Pt 33 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 33 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग रामकली -- SGGS 926) रामकली महला ५ छंत ॥
सलोकु ॥
चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥ नानक प्रभु आराधीऐ बिपति निवारण राम ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 926) छंतु ॥
प्रभ बिपति निवारणो तिसु बिनु अवरु न कोइ जीउ ॥ सदा सदा हरि सिमरीऐ जलि थलि महीअलि सोइ जीउ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥ गुर चरन लागे दिन सभागे सरब गुण जगदीसरै ॥ करि सेव सेवक दिनसु रैणी तिसु भावै सो होइ जीउ ॥ बलि जाइ नानकु सुखह दाते परगासु मनि तनि होइ जीउ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 926) सलोकु ॥
हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥ नानक टेक गोपाल की गोविंद संकट मोच ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 926) छंतु ॥
भै संकट काटे नाराइण दइआल जीउ ॥ हरि गुण आनंद गाए प्रभ दीना नाथ प्रतिपाल जीउ ॥ प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥ कर चरन मसतकु मेलि लीने सदा अनदिनु जागा ॥ जीउ पिंडु ग्रिहु थानु तिस का तनु जोबनु धनु मालु जीउ ॥ सद सदा बलि जाइ नानकु सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 926) सलोकु ॥
रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥ नानक पकड़ी टेक एक परमेसरु रखै निदान ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 926) छंतु ॥
सो सुआमी प्रभु रखको अंचलि ता कै लागु जीउ ॥ भजु साधू संगि दइआल देव मन की मति तिआगु जीउ ॥ इक ओट कीजै जीउ दीजै आस इक धरणीधरै ॥ साधसंगे हरि नाम रंगे संसारु सागरु सभु तरै ॥ जनम मरण बिकार छूटे फिरि न लागै दागु जीउ ॥ बलि जाइ नानकु पुरख पूरन थिरु जा का सोहागु जीउ ॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 927) सलोकु ॥
धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥ सगल मनोरथ पूरिआ नानक लिखिआ माथ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 927) छंतु ॥
सगल इछ मेरी पुंनीआ मिलिआ निरंजन राइ जीउ ॥ अनदु भइआ वडभागीहो ग्रिहि प्रगटे प्रभ आइ जीउ ॥ ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥ बेअंत पूरन सुख सहज दाता कवन रसना गुण भणा ॥ आपे मिलाए गहि कंठि लाए तिसु बिना नही जाइ जीउ ॥ बलि जाइ नानकु सदा करते सभ महि रहिआ समाइ जीउ ॥४॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 927) रागु रामकली महला ५ ॥
रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥ सतिगुरु तुम सेवि सखी मनि चिंदिअड़ा फलु पावहु ॥

(राग रामकली -- SGGS 927) रामकली महला ५ रुती सलोकु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥ आपु निवारि हरि हरि भजउ नानक प्रभ भरपूरि ॥१॥

किलविख काटण भै हरण सुख सागर हरि राइ ॥ दीन दइआल दुख भंजनो नानक नीत धिआइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 927) छंतु ॥
जसु गावहु वडभागीहो करि किरपा भगवंत जीउ ॥ रुती माह मूरत घड़ी गुण उचरत सोभावंत जीउ ॥ गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥ सफल जनमु भइआ तिन का जिनी सो प्रभु पाइआ ॥ पुंन दान न तुलि किरिआ हरि सरब पापा हंत जीउ ॥ बिनवंति नानक सिमरि जीवा जनम मरण रहंत जीउ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 927) सलोक ॥
उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥ कथनी सा तुधु भावसी नानक नाम अधार ॥१॥

संत सरणि साजन परहु सुआमी सिमरि अनंत ॥ सूके ते हरिआ थीआ नानक जपि भगवंत ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 927) छंतु ॥
रुति सरस बसंत माह चेतु वैसाख सुख मासु जीउ ॥ हरि जीउ नाहु मिलिआ मउलिआ मनु तनु सासु जीउ ॥ घरि नाहु निहचलु अनदु सखीए चरन कमल प्रफुलिआ ॥ सुंदरु सुघड़ु सुजाणु बेता गुण गोविंद अमुलिआ ॥ वडभागि पाइआ दुखु गवाइआ भई पूरन आस जीउ ॥ बिनवंति नानक सरणि तेरी मिटी जम की त्रास जीउ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 928) सलोक ॥
साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥ कोमल बंधन बाधीआ नानक करमहि लेख ॥१॥

जो भाणे से मेलिआ विछोड़े भी आपि ॥ नानक प्रभ सरणागती जा का वड परतापु ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 928) छंतु ॥
ग्रीखम रुति अति गाखड़ी जेठ अखाड़ै घाम जीउ ॥ प्रेम बिछोहु दुहागणी द्रिसटि न करी राम जीउ ॥ नह द्रिसटि आवै मरत हावै महा गारबि मुठीआ ॥ जल बाझु मछुली तड़फड़ावै संगि माइआ रुठीआ ॥ करि पाप जोनी भै भीत होई देइ सासन जाम जीउ ॥ बिनवंति नानक ओट तेरी राखु पूरन काम जीउ ॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 928) सलोक ॥
सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥ मन तन अंतरि रवि रहे नानक सहजि सुभाइ ॥१॥

करु गहि लीनी साजनहि जनम जनम के मीत ॥ चरनह दासी करि लई नानक प्रभ हित चीत ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 928) छंतु ॥
रुति बरसु सुहेलीआ सावण भादवे आनंद जीउ ॥ घण उनवि वुठे जल थल पूरिआ मकरंद जीउ ॥ प्रभु पूरि रहिआ सरब ठाई हरि नाम नव निधि ग्रिह भरे ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी कुल समूहा सभि तरे ॥ प्रिअ रंगि जागे नह छिद्र लागे क्रिपालु सद बखसिंदु जीउ ॥ बिनवंति नानक हरि कंतु पाइआ सदा मनि भावंदु जीउ ॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 928) सलोक ॥
आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥ है कोई साजनु संत जनु नानक प्रभ मेलणहार ॥१॥

बिनु मिलबे सांति न ऊपजै तिलु पलु रहणु न जाइ ॥ हरि साधह सरणागती नानक आस पुजाइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 928) छंतु ॥
रुति सरद अड्मबरो असू कतके हरि पिआस जीउ ॥ खोजंती दरसनु फिरत कब मिलीऐ गुणतास जीउ ॥ बिनु कंत पिआरे नह सूख सारे हार कंङण ध्रिगु बना ॥ सुंदरि सुजाणि चतुरि बेती सास बिनु जैसे तना ॥ ईत उत दह दिस अलोकन मनि मिलन की प्रभ पिआस जीउ ॥ बिनवंति नानक धारि किरपा मेलहु प्रभ गुणतास जीउ ॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 928) सलोक ॥
जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥ नानक प्रभ पूरन मिले दुतीआ बिनसी भ्रांति ॥१॥

साध पठाए आपि हरि हम तुम ते नाही दूरि ॥ नानक भ्रम भै मिटि गए रमण राम भरपूरि ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 929) छंतु ॥
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥ जलनि बुझी दरसु पाइआ बिनसे माइआ ध्रोह जीउ ॥ सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥ हार डोर सीगार सभि रस गुण गाउ अलख अभेविआ ॥ भाउ भगति गोविंद बांछत जमु न साकै जोहि जीउ ॥ बिनवंति नानक प्रभि आपि मेली तह न प्रेम बिछोह जीउ ॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 929) सलोक ॥
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥ संत संजोगी नानका ग्रिहि प्रगटे प्रभ मीत ॥१॥

नाद बिनोद अनंद कोड प्रिअ प्रीतम संगि बने ॥ मन बांछत फल पाइआ हरि नानक नाम भने ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 929) छंतु ॥
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥ सखी सहेली गाउ मंगलो ग्रिहि आए हरि कंत जीउ ॥ ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥ वणु त्रिणु त्रिभवण भए हरिआ देखि दरसन मोहीआ ॥ मिले सुआमी इछ पुंनी मनि जपिआ निरमल मंत जीउ ॥ बिनवंति नानक नित करहु रलीआ हरि मिले स्रीधर कंत जीउ ॥७॥

(राग रामकली -- SGGS 929) सलोक ॥
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥ सभ ते ऊचे जाणीअहि नानक नाम पिआर ॥१॥

जिन जानिआ सेई तरे से सूरे से बीर ॥ नानक तिन बलिहारणै हरि जपि उतरे तीर ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 929) छंतु ॥
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥ आवण जावण दुख हरे हरि भगति कीआ परवेसु जीउ ॥ हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥ तजि आपु सरणी परे चरनी सरब गुण जगदीसरै ॥ गोविंद गुण निधि स्रीरंग सुआमी आदि कउ आदेसु जीउ ॥ बिनवंति नानक मइआ धारहु जुगु जुगो इक वेसु जीउ ॥८॥१॥६॥८॥

(राग रामकली -- SGGS 957) रामकली की वार महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः ५ ॥
जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥ विछुड़िआ मेले प्रभू हरि दरगह का बसीठु ॥ हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा कटे हउमै रोगु ॥ नानक सतिगुरु तिना मिलाइआ जिना धुरे पइआ संजोगु ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 957) मः ५ ॥
इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥ गुरि पूरै देखालिआ विणु नावै सभ बादि ॥ साकत दुरजन भरमिआ जो लगे दूजै सादि ॥ जन नानकि हरि प्रभु बुझिआ गुर सतिगुर कै परसादि ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 957) पउड़ी ॥
थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥ आपे पूरा साहु आपे ही खटिआ ॥ आपे करि पासारु आपे रंग रटिआ ॥ कुदरति कीम न पाइ अलख ब्रहमटिआ ॥ अगम अथाह बेअंत परै परटिआ ॥ आपे वड पातिसाहु आपि वजीरटिआ ॥ कोइ न जाणै कीम केवडु मटिआ ॥ सचा साहिबु आपि गुरमुखि परगटिआ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 957) सलोकु मः ५ ॥
सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥ हउ तिसु देवा मनु आपणा नित हिरदै रखा समालि ॥ इकसु सतिगुर बाहरा ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 957) मः ५ ॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥ कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु जो मेले प्रीतमु मोहि ॥ गुरि पूरै मेलाइआ जत देखा तत सोइ ॥ जन नानक सो प्रभु सेविआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 957) पउड़ी ॥
देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥ जिसु रखै किरपा धारि रिजकु समाहीऐ ॥ कोइ न किस ही वसि सभना इक धर ॥ पाले बालक वागि दे कै आपि कर ॥ करदा अनद बिनोद किछू न जाणीऐ ॥ सरब धार समरथ हउ तिसु कुरबाणीऐ ॥ गाईऐ राति दिनंतु गावण जोगिआ ॥ जो गुर की पैरी पाहि तिनी हरि रसु भोगिआ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 957) सलोक मः ५ ॥
भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुट्मबै नालि ॥ कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥ प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥ दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 958) मः ५ ॥
विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥ देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥ गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 958) पउड़ी ॥
सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥ घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥ अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥ जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥ भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥ सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥ जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥ तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 958) सलोकु मः ५ ॥
धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥ धंनु सु जंत सुहावड़े जो गुरमुखि जपदे नाउ ॥ जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन सद बलिहारै जाउ ॥ तिन की धूड़ि हम बाछदे करमी पलै पाइ ॥ जो रते रंगि गोविद कै हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ आखा बिरथा जीअ की हरि सजणु मेलहु राइ ॥ गुरि पूरै मेलाइआ जनम मरण दुखु जाइ ॥ जन नानक पाइआ अगम रूपु अनत न काहू जाइ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 958) मः ५ ॥
धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥ धंनु सु दिनसु संजोगड़ा जितु डिठा गुर दरसारु ॥ मन कीआ इछा पूरीआ हरि पाइआ अगम अपारु ॥ हउमै तुटा मोहड़ा इकु सचु नामु आधारु ॥ जनु नानकु लगा सेव हरि उधरिआ सगल संसारु ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 958) पउड़ी ॥
सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥ सउपे जिसु भंडार फिरि पुछ न लीतीअनु ॥ जिस नो लगा रंगु से रंगि रतिआ ॥ ओना इको नामु अधारु इका उन भतिआ ॥ ओना पिछै जगु भुंचै भोगई ॥ ओना पिआरा रबु ओनाहा जोगई ॥ जिसु मिलिआ गुरु आइ तिनि प्रभु जाणिआ ॥ हउ बलिहारी तिन जि खसमै भाणिआ ॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 958) सलोक मः ५ ॥
हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥ हरि इको मेरा सजणो हरि इकसै नालि मै संगु ॥ हरि इकसै नालि मै गोसटे मुहु मैला करै न भंगु ॥ जाणै बिरथा जीअ की कदे न मोड़ै रंगु ॥ हरि इको मेरा मसलती भंनण घड़न समरथु ॥ हरि इको मेरा दातारु है सिरि दातिआ जग हथु ॥ हरि इकसै दी मै टेक है जो सिरि सभना समरथु ॥ सतिगुरि संतु मिलाइआ मसतकि धरि कै हथु ॥ वडा साहिबु गुरू मिलाइआ जिनि तारिआ सगल जगतु ॥ मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥ नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 959) मः ५ ॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥ वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥ जिचरु पैननि खावन्हे तिचरु रखनि गंढु ॥ जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥ जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥ कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥ अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥ झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥ क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥ जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 959) पउड़ी ॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥ जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥ मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥ दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥ जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥ मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥ नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥ तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 959) सलोक मः ५ ॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥ सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥ दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥ ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥ पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥ ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥ जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥ साई सोहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥ पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥ करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥ सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 959) मः ५ ॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥ सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥ हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥ ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥ अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥ जनु नानकु मंगै दानु इकु देहु दरसु मनि पिआरु ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 960) पउड़ी ॥
जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥ जिसु तू आवहि चिति तिसु जम नाहि दुख ॥ जिसु तू आवहि चिति तिसु कि काड़िआ ॥ जिस दा करता मित्रु सभि काज सवारिआ ॥ जिसु तू आवहि चिति सो परवाणु जनु ॥ जिसु तू आवहि चिति बहुता तिसु धनु ॥ जिसु तू आवहि चिति सो वड परवारिआ ॥ जिसु तू आवहि चिति तिनि कुल उधारिआ ॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 960) सलोक मः ५ ॥
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥ देही धोवै चक्र बणाए माइआ नो बहु धावै ॥ अंदरि मैलु न उतरै हउमै फिरि फिरि आवै जावै ॥ नींद विआपिआ कामि संतापिआ मुखहु हरि हरि कहावै ॥ बैसनो नामु करम हउ जुगता तुह कुटे किआ फलु पावै ॥ हंसा विचि बैठा बगु न बणई नित बैठा मछी नो तार लावै ॥ जा हंस सभा वीचारु करि देखनि ता बगा नालि जोड़ु कदे न आवै ॥ हंसा हीरा मोती चुगणा बगु डडा भालण जावै ॥ उडरिआ वेचारा बगुला मतु होवै मंञु लखावै ॥ जितु को लाइआ तित ही लागा किसु दोसु दिचै जा हरि एवै भावै ॥ सतिगुरु सरवरु रतनी भरपूरे जिसु प्रापति सो पावै ॥ सिख हंस सरवरि इकठे होए सतिगुर कै हुकमावै ॥ रतन पदारथ माणक सरवरि भरपूरे खाइ खरचि रहे तोटि न आवै ॥ सरवर हंसु दूरि न होई करते एवै भावै ॥ जन नानक जिस दै मसतकि भागु धुरि लिखिआ सो सिखु गुरू पहि आवै ॥ आपि तरिआ कुट्मब सभि तारे सभा स्रिसटि छडावै ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 960) मः ५ ॥
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥ अंदरि मोहु नित भरमि विआपिआ तिसटसि नाही देहा ॥ कूड़ी आवै कूड़ी जावै माइआ की नित जोहा ॥ सचु कहै ता छोहो आवै अंतरि बहुता रोहा ॥ विआपिआ दुरमति कुबुधि कुमूड़ा मनि लागा तिसु मोहा ॥ ठगै सेती ठगु रलि आइआ साथु भि इको जेहा ॥ सतिगुरु सराफु नदरी विचदो कढै तां उघड़ि आइआ लोहा ॥ बहुतेरी थाई रलाइ रलाइ दिता उघड़िआ पड़दा अगै आइ खलोहा ॥ सतिगुर की जे सरणी आवै फिरि मनूरहु कंचनु होहा ॥ सतिगुरु निरवैरु पुत्र सत्र समाने अउगण कटे करे सुधु देहा ॥ नानक जिसु धुरि मसतकि होवै लिखिआ तिसु सतिगुर नालि सनेहा ॥ अम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥ आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 961) पउड़ी ॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥ जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥ जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥ जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥ जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥ जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥ जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥ तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥७॥

(राग रामकली -- SGGS 961) सलोक मः ५ ॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥ सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥ मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥ हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥ गुण गावा दिनु रैणि एतै कमि लाइ ॥ संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥ सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥ गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥ दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥ दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 961) मः ५ ॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥ इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥ इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥ मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥ अम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥ नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 961) पउड़ी ॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥ जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥ जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥ जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥ जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥ जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥ जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥ जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥८॥

(राग रामकली -- SGGS 961) सलोक महला ५ ॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥ तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 961) मः ५ ॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥ हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 961) पउड़ी ॥
तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाहि ॥ ओथै तेरी रख अगनी उदर माहि ॥ सुणि कै जम के दूत नाइ तेरै छडि जाहि ॥ भउजलु बिखमु असगाहु गुर सबदी पारि पाहि ॥ जिन कउ लगी पिआस अम्रितु सेइ खाहि ॥ कलि महि एहो पुंनु गुण गोविंद गाहि ॥ सभसै नो किरपालु सम्हाले साहि साहि ॥ बिरथा कोइ न जाइ जि आवै तुधु आहि ॥९॥

(राग रामकली -- SGGS 962) सलोक मः ५ ॥
दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥ अगमु अगोचरु साहिबो समरथु सचु दातारु ॥ तू निहचलु निरवैरु सचु सचा तुधु दरबारु ॥ कीमति कहणु न जाईऐ अंतु न पारावारु ॥ प्रभु छोडि होरु जि मंगणा सभु बिखिआ रस छारु ॥ से सुखीए सचु साह से जिन सचा बिउहारु ॥ जिना लगी प्रीति प्रभ नाम सहज सुख सारु ॥ नानक इकु आराधे संतन रेणारु ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 962) मः ५ ॥
अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥ अवर सिआणप छाडि देहि नानक उधरसि नाइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 962) पउड़ी ॥
ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥ ना तू आवहि वसि बेद पड़ावणे ॥ ना तू आवहि वसि तीरथि नाईऐ ॥ ना तू आवहि वसि धरती धाईऐ ॥ ना तू आवहि वसि कितै सिआणपै ॥ ना तू आवहि वसि बहुता दानु दे ॥ सभु को तेरै वसि अगम अगोचरा ॥ तू भगता कै वसि भगता ताणु तेरा ॥१०॥

(राग रामकली -- SGGS 962) सलोक मः ५ ॥
आपे वैदु आपि नाराइणु ॥ एहि वैद जीअ का दुखु लाइण ॥ गुर का सबदु अम्रित रसु खाइण ॥ नानक जिसु मनि वसै तिस के सभि दूख मिटाइण ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 962) मः ५ ॥
हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥ हुकमे दुखु सुखु सम करि सहै ॥ हुकमे नामु जपै दिनु राति ॥ नानक जिस नो होवै दाति ॥ हुकमि मरै हुकमे ही जीवै ॥ हुकमे नान्हा वडा थीवै ॥ हुकमे सोग हरख आनंद ॥ हुकमे जपै निरोधर गुरमंत ॥ हुकमे आवणु जाणु रहाए ॥ नानक जा कउ भगती लाए ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 962) पउड़ी ॥
हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥ हउ तिसु ढाढी बलिहार जि गावै गुण अपार ॥ सो ढाढी धनु धंनु जिसु लोड़े निरंकारु ॥ सो ढाढी भागठु जिसु सचा दुआर बारु ॥ ओहु ढाढी तुधु धिआइ कलाणे दिनु रैणार ॥ मंगै अम्रित नामु न आवै कदे हारि ॥ कपड़ु भोजनु सचु रहदा लिवै धार ॥ सो ढाढी गुणवंतु जिस नो प्रभ पिआरु ॥११॥

(राग रामकली -- SGGS 963) सलोक मः ५ ॥
अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥ मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥ उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥ जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥ सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥ नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 963) मः ५ ॥
नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥ भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥ भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥ भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥ भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥ भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥ भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥ भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 963) पउड़ी ॥
वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥ पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥ दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥ त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥ रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥ तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥ खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥ तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥१२॥

(राग रामकली -- SGGS 963) सलोक मः ५ ॥
मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसु्मभै भुली ॥ तउ सजण की मै कीम न पउदी हउ तुधु बिनु अढु न लहदी ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 963) मः ५ ॥
ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥ हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 963) पउड़ी ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥ जिसु तू वुठा चिति तिसु कदे न हारणो ॥ जिसु मिलिआ पूरा गुरू सु सरपर तारणो ॥ जिस नो लाए सचि तिसु सचु सम्हालणो ॥ जिसु आइआ हथि निधानु सु रहिआ भालणो ॥ जिस नो इको रंगु भगतु सो जानणो ॥ ओहु सभना की रेणु बिरही चारणो ॥ सभि तेरे चोज विडाण सभु तेरा कारणो ॥१३॥

(राग रामकली -- SGGS 963) सलोक मः ५ ॥
उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥ हभे साक कूड़ावे डिठे तउ पलै तैडै लागी ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 963) मः ५ ॥
फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥ ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 964) पउड़ी ॥
सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥ जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥ जिस नो विसरै नाउ सु निरधनु कांढीऐ ॥ जिस नो विसरै नाउ सु जोनी हांढीऐ ॥ जिसु खसमु न आवै चिति तिसु जमु डंडु दे ॥ जिसु खसमु न आवी चिति रोगी से गणे ॥ जिसु खसमु न आवी चिति सु खरो अहंकारीआ ॥ सोई दुहेला जगि जिनि नाउ विसारीआ ॥१४॥

(राग रामकली -- SGGS 964) सलोक मः ५ ॥
तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥ घोलि घुमाई तिसु मित्र विचोले जै मिलि कंतु पछाणा ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 964) मः ५ ॥
पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥ मुखु सुहावा जां तउ जसु गावै जीउ पइआ तउ सरणी ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 964) पउड़ी ॥
मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥ घर का होआ बंधानु बहुड़ि न धावीआ ॥ बिनठी दुरमति दुरतु सोइ कूड़ावीआ ॥ सीलवंति परधानि रिदै सचावीआ ॥ अंतरि बाहरि इकु इक रीतावीआ ॥ मनि दरसन की पिआस चरण दासावीआ ॥ सोभा बणी सीगारु खसमि जां रावीआ ॥ मिलीआ आइ संजोगि जां तिसु भावीआ ॥१५॥

(राग रामकली -- SGGS 964) सलोक मः ५ ॥
हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥ तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 964) मः ५ ॥
देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥ हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 964) पउड़ी ॥
वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥ सिरि साहा पातिसाहु निहचलु चउरु छतु ॥ जो भावै पारब्रहम सोई सचु निआउ ॥ जे भावै पारब्रहम निथावे मिलै थाउ ॥ जो कीन्ही करतारि साई भली गल ॥ जिन्ही पछाता खसमु से दरगाह मल ॥ सही तेरा फुरमानु किनै न फेरीऐ ॥ कारण करण करीम कुदरति तेरीऐ ॥१६॥

(राग रामकली -- SGGS 964) सलोक मः ५ ॥
सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥ पंधि जुलंदड़ी मेरा अंदरु ठंढा गुर दरसनु देखि निहाली ॥१॥


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