Pt 21 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 21 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सोरठि -- SGGS 614) सोरठि मः ५ ॥
जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥ राम नाम संगि करि बिउहारा पावहि पदु निरबानी ॥१॥

पिआरे तू मेरो सुखदाता ॥ गुरि पूरै दीआ उपदेसा तुम ही संगि पराता ॥ रहाउ ॥ काम क्रोध लोभ मोह अभिमाना ता महि सुखु नही पाईऐ ॥ होहु रेन तू सगल की मेरे मन तउ अनद मंगल सुखु पाईऐ ॥२॥

घाल न भानै अंतर बिधि जानै ता की करि मन सेवा ॥ करि पूजा होमि इहु मनूआ अकाल मूरति गुरदेवा ॥३॥

गोबिद दामोदर दइआल माधवे पारब्रहम निरंकारा ॥ नामु वरतणि नामो वालेवा नामु नानक प्रान अधारा ॥४॥९॥२०॥

(राग सोरठि -- SGGS 614) सोरठि महला ५ ॥
मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥ पसू परेत मुगध भए स्रोते हरि नामा मुखि गाइआ ॥१॥

पूरे गुर की देखु वडाई ॥ ता की कीमति कहणु न जाई ॥ रहाउ ॥ दूख सोग का ढाहिओ डेरा अनद मंगल बिसरामा ॥ मन बांछत फल मिले अचिंता पूरन होए कामा ॥२॥

ईहा सुखु आगै मुख ऊजल मिटि गए आवण जाणे ॥ निरभउ भए हिरदै नामु वसिआ अपुने सतिगुर कै मनि भाणे ॥३॥

ऊठत बैठत हरि गुण गावै दूखु दरदु भ्रमु भागा ॥ कहु नानक ता के पूर करमा जा का गुर चरनी मनु लागा ॥४॥१०॥२१॥

(राग सोरठि -- SGGS 614) सोरठि महला ५ ॥
रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥ पूरन पारब्रहम परमेसुर मेरे मन सदा धिआईऐ ॥१॥

सिमरहु हरि हरि नामु परानी ॥ बिनसै काची देह अगिआनी ॥ रहाउ ॥ म्रिग त्रिसना अरु सुपन मनोरथ ता की कछु न वडाई ॥ राम भजन बिनु कामि न आवसि संगि न काहू जाई ॥२॥

हउ हउ करत बिहाइ अवरदा जीअ को कामु न कीना ॥ धावत धावत नह त्रिपतासिआ राम नामु नही चीना ॥३॥

साद बिकार बिखै रस मातो असंख खते करि फेरे ॥ नानक की प्रभ पाहि बिनंती काटहु अवगुण मेरे ॥४॥११॥२२॥

(राग सोरठि -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥ महा बिखमु अगनि को सागरु साधू संगि उधारे ॥१॥

पूरै गुरि मेटिओ भरमु अंधेरा ॥ भजु प्रेम भगति प्रभु नेरा ॥ रहाउ ॥ हरि हरि नामु निधान रसु पीआ मन तन रहे अघाई ॥ जत कत पूरि रहिओ परमेसरु कत आवै कत जाई ॥२॥

जप तप संजम गिआन तत बेता जिसु मनि वसै गोपाला ॥ नामु रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ता की पूरन घाला ॥३॥

कलि कलेस मिटे दुख सगले काटी जम की फासा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा धारी मन तन भए बिगासा ॥४॥१२॥२३॥

(राग सोरठि -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥ सगले जीअ कीए दइआला सो प्रभु अंतरजामी ॥१॥

मेरा गुरु होआ आपि सहाई ॥ सूख सहज आनंद मंगल रस अचरज भई बडाई ॥ रहाउ ॥ गुर की सरणि पए भै नासे साची दरगह माने ॥ गुण गावत आराधि नामु हरि आए अपुनै थाने ॥२॥

जै जै कारु करै सभ उसतति संगति साध पिआरी ॥ सद बलिहारि जाउ प्रभ अपुने जिनि पूरन पैज सवारी ॥३॥

गोसटि गिआनु नामु सुणि उधरे जिनि जिनि दरसनु पाइआ ॥ भइओ क्रिपालु नानक प्रभु अपुना अनद सेती घरि आइआ ॥४॥१३॥२४॥

(राग सोरठि -- SGGS 615) सोरठि महला ५ ॥
प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥ दइआलु होआ पारब्रहमु सुआमी पूरा सतिगुरु धिआइआ ॥१॥

प्रभ जीउ तू मेरो साहिबु दाता ॥ करि किरपा प्रभ दीन दइआला गुण गावउ रंगि राता ॥ रहाउ ॥ सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ चिंता सगल बिनासी ॥ करि किरपा अपुनो करि लीना मनि वसिआ अबिनासी ॥२॥

ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जो सतिगुरि अपुनै राखे ॥ चरन कमल बसे रिद अंतरि अम्रित हरि रसु चाखे ॥३॥

करि सेवा सेवक प्रभ अपुने जिनि मन की इछ पुजाई ॥ नानक दास ता कै बलिहारै जिनि पूरन पैज रखाई ॥४॥१४॥२५॥

(राग सोरठि -- SGGS 616) सोरठि महला ५ ॥
माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥ जीउ पिंडु साजि जिनि रचिआ बलु अपुनो करि मानै ॥१॥

मन मूड़े देखि रहिओ प्रभ सुआमी ॥ जो किछु करहि सोई सोई जाणै रहै न कछूऐ छानी ॥ रहाउ ॥ जिहवा सुआद लोभ मदि मातो उपजे अनिक बिकारा ॥ बहुतु जोनि भरमत दुखु पाइआ हउमै बंधन के भारा ॥२॥

देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि पर दारा संगि फाकै ॥ चित्र गुपतु जब लेखा मागहि तब कउणु पड़दा तेरा ढाकै ॥३॥

दीन दइआल पूरन दुख भंजन तुम बिनु ओट न काई ॥ काढि लेहु संसार सागर महि नानक प्रभ सरणाई ॥४॥१५॥२६॥

(राग सोरठि -- SGGS 616) सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥ गुर पूरे की बाणी जपि अनदु करहु नित प्राणी ॥१॥

हरि साचा सिमरहु भाई ॥ साधसंगि सदा सुखु पाईऐ हरि बिसरि न कबहू जाई ॥ रहाउ ॥ अम्रित नामु परमेसरु तेरा जो सिमरै सो जीवै ॥ जिस नो करमि परापति होवै सो जनु निरमलु थीवै ॥२॥

बिघन बिनासन सभि दुख नासन गुर चरणी मनु लागा ॥ गुण गावत अचुत अबिनासी अनदिनु हरि रंगि जागा ॥३॥

मन इछे सेई फल पाए हरि की कथा सुहेली ॥ आदि अंति मधि नानक कउ सो प्रभु होआ बेली ॥४॥१६॥२७॥

(राग सोरठि -- SGGS 616) सोरठि महला ५ पंचपदा ॥
बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥१॥

संतहु इहा बतावहु कारी ॥ जितु हउमै गरबु निवारी ॥१॥ रहाउ ॥

सरब भूत पारब्रहमु करि मानिआ होवां सगल रेनारी ॥२॥

पेखिओ प्रभ जीउ अपुनै संगे चूकै भीति भ्रमारी ॥३॥

अउखधु नामु निरमल जलु अम्रितु पाईऐ गुरू दुआरी ॥४॥

कहु नानक जिसु मसतकि लिखिआ तिसु गुर मिलि रोग बिदारी ॥५॥१७॥२८॥

(राग सोरठि -- SGGS 617) सोरठि महला ५ घरु २ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥ ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥१॥

संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥ पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥ सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥२॥१॥२९॥

(राग सोरठि -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥ चारि पदारथ नव निधि पावहि बहुरि न त्रिसना भुखी ॥१॥

जा को नामु लैत तू सुखी ॥ सासि सासि धिआवहु ठाकुर कउ मन तन जीअरे मुखी ॥१॥ रहाउ ॥

सांति पावहि होवहि मन सीतल अगनि न अंतरि धुखी ॥ गुर नानक कउ प्रभू दिखाइआ जलि थलि त्रिभवणि रुखी ॥२॥२॥३०॥

(राग सोरठि -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥ इह भीतर ते इन कउ डारहु आपन निकटि बुलावहु ॥१॥

अपुनी बिधि आपि जनावहु ॥ हरि जन मंगल गावहु ॥१॥ रहाउ ॥

बिसरु नाही कबहू हीए ते इह बिधि मन महि पावहु ॥ गुरु पूरा भेटिओ वडभागी जन नानक कतहि न धावहु ॥२॥३॥३१॥

(राग सोरठि -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥ तिसु प्रभ तिआगि अवर कत राचहु जो सभ महि रहिआ समाई ॥१॥

हरि हरि सिमरहु संत गोपाला ॥ साधसंगि मिलि नामु धिआवहु पूरन होवै घाला ॥१॥ रहाउ ॥

सारि समालै निति प्रतिपालै प्रेम सहित गलि लावै ॥ कहु नानक प्रभ तुमरे बिसरत जगत जीवनु कैसे पावै ॥२॥४॥३२॥

(राग सोरठि -- SGGS 617) सोरठि महला ५ ॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥ गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥१॥

मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥ जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥१॥ रहाउ ॥

वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥ तिन की धूरि नानकु दासु बाछै जिन हरि नामु रिदै परोई ॥२॥५॥३३॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
जनम जनम के दूख निवारै सूका मनु साधारै ॥ दरसनु भेटत होत निहाला हरि का नामु बीचारै ॥१॥

मेरा बैदु गुरू गोविंदा ॥ हरि हरि नामु अउखधु मुखि देवै काटै जम की फंधा ॥१॥ रहाउ ॥

समरथ पुरख पूरन बिधाते आपे करणैहारा ॥ अपुना दासु हरि आपि उबारिआ नानक नाम अधारा ॥२॥६॥३४॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
अंतर की गति तुम ही जानी तुझ ही पाहि निबेरो ॥ बखसि लैहु साहिब प्रभ अपने लाख खते करि फेरो ॥१॥

प्रभ जी तू मेरो ठाकुरु नेरो ॥ हरि चरण सरण मोहि चेरो ॥१॥ रहाउ ॥

बेसुमार बेअंत सुआमी ऊचो गुनी गहेरो ॥ काटि सिलक कीनो अपुनो दासरो तउ नानक कहा निहोरो ॥२॥७॥३५॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि मः ५ ॥
भए क्रिपाल गुरू गोविंदा सगल मनोरथ पाए ॥ असथिर भए लागि हरि चरणी गोविंद के गुण गाए ॥१॥

भलो समूरतु पूरा ॥ सांति सहज आनंद नामु जपि वाजे अनहद तूरा ॥१॥ रहाउ ॥

मिले सुआमी प्रीतम अपुने घर मंदर सुखदाई ॥ हरि नामु निधानु नानक जन पाइआ सगली इछ पुजाई ॥२॥८॥३६॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
गुर के चरन बसे रिद भीतरि सुभ लखण प्रभि कीने ॥ भए क्रिपाल पूरन परमेसर नाम निधान मनि चीने ॥१॥

मेरो गुरु रखवारो मीत ॥ दूण चऊणी दे वडिआई सोभा नीता नीत ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत प्रभि सगल उधारे दरसनु देखणहारे ॥ गुर पूरे की अचरज वडिआई नानक सद बलिहारे ॥२॥९॥३७॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
संचनि करउ नाम धनु निरमल थाती अगम अपार ॥ बिलछि बिनोद आनंद सुख माणहु खाइ जीवहु सिख परवार ॥१॥

हरि के चरन कमल आधार ॥ संत प्रसादि पाइओ सच बोहिथु चड़ि लंघउ बिखु संसार ॥१॥ रहाउ ॥

भए क्रिपाल पूरन अबिनासी आपहि कीनी सार ॥ पेखि पेखि नानक बिगसानो नानक नाही सुमार ॥२॥१०॥३८॥

(राग सोरठि -- SGGS 618) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै अपनी कल धारी सभ घट उपजी दइआ ॥ आपे मेलि वडाई कीनी कुसल खेम सभ भइआ ॥१॥

सतिगुरु पूरा मेरै नालि ॥ पारब्रहमु जपि सदा निहाल ॥ रहाउ ॥ अंतरि बाहरि थान थनंतरि जत कत पेखउ सोई ॥ नानक गुरु पाइओ वडभागी तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥२॥११॥३९॥

(राग सोरठि -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥ राखनहारै राखिओ बारिकु सतिगुरि तापु उतारिआ ॥१॥

उबरे सतिगुर की सरणाई ॥ जा की सेव न बिरथी जाई ॥ रहाउ ॥ घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा प्रभ अपुने भए दइआला ॥ नानक बिघनु न लागै कोऊ मेरा प्रभु होआ किरपाला ॥२॥१२॥४०॥

(राग सोरठि -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥ मिटि गई चिंता सिमरि अनंता सागरु तरिआ भाई ॥१॥

हिरदै हरि के चरण वसाई ॥ सुखु पाइआ सहज धुनि उपजी रोगा घाणि मिटाई ॥ रहाउ ॥ किआ गुण तेरे आखि वखाणा कीमति कहणु न जाई ॥ नानक भगत भए अबिनासी अपुना प्रभु भइआ सहाई ॥२॥१३॥४१॥

(राग सोरठि -- SGGS 619) सोरठि मः ५ ॥
गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥ आठ पहर आराधहु सुआमी पूरन घाल हमारी ॥१॥

हरि जीउ तू सुख स्मपति रासि ॥ राखि लैहु भाई मेरे कउ प्रभ आगै अरदासि ॥ रहाउ ॥ जो मागउ सोई सोई पावउ अपने खसम भरोसा ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ मिटिओ सगल अंदेसा ॥२॥१४॥४२॥

(राग सोरठि -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥ ताप रोग गए गुर बचनी मन इछे फल पाइआ ॥१॥

मेरा गुरु पूरा सुखदाता ॥ करण कारण समरथ सुआमी पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥ अनंद बिनोद मंगल गुण गावहु गुर नानक भए दइआला ॥ जै जै कार भए जग भीतरि होआ पारब्रहमु रखवाला ॥२॥१५॥४३॥

(राग सोरठि -- SGGS 619) सोरठि महला ५ ॥
हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥ हाथ देइ राखे करि अपुने सदा सदा रंगु माणि ॥१॥

साचा साहिबु सद मिहरवाण ॥ बंधु पाइआ मेरै सतिगुरि पूरै होई सरब कलिआण ॥ रहाउ ॥ जीउ पाइ पिंडु जिनि साजिआ दिता पैनणु खाणु ॥ अपणे दास की आपि पैज राखी नानक सद कुरबाणु ॥२॥१६॥४४॥

(राग सोरठि -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥ पारब्रहमि प्रभि किरपा धारी अपणा बिरदु समारिआ ॥१॥

होई राजे राम की रखवाली ॥ सूख सहज आनद गुण गावहु मनु तनु देह सुखाली ॥ रहाउ ॥ पतित उधारणु सतिगुरु मेरा मोहि तिस का भरवासा ॥ बखसि लए सभि सचै साहिबि सुणि नानक की अरदासा ॥२॥१७॥४५॥

(राग सोरठि -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥ गुर पूरे की सरणी उबरे कारज सगल सवारे ॥१॥

हरि जनि सिमरिआ नाम अधारि ॥ तापु उतारिआ सतिगुरि पूरै अपणी किरपा धारि ॥ रहाउ ॥ सदा अनंद करह मेरे पिआरे हरि गोविदु गुरि राखिआ ॥ वडी वडिआई नानक करते की साचु सबदु सति भाखिआ ॥२॥१८॥४६॥

(राग सोरठि -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥ सतिगुरि तापु गवाइआ भाई ठांढि पई संसारि ॥ अपणे जीअ जंत आपे राखे जमहि कीओ हटतारि ॥१॥

हरि के चरण रिदै उरि धारि ॥ सदा सदा प्रभु सिमरीऐ भाई दुख किलबिख काटणहारु ॥१॥ रहाउ ॥

तिस की सरणी ऊबरै भाई जिनि रचिआ सभु कोइ ॥ करण कारण समरथु सो भाई सचै सची सोइ ॥ नानक प्रभू धिआईऐ भाई मनु तनु सीतलु होइ ॥२॥१९॥४७॥

(राग सोरठि -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥ सुख सागर प्रभु विसरउ नाही मन चिंदिअड़ा फलु पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरि पूरै तापु गवाइआ अपणी किरपा धारी ॥ पारब्रहम प्रभ भए दइआला दुखु मिटिआ सभ परवारी ॥१॥

सरब निधान मंगल रस रूपा हरि का नामु अधारो ॥ नानक पति राखी परमेसरि उधरिआ सभु संसारो ॥२॥२०॥४८॥

(राग सोरठि -- SGGS 620) सोरठि महला ५ ॥
मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥ धारि क्रिपा प्रभ हाथ दे राखिआ हरि गोविदु नवा निरोआ ॥१॥ रहाउ ॥

तापु गइआ प्रभि आपि मिटाइआ जन की लाज रखाई ॥ साधसंगति ते सभ फल पाए सतिगुर कै बलि जांई ॥१॥

हलतु पलतु प्रभ दोवै सवारे हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ अटल बचनु नानक गुर तेरा सफल करु मसतकि धारिआ ॥२॥२१॥४९॥

(राग सोरठि -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥ अपुने सेवक की आपे राखै पूरन भई बडाई ॥१॥

पारब्रहमु पूरा मेरै नालि ॥ गुरि पूरै पूरी सभ राखी होए सरब दइआल ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु नानकु नामु धिआए जीअ प्रान का दाता ॥ अपुने दास कउ कंठि लाइ राखै जिउ बारिक पित माता ॥२॥२२॥५०॥

(राग सोरठि -- SGGS 621) सोरठि महला ५ घरु ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥ सिकदारहु नह पतीआइआ ॥ उमरावहु आगै झेरा ॥ मिलि राजन राम निबेरा ॥१॥

अब ढूढन कतहु न जाई ॥ गोबिद भेटे गुर गोसाई ॥ रहाउ ॥ आइआ प्रभ दरबारा ॥ ता सगली मिटी पूकारा ॥ लबधि आपणी पाई ॥ ता कत आवै कत जाई ॥२॥

तह साच निआइ निबेरा ॥ ऊहा सम ठाकुरु सम चेरा ॥ अंतरजामी जानै ॥ बिनु बोलत आपि पछानै ॥३॥

सरब थान को राजा ॥ तह अनहद सबद अगाजा ॥ तिसु पहि किआ चतुराई ॥ मिलु नानक आपु गवाई ॥४॥१॥५१॥

(राग सोरठि -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
हिरदै नामु वसाइहु ॥ घरि बैठे गुरू धिआइहु ॥ गुरि पूरै सचु कहिआ ॥ सो सुखु साचा लहिआ ॥१॥

अपुना होइओ गुरु मिहरवाना ॥ अनद सूख कलिआण मंगल सिउ घरि आए करि इसनाना ॥ रहाउ ॥ साची गुर वडिआई ॥ ता की कीमति कहणु न जाई ॥ सिरि साहा पातिसाहा ॥ गुर भेटत मनि ओमाहा ॥२॥

सगल पराछत लाथे ॥ मिलि साधसंगति कै साथे ॥ गुण निधान हरि नामा ॥ जपि पूरन होए कामा ॥३॥

गुरि कीनो मुकति दुआरा ॥ सभ स्रिसटि करै जैकारा ॥ नानक प्रभु मेरै साथे ॥ जनम मरण भै लाथे ॥४॥२॥५२॥

(राग सोरठि -- SGGS 621) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥ प्रभि पूरी लोच हमारी ॥ करि इसनानु ग्रिहि आए ॥ अनद मंगल सुख पाए ॥१॥

संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥ ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥ कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥

उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥ जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥

बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥

(राग सोरठि -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥ घरु लसकरु सभु तेरा ॥ रखवाले गुर गोपाला ॥ सभि जीअ भए दइआला ॥१॥

जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥ भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥ तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥ प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥ बलु धनु तकीआ तेरा ॥ तू भारो ठाकुरु मेरा ॥२॥

जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥ सो प्रभि आपि तराइआ ॥ करि किरपा नाम रसु दीआ ॥ कुसल खेम सभ थीआ ॥३॥

होए प्रभू सहाई ॥ सभ उठि लागी पाई ॥ सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥ हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥४॥४॥५४॥

(राग सोरठि -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
सूख सहज आनंदा ॥ प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥ पूरै गुरि किरपा धारी ॥ ता गति भई हमारी ॥१॥

हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥ नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥ हरि चरण की ओट सताणी ॥ सभ चूकी काणि लोकाणी ॥ जगजीवनु दाता पाइआ ॥ हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥२॥

प्रभ काटिआ जम का फासा ॥ मन पूरन होई आसा ॥ जह पेखा तह सोई ॥ हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥३॥

करि किरपा प्रभि राखे ॥ सभि जनम जनम दुख लाथे ॥ निरभउ नामु धिआइआ ॥ अटल सुखु नानक पाइआ ॥४॥५॥५५॥

(राग सोरठि -- SGGS 622) सोरठि महला ५ ॥
ठाढि पाई करतारे ॥ तापु छोडि गइआ परवारे ॥ गुरि पूरै है राखी ॥ सरणि सचे की ताकी ॥१॥

परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥ सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥ हरि हरि नामु दीओ दारू ॥ तिनि सगला रोगु बिदारू ॥ अपणी किरपा धारी ॥ तिनि सगली बात सवारी ॥२॥

प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥ हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥ गुर का सबदु भइओ साखी ॥ तिनि सगली लाज राखी ॥३॥

बोलाइआ बोली तेरा ॥ तू साहिबु गुणी गहेरा ॥ जपि नानक नामु सचु साखी ॥ अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥

(राग सोरठि -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
विचि करता पुरखु खलोआ ॥ वालु न विंगा होआ ॥ मजनु गुर आंदा रासे ॥ जपि हरि हरि किलविख नासे ॥१॥

संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥ जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥१॥ रहाउ ॥

जै जै कारु जगु गावै ॥ मन चिंदिअड़े फल पावै ॥ सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥२॥

संत सरोवर नावै ॥ सो जनु परम गति पावै ॥ मरै न आवै जाई ॥ हरि हरि नामु धिआई ॥३॥

इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥ जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥ बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥ सभ चिंता गणत मिटाई ॥४॥७॥५७॥

(राग सोरठि -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमि निबाही पूरी ॥ काई बात न रहीआ ऊरी ॥ गुरि चरन लाइ निसतारे ॥ हरि हरि नामु सम्हारे ॥१॥

अपने दास का सदा रखवाला ॥ करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥१॥ रहाउ ॥

वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥ जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥ हरि भगति भाइ चितु लागा ॥ जपि जीवहि से वडभागा ॥२॥

हरि अम्रित बाणी गावै ॥ साधा की धूरी नावै ॥ अपुना नामु आपे दीआ ॥ प्रभ करणहार रखि लीआ ॥३॥

हरि दरसन प्रान अधारा ॥ इहु पूरन बिमल बीचारा ॥ करि किरपा अंतरजामी ॥ दास नानक सरणि सुआमी ॥४॥८॥५८॥

(राग सोरठि -- SGGS 623) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥ हरि संगि सहाई पाइआ ॥ जह जाईऐ तहा सुहेले ॥ करि किरपा प्रभि मेले ॥१॥

हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥ मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

नाराइण प्राण अधारा ॥ हम संत जनां रेनारा ॥ पतित पुनीत करि लीने ॥ करि किरपा हरि जसु दीने ॥२॥

पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥ सद जीअ संगि रखवाला ॥ हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥ बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥३॥

जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥ हरि रसु तिन ही जाता ॥ जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥ सुखु नानक सरणी पाइआ ॥४॥९॥५९॥

(राग सोरठि -- SGGS 624) सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै कीती पूरी ॥ प्रभु रवि रहिआ भरपूरी ॥ खेम कुसल भइआ इसनाना ॥ पारब्रहम विटहु कुरबाना ॥१॥

गुर के चरन कवल रिद धारे ॥ बिघनु न लागै तिल का कोई कारज सगल सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

मिलि साधू दुरमति खोए ॥ पतित पुनीत सभ होए ॥ रामदासि सरोवर नाते ॥ सभ लाथे पाप कमाते ॥२॥

गुन गोबिंद नित गाईऐ ॥ साधसंगि मिलि धिआईऐ ॥ मन बांछत फल पाए ॥ गुरु पूरा रिदै धिआए ॥३॥

गुर गोपाल आनंदा ॥ जपि जपि जीवै परमानंदा ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ प्रभ अपना बिरदु रखाइआ ॥४॥१०॥६०॥

(राग सोरठि -- SGGS 624) रागु सोरठि महला ५ ॥
दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥ सेज इकेली नीद नहु नैनह पिरु परदेसि सिधाइओ ॥१॥

हुणि नही संदेसरो माइओ ॥ एक कोसरो सिधि करत लालु तब चतुर पातरो आइओ ॥ रहाउ ॥ किउ बिसरै इहु लालु पिआरो सरब गुणा सुखदाइओ ॥ मंदरि चरि कै पंथु निहारउ नैन नीरि भरि आइओ ॥२॥

हउ हउ भीति भइओ है बीचो सुनत देसि निकटाइओ ॥ भांभीरी के पात परदो बिनु पेखे दूराइओ ॥३॥

भइओ किरपालु सरब को ठाकुरु सगरो दूखु मिटाइओ ॥ कहु नानक हउमै भीति गुरि खोई तउ दइआरु बीठलो पाइओ ॥४॥

सभु रहिओ अंदेसरो माइओ ॥ जो चाहत सो गुरू मिलाइओ ॥ सरब गुना निधि राइओ ॥ रहाउ दूजा ॥११॥६१॥

(राग सोरठि -- SGGS 624) सोरठि महला ५ ॥
गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥ करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥ नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥१॥

हरि जीउ निमाणिआ तू माणु ॥ निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंदु तेरी कुदरति कउ कुरबाणु ॥ रहाउ ॥ जैसा बालकु भाइ सुभाई लख अपराध कमावै ॥ करि उपदेसु झिड़के बहु भाती बहुड़ि पिता गलि लावै ॥ पिछले अउगुण बखसि लए प्रभु आगै मारगि पावै ॥२॥

हरि अंतरजामी सभ बिधि जाणै ता किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥ कहणै कथनि न भीजै गोबिंदु हरि भावै पैज रखाईऐ ॥ अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ ॥३॥

होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती ॥ पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती ॥ हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती ॥४॥१२॥६२॥

(राग सोरठि -- SGGS 625) सोरठि महला ५ ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥ गुन गावत धिआवत प्रभु अपना कारज सगले सांठे ॥१॥

जगजीवन नामु तुमारा ॥ गुर पूरे दीओ उपदेसा जपि भउजलु पारि उतारा ॥ रहाउ ॥ तूहै मंत्री सुनहि प्रभ तूहै सभु किछु करणैहारा ॥ तू आपे दाता आपे भुगता किआ इहु जंतु विचारा ॥२॥

किआ गुण तेरे आखि वखाणी कीमति कहणु न जाई ॥ पेखि पेखि जीवै प्रभु अपना अचरजु तुमहि वडाई ॥३॥

धारि अनुग्रहु आपि प्रभ स्वामी पति मति कीनी पूरी ॥ सदा सदा नानक बलिहारी बाछउ संता धूरी ॥४॥१३॥६३॥

(राग सोरठि -- SGGS 625) सोरठि मः ५ ॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥ प्रभि सभे काज सवारे ॥ हरि अपणी किरपा धारी ॥ प्रभ पूरन पैज सवारी ॥१॥

अपने दास को भइओ सहाई ॥ सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥ करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥ पिछै लगि चली माइआ ॥ तोटि न कतहू आवै ॥ मेरे पूरे सतगुर भावै ॥२॥

सिमरि सिमरि दइआला ॥ सभि जीअ भए किरपाला ॥ जै जै कारु गुसाई ॥ जिनि पूरी बणत बणाई ॥३॥

तू भारो सुआमी मोरा ॥ इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥ जन नानक एकु धिआइआ ॥ सरब फला पुंनु पाइआ ॥४॥१४॥६४॥

(राग सोरठि -- SGGS 625) सोरठि महला ५ घरु ३ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामदास सरोवरि नाते ॥ सभि उतरे पाप कमाते ॥ निरमल होए करि इसनाना ॥ गुरि पूरै कीने दाना ॥१॥

सभि कुसल खेम प्रभि धारे ॥ सही सलामति सभि थोक उबारे गुर का सबदु वीचारे ॥ रहाउ ॥ साधसंगि मलु लाथी ॥ पारब्रहमु भइओ साथी ॥ नानक नामु धिआइआ ॥ आदि पुरख प्रभु पाइआ ॥२॥१॥६५॥

(राग सोरठि -- SGGS 625) सोरठि महला ५ ॥
जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥ सुख सागरु गुरु पाइआ ॥ ता सहसा सगल मिटाइआ ॥१॥

हरि के नाम की वडिआई ॥ आठ पहर गुण गाई ॥ गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥ प्रभ की अकथ कहाणी ॥ जन बोलहि अम्रित बाणी ॥ नानक दास वखाणी ॥ गुर पूरे ते जाणी ॥२॥२॥६६॥

(राग सोरठि -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥ पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥ सरब निधान सुख पाइआ ॥ गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥१॥

अपने सतिगुर की वडिआई ॥ मन इछे फल पाई ॥ संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥ जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥ सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥२॥३॥६७॥

(राग सोरठि -- SGGS 626) सोरठि महला ५ ॥
गुर का सबदु रखवारे ॥ चउकी चउगिरद हमारे ॥ राम नामि मनु लागा ॥ जमु लजाइ करि भागा ॥१॥

प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥ बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥ नानक प्रभु अबिनासी ॥ ता की सेव न बिरथी जासी ॥ अनद करहि तेरे दासा ॥ जपि पूरन होई आसा ॥२॥४॥६८॥


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