Pt 17 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 17 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(राग आसा -- SGGS 455) आसा महला ५ ॥
सलोकु ॥ बनु बनु फिरती खोजती हारी बहु अवगाहि ॥ नानक भेटे साध जब हरि पाइआ मन माहि ॥१॥

छंत ॥ जा कउ खोजहि असंख मुनी अनेक तपे ॥ ब्रहमे कोटि अराधहि गिआनी जाप जपे ॥ जप ताप संजम किरिआ पूजा अनिक सोधन बंदना ॥ करि गवनु बसुधा तीरथह मजनु मिलन कउ निरंजना ॥ मानुख बनु तिनु पसू पंखी सगल तुझहि अराधते ॥ दइआल लाल गोबिंद नानक मिलु साधसंगति होइ गते ॥१॥

कोटि बिसन अवतार संकर जटाधार ॥ चाहहि तुझहि दइआर मनि तनि रुच अपार ॥ अपार अगम गोबिंद ठाकुर सगल पूरक प्रभ धनी ॥ सुर सिध गण गंधरब धिआवहि जख किंनर गुण भनी ॥ कोटि इंद्र अनेक देवा जपत सुआमी जै जै कार ॥ अनाथ नाथ दइआल नानक साधसंगति मिलि उधार ॥२॥

कोटि देवी जा कउ सेवहि लखिमी अनिक भाति ॥ गुपत प्रगट जा कउ अराधहि पउण पाणी दिनसु राति ॥ नखिअत्र ससीअर सूर धिआवहि बसुध गगना गावए ॥ सगल खाणी सगल बाणी सदा सदा धिआवए ॥ सिम्रिति पुराण चतुर बेदह खटु सासत्र जा कउ जपाति ॥ पतित पावन भगति वछल नानक मिलीऐ संगि साति ॥३॥

जेती प्रभू जनाई रसना तेत भनी ॥ अनजानत जो सेवै तेती नह जाइ गनी ॥ अविगत अगनत अथाह ठाकुर सगल मंझे बाहरा ॥ सरब जाचिक एकु दाता नह दूरि संगी जाहरा ॥ वसि भगत थीआ मिले जीआ ता की उपमा कित गनी ॥ इहु दानु मानु नानकु पाए सीसु साधह धरि चरनी ॥४॥२॥५॥

(राग आसा -- SGGS 456) आसा महला ५ ॥
सलोक ॥ उदमु करहु वडभागीहो सिमरहु हरि हरि राइ ॥ नानक जिसु सिमरत सभ सुख होवहि दूखु दरदु भ्रमु जाइ ॥१॥

छंतु ॥ नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥ भेटत साधू संग जम पुरि नह जाईऐ ॥ दूख दरद न भउ बिआपै नामु सिमरत सद सुखी ॥ सासि सासि अराधि हरि हरि धिआइ सो प्रभु मनि मुखी ॥ क्रिपाल दइआल रसाल गुण निधि करि दइआ सेवा लाईऐ ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥१॥

पावन पतित पुनीत नाम निरंजना ॥ भरम अंधेर बिनास गिआन गुर अंजना ॥ गुर गिआन अंजन प्रभ निरंजन जलि थलि महीअलि पूरिआ ॥ इक निमख जा कै रिदै वसिआ मिटे तिसहि विसूरिआ ॥ अगाधि बोध समरथ सुआमी सरब का भउ भंजना ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै पावन पतित पुनीत नाम निरंजना ॥२॥

ओट गही गोपाल दइआल क्रिपा निधे ॥ मोहि आसर तुअ चरन तुमारी सरनि सिधे ॥ हरि चरन कारन करन सुआमी पतित उधरन हरि हरे ॥ सागर संसार भव उतार नामु सिमरत बहु तरे ॥ आदि अंति बेअंत खोजहि सुनी उधरन संतसंग बिधे ॥ नानकु पइअंपै चरन ज्मपै ओट गही गोपाल दइआल क्रिपा निधे ॥३॥

भगति वछलु हरि बिरदु आपि बनाइआ ॥ जह जह संत अराधहि तह तह प्रगटाइआ ॥ प्रभि आपि लीए समाइ सहजि सुभाइ भगत कारज सारिआ ॥ आनंद हरि जस महा मंगल सरब दूख विसारिआ ॥ चमतकार प्रगासु दह दिस एकु तह द्रिसटाइआ ॥ नानकु पइअंपै चरण ज्मपै भगति वछलु हरि बिरदु आपि बनाइआ ॥४॥३॥६॥

(राग आसा -- SGGS 457) आसा महला ५ ॥
थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥ जा कै ग्रिहि हरि नाहु सु सद ही रावए ॥ अविनासी अविगतु सो प्रभु सदा नवतनु निरमला ॥ नह दूरि सदा हदूरि ठाकुरु दह दिस पूरनु सद सदा ॥ प्रानपति गति मति जा ते प्रिअ प्रीति प्रीतमु भावए ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥१॥

जा कउ राम भतारु ता कै अनदु घणा ॥ सुखवंती सा नारि सोभा पूरि बणा ॥ माणु महतु कलिआणु हरि जसु संगि सुरजनु सो प्रभू ॥ सरब सिधि नव निधि तितु ग्रिहि नही ऊना सभु कछू ॥ मधुर बानी पिरहि मानी थिरु सोहागु ता का बणा ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा को रामु भतारु ता कै अनदु घणा ॥२॥

आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥ पीसउ चरण पखारि आपु तिआगीऐ ॥ तजि आपु मिटै संतापु आपु नह जाणाईऐ ॥ सरणि गहीजै मानि लीजै करे सो सुखु पाईऐ ॥ करि दास दासी तजि उदासी कर जोड़ि दिनु रैणि जागीऐ ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै आउ सखी संत पासि सेवा लागीऐ ॥३॥

जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥ ता की पूरन आस जिन्ह साधसंगु पाइआ ॥ साधसंगि हरि कै रंगि गोबिंद सिमरण लागिआ ॥ भरमु मोहु विकारु दूजा सगल तिनहि तिआगिआ ॥ मनि सांति सहजु सुभाउ वूठा अनद मंगल गुण गाइआ ॥ नानकु वखाणै गुर बचनि जाणै जा कै मसतकि भाग सि सेवा लाइआ ॥४॥४॥७॥

(राग आसा -- SGGS 457) आसा महला ५ ॥
सलोकु ॥ हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥ नानक मनु तनु सुखी होइ अंते मिलै गोपालु ॥१॥

छंत ॥ मिलउ संतन कै संगि मोहि उधारि लेहु ॥ बिनउ करउ कर जोड़ि हरि हरि नामु देहु ॥ हरि नामु मागउ चरण लागउ मानु तिआगउ तुम्ह दइआ ॥ कतहूं न धावउ सरणि पावउ करुणा मै प्रभ करि मइआ ॥ समरथ अगथ अपार निरमल सुणहु सुआमी बिनउ एहु ॥ कर जोड़ि नानक दानु मागै जनम मरण निवारि लेहु ॥१॥

अपराधी मतिहीनु निरगुनु अनाथु नीचु ॥ सठ कठोरु कुलहीनु बिआपत मोह कीचु ॥ मल भरम करम अहं ममता मरणु चीति न आवए ॥ बनिता बिनोद अनंद माइआ अगिआनता लपटावए ॥ खिसै जोबनु बधै जरूआ दिन निहारे संगि मीचु ॥ बिनवंति नानक आस तेरी सरणि साधू राखु नीचु ॥२॥

भरमे जनम अनेक संकट महा जोन ॥ लपटि रहिओ तिह संगि मीठे भोग सोन ॥ भ्रमत भार अगनत आइओ बहु प्रदेसह धाइओ ॥ अब ओट धारी प्रभ मुरारी सरब सुख हरि नाइओ ॥ राखनहारे प्रभ पिआरे मुझ ते कछू न होआ होन ॥ सूख सहज आनंद नानक क्रिपा तेरी तरै भउन ॥३॥

नाम धारीक उधारे भगतह संसा कउन ॥ जेन केन परकारे हरि हरि जसु सुनहु स्रवन ॥ सुनि स्रवन बानी पुरख गिआनी मनि निधाना पावहे ॥ हरि रंगि राते प्रभ बिधाते राम के गुण गावहे ॥ बसुध कागद बनराज कलमा लिखण कउ जे होइ पवन ॥ बेअंत अंतु न जाइ पाइआ गही नानक चरण सरन ॥४॥५॥८॥

(राग आसा -- SGGS 458) आसा महला ५ ॥
पुरख पते भगवान ता की सरणि गही ॥ निरभउ भए परान चिंता सगल लही ॥ मात पिता सुत मीत सुरिजन इसट बंधप जाणिआ ॥ गहि कंठि लाइआ गुरि मिलाइआ जसु बिमल संत वखाणिआ ॥ बेअंत गुण अनेक महिमा कीमति कछू न जाइ कही ॥ प्रभ एक अनिक अलख ठाकुर ओट नानक तिसु गही ॥१॥

अम्रित बनु संसारु सहाई आपि भए ॥ राम नामु उर हारु बिखु के दिवस गए ॥ गतु भरम मोह बिकार बिनसे जोनि आवण सभ रहे ॥ अगनि सागर भए सीतल साध अंचल गहि रहे ॥ गोविंद गुपाल दइआल सम्रिथ बोलि साधू हरि जै जए ॥ नानक नामु धिआइ पूरन साधसंगि पाई परम गते ॥२॥

जह देखउ तह संगि एको रवि रहिआ ॥ घट घट वासी आपि विरलै किनै लहिआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन कीट हसति समानिआ ॥ आदि अंते मधि सोई गुर प्रसादी जानिआ ॥ ब्रहमु पसरिआ ब्रहम लीला गोविंद गुण निधि जनि कहिआ ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी हरि एकु नानक रवि रहिआ ॥३॥

दिनु रैणि सुहावड़ी आई सिमरत नामु हरे ॥ चरण कमल संगि प्रीति कलमल पाप टरे ॥ दूख भूख दारिद्र नाठे प्रगटु मगु दिखाइआ ॥ मिलि साधसंगे नाम रंगे मनि लोड़ीदा पाइआ ॥ हरि देखि दरसनु इछ पुंनी कुल स्मबूहा सभि तरे ॥ दिनसु रैणि अनंद अनदिनु सिमरंत नानक हरि हरे ॥४॥६॥९॥

(राग आसा -- SGGS 459) आसा महला ५ छंत घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥ सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥ नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥१॥

छंत ॥ भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥ जागहि संत जना मेरे राम पिआरे ॥ राम पिआरे सदा जागहि नामु सिमरहि अनदिनो ॥ चरण कमल धिआनु हिरदै प्रभ बिसरु नाही इकु खिनो ॥ तजि मानु मोहु बिकारु मन का कलमला दुख जारे ॥ बिनवंति नानक सदा जागहि हरि दास संत पिआरे ॥१॥

मेरी सेजड़ीऐ आड्मबरु बणिआ ॥ मनि अनदु भइआ प्रभु आवत सुणिआ ॥ प्रभ मिले सुआमी सुखह गामी चाव मंगल रस भरे ॥ अंग संगि लागे दूख भागे प्राण मन तन सभि हरे ॥ मन इछ पाई प्रभ धिआई संजोगु साहा सुभ गणिआ ॥ बिनवंति नानक मिले स्रीधर सगल आनंद रसु बणिआ ॥२॥

मिलि सखीआ पुछहि कहु कंत नीसाणी ॥ रसि प्रेम भरी कछु बोलि न जाणी ॥ गुण गूड़ गुपत अपार करते निगम अंतु न पावहे ॥ भगति भाइ धिआइ सुआमी सदा हरि गुण गावहे ॥ सगल गुण सुगिआन पूरन आपणे प्रभ भाणी ॥ बिनवंति नानक रंगि राती प्रेम सहजि समाणी ॥३॥

सुख सोहिलड़े हरि गावण लागे ॥ साजन सरसिअड़े दुख दुसमन भागे ॥ सुख सहज सरसे हरि नामि रहसे प्रभि आपि किरपा धारीआ ॥ हरि चरण लागे सदा जागे मिले प्रभ बनवारीआ ॥ सुभ दिवस आए सहजि पाए सगल निधि प्रभ पागे ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी सदा हरि जन तागे ॥४॥१॥१०॥

(राग आसा -- SGGS 459) आसा महला ५ ॥
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥ मुहलति पुंनड़ीआ कितु कूड़ि लोभाइआ ॥ कूड़े लुभाइआ धोहु माइआ करहि पाप अमितिआ ॥ तनु भसम ढेरी जमहि हेरी कालि बपुड़ै जितिआ ॥ मालु जोबनु छोडि वैसी रहिओ पैनणु खाइआ ॥ नानक कमाणा संगि जुलिआ नह जाइ किरतु मिटाइआ ॥१॥

फाथोहु मिरग जिवै पेखि रैणि चंद्राइणु ॥ सूखहु दूख भए नित पाप कमाइणु ॥ पापा कमाणे छडहि नाही लै चले घति गलाविआ ॥ हरिचंदउरी देखि मूठा कूड़ु सेजा राविआ ॥ लबि लोभि अहंकारि माता गरबि भइआ समाइणु ॥ नानक म्रिग अगिआनि बिनसे नह मिटै आवणु जाइणु ॥२॥

मिठै मखु मुआ किउ लए ओडारी ॥ हसती गरति पइआ किउ तरीऐ तारी ॥ तरणु दुहेला भइआ खिन महि खसमु चिति न आइओ ॥ दूखा सजाई गणत नाही कीआ अपणा पाइओ ॥ गुझा कमाणा प्रगटु होआ ईत उतहि खुआरी ॥ नानक सतिगुर बाझु मूठा मनमुखो अहंकारी ॥३॥

हरि के दास जीवे लगि प्रभ की चरणी ॥ कंठि लगाइ लीए तिसु ठाकुर सरणी ॥ बल बुधि गिआनु धिआनु अपणा आपि नामु जपाइआ ॥ साधसंगति आपि होआ आपि जगतु तराइआ ॥ राखि लीए रखणहारै सदा निरमल करणी ॥ नानक नरकि न जाहि कबहूं हरि संत हरि की सरणी ॥४॥२॥११॥

(राग आसा -- SGGS 460) आसा महला ५ ॥
वंञु मेरे आलसा हरि पासि बेनंती ॥ रावउ सहु आपनड़ा प्रभ संगि सोहंती ॥ संगे सोहंती कंत सुआमी दिनसु रैणी रावीऐ ॥ सासि सासि चितारि जीवा प्रभु पेखि हरि गुण गावीऐ ॥ बिरहा लजाइआ दरसु पाइआ अमिउ द्रिसटि सिंचंती ॥ बिनवंति नानकु मेरी इछ पुंनी मिले जिसु खोजंती ॥१॥

नसि वंञहु किलविखहु करता घरि आइआ ॥ दूतह दहनु भइआ गोविंदु प्रगटाइआ ॥ प्रगटे गुपाल गोबिंद लालन साधसंगि वखाणिआ ॥ आचरजु डीठा अमिउ वूठा गुर प्रसादी जाणिआ ॥ मनि सांति आई वजी वधाई नह अंतु जाई पाइआ ॥ बिनवंति नानक सुख सहजि मेला प्रभू आपि बणाइआ ॥२॥

नरक न डीठड़िआ सिमरत नाराइण ॥ जै जै धरमु करे दूत भए पलाइण ॥ धरम धीरज सहज सुखीए साधसंगति हरि भजे ॥ करि अनुग्रहु राखि लीने मोह ममता सभ तजे ॥ गहि कंठि लाए गुरि मिलाए गोविंद जपत अघाइण ॥ बिनवंति नानक सिमरि सुआमी सगल आस पुजाइण ॥३॥

निधि सिधि चरण गहे ता केहा काड़ा ॥ सभु किछु वसि जिसै सो प्रभू असाड़ा ॥ गहि भुजा लीने नाम दीने करु धारि मसतकि राखिआ ॥ संसार सागरु नह विआपै अमिउ हरि रसु चाखिआ ॥ साधसंगे नाम रंगे रणु जीति वडा अखाड़ा ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी बहुड़ि जमि न उपाड़ा ॥४॥३॥१२॥

(राग आसा -- SGGS 461) आसा महला ५ ॥
दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥ जिसु पासि लुकाइदड़ो सो वेखी साथै ॥ संगि देखै करणहारा काइ पापु कमाईऐ ॥ सुक्रितु कीजै नामु लीजै नरकि मूलि न जाईऐ ॥ आठ पहर हरि नामु सिमरहु चलै तेरै साथे ॥ भजु साधसंगति सदा नानक मिटहि दोख कमाते ॥१॥

वलवंच करि उदरु भरहि मूरख गावारा ॥ सभु किछु दे रहिआ हरि देवणहारा ॥ दातारु सदा दइआलु सुआमी काइ मनहु विसारीऐ ॥ मिलु साधसंगे भजु निसंगे कुल समूहा तारीऐ ॥ सिध साधिक देव मुनि जन भगत नामु अधारा ॥ बिनवंति नानक सदा भजीऐ प्रभु एकु करणैहारा ॥२॥

खोटु न कीचई प्रभु परखणहारा ॥ कूड़ु कपटु कमावदड़े जनमहि संसारा ॥ संसारु सागरु तिन्ही तरिआ जिन्ही एकु धिआइआ ॥ तजि कामु क्रोधु अनिंद निंदा प्रभ सरणाई आइआ ॥ जलि थलि महीअलि रविआ सुआमी ऊच अगम अपारा ॥ बिनवंति नानक टेक जन की चरण कमल अधारा ॥३॥

पेखु हरिचंदउरड़ी असथिरु किछु नाही ॥ माइआ रंग जेते से संगि न जाही ॥ हरि संगि साथी सदा तेरै दिनसु रैणि समालीऐ ॥ हरि एक बिनु कछु अवरु नाही भाउ दुतीआ जालीऐ ॥ मीतु जोबनु मालु सरबसु प्रभु एकु करि मन माही ॥ बिनवंति नानकु वडभागि पाईऐ सूखि सहजि समाही ॥४॥४॥१३॥

(राग आसा -- SGGS 461) आसा महला ५ छंत घरु ८
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥ गहबर बन घोर गहबर बन घोर हे ग्रिह मूसत मन चोर हे दिनकरो अनदिनु खात ॥ दिन खात जात बिहात प्रभ बिनु मिलहु प्रभ करुणा पते ॥ जनम मरण अनेक बीते प्रिअ संग बिनु कछु नह गते ॥ कुल रूप धूप गिआनहीनी तुझ बिना मोहि कवन मात ॥ कर जोड़ि नानकु सरणि आइओ प्रिअ नाथ नरहर करहु गात ॥१॥

मीना जलहीन मीना जलहीन हे ओहु बिछुरत मन तन खीन हे कत जीवनु प्रिअ बिनु होत ॥ सनमुख सहि बान सनमुख सहि बान हे म्रिग अरपे मन तन प्रान हे ओहु बेधिओ सहज सरोत ॥ प्रिअ प्रीति लागी मिलु बैरागी खिनु रहनु ध्रिगु तनु तिसु बिना ॥ पलका न लागै प्रिअ प्रेम पागै चितवंति अनदिनु प्रभ मना ॥ स्रीरंग राते नाम माते भै भरम दुतीआ सगल खोत ॥ करि मइआ दइआ दइआल पूरन हरि प्रेम नानक मगन होत ॥२॥

अलीअल गुंजात अलीअल गुंजात हे मकरंद रस बासन मात हे प्रीति कमल बंधावत आप ॥ चात्रिक चित पिआस चात्रिक चित पिआस हे घन बूंद बचित्रि मनि आस हे अल पीवत बिनसत ताप ॥ तापा बिनासन दूख नासन मिलु प्रेमु मनि तनि अति घना ॥ सुंदरु चतुरु सुजान सुआमी कवन रसना गुण भना ॥ गहि भुजा लेवहु नामु देवहु द्रिसटि धारत मिटत पाप ॥ नानकु ज्मपै पतित पावन हरि दरसु पेखत नह संताप ॥३॥

चितवउ चित नाथ चितवउ चित नाथ हे रखि लेवहु सरणि अनाथ हे मिलु चाउ चाईले प्रान ॥ सुंदर तन धिआन सुंदर तन धिआन हे मनु लुबध गोपाल गिआन हे जाचिक जन राखत मान ॥ प्रभ मान पूरन दुख बिदीरन सगल इछ पुजंतीआ ॥ हरि कंठि लागे दिन सभागे मिलि नाह सेज सोहंतीआ ॥ प्रभ द्रिसटि धारी मिले मुरारी सगल कलमल भए हान ॥ बिनवंति नानक मेरी आस पूरन मिले स्रीधर गुण निधान ॥४॥१॥१४॥

(राग आसा -- SGGS 487) महला ५ ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥ आढ दाम को छीपरो होइओ लाखीणा ॥१॥ रहाउ ॥

बुनना तनना तिआगि कै प्रीति चरन कबीरा ॥ नीच कुला जोलाहरा भइओ गुनीय गहीरा ॥१॥

रविदासु ढुवंता ढोर नीति तिनि तिआगी माइआ ॥ परगटु होआ साधसंगि हरि दरसनु पाइआ ॥२॥

सैनु नाई बुतकारीआ ओहु घरि घरि सुनिआ ॥ हिरदे वसिआ पारब्रहमु भगता महि गनिआ ॥३॥

इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भगती लागा ॥ मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा ॥४॥२॥

(राग गूजरी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥ सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥१॥

मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सि तरिआ ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥१॥ रहाउ ॥

जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥ सिरि सिरि रिजकु स्मबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥२॥

ऊडै ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥ उन कवनु खलावै कवनु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥३॥

सभ निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥ जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥४॥१॥

(राग गूजरी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ चउपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥ अंतरि मैलु न उतरै हउमै बिनु गुर बाजी हारी ॥१॥

मेरे ठाकुर रखि लेवहु किरपा धारी ॥ कोटि मधे को विरला सेवकु होरि सगले बिउहारी ॥१॥ रहाउ ॥

सासत बेद सिम्रिति सभि सोधे सभ एका बात पुकारी ॥ बिनु गुर मुकति न कोऊ पावै मनि वेखहु करि बीचारी ॥२॥

अठसठि मजनु करि इसनाना भ्रमि आए धर सारी ॥ अनिक सोच करहि दिन राती बिनु सतिगुर अंधिआरी ॥३॥

धावत धावत सभु जगु धाइओ अब आए हरि दुआरी ॥ दुरमति मेटि बुधि परगासी जन नानक गुरमुखि तारी ॥४॥१॥२॥

(राग गूजरी -- SGGS 495) गूजरी महला ५ ॥
हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥ निमख न बिसरउ मन ते हरि हरि साधसंगति महि पाइआ ॥१॥

माई खाटि आइओ घरि पूता ॥ हरि धनु चलते हरि धनु बैसे हरि धनु जागत सूता ॥१॥ रहाउ ॥

हरि धनु इसनानु हरि धनु गिआनु हरि संगि लाइ धिआना ॥ हरि धनु तुलहा हरि धनु बेड़ी हरि हरि तारि पराना ॥२॥

हरि धन मेरी चिंत विसारी हरि धनि लाहिआ धोखा ॥ हरि धन ते मै नव निधि पाई हाथि चरिओ हरि थोका ॥३॥

खावहु खरचहु तोटि न आवै हलत पलत कै संगे ॥ लादि खजाना गुरि नानक कउ दीआ इहु मनु हरि रंगि रंगे ॥४॥२॥३॥

(राग गूजरी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥ सो हरि हरि तुम्ह सद ही जापहु जा का अंतु न पारो ॥१॥

पूता माता की आसीस ॥ निमख न बिसरउ तुम्ह कउ हरि हरि सदा भजहु जगदीस ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु तुम्ह कउ होइ दइआला संतसंगि तेरी प्रीति ॥ कापड़ु पति परमेसरु राखी भोजनु कीरतनु नीति ॥२॥

अम्रितु पीवहु सदा चिरु जीवहु हरि सिमरत अनद अनंता ॥ रंग तमासा पूरन आसा कबहि न बिआपै चिंता ॥३॥

भवरु तुम्हारा इहु मनु होवउ हरि चरणा होहु कउला ॥ नानक दासु उन संगि लपटाइओ जिउ बूंदहि चात्रिकु मउला ॥४॥३॥४॥

(राग गूजरी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥ खिन महि थापि उथापनहारा आपन हाथि मतात ॥१॥

सिआनप काहू कामि न आत ॥ जो अनरूपिओ ठाकुरि मेरै होइ रही उह बात ॥१॥ रहाउ ॥

देसु कमावन धन जोरन की मनसा बीचे निकसे सास ॥ लसकर नेब खवास सभ तिआगे जम पुरि ऊठि सिधास ॥२॥

होइ अनंनि मनहठ की द्रिड़ता आपस कउ जानात ॥ जो अनिंदु निंदु करि छोडिओ सोई फिरि फिरि खात ॥३॥

सहज सुभाइ भए किरपाला तिसु जन की काटी फास ॥ कहु नानक गुरु पूरा भेटिआ परवाणु गिरसत उदास ॥४॥४॥५॥

(राग गूजरी -- SGGS 496) गूजरी महला ५ ॥
नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥ काम क्रोध माइआ बिखु ममता इह बिआधि ते हाटे ॥१॥

हरि जसु साधसंगि मिलि गाइओ ॥ गुर परसादि भइओ मनु निरमलु सरब सुखा सुख पाइअउ ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु कीओ सोई भल मानै ऐसी भगति कमानी ॥ मित्र सत्रु सभ एक समाने जोग जुगति नीसानी ॥२॥

पूरन पूरि रहिओ स्रब थाई आन न कतहूं जाता ॥ घट घट अंतरि सरब निरंतरि रंगि रविओ रंगि राता ॥३॥

भए क्रिपाल दइआल गुपाला ता निरभै कै घरि आइआ ॥ कलि कलेस मिटे खिन भीतरि नानक सहजि समाइआ ॥४॥५॥६॥

(राग गूजरी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ ॥
जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥ पारब्रहमु जिनि रिदै अराधिआ तिनि भउ सागरु तरिआ ॥१॥

गुर हरि बिनु को न ब्रिथा दुखु काटै ॥ प्रभु तजि अवर सेवकु जे होई है तितु मानु महतु जसु घाटै ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ के सनबंध सैन साक कित ही कामि न आइआ ॥ हरि का दासु नीच कुलु ऊचा तिसु संगि मन बांछत फल पाइआ ॥२॥

लाख कोटि बिखिआ के बिंजन ता महि त्रिसन न बूझी ॥ सिमरत नामु कोटि उजीआरा बसतु अगोचर सूझी ॥३॥

फिरत फिरत तुम्हरै दुआरि आइआ भै भंजन हरि राइआ ॥ साध के चरन धूरि जनु बाछै सुखु नानक इहु पाइआ ॥४॥६॥७॥

(राग गूजरी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ पंचपदा घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥ चित्र साल सुंदर बाग मंदर संगि न कछहू जाइआ ॥१॥

अवर सभ मिथिआ लोभ लबी ॥ गुरि पूरै दीओ हरि नामा जीअ कउ एहा वसतु फबी ॥१॥ रहाउ ॥

इसट मीत बंधप सुत भाई संगि बनिता रचि हसिआ ॥ जब अंती अउसरु आइ बनिओ है उन्ह पेखत ही कालि ग्रसिआ ॥२॥

करि करि अनरथ बिहाझी स्मपै सुइना रूपा दामा ॥ भाड़ी कउ ओहु भाड़ा मिलिआ होरु सगल भइओ बिराना ॥३॥

हैवर गैवर रथ स्मबाहे गहु करि कीने मेरे ॥ जब ते होई लांमी धाई चलहि नाही इक पैरे ॥४॥

नामु धनु नामु सुख राजा नामु कुट्मब सहाई ॥ नामु स्मपति गुरि नानक कउ दीई ओह मरै न आवै जाई ॥५॥१॥८॥

(राग गूजरी -- SGGS 497) गूजरी महला ५ तिपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥ नामु निधानु सतिगुरू द्रिड़ाइआ बिनसि न आवै जाई ॥१॥

हरि जपि माइआ बंधन तूटे ॥ भए क्रिपाल दइआल प्रभ मेरे साधसंगति मिलि छूटे ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर हरि के गुन गावै भगति प्रेम रसि माता ॥ हरख सोग दुहु माहि निराला करणैहारु पछाता ॥२॥

जिस का सा तिन ही रखि लीआ सगल जुगति बणि आई ॥ कहु नानक प्रभ पुरख दइआला कीमति कहणु न जाई ॥३॥१॥९॥

(राग गूजरी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ दुपदे घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥ बरनु जाति कोऊ पूछै नाही बाछहि चरन रवारो ॥१॥

ठाकुर ऐसो नामु तुम्हारो ॥ सगल स्रिसटि को धणी कहीजै जन को अंगु निरारो ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि नानक बुधि पाई हरि कीरतनु आधारो ॥ नामदेउ त्रिलोचनु कबीर दासरो मुकति भइओ चमिआरो ॥२॥१॥१०॥

(राग गूजरी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥ सिव बिरंचि अरु सगल मोनि जन गहि न सकाहि गता ॥१॥

प्रभ की अगम अगाधि कथा ॥ सुनीऐ अवर अवर बिधि बुझीऐ बकन कथन रहता ॥१॥ रहाउ ॥

आपे भगता आपि सुआमी आपन संगि रता ॥ नानक को प्रभु पूरि रहिओ है पेखिओ जत्र कता ॥२॥२॥११॥

(राग गूजरी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥ जह जह अउसरु आइ बनिओ है तहा तहा हरि धिआइओ ॥१॥

प्रभ को भगति वछलु बिरदाइओ ॥ करे प्रतिपाल बारिक की निआई जन कउ लाड लडाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जप तप संजम करम धरम हरि कीरतनु जनि गाइओ ॥ सरनि परिओ नानक ठाकुर की अभै दानु सुखु पाइओ ॥२॥३॥१२॥

(राग गूजरी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥ संत सेवा करि भावनी लाईऐ तिआगि मानु हाठीला ॥१॥

मोहनु प्रान मान रागीला ॥ बासि रहिओ हीअरे कै संगे पेखि मोहिओ मनु लीला ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु सिमरत मनि होत अनंदा उतरै मनहु जंगीला ॥ मिलबे की महिमा बरनि न साकउ नानक परै परीला ॥२॥४॥१३॥

(राग गूजरी -- SGGS 498) गूजरी महला ५ ॥
मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन्हे बसि अपनही ॥ तीनि देव अरु कोड़ि तेतीसा तिन की हैरति कछु न रही ॥१॥

बलवंति बिआपि रही सभ मही ॥ अवरु न जानसि कोऊ मरमा गुर किरपा ते लही ॥१॥ रहाउ ॥

जीति जीति जीते सभि थाना सगल भवन लपटही ॥ कहु नानक साध ते भागी होइ चेरी चरन गही ॥२॥५॥१४॥

(राग गूजरी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥ हाथ देइ राखे परमेसरि सगला दुरतु मिटाइआ ॥१॥

ठाकुर होए आपि दइआल ॥ भई कलिआण आनंद रूप हुई है उबरे बाल गुपाल ॥१॥ रहाउ ॥

मिलि वर नारी मंगलु गाइआ ठाकुर का जैकारु ॥ कहु नानक तिसु गुर बलिहारी जिनि सभ का कीआ उधारु ॥२॥६॥१५॥

(राग गूजरी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥ अनिक रंग माइआ के पेखे किछु साथि न चालै भोरा ॥१॥

ठाकुर तुझ बिनु आहि न मोरा ॥ मोहि अनाथ निरगुन गुणु नाही मै आहिओ तुम्हरा धोरा ॥१॥ रहाउ ॥

बलि बलि बलि बलि चरण तुम्हारे ईहा ऊहा तुम्हारा जोरा ॥ साधसंगि नानक दरसु पाइओ बिनसिओ सगल निहोरा ॥२॥७॥१६॥

(राग गूजरी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥ मन कउ इह उपदेसु द्रिड़ावै सहजि सहजि गुण गाई ॥१॥

साजन ऐसो संतु सहाई ॥ जिसु भेटे तूटहि माइआ बंध बिसरि न कबहूं जाई ॥१॥ रहाउ ॥

करत करत अनिक बहु भाती नीकी इह ठहराई ॥ मिलि साधू हरि जसु गावै नानक भवजलु पारि पराई ॥२॥८॥१७॥

(राग गूजरी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥ राजा रंकु करै खिन भीतरि नीचह जोति धरी ॥१॥

धिआईऐ अपनो सदा हरी ॥ सोच अंदेसा ता का कहा करीऐ जा महि एक घरी ॥१॥ रहाउ ॥

तुम्हरी टेक पूरे मेरे सतिगुर मन सरनि तुम्हारै परी ॥ अचेत इआने बारिक नानक हम तुम राखहु धारि करी ॥२॥९॥१८॥

(राग गूजरी -- SGGS 499) गूजरी महला ५ ॥
तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥ चरण कमल रिद माहि समाए तह भरमु अंधेरा नाही ॥१॥

ठाकुर जा सिमरा तूं ताही ॥ करि किरपा सरब प्रतिपालक प्रभ कउ सदा सलाही ॥१॥ रहाउ ॥

सासि सासि तेरा नामु समारउ तुम ही कउ प्रभ आही ॥ नानक टेक भई करते की होर आस बिडाणी लाही ॥२॥१०॥१९॥


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