Pt 27 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 27 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सूही -- SGGS 779) रागु सूही छंत महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥ तूं सागरो रतनागरो हउ सार न जाणा तेरी राम ॥ सार न जाणा तू वड दाणा करि मिहरमति सांई ॥ किरपा कीजै सा मति दीजै आठ पहर तुधु धिआई ॥ गरबु न कीजै रेण होवीजै ता गति जीअरे तेरी ॥ सभ ऊपरि नानक का ठाकुरु मै जेही घण चेरी राम ॥१॥

तुम्ह गउहर अति गहिर ग्मभीरा तुम पिर हम बहुरीआ राम ॥ तुम वडे वडे वड ऊचे हउ इतनीक लहुरीआ राम ॥ हउ किछु नाही एको तूहै आपे आपि सुजाना ॥ अम्रित द्रिसटि निमख प्रभ जीवा सरब रंग रस माना ॥ चरणह सरनी दासह दासी मनि मउलै तनु हरीआ ॥ नानक ठाकुरु सरब समाणा आपन भावन करीआ ॥२॥

तुझु ऊपरि मेरा है माणा तूहै मेरा ताणा राम ॥ सुरति मति चतुराई तेरी तू जाणाइहि जाणा राम ॥ सोई जाणै सोई पछाणै जा कउ नदरि सिरंदे ॥ मनमुखि भूली बहुती राही फाथी माइआ फंदे ॥ ठाकुर भाणी सा गुणवंती तिन ही सभ रंग माणा ॥ नानक की धर तूहै ठाकुर तू नानक का माणा ॥३॥

हउ वारी वंञा घोली वंञा तू परबतु मेरा ओल्हा राम ॥ हउ बलि जाई लख लख लख बरीआ जिनि भ्रमु परदा खोल्हा राम ॥ मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥ प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥ भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल्हा ॥ कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल्हा ॥४॥१॥४॥

(राग सूही -- SGGS 780) सूही महला ५ ॥
साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥ मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥ अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥ ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥ सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥१॥

ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥ जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥ हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥ गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥ नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥२॥

हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥ संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥ परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥ सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥ जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥ नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥३॥

गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥ रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥ अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥ सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥ पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥ कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥४॥२॥५॥

(राग सूही -- SGGS 780) सूही महला ५ ॥
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥ लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥ हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥ भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥ नानक कउ प्रभ किरपा कीजै नेत्र देखहि दरसु तेरा ॥१॥

कोटि करन दीजहि प्रभ प्रीतम हरि गुण सुणीअहि अबिनासी राम ॥ सुणि सुणि इहु मनु निरमलु होवै कटीऐ काल की फासी राम ॥ कटीऐ जम फासी सिमरि अबिनासी सगल मंगल सुगिआना ॥ हरि हरि जपु जपीऐ दिनु राती लागै सहजि धिआना ॥ कलमल दुख जारे प्रभू चितारे मन की दुरमति नासी ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै हरि गुण सुणीअहि अविनासी ॥२॥

करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम ॥ भव सागर नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम ॥ भवजलु तरिआ हरि हरि सिमरिआ सगल मनोरथ पूरे ॥ महा बिकार गए सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥ मन बांछत फल पाए सगले कुदरति कीम अपारगि ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै मनु सदा चलै तेरै मारगि ॥३॥

एहो वरु एहा वडिआई इहु धनु होइ वडभागा राम ॥ एहो रंगु एहो रस भोगा हरि चरणी मनु लागा राम ॥ मनु लागा चरणे प्रभ की सरणे करण कारण गोपाला ॥ सभु किछु तेरा तू प्रभु मेरा मेरे ठाकुर दीन दइआला ॥ मोहि निरगुण प्रीतम सुख सागर संतसंगि मनु जागा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा कीन्ही चरण कमल मनु लागा ॥४॥३॥६॥

(राग सूही -- SGGS 781) सूही महला ५ ॥
हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सगले पाप तजावहि राम ॥ हरि गुण गाइ परम पदु पाइआ प्रभ की ऊतम बाणी ॥ सहज कथा प्रभ की अति मीठी कथी अकथ कहाणी ॥ भला संजोगु मूरतु पलु साचा अबिचल नीव रखाई ॥ जन नानक प्रभ भए दइआला सरब कला बणि आई ॥१॥

