Pt 2 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 2 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सिरीरागु -- SGGS 70) सिरीरागु महला ५ ॥
जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥ लागू होए दुसमना साक भि भजि खले ॥ सभो भजै आसरा चुकै सभु असराउ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु लगै न तती वाउ ॥१॥

साहिबु निताणिआ का ताणु ॥ आइ न जाई थिरु सदा गुर सबदी सचु जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

जे को होवै दुबला नंग भुख की पीर ॥ दमड़ा पलै ना पवै ना को देवै धीर ॥ सुआरथु सुआउ न को करे ना किछु होवै काजु ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निहचलु होवै राजु ॥२॥

जा कउ चिंता बहुतु बहुतु देही विआपै रोगु ॥ ग्रिसति कुट्मबि पलेटिआ कदे हरखु कदे सोगु ॥ गउणु करे चहु कुंट का घड़ी न बैसणु सोइ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु तनु मनु सीतलु होइ ॥३॥

कामि करोधि मोहि वसि कीआ किरपन लोभि पिआरु ॥ चारे किलविख उनि अघ कीए होआ असुर संघारु ॥ पोथी गीत कवित किछु कदे न करनि धरिआ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निमख सिमरत तरिआ ॥४॥

सासत सिम्रिति बेद चारि मुखागर बिचरे ॥ तपे तपीसर जोगीआ तीरथि गवनु करे ॥ खटु करमा ते दुगुणे पूजा करता नाइ ॥ रंगु न लगी पारब्रहम ता सरपर नरके जाइ ॥५॥

राज मिलक सिकदारीआ रस भोगण बिसथार ॥ बाग सुहावे सोहणे चलै हुकमु अफार ॥ रंग तमासे बहु बिधी चाइ लगि रहिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता सरप की जूनि गइआ ॥६॥

बहुतु धनाढि अचारवंतु सोभा निरमल रीति ॥ मात पिता सुत भाईआ साजन संगि परीति ॥ लसकर तरकसबंद बंद जीउ जीउ सगली कीत ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता खड़ि रसातलि दीत ॥७॥

काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥ मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥ सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥८॥

किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥ जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥ दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥ सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥९॥१॥२६॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 71) सिरीरागु महला ५ घरु ५ ॥
जानउ नही भावै कवन बाता ॥ मन खोजि मारगु ॥१॥ रहाउ ॥

धिआनी धिआनु लावहि ॥ गिआनी गिआनु कमावहि ॥ प्रभु किन ही जाता ॥१॥

भगउती रहत जुगता ॥ जोगी कहत मुकता ॥ तपसी तपहि राता ॥२॥

मोनी मोनिधारी ॥ सनिआसी ब्रहमचारी ॥ उदासी उदासि राता ॥३॥

भगति नवै परकारा ॥ पंडितु वेदु पुकारा ॥ गिरसती गिरसति धरमाता ॥४॥

इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥ कापड़ी कउते जागूता ॥ इकि तीरथि नाता ॥५॥

निरहार वरती आपरसा ॥ इकि लूकि न देवहि दरसा ॥ इकि मन ही गिआता ॥६॥

घाटि न किन ही कहाइआ ॥ सभ कहते है पाइआ ॥ जिसु मेले सो भगता ॥७॥

सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥ नानकु गुर चरणि पराता ॥८॥२॥२७॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 73) सिरीरागु महला ५ ॥
पै पाइ मनाई सोइ जीउ ॥ सतिगुर पुरखि मिलाइआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥ अम अबे थावहु मिठड़ा ॥ भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥

तेरै हुकमे सावणु आइआ ॥ मै सत का हलु जोआइआ ॥ नाउ बीजण लगा आस करि हरि बोहल बखस जमाइ जीउ ॥२॥

हउ गुर मिलि इकु पछाणदा ॥ दुया कागलु चिति न जाणदा ॥ हरि इकतै कारै लाइओनु जिउ भावै तिंवै निबाहि जीउ ॥३॥

तुसी भोगिहु भुंचहु भाईहो ॥ गुरि दीबाणि कवाइ पैनाईओ ॥ हउ होआ माहरु पिंड दा बंनि आदे पंजि सरीक जीउ ॥४॥

हउ आइआ साम्है तिहंडीआ ॥ पंजि किरसाण मुजेरे मिहडिआ ॥ कंनु कोई कढि न हंघई नानक वुठा घुघि गिराउ जीउ ॥५॥

हउ वारी घुमा जावदा ॥ इक साहा तुधु धिआइदा ॥ उजड़ु थेहु वसाइओ हउ तुध विटहु कुरबाणु जीउ ॥६॥

हरि इठै नित धिआइदा ॥ मनि चिंदी सो फलु पाइदा ॥ सभे काज सवारिअनु लाहीअनु मन की भुख जीउ ॥७॥

मै छडिआ सभो धंधड़ा ॥ गोसाई सेवी सचड़ा ॥ नउ निधि नामु निधानु हरि मै पलै बधा छिकि जीउ ॥८॥

मै सुखी हूं सुखु पाइआ ॥ गुरि अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सतिगुरि पुरखि विखालिआ मसतकि धरि कै हथु जीउ ॥९॥

मै बधी सचु धरम साल है ॥ गुरसिखा लहदा भालि कै ॥ पैर धोवा पखा फेरदा तिसु निवि निवि लगा पाइ जीउ ॥१०॥

सुणि गला गुर पहि आइआ ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥ सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥११॥

सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥ दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥ ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥१२॥

हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥ पै कोइ न किसै रञाणदा ॥ सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥१३॥

झिमि झिमि अम्रितु वरसदा ॥ बोलाइआ बोली खसम दा ॥ बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥१४॥

तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥ हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥ देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥१५॥

तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥ तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥ तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥१६॥

हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥ मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥ सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥१७॥

वात वजनि टमक भेरीआ ॥ मल लथे लैदे फेरीआ ॥ निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥१८॥

सभ इकठे होइ आइआ ॥ घरि जासनि वाट वटाइआ ॥ गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥१९॥

तूं वरना चिहना बाहरा ॥ हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥ सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥२०॥

मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥ गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥ हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥२१॥२॥२९॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 77) सिरीरागु महला ५ ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥ दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥ मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥ मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥ करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥१॥

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥ बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहमेइ ॥ बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥ पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥ धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥२॥

तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥ पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥ अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥ साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥ सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥ कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥३॥

चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥ गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥ गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥ इहु मोहु माइआ तेरै संगि न चालै झूठी प्रीति लगाई ॥ सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥४॥

लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥ इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥ लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥ जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥ करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥ कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥५॥१॥४॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 79) सिरीरागु महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा गोबिंद नामु समाले ॥ मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥ संगि सहाई हरि नामु धिआई बिरथा कोइ न जाए ॥ मन चिंदे सेई फल पावहि चरण कमल चितु लाए ॥ जलि थलि पूरि रहिआ बनवारी घटि घटि नदरि निहाले ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम साधसंगि भ्रमु जाले ॥१॥

मन पिआरिआ जी मित्रा हरि बिनु झूठु पसारे ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा बिखु सागरु संसारे ॥ चरण कमल करि बोहिथु करते सहसा दूखु न बिआपै ॥ गुरु पूरा भेटै वडभागी आठ पहर प्रभु जापै ॥ आदि जुगादी सेवक सुआमी भगता नामु अधारे ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम बिनु हरि झूठ पसारे ॥२॥

मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि लदे खेप सवली ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि दरु निहचलु मली ॥ हरि दरु सेवे अलख अभेवे निहचलु आसणु पाइआ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा संसा दूखु मिटाइआ ॥ चित्र गुपत का कागदु फारिआ जमदूता कछू न चली ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम हरि लदे खेप सवली ॥३॥

मन पिआरिआ जीउ मित्रा करि संता संगि निवासो ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि नामु जपत परगासो ॥ सिमरि सुआमी सुखह गामी इछ सगली पुंनीआ ॥ पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥ अंतरि बाहरि सरबति रविआ मनि उपजिआ बिसुआसो ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम करि संता संगि निवासो ॥४॥

मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि जल मिलि जीवे मीना ॥ हरि पी आघाने अम्रित बाने स्रब सुखा मन वुठे ॥ स्रीधर पाए मंगल गाए इछ पुंनी सतिगुर तुठे ॥ लड़ि लीने लाए नउ निधि पाए नाउ सरबसु ठाकुरि दीना ॥ नानक सिख संत समझाई हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥५॥१॥२॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 80) सिरीराग के छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डखणा ॥ हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥ संत सरणाई लभणे नानक प्राण अधार ॥१॥

छंतु ॥ चरन कमल सिउ प्रीति रीति संतन मनि आवए जीउ ॥ दुतीआ भाउ बिपरीति अनीति दासा नह भावए जीउ ॥ दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥ नाम बिहूना तनु मनु हीना जल बिनु मछुली जिउ मरै ॥ मिलु मेरे पिआरे प्रान अधारे गुण साधसंगि मिलि गावए ॥ नानक के सुआमी धारि अनुग्रहु मनि तनि अंकि समावए ॥१॥

डखणा ॥ सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥ खुल्हड़े कपाट नानक सतिगुर भेटते ॥१॥

छंतु ॥ तेरे बचन अनूप अपार संतन आधार बाणी बीचारीऐ जीउ ॥ सिमरत सास गिरास पूरन बिसुआस किउ मनहु बिसारीऐ जीउ ॥ किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥ मन बांछत फल देत है सुआमी जीअ की बिरथा सारे ॥ अनाथ के नाथे स्रब कै साथे जपि जूऐ जनमु न हारीऐ ॥ नानक की बेनंती प्रभ पहि क्रिपा करि भवजलु तारीऐ ॥२॥

डखणा ॥ धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥ लधे हभे थोकड़े नानक हरि धनु माल ॥१॥

छंतु ॥ सुंदर सुआमी धाम भगतह बिस्राम आसा लगि जीवते जीउ ॥ मनि तने गलतान सिमरत प्रभ नाम हरि अम्रितु पीवते जीउ ॥ अम्रितु हरि पीवते सदा थिरु थीवते बिखै बनु फीका जानिआ ॥ भए किरपाल गोपाल प्रभ मेरे साधसंगति निधि मानिआ ॥ सरबसो सूख आनंद घन पिआरे हरि रतनु मन अंतरि सीवते ॥ इकु तिलु नही विसरै प्रान आधारा जपि जपि नानक जीवते ॥३॥

डखणा ॥ जो तउ कीने आपणे तिना कूं मिलिओहि ॥ आपे ही आपि मोहिओहु जसु नानक आपि सुणिओहि ॥१॥

छंतु ॥ प्रेम ठगउरी पाइ रीझाइ गोबिंद मनु मोहिआ जीउ ॥ संतन कै परसादि अगाधि कंठे लगि सोहिआ जीउ ॥ हरि कंठि लगि सोहिआ दोख सभि जोहिआ भगति लख्यण करि वसि भए ॥ मनि सरब सुख वुठे गोविद तुठे जनम मरणा सभि मिटि गए ॥ सखी मंगलो गाइआ इछ पुजाइआ बहुड़ि न माइआ होहिआ ॥ करु गहि लीने नानक प्रभ पिआरे संसारु सागरु नही पोहिआ ॥४॥

डखणा ॥ साई नामु अमोलु कीम न कोई जाणदो ॥ जिना भाग मथाहि से नानक हरि रंगु माणदो ॥१॥

छंतु ॥ कहते पवित्र सुणते सभि धंनु लिखतीं कुलु तारिआ जीउ ॥ जिन कउ साधू संगु नाम हरि रंगु तिनी ब्रहमु बीचारिआ जीउ ॥ ब्रहमु बीचारिआ जनमु सवारिआ पूरन किरपा प्रभि करी ॥ करु गहि लीने हरि जसो दीने जोनि ना धावै नह मरी ॥ सतिगुर दइआल किरपाल भेटत हरे कामु क्रोधु लोभु मारिआ ॥ कथनु न जाइ अकथु सुआमी सदकै जाइ नानकु वारिआ ॥५॥१॥३॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 89) मः ५ ॥
मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥ कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुमि पईआसु ॥२॥

(राग माझ -- SGGS 96) माझ महला ५ चउपदे घरु १ ॥
मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥ बिलप करे चात्रिक की निआई ॥ त्रिखा न उतरै सांति न आवै बिनु दरसन संत पिआरे जीउ ॥१॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई गुर दरसन संत पिआरे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी ॥ चिरु होआ देखे सारिंगपाणी ॥ धंनु सु देसु जहा तूं वसिआ मेरे सजण मीत मुरारे जीउ ॥२॥

हउ घोली हउ घोलि घुमाई गुर सजण मीत मुरारे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता ॥ हुणि कदि मिलीऐ प्रिअ तुधु भगवंता ॥ मोहि रैणि न विहावै नीद न आवै बिनु देखे गुर दरबारे जीउ ॥३॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

भागु होआ गुरि संतु मिलाइआ ॥ प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ ॥ सेव करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ ॥४॥

हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ ॥ रहाउ ॥१॥८॥

(राग माझ -- SGGS 97) रागु माझ महला ५ ॥
सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥ सो कमु सुहेला जो तेरी घाली ॥ सो रिदा सुहेला जितु रिदै तूं वुठा सभना के दातारा जीउ ॥१॥

तूं साझा साहिबु बापु हमारा ॥ नउ निधि तेरै अखुट भंडारा ॥ जिसु तूं देहि सु त्रिपति अघावै सोई भगतु तुमारा जीउ ॥२॥

सभु को आसै तेरी बैठा ॥ घट घट अंतरि तूंहै वुठा ॥ सभे साझीवाल सदाइनि तूं किसै न दिसहि बाहरा जीउ ॥३॥

तूं आपे गुरमुखि मुकति कराइहि ॥ तूं आपे मनमुखि जनमि भवाइहि ॥ नानक दास तेरै बलिहारै सभु तेरा खेलु दसाहरा जीउ ॥४॥२॥९॥

(राग माझ -- SGGS 97) माझ महला ५ ॥
अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥ सबदि अनंद करे सद केला ॥ सहज गुफा महि ताड़ी लाई आसणु ऊच सवारिआ जीउ ॥१॥

फिरि घिरि अपुने ग्रिह महि आइआ ॥ जो लोड़ीदा सोई पाइआ ॥ त्रिपति अघाइ रहिआ है संतहु गुरि अनभउ पुरखु दिखारिआ जीउ ॥२॥

आपे राजनु आपे लोगा ॥ आपि निरबाणी आपे भोगा ॥ आपे तखति बहै सचु निआई सभ चूकी कूक पुकारिआ जीउ ॥३॥

जेहा डिठा मै तेहो कहिआ ॥ तिसु रसु आइआ जिनि भेदु लहिआ ॥ जोती जोति मिली सुखु पाइआ जन नानक इकु पसारिआ जीउ ॥४॥३॥१०॥

(राग माझ -- SGGS 97) माझ महला ५ ॥
जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥ तितु घरि सखीए मंगलु गाइआ ॥ अनद बिनोद तितै घरि सोहहि जो धन कंति सिगारी जीउ ॥१॥

सा गुणवंती सा वडभागणि ॥ पुत्रवंती सीलवंति सोहागणि ॥ रूपवंति सा सुघड़ि बिचखणि जो धन कंत पिआरी जीउ ॥२॥

अचारवंति साई परधाने ॥ सभ सिंगार बणे तिसु गिआने ॥ सा कुलवंती सा सभराई जो पिरि कै रंगि सवारी जीउ ॥३॥

महिमा तिस की कहणु न जाए ॥ जो पिरि मेलि लई अंगि लाए ॥ थिरु सुहागु वरु अगमु अगोचरु जन नानक प्रेम साधारी जीउ ॥४॥४॥११॥

(राग माझ -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
खोजत खोजत दरसन चाहे ॥ भाति भाति बन बन अवगाहे ॥ निरगुणु सरगुणु हरि हरि मेरा कोई है जीउ आणि मिलावै जीउ ॥१॥

खटु सासत बिचरत मुखि गिआना ॥ पूजा तिलकु तीरथ इसनाना ॥ निवली करम आसन चउरासीह इन महि सांति न आवै जीउ ॥२॥

अनिक बरख कीए जप तापा ॥ गवनु कीआ धरती भरमाता ॥ इकु खिनु हिरदै सांति न आवै जोगी बहुड़ि बहुड़ि उठि धावै जीउ ॥३॥

करि किरपा मोहि साधु मिलाइआ ॥ मनु तनु सीतलु धीरजु पाइआ ॥ प्रभु अबिनासी बसिआ घट भीतरि हरि मंगलु नानकु गावै जीउ ॥४॥५॥१२॥

(राग माझ -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
पारब्रहम अपर्मपर देवा ॥ अगम अगोचर अलख अभेवा ॥ दीन दइआल गोपाल गोबिंदा हरि धिआवहु गुरमुखि गाती जीउ ॥१॥

गुरमुखि मधुसूदनु निसतारे ॥ गुरमुखि संगी क्रिसन मुरारे ॥ दइआल दमोदरु गुरमुखि पाईऐ होरतु कितै न भाती जीउ ॥२॥

निरहारी केसव निरवैरा ॥ कोटि जना जा के पूजहि पैरा ॥ गुरमुखि हिरदै जा कै हरि हरि सोई भगतु इकाती जीउ ॥३॥

अमोघ दरसन बेअंत अपारा ॥ वड समरथु सदा दातारा ॥ गुरमुखि नामु जपीऐ तितु तरीऐ गति नानक विरली जाती जीउ ॥४॥६॥१३॥

(राग माझ -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
कहिआ करणा दिता लैणा ॥ गरीबा अनाथा तेरा माणा ॥ सभ किछु तूंहै तूंहै मेरे पिआरे तेरी कुदरति कउ बलि जाई जीउ ॥१॥

भाणै उझड़ भाणै राहा ॥ भाणै हरि गुण गुरमुखि गावाहा ॥ भाणै भरमि भवै बहु जूनी सभ किछु तिसै रजाई जीउ ॥२॥

ना को मूरखु ना को सिआणा ॥ वरतै सभ किछु तेरा भाणा ॥ अगम अगोचर बेअंत अथाहा तेरी कीमति कहणु न जाई जीउ ॥३॥

खाकु संतन की देहु पिआरे ॥ आइ पइआ हरि तेरै दुआरै ॥ दरसनु पेखत मनु आघावै नानक मिलणु सुभाई जीउ ॥४॥७॥१४॥

(राग माझ -- SGGS 98) माझ महला ५ ॥
दुखु तदे जा विसरि जावै ॥ भुख विआपै बहु बिधि धावै ॥ सिमरत नामु सदा सुहेला जिसु देवै दीन दइआला जीउ ॥१॥

सतिगुरु मेरा वड समरथा ॥ जीइ समाली ता सभु दुखु लथा ॥ चिंता रोगु गई हउ पीड़ा आपि करे प्रतिपाला जीउ ॥२॥

बारिक वांगी हउ सभ किछु मंगा ॥ देदे तोटि नाही प्रभ रंगा ॥ पैरी पै पै बहुतु मनाई दीन दइआल गोपाला जीउ ॥३॥

हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥ जिनि बंधन काटे सगले मेरे ॥ हिरदै नामु दे निरमल कीए नानक रंगि रसाला जीउ ॥४॥८॥१५॥

(राग माझ -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥ गहिर ग्मभीर बेअंत गोविंदे ॥ ऊच अथाह बेअंत सुआमी सिमरि सिमरि हउ जीवां जीउ ॥१॥

दुख भंजन निधान अमोले ॥ निरभउ निरवैर अथाह अतोले ॥ अकाल मूरति अजूनी स्मभौ मन सिमरत ठंढा थीवां जीउ ॥२॥

सदा संगी हरि रंग गोपाला ॥ ऊच नीच करे प्रतिपाला ॥ नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अम्रितु पीवां जीउ ॥३॥

दुखि सुखि पिआरे तुधु धिआई ॥ एह सुमति गुरू ते पाई ॥ नानक की धर तूंहै ठाकुर हरि रंगि पारि परीवां जीउ ॥४॥९॥१६॥

(राग माझ -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥ सफलु दरसनु नेत्र पेखत तरिआ ॥ धंनु मूरत चसे पल घड़ीआ धंनि सु ओइ संजोगा जीउ ॥१॥

उदमु करत मनु निरमलु होआ ॥ हरि मारगि चलत भ्रमु सगला खोइआ ॥ नामु निधानु सतिगुरू सुणाइआ मिटि गए सगले रोगा जीउ ॥२॥

अंतरि बाहरि तेरी बाणी ॥ तुधु आपि कथी तै आपि वखाणी ॥ गुरि कहिआ सभु एको एको अवरु न कोई होइगा जीउ ॥३॥

अम्रित रसु हरि गुर ते पीआ ॥ हरि पैनणु नामु भोजनु थीआ ॥ नामि रंग नामि चोज तमासे नाउ नानक कीने भोगा जीउ ॥४॥१०॥१७॥

(राग माझ -- SGGS 99) माझ महला ५ ॥
सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥ करउ बिनंती मानु तिआगउ ॥ वारि वारि जाई लख वरीआ देहु संतन की धूरा जीउ ॥१॥

तुम दाते तुम पुरख बिधाते ॥ तुम समरथ सदा सुखदाते ॥ सभ को तुम ही ते वरसावै अउसरु करहु हमारा पूरा जीउ ॥२॥

दरसनि तेरै भवन पुनीता ॥ आतम गड़ु बिखमु तिना ही जीता ॥ तुम दाते तुम पुरख बिधाते तुधु जेवडु अवरु न सूरा जीउ ॥३॥

रेनु संतन की मेरै मुखि लागी ॥ दुरमति बिनसी कुबुधि अभागी ॥ सच घरि बैसि रहे गुण गाए नानक बिनसे कूरा जीउ ॥४॥११॥१८॥

(राग माझ -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
विसरु नाही एवड दाते ॥ करि किरपा भगतन संगि राते ॥ दिनसु रैणि जिउ तुधु धिआई एहु दानु मोहि करणा जीउ ॥१॥

माटी अंधी सुरति समाई ॥ सभ किछु दीआ भलीआ जाई ॥ अनद बिनोद चोज तमासे तुधु भावै सो होणा जीउ ॥२॥

जिस दा दिता सभु किछु लैणा ॥ छतीह अम्रित भोजनु खाणा ॥ सेज सुखाली सीतलु पवणा सहज केल रंग करणा जीउ ॥३॥

सा बुधि दीजै जितु विसरहि नाही ॥ सा मति दीजै जितु तुधु धिआई ॥ सास सास तेरे गुण गावा ओट नानक गुर चरणा जीउ ॥४॥१२॥१९॥

(राग माझ -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥ सो गिआनु धिआनु जो तुधु भाई ॥ सोई जपु जो प्रभ जीउ भावै भाणै पूर गिआना जीउ ॥१॥

अम्रितु नामु तेरा सोई गावै ॥ जो साहिब तेरै मनि भावै ॥ तूं संतन का संत तुमारे संत साहिब मनु माना जीउ ॥२॥

तूं संतन की करहि प्रतिपाला ॥ संत खेलहि तुम संगि गोपाला ॥ अपुने संत तुधु खरे पिआरे तू संतन के प्राना जीउ ॥३॥

उन संतन कै मेरा मनु कुरबाने ॥ जिन तूं जाता जो तुधु मनि भाने ॥ तिन कै संगि सदा सुखु पाइआ हरि रस नानक त्रिपति अघाना जीउ ॥४॥१३॥२०॥

(राग माझ -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥ तेरा नामु बूंद हम चात्रिक तिखहारे ॥ तुमरी आस पिआसा तुमरी तुम ही संगि मनु लीना जीउ ॥१॥

जिउ बारिकु पी खीरु अघावै ॥ जिउ निरधनु धनु देखि सुखु पावै ॥ त्रिखावंत जलु पीवत ठंढा तिउ हरि संगि इहु मनु भीना जीउ ॥२॥

जिउ अंधिआरै दीपकु परगासा ॥ भरता चितवत पूरन आसा ॥ मिलि प्रीतम जिउ होत अनंदा तिउ हरि रंगि मनु रंगीना जीउ ॥३॥

संतन मो कउ हरि मारगि पाइआ ॥ साध क्रिपालि हरि संगि गिझाइआ ॥ हरि हमरा हम हरि के दासे नानक सबदु गुरू सचु दीना जीउ ॥४॥१४॥२१॥

(राग माझ -- SGGS 100) माझ महला ५ ॥
अम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥ सुखदाई दूख बिडारन हरीआ ॥ अवरि साद चखि सगले देखे मन हरि रसु सभ ते मीठा जीउ ॥१॥

जो जो पीवै सो त्रिपतावै ॥ अमरु होवै जो नाम रसु पावै ॥ नाम निधान तिसहि परापति जिसु सबदु गुरू मनि वूठा जीउ ॥२॥

जिनि हरि रसु पाइआ सो त्रिपति अघाना ॥ जिनि हरि सादु पाइआ सो नाहि डुलाना ॥ तिसहि परापति हरि हरि नामा जिसु मसतकि भागीठा जीउ ॥३॥

हरि इकसु हथि आइआ वरसाणे बहुतेरे ॥ तिसु लगि मुकतु भए घणेरे ॥ नामु निधाना गुरमुखि पाईऐ कहु नानक विरली डीठा जीउ ॥४॥१५॥२२॥

(राग माझ -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥ जनमु पदारथु गहिर ग्मभीरै ॥ लाख कोट खुसीआ रंग रावै जो गुर लागा पाई जीउ ॥१॥

दरसनु पेखत भए पुनीता ॥ सगल उधारे भाई मीता ॥ अगम अगोचरु सुआमी अपुना गुर किरपा ते सचु धिआई जीउ ॥२॥

जा कउ खोजहि सरब उपाए ॥ वडभागी दरसनु को विरला पाए ॥ ऊच अपार अगोचर थाना ओहु महलु गुरू देखाई जीउ ॥३॥

गहिर ग्मभीर अम्रित नामु तेरा ॥ मुकति भइआ जिसु रिदै वसेरा ॥ गुरि बंधन तिन के सगले काटे जन नानक सहजि समाई जीउ ॥४॥१६॥२३॥

(राग माझ -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥ प्रभू दइआ ते मंगलु गावउ ॥ ऊठत बैठत सोवत जागत हरि धिआईऐ सगल अवरदा जीउ ॥१॥

नामु अउखधु मो कउ साधू दीआ ॥ किलबिख काटे निरमलु थीआ ॥ अनदु भइआ निकसी सभ पीरा सगल बिनासे दरदा जीउ ॥२॥

जिस का अंगु करे मेरा पिआरा ॥ सो मुकता सागर संसारा ॥ सति करे जिनि गुरू पछाता सो काहे कउ डरदा जीउ ॥३॥

जब ते साधू संगति पाए ॥ गुर भेटत हउ गई बलाए ॥ सासि सासि हरि गावै नानकु सतिगुर ढाकि लीआ मेरा पड़दा जीउ ॥४॥१७॥२४॥

(राग माझ -- SGGS 101) माझ महला ५ ॥
ओति पोति सेवक संगि राता ॥ प्रभ प्रतिपाले सेवक सुखदाता ॥ पाणी पखा पीसउ सेवक कै ठाकुर ही का आहरु जीउ ॥१॥

काटि सिलक प्रभि सेवा लाइआ ॥ हुकमु साहिब का सेवक मनि भाइआ ॥ सोई कमावै जो साहिब भावै सेवकु अंतरि बाहरि माहरु जीउ ॥२॥

तूं दाना ठाकुरु सभ बिधि जानहि ॥ ठाकुर के सेवक हरि रंग माणहि ॥ जो किछु ठाकुर का सो सेवक का सेवकु ठाकुर ही संगि जाहरु जीउ ॥३॥

अपुनै ठाकुरि जो पहिराइआ ॥ बहुरि न लेखा पुछि बुलाइआ ॥ तिसु सेवक कै नानक कुरबाणी सो गहिर गभीरा गउहरु जीउ ॥४॥१८॥२५॥

(राग माझ -- SGGS 102) माझ महला ५ ॥
सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥ बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही ॥ गुर परसादी जिनी अंतरि पाइआ सो अंतरि बाहरि सुहेला जीउ ॥१॥

झिमि झिमि वरसै अम्रित धारा ॥ मनु पीवै सुनि सबदु बीचारा ॥ अनद बिनोद करे दिन राती सदा सदा हरि केला जीउ ॥२॥

जनम जनम का विछुड़िआ मिलिआ ॥ साध क्रिपा ते सूका हरिआ ॥ सुमति पाए नामु धिआए गुरमुखि होए मेला जीउ ॥३॥

जल तरंगु जिउ जलहि समाइआ ॥ तिउ जोती संगि जोति मिलाइआ ॥ कहु नानक भ्रम कटे किवाड़ा बहुड़ि न होईऐ जउला जीउ ॥४॥१९॥२६॥

(राग माझ -- SGGS 102) माझ महला ५ ॥
तिसु कुरबाणी जिनि तूं सुणिआ ॥ तिसु बलिहारी जिनि रसना भणिआ ॥ वारि वारि जाई तिसु विटहु जो मनि तनि तुधु आराधे जीउ ॥१॥

तिसु चरण पखाली जो तेरै मारगि चालै ॥ नैन निहाली तिसु पुरख दइआलै ॥ मनु देवा तिसु अपुने साजन जिनि गुर मिलि सो प्रभु लाधे जीउ ॥२॥

से वडभागी जिनि तुम जाणे ॥ सभ कै मधे अलिपत निरबाणे ॥ साध कै संगि उनि भउजलु तरिआ सगल दूत उनि साधे जीउ ॥३॥

तिन की सरणि परिआ मनु मेरा ॥ माणु ताणु तजि मोहु अंधेरा ॥ नामु दानु दीजै नानक कउ तिसु प्रभ अगम अगाधे जीउ ॥४॥२०॥२७॥


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