Pt 26 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 26 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सूही -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

(राग सूही -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ ॥

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

(राग सूही -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ ॥

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥ उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥४॥२७॥३३॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
साधसंगि तरै भै सागरु ॥ हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥१॥

सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥ दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥१॥ रहाउ ॥

जीवन पदवी हरि का नाउ ॥ मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥२॥

आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥ पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥३॥

सरणि पए जपि दीन दइआला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥४॥२८॥३४॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥ झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥१॥

जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥ जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के दास हरि सेती राते ॥ राम रसाइणि अनदिनु माते ॥२॥

बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥ जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥

उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥ नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥४॥२९॥३५॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥ सरब सूख फिरि नही डोलाइआ ॥१॥

गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन्हे ॥ ता ते करतै असथिरु कीन्हे ॥१॥ रहाउ ॥

गुण गावत अचुत अबिनासी ॥ ता ते काटी जम की फासी ॥२॥

करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥ सदा अनदु नानक गुण गाए ॥३॥३०॥३६॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
अम्रित बचन साध की बाणी ॥ जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥१॥ रहाउ ॥

कली काल के मिटे कलेसा ॥ एको नामु मन महि परवेसा ॥१॥

साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥ नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥२॥३१॥३७॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ घरु ३ ॥
गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥ दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ ॥ करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥ जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥१॥

अम्रित नामु चलै जपि नाला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥२॥३२॥३८॥

(राग सूही -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥ आपे थमै सचा सोई ॥१॥

हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥ करण कारण समरथु अपारु ॥१॥ रहाउ ॥

सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥ नानक रखा आपे होआ ॥२॥३३॥३९॥

(राग सूही -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥ पूरै भागि परापति होई ॥ रहाउ ॥ सिआम सुंदर तजि नीद किउ आई ॥ महा मोहनी दूता लाई ॥१॥

प्रेम बिछोहा करत कसाई ॥ निरदै जंतु तिसु दइआ न पाई ॥२॥

अनिक जनम बीतीअन भरमाई ॥ घरि वासु न देवै दुतर माई ॥३॥

दिनु रैनि अपना कीआ पाई ॥ किसु दोसु न दीजै किरतु भवाई ॥४॥

सुणि साजन संत जन भाई ॥ चरण सरण नानक गति पाई ॥५॥३४॥४०॥

(राग सूही -- SGGS 745) रागु सूही महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥ कित ही कामि न धउलहर जितु हरि बिसराए ॥१॥ रहाउ ॥

अनदु गरीबी साधसंगि जितु प्रभ चिति आए ॥ जलि जाउ एहु बडपना माइआ लपटाए ॥१॥

पीसनु पीसि ओढि कामरी सुखु मनु संतोखाए ॥ ऐसो राजु न कितै काजि जितु नह त्रिपताए ॥२॥

नगन फिरत रंगि एक कै ओहु सोभा पाए ॥ पाट पट्मबर बिरथिआ जिह रचि लोभाए ॥३॥

सभु किछु तुम्हरै हाथि प्रभ आपि करे कराए ॥ सासि सासि सिमरत रहा नानक दानु पाए ॥४॥१॥४१॥

(राग सूही -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥ भाई मीत सुत सगल ते जीअ हूं ते पिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

केसा का करि बीजना संत चउरु ढुलावउ ॥ सीसु निहारउ चरण तलि धूरि मुखि लावउ ॥१॥

मिसट बचन बेनती करउ दीन की निआई ॥ तजि अभिमानु सरणी परउ हरि गुण निधि पाई ॥२॥

अवलोकन पुनह पुनह करउ जन का दरसारु ॥ अम्रित बचन मन महि सिंचउ बंदउ बार बार ॥३॥

चितवउ मनि आसा करउ जन का संगु मागउ ॥ नानक कउ प्रभ दइआ करि दास चरणी लागउ ॥४॥२॥४२॥

(राग सूही -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥ राखि लेहु इहु बिखई जीउ देहु अपुना नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जा ते नाही को सुखी ता कै पाछै जाउ ॥ छोडि जाहि जो सगल कउ फिरि फिरि लपटाउ ॥१॥

करहु क्रिपा करुणापते तेरे हरि गुण गाउ ॥ नानक की प्रभ बेनती साधसंगि समाउ ॥२॥३॥४३॥

(राग सूही -- SGGS 746) रागु सूही महला ५ घरु ५ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥ जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥ विचि मन कोटवरीआ ॥ निज मंदरि पिरीआ ॥ तहा आनद करीआ ॥ नह मरीआ नह जरीआ ॥१॥

किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥ बिखना घिरीआ ॥ अब साधू संगि परीआ ॥ हरि दुआरै खरीआ ॥ दरसनु करीआ ॥ नानक गुर मिरीआ ॥ बहुरि न फिरीआ ॥२॥१॥४४॥

(राग सूही -- SGGS 746) सूही महला ५ ॥
रासि मंडलु कीनो आखारा ॥ सगलो साजि रखिओ पासारा ॥१॥ रहाउ ॥

बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥ पेखै खुसी भोग नही हारा ॥ सभि रस लैत बसत निरारा ॥१॥

बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥ कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥ नानक रेण संत चरनारा ॥२॥२॥४५॥

(राग सूही -- SGGS 746) सूही महला ५ ॥
तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥ भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥१॥

सुनि सुनि ही डराइआ ॥ कररो ध्रमराइआ ॥२॥

ग्रिह अंध कूपाइआ ॥ पावकु सगराइआ ॥३॥

गही ओट साधाइआ ॥ नानक हरि धिआइआ ॥ अब मै पूरा पाइआ ॥४॥३॥४६॥

(राग सूही -- SGGS 746) रागु सूही महला ५ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥ तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥१॥

भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥१॥ रहाउ ॥

सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥ सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥२॥

तेरा रूपु अगमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥ हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥३॥

सभे इछा पूरीआ जा पाइआ अगम अपारा ॥ गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥४॥१॥४७॥

(राग सूही -- SGGS 747) रागु सूही महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥ साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥१॥

मेरे राम राइ संता टेक तुम्हारी ॥ जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥ भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥२॥

तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥ इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥३॥

दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥ नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥४॥१॥४८॥

(राग सूही -- SGGS 747) सूही महला ५ ॥
विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥ आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥१॥

मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥ खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन्ह सरणाई पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥ साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥२॥

दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥ तिन्ह भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥३॥

सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥ सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥४॥२॥४९॥

(राग सूही -- SGGS 747) सूही महला ५ ॥
करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥ निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥१॥

संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥ जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥ साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥२॥

बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन्ह पड़िआ मुकति न होई ॥ एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥३॥

खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥ गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥४॥३॥५०॥

(राग सूही -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥ तिन्ह की सोभा सभनी थाई जिन्ह प्रभ के चरण पराते ॥१॥

मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥ भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥ जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन्ह हरि सिउ आणि मिलावै ॥२॥

माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥ जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥३॥

जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥ कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥४॥४॥५१॥

(राग सूही -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥ तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥१॥

मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥ तेरी टेक भरवासा तुम्हरा जपि नामु तुम्हारा उधरे ॥१॥ रहाउ ॥

अंध कूप ते काढि लीए तुम्ह आपि भए किरपाला ॥ सारि सम्हालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥२॥

आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥ आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥३॥

भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥ नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥४॥५॥५२॥

(राग सूही -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥ अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥१॥

मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥ आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥१॥ रहाउ ॥

गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥ क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥२॥

जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥३॥

निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥ दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥४॥६॥५३॥

(राग सूही -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
भागठड़े हरि संत तुम्हारे जिन्ह घरि धनु हरि नामा ॥ परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥१॥

मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥ केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥१॥ रहाउ ॥

जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥ जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥२॥

सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥ सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥३॥

पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥ नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥४॥७॥५४॥

(राग सूही -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥ चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥१॥

मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥ तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥ तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥२॥

सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥३॥

कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥ नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥४॥८॥५५॥

(राग सूही -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥ दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥१॥

मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥ अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥ अम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥२॥

अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥३॥

दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥ सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥४॥९॥५६॥

(राग सूही -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥ बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥१॥

मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥ तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन्ह का जनम मरण दुखु नासा ॥ तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥२॥

नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥ तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥३॥

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥ सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥४॥१०॥५७॥

(राग सूही -- SGGS 750) सूही महला ५ ॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥ जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥१॥

मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥ करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥ आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥२॥

सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥ सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥३॥

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥ करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥४॥११॥५८॥

(राग सूही -- SGGS 759) रागु सूही असटपदीआ महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥ मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥१॥

मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥१॥ रहाउ ॥

मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥ अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥२॥

बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥ अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥३॥

भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥ जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥४॥

आसा अंदेसा बंधि पराना ॥ महलु न पावै फिरत बिगाना ॥५॥

सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥ फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥६॥

कछू सिआनप उकति न मोरी ॥ एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥७॥

करउ बेनती संतन पासे ॥ मेलि लैहु नानक अरदासे ॥८॥

भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥ नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥

(राग सूही -- SGGS 759) रागु सूही महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥ करि किरपा उधरु हरि नागर ॥१॥

चरण कमल सरणाइ नराइण ॥ दीना नाथ भगत पराइण ॥१॥ रहाउ ॥

अनाथा नाथ भगत भै मेटन ॥ साधसंगि जमदूत न भेटन ॥२॥

जीवन रूप अनूप दइआला ॥ रवण गुणा कटीऐ जम जाला ॥३॥

अम्रित नामु रसन नित जापै ॥ रोग रूप माइआ न बिआपै ॥४॥

जपि गोबिंद संगी सभि तारे ॥ पोहत नाही पंच बटवारे ॥५॥

मन बच क्रम प्रभु एकु धिआए ॥ सरब फला सोई जनु पाए ॥६॥

धारि अनुग्रहु अपना प्रभि कीना ॥ केवल नामु भगति रसु दीना ॥७॥

आदि मधि अंति प्रभु सोई ॥ नानक तिसु बिनु अवरु न कोई ॥८॥१॥२॥

(राग सूही -- SGGS 760) रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिन डिठिआ मनु रहसीऐ किउ पाईऐ तिन्ह संगु जीउ ॥ संत सजन मन मित्र से लाइनि प्रभ सिउ रंगु जीउ ॥ तिन्ह सिउ प्रीति न तुटई कबहु न होवै भंगु जीउ ॥१॥

पारब्रहम प्रभ करि दइआ गुण गावा तेरे नित जीउ ॥ आइ मिलहु संत सजणा नामु जपह मन मित जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

देखै सुणे न जाणई माइआ मोहिआ अंधु जीउ ॥ काची देहा विणसणी कूड़ु कमावै धंधु जीउ ॥ नामु धिआवहि से जिणि चले गुर पूरे सनबंधु जीउ ॥२॥

हुकमे जुग महि आइआ चलणु हुकमि संजोगि जीउ ॥ हुकमे परपंचु पसरिआ हुकमि करे रस भोग जीउ ॥ जिस नो करता विसरै तिसहि विछोड़ा सोगु जीउ ॥३॥

आपनड़े प्रभ भाणिआ दरगह पैधा जाइ जीउ ॥ ऐथै सुखु मुखु उजला इको नामु धिआइ जीउ ॥ आदरु दिता पारब्रहमि गुरु सेविआ सत भाइ जीउ ॥४॥

थान थनंतरि रवि रहिआ सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥ सचु खजाना संचिआ एकु नामु धनु माल जीउ ॥ मन ते कबहु न वीसरै जा आपे होइ दइआल जीउ ॥५॥

आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥ ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥ जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जमै लख वार जीउ ॥६॥

साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥ गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥ रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥७॥

तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥ तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥ नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥८॥१॥३॥

(राग सूही काफी -- SGGS 761) रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु १० काफी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे भुली जे चुकी साईं भी तहिंजी काढीआ ॥ जिन्हा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥१॥

हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥ सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥१॥ रहाउ ॥

सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥ जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥२॥

जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥ एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥३॥

पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥ स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥४॥

किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥ तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥५॥

सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥ हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥६॥

जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञन्हि दूरे ॥ सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥७॥

होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥८॥१॥४॥

(राग सूही -- SGGS 761) सूही महला ५ ॥
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड़ु गाल्ही होछीआ ॥१॥

नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥ सुखु न पाइन्हि मूलि नाम विछुंनिआ ॥२॥

मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥ नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥३॥

सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥ नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥४॥

आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥ बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥

जिन्ह कउ भए दइआल तिन्ह साधू संगु भइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु तिन्ही जनी जपि लइआ ॥६॥

खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥ जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥

विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥ गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥

(राग सूही -- SGGS 762) सूही महला ५ गुणवंती ॥
जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥ आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥ सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥ इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥ हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥ मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥ इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥ तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥ इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥ हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥ हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥ मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥ जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥

(राग सूही -- SGGS 777) रागु सूही छंत महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥ सुणि बावरे नेहु कूड़ा लाइओ कुस्मभ रंगाना ॥ कूड़ी डेखि भुलो अढु लहै न मुलो गोविद नामु मजीठा ॥ थीवहि लाला अति गुलाला सबदु चीनि गुर मीठा ॥ मिथिआ मोहि मगनु थी रहिआ झूठ संगि लपटाना ॥ नानक दीन सरणि किरपा निधि राखु लाज भगताना ॥१॥

सुणि बावरे सेवि ठाकुरु नाथु पराणा ॥ सुणि बावरे जो आइआ तिसु जाणा ॥ निहचलु हभ वैसी सुणि परदेसी संतसंगि मिलि रहीऐ ॥ हरि पाईऐ भागी सुणि बैरागी चरण प्रभू गहि रहीऐ ॥ एहु मनु दीजै संक न कीजै गुरमुखि तजि बहु माणा ॥ नानक दीन भगत भव तारण तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥२॥

सुणि बावरे किआ कीचै कूड़ा मानो ॥ सुणि बावरे हभु वैसी गरबु गुमानो ॥ निहचलु हभ जाणा मिथिआ माणा संत प्रभू होइ दासा ॥ जीवत मरीऐ भउजलु तरीऐ जे थीवै करमि लिखिआसा ॥ गुरु सेवीजै अम्रितु पीजै जिसु लावहि सहजि धिआनो ॥ नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हउ बलि बलि सद कुरबानो ॥३॥

सुणि बावरे मतु जाणहि प्रभु मै पाइआ ॥ सुणि बावरे थीउ रेणु जिनी प्रभु धिआइआ ॥ जिनि प्रभु धिआइआ तिनि सुखु पाइआ वडभागी दरसनु पाईऐ ॥ थीउ निमाणा सद कुरबाणा सगला आपु मिटाईऐ ॥ ओहु धनु भाग सुधा जिनि प्रभु लधा हम तिसु पहि आपु वेचाइआ ॥ नानक दीन सरणि सुख सागर राखु लाज अपनाइआ ॥४॥१॥

(राग सूही -- SGGS 777) सूही महला ५ ॥
हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥ हरि अम्रिति भरे भंडार सभु किछु है घरि तिस कै बलि राम जीउ ॥ बाबुलु मेरा वड समरथा करण कारण प्रभु हारा ॥ जिसु सिमरत दुखु कोई न लागै भउजलु पारि उतारा ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा उसतति करि करि जीवा ॥ नानक नामु महा रसु मीठा अनदिनु मनि तनि पीवा ॥१॥

हरि आपे लए मिलाइ किउ वेछोड़ा थीवई बलि राम जीउ ॥ जिस नो तेरी टेक सो सदा सद जीवई बलि राम जीउ ॥ तेरी टेक तुझै ते पाई साचे सिरजणहारा ॥ जिस ते खाली कोई नाही ऐसा प्रभू हमारा ॥ संत जना मिलि मंगलु गाइआ दिनु रैनि आस तुम्हारी ॥ सफलु दरसु भेटिआ गुरु पूरा नानक सद बलिहारी ॥२॥

सम्हलिआ सचु थानु मानु महतु सचु पाइआ बलि राम जीउ ॥ सतिगुरु मिलिआ दइआलु गुण अबिनासी गाइआ बलि राम जीउ ॥ गुण गोविंद गाउ नित नित प्राण प्रीतम सुआमीआ ॥ सुभ दिवस आए गहि कंठि लाए मिले अंतरजामीआ ॥ सतु संतोखु वजहि वाजे अनहदा झुणकारे ॥ सुणि भै बिनासे सगल नानक प्रभ पुरख करणैहारे ॥३॥

उपजिआ ततु गिआनु साहुरै पेईऐ इकु हरि बलि राम जीउ ॥ ब्रहमै ब्रहमु मिलिआ कोइ न साकै भिंन करि बलि राम जीउ ॥ बिसमु पेखै बिसमु सुणीऐ बिसमादु नदरी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी घटि घटि रहिआ समाइआ ॥ जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाइआ कीमति कहणु न जाए ॥ जिस के चलत न जाही लखणे नानक तिसहि धिआए ॥४॥२॥

(राग सूही -- SGGS 778) रागु सूही छंत महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गोबिंद गुण गावण लागे ॥ हरि रंगि अनदिनु जागे ॥ हरि रंगि जागे पाप भागे मिले संत पिआरिआ ॥ गुर चरण लागे भरम भागे काज सगल सवारिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी सहजि जाणी हरि नामु जपि वडभागै ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी जीउ पिंडु प्रभ आगै ॥१॥

अनहत सबदु सुहावा ॥ सचु मंगलु हरि जसु गावा ॥ गुण गाइ हरि हरि दूख नासे रहसु उपजै मनि घणा ॥ मनु तंनु निरमलु देखि दरसनु नामु प्रभ का मुखि भणा ॥ होइ रेण साधू प्रभ अराधू आपणे प्रभ भावा ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु सदा हरि गुण गावा ॥२॥

गुर मिलि सागरु तरिआ ॥ हरि चरण जपत निसतरिआ ॥ हरि चरण धिआए सभि फल पाए मिटे आवण जाणा ॥ भाइ भगति सुभाइ हरि जपि आपणे प्रभ भावा ॥ जपि एकु अलख अपार पूरन तिसु बिना नही कोई ॥ बिनवंति नानक गुरि भरमु खोइआ जत देखा तत सोई ॥३॥

पतित पावन हरि नामा ॥ पूरन संत जना के कामा ॥ गुरु संतु पाइआ प्रभु धिआइआ सगल इछा पुंनीआ ॥ हउ ताप बिनसे सदा सरसे प्रभ मिले चिरी विछुंनिआ ॥ मनि साति आई वजी वधाई मनहु कदे न वीसरै ॥ बिनवंति नानक सतिगुरि द्रिड़ाइआ सदा भजु जगदीसरै ॥४॥१॥३॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates