Pt 25 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 25 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग टोडी -- SGGS 714) टोडी महला ५ ॥
हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥ धारि अनुग्रहु पारब्रहम सुआमी वसदी कीनी आपि ॥१॥ रहाउ ॥

जिस के से फिरि तिन ही सम्हाले बिनसे सोग संताप ॥ हाथ देइ राखे जन अपने हरि होए माई बाप ॥१॥

जीअ जंत होए मिहरवाना दया धारी हरि नाथ ॥ नानक सरनि परे दुख भंजन जा का बड परताप ॥२॥९॥१४॥

(राग टोडी -- SGGS 714) टोडी महला ५ ॥
स्वामी सरनि परिओ दरबारे ॥ कोटि अपराध खंडन के दाते तुझ बिनु कउनु उधारे ॥१॥ रहाउ ॥

खोजत खोजत बहु परकारे सरब अरथ बीचारे ॥ साधसंगि परम गति पाईऐ माइआ रचि बंधि हारे ॥१॥

चरन कमल संगि प्रीति मनि लागी सुरि जन मिले पिआरे ॥ नानक अनद करे हरि जपि जपि सगले रोग निवारे ॥२॥१०॥१५॥

(राग टोडी -- SGGS 715) टोडी महला ५ घरु ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हां हां लपटिओ रे मूड़्हे कछू न थोरी ॥ तेरो नही सु जानी मोरी ॥ रहाउ ॥ आपन रामु न चीनो खिनूआ ॥ जो पराई सु अपनी मनूआ ॥१॥

नामु संगी सो मनि न बसाइओ ॥ छोडि जाहि वाहू चितु लाइओ ॥२॥

सो संचिओ जितु भूख तिसाइओ ॥ अम्रित नामु तोसा नही पाइओ ॥३॥

काम क्रोधि मोह कूपि परिआ ॥ गुर प्रसादि नानक को तरिआ ॥४॥१॥१६॥

(राग टोडी -- SGGS 715) टोडी महला ५ ॥
हमारै एकै हरी हरी ॥ आन अवर सिञाणि न करी ॥ रहाउ ॥ वडै भागि गुरु अपुना पाइओ ॥ गुरि मो कउ हरि नामु द्रिड़ाइओ ॥१॥

हरि हरि जाप ताप ब्रत नेमा ॥ हरि हरि धिआइ कुसल सभि खेमा ॥२॥

आचार बिउहार जाति हरि गुनीआ ॥ महा अनंद कीरतन हरि सुनीआ ॥३॥

कहु नानक जिनि ठाकुरु पाइआ ॥ सभु किछु तिस के ग्रिह महि आइआ ॥४॥२॥१७॥

(राग टोडी -- SGGS 715) टोडी महला ५ घरु ४ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रूड़ो मनु हरि रंगो लोड़ै ॥ गाली हरि नीहु न होइ ॥ रहाउ ॥ हउ ढूढेदी दरसन कारणि बीथी बीथी पेखा ॥ गुर मिलि भरमु गवाइआ हे ॥१॥

इह बुधि पाई मै साधू कंनहु लेखु लिखिओ धुरि माथै ॥ इह बिधि नानक हरि नैण अलोइ ॥२॥१॥१८॥

(राग टोडी -- SGGS 715) टोडी महला ५ ॥
गरबि गहिलड़ो मूड़ड़ो हीओ रे ॥ हीओ महराज री माइओ ॥ डीहर निआई मोहि फाकिओ रे ॥ रहाउ ॥ घणो घणो घणो सद लोड़ै बिनु लहणे कैठै पाइओ रे ॥ महराज रो गाथु वाहू सिउ लुभड़िओ निहभागड़ो भाहि संजोइओ रे ॥१॥

सुणि मन सीख साधू जन सगलो थारे सगले प्राछत मिटिओ रे ॥ जा को लहणो महराज री गाठड़ीओ जन नानक गरभासि न पउड़िओ रे ॥२॥२॥१९॥

(राग टोडी -- SGGS 716) टोडी महला ५ घरु ५ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो गुनु मेरो प्रभ जी कीन ॥ पंच दोख अरु अहं रोग इह तन ते सगल दूरि कीन ॥ रहाउ ॥ बंधन तोरि छोरि बिखिआ ते गुर को सबदु मेरै हीअरै दीन ॥ रूपु अनरूपु मोरो कछु न बीचारिओ प्रेम गहिओ मोहि हरि रंग भीन ॥१॥

पेखिओ लालनु पाट बीच खोए अनद चिता हरखे पतीन ॥ तिस ही को ग्रिहु सोई प्रभु नानक सो ठाकुरु तिस ही को धीन ॥२॥१॥२०॥

(राग टोडी -- SGGS 716) टोडी महला ५ ॥
माई मेरे मन की प्रीति ॥ एही करम धरम जप एही राम नाम निरमल है रीति ॥ रहाउ ॥ प्रान अधार जीवन धन मोरै देखन कउ दरसन प्रभ नीति ॥ बाट घाट तोसा संगि मोरै मन अपुने कउ मै हरि सखा कीत ॥१॥

संत प्रसादि भए मन निरमल करि किरपा अपुने करि लीत ॥ सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ आदि जुगादि भगतन के मीत ॥२॥२॥२१॥

(राग टोडी -- SGGS 716) टोडी महला ५ ॥
प्रभ जी मिलु मेरे प्रान ॥ बिसरु नही निमख हीअरे ते अपने भगत कउ पूरन दान ॥ रहाउ ॥ खोवहु भरमु राखु मेरे प्रीतम अंतरजामी सुघड़ सुजान ॥ कोटि राज नाम धनु मेरै अम्रित द्रिसटि धारहु प्रभ मान ॥१॥

आठ पहर रसना गुन गावै जसु पूरि अघावहि समरथ कान ॥ तेरी सरणि जीअन के दाते सदा सदा नानक कुरबान ॥२॥३॥२२॥

(राग टोडी -- SGGS 716) टोडी महला ५ ॥
प्रभ तेरे पग की धूरि ॥ दीन दइआल प्रीतम मनमोहन करि किरपा मेरी लोचा पूरि ॥ रहाउ ॥ दह दिस रवि रहिआ जसु तुमरा अंतरजामी सदा हजूरि ॥ जो तुमरा जसु गावहि करते से जन कबहु न मरते झूरि ॥१॥

धंध बंध बिनसे माइआ के साधू संगति मिटे बिसूर ॥ सुख स्मपति भोग इसु जीअ के बिनु हरि नानक जाने कूर ॥२॥४॥२३॥

(राग टोडी -- SGGS 716) टोडी मः ५ ॥
माई मेरे मन की पिआस ॥ इकु खिनु रहि न सकउ बिनु प्रीतम दरसन देखन कउ धारी मनि आस ॥ रहाउ ॥ सिमरउ नामु निरंजन करते मन तन ते सभि किलविख नास ॥ पूरन पारब्रहम सुखदाते अबिनासी बिमल जा को जास ॥१॥

संत प्रसादि मेरे पूर मनोरथ करि किरपा भेटे गुणतास ॥ सांति सहज सूख मनि उपजिओ कोटि सूर नानक परगास ॥२॥५॥२४॥

(राग टोडी -- SGGS 717) टोडी महला ५ ॥
हरि हरि पतित पावन ॥ जीअ प्रान मान सुखदाता अंतरजामी मन को भावन ॥ रहाउ ॥ सुंदरु सुघड़ु चतुरु सभ बेता रिद दास निवास भगत गुन गावन ॥ निरमल रूप अनूप सुआमी करम भूमि बीजन सो खावन ॥१॥

बिसमन बिसम भए बिसमादा आन न बीओ दूसर लावन ॥ रसना सिमरि सिमरि जसु जीवा नानक दास सदा बलि जावन ॥२॥६॥२५॥

(राग टोडी -- SGGS 717) टोडी महला ५ ॥
माई माइआ छलु ॥ त्रिण की अगनि मेघ की छाइआ गोबिद भजन बिनु हड़ का जलु ॥ रहाउ ॥ छोडि सिआनप बहु चतुराई दुइ कर जोड़ि साध मगि चलु ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी मानुख देह का इहु ऊतम फलु ॥१॥

बेद बखिआन करत साधू जन भागहीन समझत नही खलु ॥ प्रेम भगति राचे जन नानक हरि सिमरनि दहन भए मल ॥२॥७॥२६॥

(राग टोडी -- SGGS 717) टोडी महला ५ ॥
माई चरन गुर मीठे ॥ वडै भागि देवै परमेसरु कोटि फला दरसन गुर डीठे ॥ रहाउ ॥ गुन गावत अचुत अबिनासी काम क्रोध बिनसे मद ढीठे ॥ असथिर भए साच रंगि राते जनम मरन बाहुरि नही पीठे ॥१॥

