गुर चलदा पखा फेरी हथा ॥ अकाल मूरति रिदै धिआइदा दिनु रैनि जपंथा ॥ मै छडिआ सगल अपाइणो भरवासै गुर समरथा ॥ गुरि बखसिआ नामु निधानु सभो दुखु लथा ॥ भोगहु भुंचहु भाईहो पलै नामु अगथा ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ु सदा करहु गुर कथा ॥ सहजु भइआ प्रभु पाइआ जम का भउ लथा ॥२०॥

(राग मारू -- SGGS 1101) सलोक डखणे मः ५ ॥
लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥ हभ मझाहू सो धणी बिआ न डिठो कोइ ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥ नानक लधड़ीआ तिंनाह जिना भागु मथाहड़ै ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1101) मः ५ ॥
डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥ पाताला आकास पूरनु हभ घटा ॥ नानक पेखि जीओ इकतु सूति परोतीआ ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1101) पउड़ी ॥
हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥ हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥ सहजे सहजि खिलाइदा नही करदा आलक ॥ अउगणु को न चितारदा गल सेती लाइक ॥ मुहि मंगां सोई देवदा हरि पिता सुखदाइक ॥ गिआनु रासि नामु धनु सउपिओनु इसु सउदे लाइक ॥ साझी गुर नालि बहालिआ सरब सुख पाइक ॥ मै नालहु कदे न विछुड़ै हरि पिता सभना गला लाइक ॥२१॥

(राग मारू -- SGGS 1102) सलोक डखणे मः ५ ॥
नानक कचड़िआ सिउ तोड़ि ढूढि सजण संत पकिआ ॥ ओइ जीवंदे विछुड़हि ओइ मुइआ न जाही छोड़ि ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1102) मः ५ ॥
नानक बिजुलीआ चमकंनि घुरन्हि घटा अति कालीआ ॥ बरसनि मेघ अपार नानक संगमि पिरी सुहंदीआ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1102) मः ५ ॥
जल थल नीरि भरे सीतल पवण झुलारदे ॥ सेजड़ीआ सोइंन हीरे लाल जड़ंदीआ ॥ सुभर कपड़ भोग नानक पिरी विहूणी ततीआ ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1102) पउड़ी ॥
कारणु करतै जो कीआ सोई है करणा ॥ जे सउ धावहि प्राणीआ पावहि धुरि लहणा ॥ बिनु करमा किछू न लभई जे फिरहि सभ धरणा ॥ गुर मिलि भउ गोविंद का भै डरु दूरि करणा ॥ भै ते बैरागु ऊपजै हरि खोजत फिरणा ॥ खोजत खोजत सहजु उपजिआ फिरि जनमि न मरणा ॥ हिआइ कमाइ धिआइआ पाइआ साध सरणा ॥ बोहिथु नानक देउ गुरु जिसु हरि चड़ाए तिसु भउजलु तरणा ॥२२॥

(राग मारू -- SGGS 1102) सलोक मः ५ ॥
पहिला मरणु कबूलि जीवण की छडि आस ॥ होहु सभना की रेणुका तउ आउ हमारै पासि ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1102) मः ५ ॥
मुआ जीवंदा पेखु जीवंदे मरि जानि ॥ जिन्हा मुहबति इक सिउ ते माणस परधान ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1102) मः ५ ॥
जिसु मनि वसै पारब्रहमु निकटि न आवै पीर ॥ भुख तिख तिसु न विआपई जमु नही आवै नीर ॥३॥

(राग मारू -- SGGS 1102) पउड़ी ॥
कीमति कहणु न जाईऐ सचु साह अडोलै ॥ सिध साधिक गिआनी धिआनीआ कउणु तुधुनो तोलै ॥ भंनण घड़ण समरथु है ओपति सभ परलै ॥ करण कारण समरथु है घटि घटि सभ बोलै ॥ रिजकु समाहे सभसै किआ माणसु डोलै ॥ गहिर गभीरु अथाहु तू गुण गिआन अमोलै ॥ सोई कमु कमावणा कीआ धुरि मउलै ॥ तुधहु बाहरि किछु नही नानकु गुण बोलै ॥२३॥१॥२॥

(राग तुखारी -- SGGS 1117) तुखारी छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
घोलि घुमाई लालना गुरि मनु दीना ॥ सुणि सबदु तुमारा मेरा मनु भीना ॥ इहु मनु भीना जिउ जल मीना लागा रंगु मुरारा ॥ कीमति कही न जाई ठाकुर तेरा महलु अपारा ॥ सगल गुणा के दाते सुआमी बिनउ सुनहु इक दीना ॥ देहु दरसु नानक बलिहारी जीअड़ा बलि बलि कीना ॥१॥

इहु तनु मनु तेरा सभि गुण तेरे ॥ खंनीऐ वंञा दरसन तेरे ॥ दरसन तेरे सुणि प्रभ मेरे निमख द्रिसटि पेखि जीवा ॥ अम्रित नामु सुनीजै तेरा किरपा करहि त पीवा ॥ आस पिआसी पिर कै ताई जिउ चात्रिकु बूंदेरे ॥ कहु नानक जीअड़ा बलिहारी देहु दरसु प्रभ मेरे ॥२॥

तू साचा साहिबु साहु अमिता ॥ तू प्रीतमु पिआरा प्रान हित चिता ॥ प्रान सुखदाता गुरमुखि जाता सगल रंग बनि आए ॥ सोई करमु कमावै प्राणी जेहा तू फुरमाए ॥ जा कउ क्रिपा करी जगदीसुरि तिनि साधसंगि मनु जिता ॥ कहु नानक जीअड़ा बलिहारी जीउ पिंडु तउ दिता ॥३॥

निरगुणु राखि लीआ संतन का सदका ॥ सतिगुरि ढाकि लीआ मोहि पापी पड़दा ॥ ढाकनहारे प्रभू हमारे जीअ प्रान सुखदाते ॥ अबिनासी अबिगत सुआमी पूरन पुरख बिधाते ॥ उसतति कहनु न जाइ तुमारी कउणु कहै तू कद का ॥ नानक दासु ता कै बलिहारी मिलै नामु हरि निमका ॥४॥१॥११॥

(राग केदारा -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माई संतसंगि जागी ॥ प्रिअ रंग देखै जपती नामु निधानी ॥ रहाउ ॥ दरसन पिआस लोचन तार लागी ॥ बिसरी तिआस बिडानी ॥१॥

अब गुरु पाइओ है सहज सुखदाइक दरसनु पेखत मनु लपटानी ॥ देखि दमोदर रहसु मनि उपजिओ नानक प्रिअ अम्रित बानी ॥२॥१॥

(राग केदारा -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन बिनउ सुनु दइआल ॥ पंच दास तीनि दोखी एक मनु अनाथ नाथ ॥ राखु हो किरपाल ॥ रहाउ ॥ अनिक जतन गवनु करउ ॥ खटु करम जुगति धिआनु धरउ ॥ उपाव सगल करि हारिओ नह नह हुटहि बिकराल ॥१॥

सरणि बंदन करुणा पते ॥ भव हरण हरि हरि हरि हरे ॥ एक तूही दीन दइआल ॥ प्रभ चरन नानक आसरो ॥ उधरे भ्रम मोह सागर ॥ लगि संतना पग पाल ॥२॥१॥२॥

(राग केदारा -- SGGS 1119) केदारा महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरनी आइओ नाथ निधान ॥ नाम प्रीति लागी मन भीतरि मागन कउ हरि दान ॥१॥ रहाउ ॥

सुखदाई पूरन परमेसुर करि किरपा राखहु मान ॥ देहु प्रीति साधू संगि सुआमी हरि गुन रसन बखान ॥१॥

गोपाल दइआल गोबिद दमोदर निरमल कथा गिआन ॥ नानक कउ हरि कै रंगि रागहु चरन कमल संगि धिआन ॥२॥१॥३॥

(राग केदारा -- SGGS 1119) केदारा महला ५ ॥
हरि के दरसन को मनि चाउ ॥ करि किरपा सतसंगि मिलावहु तुम देवहु अपनो नाउ ॥ रहाउ ॥ करउ सेवा सत पुरख पिआरे जत सुनीऐ तत मनि रहसाउ ॥ वारी फेरी सदा घुमाई कवनु अनूपु तेरो ठाउ ॥१॥

सरब प्रतिपालहि सगल समालहि सगलिआ तेरी छाउ ॥ नानक के प्रभ पुरख बिधाते घटि घटि तुझहि दिखाउ ॥२॥२॥४॥

(राग केदारा -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥ मगन मनै महि चितवउ आसा नैनहु तार तुहारी ॥ रहाउ ॥ ओइ दिन पहर मूरत पल कैसे ओइ पल घरी किहारी ॥ खूले कपट धपट बुझि त्रिसना जीवउ पेखि दरसारी ॥१॥

कउनु सु जतनु उपाउ किनेहा सेवा कउन बीचारी ॥ मानु अभिमानु मोहु तजि नानक संतह संगि उधारी ॥२॥३॥५॥

(राग केदारा -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥ करहु क्रिपा गोपाल गोबिदे अपना नामु जपावहु ॥ रहाउ ॥ काढि लीए प्रभ आन बिखै ते साधसंगि मनु लावहु ॥ भ्रमु भउ मोहु कटिओ गुर बचनी अपना दरसु दिखावहु ॥१॥

सभ की रेन होइ मनु मेरा अह्मबुधि तजावहु ॥ अपनी भगति देहि दइआला वडभागी नानक हरि पावहु ॥२॥४॥६॥

(राग केदारा -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥ तजि गोपाल आन रंगि राचत मिथिआ पहिरत खात ॥ रहाउ ॥ धनु जोबनु स्मपै सुख भोगवै संगि न निबहत मात ॥ म्रिग त्रिसना देखि रचिओ बावर द्रुम छाइआ रंगि रात ॥१॥

मान मोह महा मद मोहत काम क्रोध कै खात ॥ करु गहि लेहु दास नानक कउ प्रभ जीउ होइ सहात ॥२॥५॥७॥

(राग केदारा -- SGGS 1120) केदारा महला ५ ॥
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥ दीना नाथ करुणापति सुआमी अनाथा के नाथ ॥ रहाउ ॥ सुत स्मपति बिखिआ रस भोगवत नह निबहत जम कै पाथ ॥ नामु निधानु गाउ गुन गोबिंद उधरु सागर के खात ॥१॥

सरनि समरथ अकथ अगोचर हरि सिमरत दुख लाथ ॥ नानक दीन धूरि जन बांछत मिलै लिखत धुरि माथ ॥२॥६॥८॥

(राग केदारा -- SGGS 1120) केदारा महला ५ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥ अब इह प्रीति महा प्रबल भई आन बिखै जरी ॥ रहाउ ॥ बूंद कहा तिआगि चात्रिक मीन रहत न घरी ॥ गुन गोपाल उचारु रसना टेव एह परी ॥१॥

महा नाद कुरंक मोहिओ बेधि तीखन सरी ॥ प्रभ चरन कमल रसाल नानक गाठि बाधि धरी ॥२॥१॥९॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥ भरम भीति निवारि ठाकुर गहि लेहु अपनी ओर ॥१॥ रहाउ ॥

अधिक गरत संसार सागर करि दइआ चारहु धोर ॥ संतसंगि हरि चरन बोहिथ उधरते लै मोर ॥१॥

गरभ कुंट महि जिनहि धारिओ नही बिखै बन महि होर ॥ हरि सकत सरन समरथ नानक आन नही निहोर ॥२॥२॥१०॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
रसना राम राम बखानु ॥ गुन गोपाल उचारु दिनु रैनि भए कलमल हान ॥ रहाउ ॥ तिआगि चलना सगल स्मपत कालु सिर परि जानु ॥ मिथन मोह दुरंत आसा झूठु सरपर मानु ॥१॥

सति पुरख अकाल मूरति रिदै धारहु धिआनु ॥ नामु निधानु लाभु नानक बसतु इह परवानु ॥२॥३॥११॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम को आधारु ॥ कलि कलेस न कछु बिआपै संतसंगि बिउहारु ॥ रहाउ ॥ करि अनुग्रहु आपि राखिओ नह उपजतउ बेकारु ॥ जिसु परापति होइ सिमरै तिसु दहत नह संसारु ॥१॥

सुख मंगल आनंद हरि हरि प्रभ चरन अम्रित सारु ॥ नानक दास सरनागती तेरे संतना की छारु ॥२॥४॥१२॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥ जीवन रूप बिसारि जीवहि तिह कत जीवन होत ॥ रहाउ ॥ खात पीत अनेक बिंजन जैसे भार बाहक खोत ॥ आठ पहर महा स्रमु पाइआ जैसे बिरख जंती जोत ॥१॥

तजि गोपाल जि आन लागे से बहु प्रकारी रोत ॥ कर जोरि नानक दानु मागै हरि रखउ कंठि परोत ॥२॥५॥१३॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
संतह धूरि ले मुखि मली ॥ गुणा अचुत सदा पूरन नह दोख बिआपहि कली ॥ रहाउ ॥ गुर बचनि कारज सरब पूरन ईत ऊत न हली ॥ प्रभ एक अनिक सरबत पूरन बिखै अगनि न जली ॥१॥

गहि भुजा लीनो दासु अपनो जोति जोती रली ॥ प्रभ चरन सरन अनाथु आइओ नानक हरि संगि चली ॥२॥६॥१४॥

(राग केदारा -- SGGS 1121) केदारा महला ५ ॥
हरि के नाम की मन रुचै ॥ कोटि सांति अनंद पूरन जलत छाती बुझै ॥ रहाउ ॥ संत मारगि चलत प्रानी पतित उधरे मुचै ॥ रेनु जन की लगी मसतकि अनिक तीरथ सुचै ॥१॥

चरन कमल धिआन भीतरि घटि घटहि सुआमी सुझै ॥ सरनि देव अपार नानक बहुरि जमु नही लुझै ॥२॥७॥१५॥

(राग केदारा -- SGGS 1122) केदारा छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलु मेरे प्रीतम पिआरिआ ॥ रहाउ ॥ पूरि रहिआ सरबत्र मै सो पुरखु बिधाता ॥ मारगु प्रभ का हरि कीआ संतन संगि जाता ॥ संतन संगि जाता पुरखु बिधाता घटि घटि नदरि निहालिआ ॥ जो सरनी आवै सरब सुख पावै तिलु नही भंनै घालिआ ॥ हरि गुण निधि गाए सहज सुभाए प्रेम महा रस माता ॥ नानक दास तेरी सरणाई तू पूरन पुरखु बिधाता ॥१॥

हरि प्रेम भगति जन बेधिआ से आन कत जाही ॥ मीनु बिछोहा ना सहै जल बिनु मरि पाही ॥ हरि बिनु किउ रहीऐ दूख किनि सहीऐ चात्रिक बूंद पिआसिआ ॥ कब रैनि बिहावै चकवी सुखु पावै सूरज किरणि प्रगासिआ ॥ हरि दरसि मनु लागा दिनसु सभागा अनदिनु हरि गुण गाही ॥ नानक दासु कहै बेनंती कत हरि बिनु प्राण टिकाही ॥२॥

सास बिना जिउ देहुरी कत सोभा पावै ॥ दरस बिहूना साध जनु खिनु टिकणु न आवै ॥ हरि बिनु जो रहणा नरकु सो सहणा चरन कमल मनु बेधिआ ॥ हरि रसिक बैरागी नामि लिव लागी कतहु न जाइ निखेधिआ ॥ हरि सिउ जाइ मिलणा साधसंगि रहणा सो सुखु अंकि न मावै ॥ होहु क्रिपाल नानक के सुआमी हरि चरनह संगि समावै ॥३॥

खोजत खोजत प्रभ मिले हरि करुणा धारे ॥ निरगुणु नीचु अनाथु मै नही दोख बीचारे ॥ नही दोख बीचारे पूरन सुख सारे पावन बिरदु बखानिआ ॥ भगति वछलु सुनि अंचलो गहिआ घटि घटि पूर समानिआ ॥ सुख सागरो पाइआ सहज सुभाइआ जनम मरन दुख हारे ॥ करु गहि लीने नानक दास अपने राम नाम उरि हारे ॥४॥१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगली थीति पासि डारि राखी ॥ असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥१॥

भरमि भूले नर करत कचराइण ॥ जनम मरण ते रहत नाराइण ॥१॥ रहाउ ॥

करि पंजीरु खवाइओ चोर ॥ ओहु जनमि न मरै रे साकत ढोर ॥२॥

सगल पराध देहि लोरोनी ॥ सो मुखु जलउ जितु कहहि ठाकुरु जोनी ॥३॥

जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥ नानक का प्रभु रहिओ समाइ ॥४॥१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
ऊठत सुखीआ बैठत सुखीआ ॥ भउ नही लागै जां ऐसे बुझीआ ॥१॥

राखा एकु हमारा सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ ॥

सोइ अचिंता जागि अचिंता ॥ जहा कहां प्रभु तूं वरतंता ॥२॥

घरि सुखि वसिआ बाहरि सुखु पाइआ ॥ कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥३॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
वरत न रहउ न मह रमदाना ॥ तिसु सेवी जो रखै निदाना ॥१॥

एकु गुसाई अलहु मेरा ॥ हिंदू तुरक दुहां नेबेरा ॥१॥ रहाउ ॥

हज काबै जाउ न तीरथ पूजा ॥ एको सेवी अवरु न दूजा ॥२॥

पूजा करउ न निवाज गुजारउ ॥ एक निरंकार ले रिदै नमसकारउ ॥३॥

ना हम हिंदू न मुसलमान ॥ अलह राम के पिंडु परान ॥४॥

कहु कबीर इहु कीआ वखाना ॥ गुर पीर मिलि खुदि खसमु पछाना ॥५॥३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥ पांच मिरग बेधे सिव की बानी ॥१॥

संतसंगि ले चड़िओ सिकार ॥ म्रिग पकरे बिनु घोर हथीआर ॥१॥ रहाउ ॥

आखेर बिरति बाहरि आइओ धाइ ॥ अहेरा पाइओ घर कै गांइ ॥२॥

म्रिग पकरे घरि आणे हाटि ॥ चुख चुख ले गए बांढे बाटि ॥३॥

एहु अहेरा कीनो दानु ॥ नानक कै घरि केवल नामु ॥४॥४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1136) भैरउ महला ५ ॥
जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥ साकत हरि हरि चीति न आइआ ॥१॥

संत जना की लेहु मते ॥ साधसंगि पावहु परम गते ॥१॥ रहाउ ॥

पाथर कउ बहु नीरु पवाइआ ॥ नह भीगै अधिक सूकाइआ ॥२॥

खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥ जैसे दह दिस पवनु झुलाइआ ॥३॥

बिनु कण खलहानु जैसे गाहन पाइआ ॥ तिउ साकत ते को न बरासाइआ ॥४॥

तित ही लागा जितु को लाइआ ॥ कहु नानक प्रभि बणत बणाइआ ॥५॥५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1137) भैरउ महला ५ ॥
जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥ जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥१॥

गुरु गोबिंदु जीअ कै काम ॥ हलति पलति जा की सद छाम ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु आराधन निरमल रीति ॥ साधसंगि बिनसी बिपरीति ॥२॥

मीत हीत धनु नह पारणा ॥ धंनि धंनि मेरे नाराइणा ॥३॥

नानकु बोलै अम्रित बाणी ॥ एक बिना दूजा नही जाणी ॥४॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1137) भैरउ महला ५ ॥
आगै दयु पाछै नाराइण ॥ मधि भागि हरि प्रेम रसाइण ॥१॥

प्रभू हमारै सासत्र सउण ॥ सूख सहज आनंद ग्रिह भउण ॥१॥ रहाउ ॥

रसना नामु करन सुणि जीवे ॥ प्रभु सिमरि सिमरि अमर थिरु थीवे ॥२॥

जनम जनम के दूख निवारे ॥ अनहद सबद वजे दरबारे ॥३॥

करि किरपा प्रभि लीए मिलाए ॥ नानक प्रभ सरणागति आए ॥४॥७॥

(राग भैरउ -- SGGS 1137) भैरउ महला ५ ॥
कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥ जम मारग कै संगी पांथ ॥१॥

गंगा जलु गुर गोबिंद नाम ॥ जो सिमरै तिस की गति होवै पीवत बहुड़ि न जोनि भ्रमाम ॥१॥ रहाउ ॥

पूजा जाप ताप इसनान ॥ सिमरत नाम भए निहकाम ॥२॥

राज माल सादन दरबार ॥ सिमरत नाम पूरन आचार ॥३॥

नानक दास इहु कीआ बीचारु ॥ बिनु हरि नाम मिथिआ सभ छारु ॥४॥८॥


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