आनंदा वजहि नित वाजे पारब्रहमु मनि वूठा राम ॥ गुरमुखे सचु करणी सारी बिनसे भ्रम भै झूठा राम ॥ अनहद बाणी गुरमुखि वखाणी जसु सुणि सुणि मनु तनु हरिआ ॥ सरब सुखा तिस ही बणि आए जो प्रभि अपना करिआ ॥ घर महि नव निधि भरे भंडारा राम नामि रंगु लागा ॥ नानक जन प्रभु कदे न विसरै पूरन जा के भागा ॥२॥

छाइआ प्रभि छत्रपति कीन्ही सगली तपति बिनासी राम ॥ दूख पाप का डेरा ढाठा कारजु आइआ रासी राम ॥ हरि प्रभि फुरमाइआ मिटी बलाइआ साचु धरमु पुंनु फलिआ ॥ सो प्रभु अपुना सदा धिआईऐ सोवत बैसत खलिआ ॥ गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥ जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥३॥

मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥ मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥ गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥ गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥ करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥ बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥४॥४॥७॥

(राग सूही -- SGGS 782) सूही महला ५ ॥
भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥ बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥ गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥ जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥ दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥ हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥१॥

संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥ आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥ करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥ अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥ सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन्हे ॥ कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥२॥

अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥ आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥ सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥ कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥ मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥ कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥३॥

गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥ सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥ जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥ ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥ पेखि दरसनु नानक बिगसे आपि लए मिलाए ॥४॥५॥८॥

(राग सूही -- SGGS 783) सूही महला ५ ॥
अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥ मन इछे सेई फल पाए करतै आपि वसाइआ राम ॥ करतै आपि वसाइआ सरब सुख पाइआ पुत भाई सिख बिगासे ॥ गुण गावहि पूरन परमेसुर कारजु आइआ रासे ॥ प्रभु आपि सुआमी आपे रखा आपि पिता आपि माइआ ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि एहु थानु सुहाइआ ॥१॥

घर मंदर हटनाले सोहे जिसु विचि नामु निवासी राम ॥ संत भगत हरि नामु अराधहि कटीऐ जम की फासी राम ॥ काटी जम फासी प्रभि अबिनासी हरि हरि नामु धिआए ॥ सगल समग्री पूरन होई मन इछे फल पाए ॥ संत सजन सुखि माणहि रलीआ दूख दरद भ्रम नासी ॥ सबदि सवारे सतिगुरि पूरै नानक सद बलि जासी ॥२॥

दाति खसम की पूरी होई नित नित चड़ै सवाई राम ॥ पारब्रहमि खसमाना कीआ जिस दी वडी वडिआई राम ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा सो प्रभु भइआ दइआला ॥ जीअ जंत सभि सुखी वसाए प्रभि आपे करि प्रतिपाला ॥ दह दिस पूरि रहिआ जसु सुआमी कीमति कहणु न जाई ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि अबिचल नीव रखाई ॥३॥

गिआन धिआन पूरन परमेसुर हरि हरि कथा नित सुणीऐ राम ॥ अनहद चोज भगत भव भंजन अनहद वाजे धुनीऐ राम ॥ अनहद झुणकारे ततु बीचारे संत गोसटि नित होवै ॥ हरि नामु अराधहि मैलु सभ काटहि किलविख सगले खोवै ॥ तह जनम न मरणा आवण जाणा बहुड़ि न पाईऐ जोनीऐ ॥ नानक गुरु परमेसरु पाइआ जिसु प्रसादि इछ पुनीऐ ॥४॥६॥९॥

(राग सूही -- SGGS 783) सूही महला ५ ॥
संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कमु करावणि आइआ राम ॥ धरति सुहावी तालु सुहावा विचि अम्रित जलु छाइआ राम ॥ अम्रित जलु छाइआ पूरन साजु कराइआ सगल मनोरथ पूरे ॥ जै जै कारु भइआ जग अंतरि लाथे सगल विसूरे ॥ पूरन पुरख अचुत अबिनासी जसु वेद पुराणी गाइआ ॥ अपना बिरदु रखिआ परमेसरि नानक नामु धिआइआ ॥१॥

नव निधि सिधि रिधि दीने करते तोटि न आवै काई राम ॥ खात खरचत बिलछत सुखु पाइआ करते की दाति सवाई राम ॥ दाति सवाई निखुटि न जाई अंतरजामी पाइआ ॥ कोटि बिघन सगले उठि नाठे दूखु न नेड़ै आइआ ॥ सांति सहज आनंद घनेरे बिनसी भूख सबाई ॥ नानक गुण गावहि सुआमी के अचरजु जिसु वडिआई राम ॥२॥

जिस का कारजु तिन ही कीआ माणसु किआ वेचारा राम ॥ भगत सोहनि हरि के गुण गावहि सदा करहि जैकारा राम ॥ गुण गाइ गोबिंद अनद उपजे साधसंगति संगि बनी ॥ जिनि उदमु कीआ ताल केरा तिस की उपमा किआ गनी ॥ अठसठि तीरथ पुंन किरिआ महा निरमल चारा ॥ पतित पावनु बिरदु सुआमी नानक सबद अधारा ॥३॥

गुण निधान मेरा प्रभु करता उसतति कउनु करीजै राम ॥ संता की बेनंती सुआमी नामु महा रसु दीजै राम ॥ नामु दीजै दानु कीजै बिसरु नाही इक खिनो ॥ गुण गोपाल उचरु रसना सदा गाईऐ अनदिनो ॥ जिसु प्रीति लागी नाम सेती मनु तनु अम्रित भीजै ॥ बिनवंति नानक इछ पुंनी पेखि दरसनु जीजै ॥४॥७॥१०॥

(राग सूही -- SGGS 784) रागु सूही महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥ हउ समलि थकी जी ओहु कदे न बोलै कउरा ॥ कउड़ा बोलि न जानै पूरन भगवानै अउगणु को न चितारे ॥ पतित पावनु हरि बिरदु सदाए इकु तिलु नही भंनै घाले ॥ घट घट वासी सरब निवासी नेरै ही ते नेरा ॥ नानक दासु सदा सरणागति हरि अम्रित सजणु मेरा ॥१॥

हउ बिसमु भई जी हरि दरसनु देखि अपारा ॥ मेरा सुंदरु सुआमी जी हउ चरन कमल पग छारा ॥ प्रभ पेखत जीवा ठंढी थीवा तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ आदि अंति मधि प्रभु रविआ जलि थलि महीअलि सोई ॥ चरन कमल जपि सागरु तरिआ भवजल उतरे पारा ॥ नानक सरणि पूरन परमेसुर तेरा अंतु न पारावारा ॥२॥

हउ निमख न छोडा जी हरि प्रीतम प्रान अधारो ॥ गुरि सतिगुर कहिआ जी साचा अगम बीचारो ॥ मिलि साधू दीना ता नामु लीना जनम मरण दुख नाठे ॥ सहज सूख आनंद घनेरे हउमै बिनठी गाठे ॥ सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥ नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥३॥

मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥ सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥ प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥ धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥ स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥ नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥४॥१॥११॥

(राग बिलावलु -- SGGS 801) रागु बिलावलु महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥ किउ मिलीऐ प्रभ अबिनासी तोहि ॥ करि किरपा मोहि मारगि पावहु ॥ साधसंगति कै अंचलि लावहु ॥१॥

किउ तरीऐ बिखिआ संसारु ॥ सतिगुरु बोहिथु पावै पारि ॥१॥ रहाउ ॥

पवन झुलारे माइआ देइ ॥ हरि के भगत सदा थिरु सेइ ॥ हरख सोग ते रहहि निरारा ॥ सिर ऊपरि आपि गुरू रखवारा ॥२॥

पाइआ वेड़ु माइआ सरब भुइअंगा ॥ हउमै पचे दीपक देखि पतंगा ॥ सगल सीगार करे नही पावै ॥ जा होइ क्रिपालु ता गुरू मिलावै ॥३॥

हउ फिरउ उदासी मै इकु रतनु दसाइआ ॥ निरमोलकु हीरा मिलै न उपाइआ ॥ हरि का मंदरु तिसु महि लालु ॥ गुरि खोलिआ पड़दा देखि भई निहालु ॥४॥

जिनि चाखिआ तिसु आइआ सादु ॥ जिउ गूंगा मन महि बिसमादु ॥ आनद रूपु सभु नदरी आइआ ॥ जन नानक हरि गुण आखि समाइआ ॥५॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 801) बिलावलु महला ५ ॥
सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥ सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥ बिघनु न लागै जपि अलख अभेव ॥१॥

धरति पुनीत भई गुन गाए ॥ दुरतु गइआ हरि नामु धिआए ॥१॥ रहाउ ॥

सभनी थांई रविआ आपि ॥ आदि जुगादि जा का वड परतापु ॥ गुर परसादि न होइ संतापु ॥२॥

गुर के चरन लगे मनि मीठे ॥ निरबिघन होइ सभ थांई वूठे ॥ सभि सुख पाए सतिगुर तूठे ॥३॥

पारब्रहम प्रभ भए रखवाले ॥ जिथै किथै दीसहि नाले ॥ नानक दास खसमि प्रतिपाले ॥४॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 801) बिलावलु महला ५ ॥
सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥ अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥ मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥ करि किरपा हरि चरन धिआई ॥१॥

दइआ करहु बसहु मनि आइ ॥ मोहि निरगुन लीजै लड़ि लाइ ॥ रहाउ ॥ प्रभु चिति आवै ता कैसी भीड़ ॥ हरि सेवक नाही जम पीड़ ॥ सरब दूख हरि सिमरत नसे ॥ जा कै संगि सदा प्रभु बसै ॥२॥

प्रभ का नामु मनि तनि आधारु ॥ बिसरत नामु होवत तनु छारु ॥ प्रभ चिति आए पूरन सभ काज ॥ हरि बिसरत सभ का मुहताज ॥३॥

चरन कमल संगि लागी प्रीति ॥ बिसरि गई सभ दुरमति रीति ॥ मन तन अंतरि हरि हरि मंत ॥ नानक भगतन कै घरि सदा अनंद ॥४॥३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 802) रागु बिलावलु महला ५ घरु २ यानड़ीए कै घरि गावणा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥ अवर सिआणपा बिरथीआ पिआरे राखन कउ तुम एक ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु पूरा जे मिलै पिआरे सो जनु होत निहाला ॥ गुर की सेवा सो करे पिआरे जिस नो होइ दइआला ॥ सफल मूरति गुरदेउ सुआमी सरब कला भरपूरे ॥ नानक गुरु पारब्रहमु परमेसरु सदा सदा हजूरे ॥१॥

सुणि सुणि जीवा सोइ तिना की जिन्ह अपुना प्रभु जाता ॥ हरि नामु अराधहि नामु वखाणहि हरि नामे ही मनु राता ॥ सेवकु जन की सेवा मागै पूरै करमि कमावा ॥ नानक की बेनंती सुआमी तेरे जन देखणु पावा ॥२॥

वडभागी से काढीअहि पिआरे संतसंगति जिना वासो ॥ अम्रित नामु अराधीऐ निरमलु मनै होवै परगासो ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ पिआरे चूकै जम की काणे ॥ तिना परापति दरसनु नानक जो प्रभ अपणे भाणे ॥३॥

ऊच अपार बेअंत सुआमी कउणु जाणै गुण तेरे ॥ गावते उधरहि सुणते उधरहि बिनसहि पाप घनेरे ॥ पसू परेत मुगध कउ तारे पाहन पारि उतारै ॥ नानक दास तेरी सरणाई सदा सदा बलिहारै ॥४॥१॥४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 802) बिलावलु महला ५ ॥
बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥ बिनु रस चाखे बुडि गई सगली सुखी न होवत जीओ ॥ मानु महतु न सकति ही काई साधा दासी थीओ ॥ नानक से दरि सोभावंते जो प्रभि अपुनै कीओ ॥१॥

हरिचंदउरी चित भ्रमु सखीए म्रिग त्रिसना द्रुम छाइआ ॥ चंचलि संगि न चालती सखीए अंति तजि जावत माइआ ॥ रसि भोगण अति रूप रस माते इन संगि सूखु न पाइआ ॥ धंनि धंनि हरि साध जन सखीए नानक जिनी नामु धिआइआ ॥२॥

जाइ बसहु वडभागणी सखीए संता संगि समाईऐ ॥ तह दूख न भूख न रोगु बिआपै चरन कमल लिव लाईऐ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा निहचलु सरणी पाईऐ ॥ प्रेम बिछोहु न मोहु बिआपै नानक हरि एकु धिआईऐ ॥३॥

द्रिसटि धारि मनु बेधिआ पिआरे रतड़े सहजि सुभाए ॥ सेज सुहावी संगि मिलि प्रीतम अनद मंगल गुण गाए ॥ सखी सहेली राम रंगि राती मन तन इछ पुजाए ॥ नानक अचरजु अचरज सिउ मिलिआ कहणा कछू न जाए ॥४॥२॥५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 803) रागु बिलावलु महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एक रूप सगलो पासारा ॥ आपे बनजु आपि बिउहारा ॥१॥

ऐसो गिआनु बिरलो ई पाए ॥ जत जत जाईऐ तत द्रिसटाए ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक रंग निरगुन इक रंगा ॥ आपे जलु आप ही तरंगा ॥२॥

आप ही मंदरु आपहि सेवा ॥ आप ही पूजारी आप ही देवा ॥३॥

आपहि जोग आप ही जुगता ॥ नानक के प्रभ सद ही मुकता ॥४॥१॥६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 803) बिलावलु महला ५ ॥
आपि उपावन आपि सधरना ॥ आपि करावन दोसु न लैना ॥१॥

आपन बचनु आप ही करना ॥ आपन बिभउ आप ही जरना ॥१॥ रहाउ ॥

आप ही मसटि आप ही बुलना ॥ आप ही अछलु न जाई छलना ॥२॥

आप ही गुपत आपि परगटना ॥ आप ही घटि घटि आपि अलिपना ॥३॥

आपे अविगतु आप संगि रचना ॥ कहु नानक प्रभ के सभि जचना ॥४॥२॥७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 803) बिलावलु महला ५ ॥
भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥ ऐसा गुरु वडभागी पाइआ ॥१॥

सिमरि मना राम नामु चितारे ॥ बसि रहे हिरदै गुर चरन पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥

कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीना ॥ बंधन काटि मुकति गुरि कीना ॥२॥

दुख सुख करत जनमि फुनि मूआ ॥ चरन कमल गुरि आस्रमु दीआ ॥३॥

अगनि सागर बूडत संसारा ॥ नानक बाह पकरि सतिगुरि निसतारा ॥४॥३॥८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
तनु मनु धनु अरपउ सभु अपना ॥ कवन सु मति जितु हरि हरि जपना ॥१॥

करि आसा आइओ प्रभ मागनि ॥ तुम्ह पेखत सोभा मेरै आगनि ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जुगति करि बहुतु बीचारउ ॥ साधसंगि इसु मनहि उधारउ ॥२॥

मति बुधि सुरति नाही चतुराई ॥ ता मिलीऐ जा लए मिलाई ॥३॥

नैन संतोखे प्रभ दरसनु पाइआ ॥ कहु नानक सफलु सो आइआ ॥४॥४॥९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
मात पिता सुत साथि न माइआ ॥ साधसंगि सभु दूखु मिटाइआ ॥१॥

रवि रहिआ प्रभु सभ महि आपे ॥ हरि जपु रसना दुखु न विआपे ॥१॥ रहाउ ॥

तिखा भूख बहु तपति विआपिआ ॥ सीतल भए हरि हरि जसु जापिआ ॥२॥

कोटि जतन संतोखु न पाइआ ॥ मनु त्रिपताना हरि गुण गाइआ ॥३॥

देहु भगति प्रभ अंतरजामी ॥ नानक की बेनंती सुआमी ॥४॥५॥१०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
गुरु पूरा वडभागी पाईऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु धिआईऐ ॥१॥

पारब्रहम प्रभ तेरी सरना ॥ किलबिख काटै भजु गुर के चरना ॥१॥ रहाउ ॥

अवरि करम सभि लोकाचार ॥ मिलि साधू संगि होइ उधार ॥२॥

सिम्रिति सासत बेद बीचारे ॥ जपीऐ नामु जितु पारि उतारे ॥३॥

जन नानक कउ प्रभ किरपा करीऐ ॥ साधू धूरि मिलै निसतरीऐ ॥४॥६॥११॥

(राग बिलावलु -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
गुर का सबदु रिदे महि चीना ॥ सगल मनोरथ पूरन आसीना ॥१॥

संत जना का मुखु ऊजलु कीना ॥ करि किरपा अपुना नामु दीना ॥१॥ रहाउ ॥

अंध कूप ते करु गहि लीना ॥ जै जै कारु जगति प्रगटीना ॥२॥

नीचा ते ऊच ऊन पूरीना ॥ अम्रित नामु महा रसु लीना ॥३॥

मन तन निरमल पाप जलि खीना ॥ कहु नानक प्रभ भए प्रसीना ॥४॥७॥१२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
सगल मनोरथ पाईअहि मीता ॥ चरन कमल सिउ लाईऐ चीता ॥१॥

हउ बलिहारी जो प्रभू धिआवत ॥ जलनि बुझै हरि हरि गुन गावत ॥१॥ रहाउ ॥

सफल जनमु होवत वडभागी ॥ साधसंगि रामहि लिव लागी ॥२॥

मति पति धनु सुख सहज अनंदा ॥ इक निमख न विसरहु परमानंदा ॥३॥

हरि दरसन की मनि पिआस घनेरी ॥ भनति नानक सरणि प्रभ तेरी ॥४॥८॥१३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥ दइआ धारि अपुना करि लीना ॥१॥

मेरा मनु तनु हरि गोपालि सुहाइआ ॥ करि किरपा प्रभु घर महि आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

भगति वछल भै काटनहारे ॥ संसार सागर अब उतरे पारे ॥२॥

पतित पावन प्रभ बिरदु बेदि लेखिआ ॥ पारब्रहमु सो नैनहु पेखिआ ॥३॥

साधसंगि प्रगटे नाराइण ॥ नानक दास सभि दूख पलाइण ॥४॥९॥१४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
कवनु जानै प्रभ तुम्हरी सेवा ॥ प्रभ अविनासी अलख अभेवा ॥१॥

गुण बेअंत प्रभ गहिर ग्मभीरे ॥ ऊच महल सुआमी प्रभ मेरे ॥ तू अपर्मपर ठाकुर मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

एकस बिनु नाही को दूजा ॥ तुम्ह ही जानहु अपनी पूजा ॥२॥

आपहु कछू न होवत भाई ॥ जिसु प्रभु देवै सो नामु पाई ॥३॥

कहु नानक जो जनु प्रभ भाइआ ॥ गुण निधान प्रभु तिन ही पाइआ ॥४॥१०॥१५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥ हरि रसु छोडि बिखिआ फलु चाखिआ ॥१॥

भजु गोबिद सभ छोडि जंजाल ॥ जब जमु आइ संघारै मूड़े तब तनु बिनसि जाइ बेहाल ॥१॥ रहाउ ॥

तनु मनु धनु अपना करि थापिआ ॥ करनहारु इक निमख न जापिआ ॥२॥

महा मोह अंध कूप परिआ ॥ पारब्रहमु माइआ पटलि बिसरिआ ॥३॥

वडै भागि प्रभ कीरतनु गाइआ ॥ संतसंगि नानक प्रभु पाइआ ॥४॥११॥१६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मात पिता सुत बंधप भाई ॥ नानक होआ पारब्रहमु सहाई ॥१॥

सूख सहज आनंद घणे ॥ गुरु पूरा पूरी जा की बाणी अनिक गुणा जा के जाहि न गणे ॥१॥ रहाउ ॥

सगल सरंजाम करे प्रभु आपे ॥ भए मनोरथ सो प्रभु जापे ॥२॥

अरथ धरम काम मोख का दाता ॥ पूरी भई सिमरि सिमरि बिधाता ॥३॥

साधसंगि नानकि रंगु माणिआ ॥ घरि आइआ पूरै गुरि आणिआ ॥४॥१२॥१७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपत नर जीवे ॥ मरि खुआरु साकत नर थीवे ॥१॥

राम नामु होआ रखवारा ॥ झख मारउ साकतु वेचारा ॥२॥

निंदा करि करि पचहि घनेरे ॥ मिरतक फास गलै सिरि पैरे ॥३॥

कहु नानक जपहि जन नाम ॥ ता के निकटि न आवै जाम ॥४॥१३॥१८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) रागु बिलावलु महला ५ घरु ४ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥ पलु पलु निमख सदा हरि जपने ॥१॥

चरन कमल प्रभ के नित धिआवउ ॥ कवन सु मति जितु प्रीतमु पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसी क्रिपा करहु प्रभ मेरे ॥ हरि नानक बिसरु न काहू बेरे ॥२॥१॥१९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥ रोग गए सगले सुख पाए ॥१॥

गुरि दुखु काटिआ दीनो दानु ॥ सफल जनमु जीवन परवानु ॥१॥ रहाउ ॥

अकथ कथा अम्रित प्रभ बानी ॥ कहु नानक जपि जीवे गिआनी ॥२॥२॥२०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥ सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥१॥ रहाउ ॥

ताप पाप संताप बिनासे ॥ हरि सिमरत किलविख सभि नासे ॥१॥

अनदु करहु मिलि सुंदर नारी ॥ गुरि नानकि मेरी पैज सवारी ॥२॥३॥२१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥ दिनु दिनु छिजत बिकार करत अउध फाही फाथा जम कै जाल ॥१॥

तेरी सरणि प्रभ दीन दइआला ॥ महा बिखम सागरु अति भारी उधरहु साधू संगि रवाला ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ सुखदाते समरथ सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरा माल ॥ भ्रम के बंधन काटहु परमेसर नानक के प्रभ सदा क्रिपाल ॥२॥४॥२२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम्हारिआ ॥ साध जना होए किरपाला बिगसे सभि परवारिआ ॥१॥

कारजु सतिगुरि आपि सवारिआ ॥ वडी आरजा हरि गोबिंद की सूख मंगल कलिआण बीचारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

वण त्रिण त्रिभवण हरिआ होए सगले जीअ साधारिआ ॥ मन इछे नानक फल पाए पूरन इछ पुजारिआ ॥२॥५॥२३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
जिसु ऊपरि होवत दइआलु ॥ हरि सिमरत काटै सो कालु ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि भजीऐ गोपालु ॥ गुन गावत तूटै जम जालु ॥१॥

आपे सतिगुरु आपे प्रतिपाल ॥ नानकु जाचै साध रवाल ॥२॥६॥२४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
मन महि सिंचहु हरि हरि नाम ॥ अनदिनु कीरतनु हरि गुण गाम ॥१॥

ऐसी प्रीति करहु मन मेरे ॥ आठ पहर प्रभ जानहु नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक जा के निरमल भाग ॥ हरि चरनी ता का मनु लाग ॥२॥७॥२५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
रोगु गइआ प्रभि आपि गवाइआ ॥ नीद पई सुख सहज घरु आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

रजि रजि भोजनु खावहु मेरे भाई ॥ अम्रित नामु रिद माहि धिआई ॥१॥

नानक गुर पूरे सरनाई ॥ जिनि अपने नाम की पैज रखाई ॥२॥८॥२६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
सतिगुर करि दीने असथिर घर बार ॥ रहाउ ॥ जो जो निंद करै इन ग्रिहन की तिसु आगै ही मारै करतार ॥१॥

नानक दास ता की सरनाई जा को सबदु अखंड अपार ॥२॥९॥२७॥


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