बिनु हरि भजन रंग रस जेते संत दइआल जाने सभि झूठे ॥ नाम रतनु पाइओ जन नानक नाम बिहून चले सभि मूठे ॥२॥८॥२७॥

(राग टोडी -- SGGS 717) टोडी महला ५ ॥
साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥ सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥ गुरु पूरा भेटिओ बडभागी जा को अंतु न पारावारा ॥ करु गहि काढि लीओ जनु अपुना बिखु सागर संसारा ॥१॥

जनम मरन काटे गुर बचनी बहुड़ि न संकट दुआरा ॥ नानक सरनि गही सुआमी की पुनह पुनह नमसकारा ॥२॥९॥२८॥

(राग टोडी -- SGGS 717) टोडी महला ५ ॥
माई मेरे मन को सुखु ॥ कोटि अनंद राज सुखु भुगवै हरि सिमरत बिनसै सभ दुखु ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जनम के किलबिख नासहि सिमरत पावन तन मन सुख ॥ देखि सरूपु पूरनु भई आसा दरसनु भेटत उतरी भुख ॥१॥

चारि पदारथ असट महा सिधि कामधेनु पारजात हरि हरि रुखु ॥ नानक सरनि गही सुख सागर जनम मरन फिरि गरभ न धुखु ॥२॥१०॥२९॥

(राग टोडी -- SGGS 718) टोडी महला ५ ॥
हरि हरि चरन रिदै उर धारे ॥ सिमरि सुआमी सतिगुरु अपुना कारज सफल हमारे ॥१॥ रहाउ ॥

पुंन दान पूजा परमेसुर हरि कीरति ततु बीचारे ॥ गुन गावत अतुल सुखु पाइआ ठाकुर अगम अपारे ॥१॥

जो जन पारब्रहमि अपने कीने तिन का बाहुरि कछु न बीचारे ॥ नाम रतनु सुनि जपि जपि जीवा हरि नानक कंठ मझारे ॥२॥११॥३०॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 720) रागु बैराड़ी महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संत जना मिलि हरि जसु गाइओ ॥ कोटि जनम के दूख गवाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जो चाहत सोई मनि पाइओ ॥ करि किरपा हरि नामु दिवाइओ ॥१॥

सरब सूख हरि नामि वडाई ॥ गुर प्रसादि नानक मति पाई ॥२॥१॥७॥

(राग तिलंग -- SGGS 723) तिलंग महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खाक नूर करदं आलम दुनीआइ ॥ असमान जिमी दरखत आब पैदाइसि खुदाइ ॥१॥

बंदे चसम दीदं फनाइ ॥ दुनींआ मुरदार खुरदनी गाफल हवाइ ॥ रहाउ ॥ गैबान हैवान हराम कुसतनी मुरदार बखोराइ ॥ दिल कबज कबजा कादरो दोजक सजाइ ॥२॥

वली निआमति बिरादरा दरबार मिलक खानाइ ॥ जब अजराईलु बसतनी तब चि कारे बिदाइ ॥३॥

हवाल मालूमु करदं पाक अलाह ॥ बुगो नानक अरदासि पेसि दरवेस बंदाह ॥४॥१॥

(राग तिलंग -- SGGS 723) तिलंग घरु २ महला ५ ॥
तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥ तू करतारु करहि सो होइ ॥ तेरा जोरु तेरी मनि टेक ॥ सदा सदा जपि नानक एक ॥१॥

सभ ऊपरि पारब्रहमु दातारु ॥ तेरी टेक तेरा आधारु ॥ रहाउ ॥ है तूहै तू होवनहार ॥ अगम अगाधि ऊच आपार ॥ जो तुधु सेवहि तिन भउ दुखु नाहि ॥ गुर परसादि नानक गुण गाहि ॥२॥

जो दीसै सो तेरा रूपु ॥ गुण निधान गोविंद अनूप ॥ सिमरि सिमरि सिमरि जन सोइ ॥ नानक करमि परापति होइ ॥३॥

जिनि जपिआ तिस कउ बलिहार ॥ तिस कै संगि तरै संसार ॥ कहु नानक प्रभ लोचा पूरि ॥ संत जना की बाछउ धूरि ॥४॥२॥

(राग तिलंग -- SGGS 724) तिलंग महला ५ घरु ३ ॥
मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥ साहिबु मेरा मिहरवानु ॥ जीअ सगल कउ देइ दानु ॥ रहाउ ॥ तू काहे डोलहि प्राणीआ तुधु राखैगा सिरजणहारु ॥ जिनि पैदाइसि तू कीआ सोई देइ आधारु ॥१॥

जिनि उपाई मेदनी सोई करदा सार ॥ घटि घटि मालकु दिला का सचा परवदगारु ॥२॥

कुदरति कीम न जाणीऐ वडा वेपरवाहु ॥ करि बंदे तू बंदगी जिचरु घट महि साहु ॥३॥

तू समरथु अकथु अगोचरु जीउ पिंडु तेरी रासि ॥ रहम तेरी सुखु पाइआ सदा नानक की अरदासि ॥४॥३॥

(राग तिलंग -- SGGS 724) तिलंग महला ५ घरु ३ ॥
करते कुदरती मुसताकु ॥ दीन दुनीआ एक तूही सभ खलक ही ते पाकु ॥ रहाउ ॥ खिन माहि थापि उथापदा आचरज तेरे रूप ॥ कउणु जाणै चलत तेरे अंधिआरे महि दीप ॥१॥

खुदि खसम खलक जहान अलह मिहरवान खुदाइ ॥ दिनसु रैणि जि तुधु अराधे सो किउ दोजकि जाइ ॥२॥

अजराईलु यारु बंदे जिसु तेरा आधारु ॥ गुनह उस के सगल आफू तेरे जन देखहि दीदारु ॥३॥

दुनीआ चीज फिलहाल सगले सचु सुखु तेरा नाउ ॥ गुर मिलि नानक बूझिआ सदा एकसु गाउ ॥४॥४॥

(राग तिलंग -- SGGS 724) तिलंग महला ५ ॥
मीरां दानां दिल सोच ॥ मुहबते मनि तनि बसै सचु साह बंदी मोच ॥१॥ रहाउ ॥

दीदने दीदार साहिब कछु नही इस का मोलु ॥ पाक परवदगार तू खुदि खसमु वडा अतोलु ॥१॥

दस्तगीरी देहि दिलावर तूही तूही एक ॥ करतार कुदरति करण खालक नानक तेरी टेक ॥२॥५॥

(राग सूही -- SGGS 736) रागु सूही महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥ नाना रूप भेख दिखलाई ॥ सांगु उतारि थम्हिओ पासारा ॥ तब एको एकंकारा ॥१॥

कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥ कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥ कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥ बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥ फल पाके ते एकंकारा ॥२॥

सहस घटा महि एकु आकासु ॥ घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥ भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥ भ्रम छूटे ते एकंकार ॥३॥

ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥ ना को आवै ना को जाही ॥ गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥ कहु नानक मेरी परम गति होई ॥४॥१॥

(राग सूही -- SGGS 736) सूही महला ५ ॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥ दास अपुने की राखहु लाज ॥१॥

तेरी सरणि पूरन दइआला ॥ तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥१॥ रहाउ ॥

जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥ लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥ साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥२॥

जिस नो लाइ लए सो लागै ॥ गिआन रतनु अंतरि तिसु जागै ॥ दुरमति जाइ परम पदु पाए ॥ गुर परसादी नामु धिआए ॥३॥

दुइ कर जोड़ि करउ अरदासि ॥ तुधु भावै ता आणहि रासि ॥ करि किरपा अपनी भगती लाइ ॥ जन नानक प्रभु सदा धिआइ ॥४॥२॥

(राग सूही -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥

सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ ॥

सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥

गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥

बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥

(राग सूही -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥ दस दासी करि दीनी भतारि ॥ सगल समग्री मै घर की जोड़ी ॥ आस पिआसी पिर कउ लोड़ी ॥१॥

कवन कहा गुन कंत पिआरे ॥ सुघड़ सरूप दइआल मुरारे ॥१॥ रहाउ ॥

सतु सीगारु भउ अंजनु पाइआ ॥ अम्रित नामु त्मबोलु मुखि खाइआ ॥ कंगन बसत्र गहने बने सुहावे ॥ धन सभ सुख पावै जां पिरु घरि आवै ॥२॥

गुण कामण करि कंतु रीझाइआ ॥ वसि करि लीना गुरि भरमु चुकाइआ ॥ सभ ते ऊचा मंदरु मेरा ॥ सभ कामणि तिआगी प्रिउ प्रीतमु मेरा ॥३॥

प्रगटिआ सूरु जोति उजीआरा ॥ सेज विछाई सरध अपारा ॥ नव रंग लालु सेज रावण आइआ ॥ जन नानक पिर धन मिलि सुखु पाइआ ॥४॥४॥

(राग सूही -- SGGS 737) सूही महला ५ ॥
उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥ खोजत चरिओ देखउ प्रिअ जाई ॥ सुनत सदेसरो प्रिअ ग्रिहि सेज विछाई ॥ भ्रमि भ्रमि आइओ तउ नदरि न पाई ॥१॥

किन बिधि हीअरो धीरै निमानो ॥ मिलु साजन हउ तुझु कुरबानो ॥१॥ रहाउ ॥

एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ पीओ मदरो धन मतवंता ॥ धन जागै जे पिरु बोलंता ॥२॥

भई निरासी बहुतु दिन लागे ॥ देस दिसंतर मै सगले झागे ॥ खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥ होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥३॥

भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥ बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥ सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥

जह देखा तह पिरु है भाई ॥ खोल्हिओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥५॥

(राग सूही -- SGGS 738) सूही महला ५ ॥
किआ गुण तेरे सारि सम्हाली मोहि निरगुन के दातारे ॥ बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥१॥

लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम्ह सदा सदा उपकारे ॥ सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥२॥

किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥ मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥३॥

पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥४॥६॥

(राग सूही -- SGGS 738) सूही महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवा थोरी मागनु बहुता ॥ महलु न पावै कहतो पहुता ॥१॥

जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥ कूड़े मूरख की हाठीसा ॥१॥ रहाउ ॥

भेख दिखावै सचु न कमावै ॥ कहतो महली निकटि न आवै ॥२॥

अतीतु सदाए माइआ का माता ॥ मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥३॥

कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥ कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥४॥

दरसन देखे की वडिआई ॥ तुम्ह सुखदाते पुरख सुभाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥७॥

(राग सूही -- SGGS 738) सूही महला ५ ॥
बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥ नाम की बेला पै पै सोइआ ॥१॥

अउसरु अपना बूझै न इआना ॥ माइआ मोह रंगि लपटाना ॥१॥ रहाउ ॥

लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥ साध जना का दरसु न डीठा ॥२॥

कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥ बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै नाद करन सुणि भीना ॥ हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥३॥

द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥ छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥ करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥४॥

तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥ जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥१॥ रहाउ ॥२॥८॥

(राग सूही -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥ गल महि पाहणु लै लटकावै ॥१॥

भरमे भूला साकतु फिरता ॥ नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥ ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥२॥

गुनहगार लूण हरामी ॥ पाहण नाव न पारगिरामी ॥३॥

गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥ जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥४॥३॥९॥

(राग सूही -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
लालनु राविआ कवन गती री ॥ सखी बतावहु मुझहि मती री ॥१॥

सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥१॥ रहाउ ॥

पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥ जहा पठावहु जांउ तती री ॥२॥

जप तप संजम देउ जती री ॥ इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥३॥

माणु ताणु अह्मबुधि हती री ॥ सा नानक सोहागवती री ॥४॥४॥१०॥

(राग सूही -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥ तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥१॥

तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥ चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥१॥ रहाउ ॥

बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥ तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥२॥

कोटि दास जा कै दरबारे ॥ निमख निमख वसै तिन्ह नाले ॥३॥

हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥ ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥४॥५॥११॥

(राग सूही -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥ ता महि वासहि भगत पिआरे ॥१॥

सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥ विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥१॥ रहाउ ॥

तह गीत नाद अखारे संगा ॥ ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥२॥

तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥ साच नाम की अम्रित वरखा ॥३॥

गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥ नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥४॥६॥१२॥

(राग सूही -- SGGS 739) सूही महला ५ ॥
जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥ भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥१॥

ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥ जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥१॥ रहाउ ॥

जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥ जा की टहल जमदूत बिदारे ॥२॥

जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥ जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥३॥

प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥ सरणि नानक तिन्ह सद बलिहारे ॥४॥७॥१३॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ ॥

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

(राग सूही -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ ॥

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

(राग सूही -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ ॥

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

(राग सूही -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

(राग सूही -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

(राग सूही -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

(राग सूही -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ ॥

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

(राग सूही -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ ॥

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

(राग सूही -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ ॥

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

(राग सूही -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

(राग सूही -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ ॥

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

(राग सूही -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

(राग सूही -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates