Pt 17 - गुरू अमरदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 17 - Guru Amardas ji (Mahalla 3) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग मारू -- SGGS 1093) मः ३ ॥
मनु माणकु जिनि परखिआ गुर सबदी वीचारि ॥ से जन विरले जाणीअहि कलजुग विचि संसारि ॥ आपै नो आपु मिलि रहिआ हउमै दुबिधा मारि ॥ नानक नामि रते दुतरु तरे भउजलु बिखमु संसारु ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1093) पउड़ी ॥
मनमुख अंदरु न भालनी मुठे अहमते ॥ चारे कुंडां भवि थके अंदरि तिख तते ॥ सिम्रिति सासत न सोधनी मनमुख विगुते ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ हरि नामु हरि सते ॥ ततु गिआनु वीचारिआ हरि जपि हरि गते ॥१९॥

(राग मारू -- SGGS 1093) पउड़ी ॥
सभे थोक विसारि इको मितु करि ॥ मनु तनु होइ निहालु पापा दहै हरि ॥ आवण जाणा चुकै जनमि न जाहि मरि ॥ सचु नामु आधारु सोगि न मोहि जरि ॥ नानक नामु निधानु मन महि संजि धरि ॥२०॥

(राग मारू -- SGGS 1093) पउड़ी ॥
भाणै हुकमु मनाइओनु भाणै सुखु पाइआ ॥ भाणै सतिगुरु मेलिओनु भाणै सचु धिआइआ ॥ भाणे जेवड होर दाति नाही सचु आखि सुणाइआ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सचु कमाइआ ॥ नानक तिसु सरणागती जिनि जगतु उपाइआ ॥२१॥

(राग मारू -- SGGS 1093) सलोक मः ३ ॥
जिन कउ अंदरि गिआनु नही भै की नाही बिंद ॥ नानक मुइआ का किआ मारणा जि आपि मारे गोविंद ॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1093) मः ३ ॥
मन की पत्री वाचणी सुखी हू सुखु सारु ॥ सो ब्राहमणु भला आखीऐ जि बूझै ब्रहमु बीचारु ॥ हरि सालाहे हरि पड़ै गुर कै सबदि वीचारि ॥ आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥ अगै जाति न पुछीऐ करणी सबदु है सारु ॥ होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु कमावणा बिखिआ नालि पिआरु ॥ अंदरि सुखु न होवई मनमुख जनमु खुआरु ॥ नानक नामि रते से उबरे गुर कै हेति अपारि ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1094) पउड़ी ॥
आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥ जो हुकमु न बूझै खसम का सोई नरु कचा ॥ जितु भावै तितु लाइदा गुरमुखि हरि सचा ॥ सभना का साहिबु एकु है गुर सबदी रचा ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सभि तिस दे जचा ॥ जिउ नानक आपि नचाइदा तिव ही को नचा ॥२२॥१॥ सुधु ॥

(राग भैरउ -- SGGS 1127) रागु भैरउ महला ३ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जाति का गरबु न करीअहु कोई ॥ ब्रहमु बिंदे सो ब्राहमणु होई ॥१॥

जाति का गरबु न करि मूरख गवारा ॥ इसु गरब ते चलहि बहुतु विकारा ॥१॥ रहाउ ॥

चारे वरन आखै सभु कोई ॥ ब्रहमु बिंद ते सभ ओपति होई ॥२॥

माटी एक सगल संसारा ॥ बहु बिधि भांडे घड़ै कुम्हारा ॥३॥

पंच ततु मिलि देही का आकारा ॥ घटि वधि को करै बीचारा ॥४॥

कहतु नानक इहु जीउ करम बंधु होई ॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न होई ॥५॥१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
जोगी ग्रिही पंडित भेखधारी ॥ ए सूते अपणै अहंकारी ॥१॥

माइआ मदि माता रहिआ सोइ ॥ जागतु रहै न मूसै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सो जागै जिसु सतिगुरु मिलै ॥ पंच दूत ओहु वसगति करै ॥२॥

सो जागै जो ततु बीचारै ॥ आपि मरै अवरा नह मारै ॥३॥

सो जागै जो एको जाणै ॥ परकिरति छोडै ततु पछाणै ॥४॥

चहु वरना विचि जागै कोइ ॥ जमै कालै ते छूटै सोइ ॥५॥

कहत नानक जनु जागै सोइ ॥ गिआन अंजनु जा की नेत्री होइ ॥६॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
जा कउ राखै अपणी सरणाई ॥ साचे लागै साचा फलु पाई ॥१॥

रे जन कै सिउ करहु पुकारा ॥ हुकमे होआ हुकमे वरतारा ॥१॥ रहाउ ॥

एहु आकारु तेरा है धारा ॥ खिन महि बिनसै करत न लागै बारा ॥२॥

करि प्रसादु इकु खेलु दिखाइआ ॥ गुर किरपा ते परम पदु पाइआ ॥३॥

कहत नानकु मारि जीवाले सोइ ॥ ऐसा बूझहु भरमि न भूलहु कोइ ॥४॥३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
मै कामणि मेरा कंतु करतारु ॥ जेहा कराए तेहा करी सीगारु ॥१॥

जां तिसु भावै तां करे भोगु ॥ तनु मनु साचे साहिब जोगु ॥१॥ रहाउ ॥

उसतति निंदा करे किआ कोई ॥ जां आपे वरतै एको सोई ॥२॥

गुर परसादी पिरम कसाई ॥ मिलउगी दइआल पंच सबद वजाई ॥३॥

भनति नानकु करे किआ कोइ ॥ जिस नो आपि मिलावै सोइ ॥४॥४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1128) भैरउ महला ३ ॥
सो मुनि जि मन की दुबिधा मारे ॥ दुबिधा मारि ब्रहमु बीचारे ॥१॥

इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥ मनु खोजत नामु नउ निधि पाई ॥१॥ रहाउ ॥

मूलु मोहु करि करतै जगतु उपाइआ ॥ ममता लाइ भरमि भोलाइआ ॥२॥

इसु मन ते सभ पिंड पराणा ॥ मन कै वीचारि हुकमु बुझि समाणा ॥३॥

करमु होवै गुरु किरपा करै ॥ इहु मनु जागै इसु मन की दुबिधा मरै ॥४॥

मन का सुभाउ सदा बैरागी ॥ सभ महि वसै अतीतु अनरागी ॥५॥

कहत नानकु जो जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥६॥५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
राम नामु जगत निसतारा ॥ भवजलु पारि उतारणहारा ॥१॥

गुर परसादी हरि नामु सम्हालि ॥ सद ही निबहै तेरै नालि ॥१॥ रहाउ ॥

नामु न चेतहि मनमुख गावारा ॥ बिनु नावै कैसे पावहि पारा ॥२॥

आपे दाति करे दातारु ॥ देवणहारे कउ जैकारु ॥३॥

नदरि करे सतिगुरू मिलाए ॥ नानक हिरदै नामु वसाए ॥४॥६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
नामे उधरे सभि जितने लोअ ॥ गुरमुखि जिना परापति होइ ॥१॥

हरि जीउ अपणी क्रिपा करेइ ॥ गुरमुखि नामु वडिआई देइ ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामि जिन प्रीति पिआरु ॥ आपि उधरे सभि कुल उधारणहारु ॥२॥

बिनु नावै मनमुख जम पुरि जाहि ॥ अउखे होवहि चोटा खाहि ॥३॥

आपे करता देवै सोइ ॥ नानक नामु परापति होइ ॥४॥७॥

(राग भैरउ -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
गोविंद प्रीति सनकादिक उधारे ॥ राम नाम सबदि बीचारे ॥१॥

हरि जीउ अपणी किरपा धारु ॥ गुरमुखि नामे लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि प्रीति भगति साची होइ ॥ पूरै गुरि मेलावा होइ ॥२॥

निज घरि वसै सहजि सुभाइ ॥ गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥३॥

आपे वेखै वेखणहारु ॥ नानक नामु रखहु उर धारि ॥४॥८॥

(राग भैरउ -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
कलजुग महि राम नामु उर धारु ॥ बिनु नावै माथै पावै छारु ॥१॥

राम नामु दुलभु है भाई ॥ गुर परसादि वसै मनि आई ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु जन भालहि सोइ ॥ पूरे गुर ते प्रापति होइ ॥२॥

हरि का भाणा मंनहि से जन परवाणु ॥ गुर कै सबदि नाम नीसाणु ॥३॥

सो सेवहु जो कल रहिआ धारि ॥ नानक गुरमुखि नामु पिआरि ॥४॥९॥

(राग भैरउ -- SGGS 1129) भैरउ महला ३ ॥
कलजुग महि बहु करम कमाहि ॥ ना रुति न करम थाइ पाहि ॥१॥

कलजुग महि राम नामु है सारु ॥ गुरमुखि साचा लगै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

तनु मनु खोजि घरै महि पाइआ ॥ गुरमुखि राम नामि चितु लाइआ ॥२॥

गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥ राम नामु रवि रहिआ तिहु लोइ ॥३॥

कलिजुग महि हरि जीउ एकु होर रुति न काई ॥ नानक गुरमुखि हिरदै राम नामु लेहु जमाई ॥४॥१०॥

(राग भैरउ -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥ मरि मरि जमहि ठउर न पावहि बिरथा जनमु गवाई ॥१॥

मेरे प्रीतम करि किरपा देहु बुझाई ॥ हउमै रोगी जगतु उपाइआ बिनु सबदै रोगु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र पड़हि मुनि केते बिनु सबदै सुरति न पाई ॥ त्रै गुण सभे रोगि विआपे ममता सुरति गवाई ॥२॥

इकि आपे काढि लए प्रभि आपे गुर सेवा प्रभि लाए ॥ हरि का नामु निधानो पाइआ सुखु वसिआ मनि आए ॥३॥

चउथी पदवी गुरमुखि वरतहि तिन निज घरि वासा पाइआ ॥ पूरै सतिगुरि किरपा कीनी विचहु आपु गवाइआ ॥४॥

एकसु की सिरि कार एक जिनि ब्रहमा बिसनु रुद्रु उपाइआ ॥ नानक निहचलु साचा एको ना ओहु मरै न जाइआ ॥५॥१॥११॥

(राग भैरउ -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ ॥
मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥ गुरमुखि बूझहि रोगु गवावहि गुर सबदी वीचारा ॥१॥

हरि जीउ सतसंगति मेलाइ ॥ नानक तिस नो देइ वडिआई जो राम नामि चितु लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

ममता कालि सभि रोगि विआपे तिन जम की है सिरि कारा ॥ गुरमुखि प्राणी जमु नेड़ि न आवै जिन हरि राखिआ उरि धारा ॥२॥

जिन हरि का नामु न गुरमुखि जाता से जग महि काहे आइआ ॥ गुर की सेवा कदे न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥३॥

नानक से पूरे वडभागी सतिगुर सेवा लाए ॥ जो इछहि सोई फलु पावहि गुरबाणी सुखु पाए ॥४॥२॥१२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1130) भैरउ महला ३ ॥
दुख विचि जमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥ गरभ जोनी विचि कदे न निकलै बिसटा माहि समाइ ॥१॥

ध्रिगु ध्रिगु मनमुखि जनमु गवाइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी हरि का नामु न भाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर का सबदु सभि रोग गवाए जिस नो हरि जीउ लाए ॥ नामे नामि मिलै वडिआई जिस नो मंनि वसाए ॥२॥

सतिगुरु भेटै ता फलु पाए सचु करणी सुख सारु ॥ से जन निरमल जो हरि लागे हरि नामे धरहि पिआरु ॥३॥

तिन की रेणु मिलै तां मसतकि लाई जिन सतिगुरु पूरा धिआइआ ॥ नानक तिन की रेणु पूरै भागि पाईऐ जिनी राम नामि चितु लाइआ ॥४॥३॥१३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
सबदु बीचारे सो जनु साचा जिन कै हिरदै साचा सोई ॥ साची भगति करहि दिनु राती तां तनि दूखु न होई ॥१॥

भगतु भगतु कहै सभु कोई ॥ बिनु सतिगुर सेवे भगति न पाईऐ पूरै भागि मिलै प्रभु सोई ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख मूलु गवावहि लाभु मागहि लाहा लाभु किदू होई ॥ जमकालु सदा है सिर ऊपरि दूजै भाइ पति खोई ॥२॥

बहले भेख भवहि दिनु राती हउमै रोगु न जाई ॥ पड़ि पड़ि लूझहि बादु वखाणहि मिलि माइआ सुरति गवाई ॥३॥

सतिगुरु सेवहि परम गति पावहि नामि मिलै वडिआई ॥ नानक नामु जिना मनि वसिआ दरि साचै पति पाई ॥४॥४॥१४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
मनमुख आसा नही उतरै दूजै भाइ खुआए ॥ उदरु नै साणु न भरीऐ कबहू त्रिसना अगनि पचाए ॥१॥

सदा अनंदु राम रसि राते ॥ हिरदै नामु दुबिधा मनि भागी हरि हरि अम्रितु पी त्रिपताते ॥१॥ रहाउ ॥

आपे पारब्रहमु स्रिसटि जिनि साजी सिरि सिरि धंधै लाए ॥ माइआ मोहु कीआ जिनि आपे आपे दूजै लाए ॥२॥

तिस नो किहु कहीऐ जे दूजा होवै सभि तुधै माहि समाए ॥ गुरमुखि गिआनु ततु बीचारा जोती जोति मिलाए ॥३॥

सो प्रभु साचा सद ही साचा साचा सभु आकारा ॥ नानक सतिगुरि सोझी पाई सचि नामि निसतारा ॥४॥५॥१५॥

(राग भैरउ -- SGGS 1131) भैरउ महला ३ ॥
कलि महि प्रेत जिन्ही रामु न पछाता सतजुगि परम हंस बीचारी ॥ दुआपुरि त्रेतै माणस वरतहि विरलै हउमै मारी ॥१॥

कलि महि राम नामि वडिआई ॥ जुगि जुगि गुरमुखि एको जाता विणु नावै मुकति न पाई ॥१॥ रहाउ ॥

हिरदै नामु लखै जनु साचा गुरमुखि मंनि वसाई ॥ आपि तरे सगले कुल तारे जिनी राम नामि लिव लाई ॥२॥

मेरा प्रभु है गुण का दाता अवगण सबदि जलाए ॥ जिन मनि वसिआ से जन सोहे हिरदै नामु वसाए ॥३॥

घरु दरु महलु सतिगुरू दिखाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥ जो किछु कहै सु भला करि मानै नानक नामु वखाणै ॥४॥६॥१६॥

(राग भैरउ -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
मनसा मनहि समाइ लै गुर सबदी वीचार ॥ गुर पूरे ते सोझी पवै फिरि मरै न वारो वार ॥१॥

मन मेरे राम नामु आधारु ॥ गुर परसादि परम पदु पाइआ सभ इछ पुजावणहारु ॥१॥ रहाउ ॥

सभ महि एको रवि रहिआ गुर बिनु बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि प्रगटु होआ मेरा हरि प्रभु अनदिनु हरि गुण गाइ ॥२॥

सुखदाता हरि एकु है होर थै सुखु न पाहि ॥ सतिगुरु जिनी न सेविआ दाता से अंति गए पछुताहि ॥३॥

सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ फिरि दुखु न लागै धाइ ॥ नानक हरि भगति परापति होई जोती जोति समाइ ॥४॥७॥१७॥

(राग भैरउ -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
बाझु गुरू जगतु बउराना भूला चोटा खाई ॥ मरि मरि जमै सदा दुखु पाए दर की खबरि न पाई ॥१॥

मेरे मन सदा रहहु सतिगुर की सरणा ॥ हिरदै हरि नामु मीठा सद लागा गुर सबदे भवजलु तरणा ॥१॥ रहाउ ॥

भेख करै बहुतु चितु डोलै अंतरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥ अंतरि तिसा भूख अति बहुती भउकत फिरै दर बारु ॥२॥

गुर कै सबदि मरहि फिरि जीवहि तिन कउ मुकति दुआरि ॥ अंतरि सांति सदा सुखु होवै हरि राखिआ उर धारि ॥३॥

जिउ तिसु भावै तिवै चलावै करणा किछू न जाई ॥ नानक गुरमुखि सबदु सम्हाले राम नामि वडिआई ॥४॥८॥१८॥

(राग भैरउ -- SGGS 1132) भैरउ महला ३ ॥
हउमै माइआ मोहि खुआइआ दुखु खटे दुख खाइ ॥ अंतरि लोभ हलकु दुखु भारी बिनु बिबेक भरमाइ ॥१॥

मनमुखि ध्रिगु जीवणु सैसारि ॥ राम नामु सुपनै नही चेतिआ हरि सिउ कदे न लागै पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

पसूआ करम करै नही बूझै कूड़ु कमावै कूड़ो होइ ॥ सतिगुरु मिलै त उलटी होवै खोजि लहै जनु कोइ ॥२॥

हरि हरि नामु रिदै सद वसिआ पाइआ गुणी निधानु ॥ गुर परसादी पूरा पाइआ चूका मन अभिमानु ॥३॥

आपे करता करे कराए आपे मारगि पाए ॥ आपे गुरमुखि दे वडिआई नानक नामि समाए ॥४॥९॥१९॥

(राग भैरउ -- SGGS 1133) भैरउ महला ३ ॥
मेरी पटीआ लिखहु हरि गोविंद गोपाला ॥ दूजै भाइ फाथे जम जाला ॥ सतिगुरु करे मेरी प्रतिपाला ॥ हरि सुखदाता मेरै नाला ॥१॥

गुर उपदेसि प्रहिलादु हरि उचरै ॥ सासना ते बालकु गमु न करै ॥१॥ रहाउ ॥

माता उपदेसै प्रहिलाद पिआरे ॥ पुत्र राम नामु छोडहु जीउ लेहु उबारे ॥ प्रहिलादु कहै सुनहु मेरी माइ ॥ राम नामु न छोडा गुरि दीआ बुझाइ ॥२॥

संडा मरका सभि जाइ पुकारे ॥ प्रहिलादु आपि विगड़िआ सभि चाटड़े विगाड़े ॥ दुसट सभा महि मंत्रु पकाइआ ॥ प्रहलाद का राखा होइ रघुराइआ ॥३॥

हाथि खड़गु करि धाइआ अति अहंकारि ॥ हरि तेरा कहा तुझु लए उबारि ॥ खिन महि भैआन रूपु निकसिआ थम्ह उपाड़ि ॥ हरणाखसु नखी बिदारिआ प्रहलादु लीआ उबारि ॥४॥

संत जना के हरि जीउ कारज सवारे ॥ प्रहलाद जन के इकीह कुल उधारे ॥ गुर कै सबदि हउमै बिखु मारे ॥ नानक राम नामि संत निसतारे ॥५॥१०॥२०॥

(राग भैरउ -- SGGS 1133) भैरउ महला ३ ॥
आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥ जो तेरी सदा सरणाई तिन मनि दुखु न होई ॥१॥

जुगि जुगि भगता की रखदा आइआ ॥ दैत पुत्रु प्रहलादु गाइत्री तरपणु किछू न जाणै सबदे मेलि मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु भगति करहि दिन राती दुबिधा सबदे खोई ॥ सदा निरमल है जो सचि राते सचु वसिआ मनि सोई ॥२॥

मूरख दुबिधा पड़्हहि मूलु न पछाणहि बिरथा जनमु गवाइआ ॥ संत जना की निंदा करहि दुसटु दैतु चिड़ाइआ ॥३॥

प्रहलादु दुबिधा न पड़ै हरि नामु न छोडै डरै न किसै दा डराइआ ॥ संत जना का हरि जीउ राखा दैतै कालु नेड़ा आइआ ॥४॥

आपणी पैज आपे राखै भगतां देइ वडिआई ॥ नानक हरणाखसु नखी बिदारिआ अंधै दर की खबरि न पाई ॥५॥११॥२१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1154) भैरउ महला ३ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिनि करतै इकु चलतु उपाइआ ॥ अनहद बाणी सबदु सुणाइआ ॥ मनमुखि भूले गुरमुखि बुझाइआ ॥ कारणु करता करदा आइआ ॥१॥

गुर का सबदु मेरै अंतरि धिआनु ॥ हउ कबहु न छोडउ हरि का नामु ॥१॥ रहाउ ॥

पिता प्रहलादु पड़ण पठाइआ ॥ लै पाटी पाधे कै आइआ ॥ नाम बिना नह पड़उ अचार ॥ मेरी पटीआ लिखि देहु गोबिंद मुरारि ॥२॥

पुत्र प्रहिलाद सिउ कहिआ माइ ॥ परविरति न पड़हु रही समझाइ ॥ निरभउ दाता हरि जीउ मेरै नालि ॥ जे हरि छोडउ तउ कुलि लागै गालि ॥३॥

प्रहलादि सभि चाटड़े विगारे ॥ हमारा कहिआ न सुणै आपणे कारज सवारे ॥ सभ नगरी महि भगति द्रिड़ाई ॥ दुसट सभा का किछु न वसाई ॥४॥

संडै मरकै कीई पूकार ॥ सभे दैत रहे झख मारि ॥ भगत जना की पति राखै सोई ॥ कीते कै कहिऐ किआ होई ॥५॥

किरत संजोगी दैति राजु चलाइआ ॥ हरि न बूझै तिनि आपि भुलाइआ ॥ पुत्र प्रहलाद सिउ वादु रचाइआ ॥ अंधा न बूझै कालु नेड़ै आइआ ॥६॥

प्रहलादु कोठे विचि राखिआ बारि दीआ ताला ॥ निरभउ बालकु मूलि न डरई मेरै अंतरि गुर गोपाला ॥ कीता होवै सरीकी करै अनहोदा नाउ धराइआ ॥ जो धुरि लिखिआ सो आइ पहुता जन सिउ वादु रचाइआ ॥७॥

पिता प्रहलाद सिउ गुरज उठाई ॥ कहां तुम्हारा जगदीस गुसाई ॥ जगजीवनु दाता अंति सखाई ॥ जह देखा तह रहिआ समाई ॥८॥

थम्हु उपाड़ि हरि आपु दिखाइआ ॥ अहंकारी दैतु मारि पचाइआ ॥ भगता मनि आनंदु वजी वधाई ॥ अपने सेवक कउ दे वडिआई ॥९॥

जमणु मरणा मोहु उपाइआ ॥ आवणु जाणा करतै लिखि पाइआ ॥ प्रहलाद कै कारजि हरि आपु दिखाइआ ॥ भगता का बोलु आगै आइआ ॥१०॥

देव कुली लखिमी कउ करहि जैकारु ॥ माता नरसिंघ का रूपु निवारु ॥ लखिमी भउ करै न साकै जाइ ॥ प्रहलादु जनु चरणी लागा आइ ॥११॥

सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ ॥ राजु मालु झूठी सभ माइआ ॥ लोभी नर रहे लपटाइ ॥ हरि के नाम बिनु दरगह मिलै सजाइ ॥१२॥

कहै नानकु सभु को करे कराइआ ॥ से परवाणु जिनी हरि सिउ चितु लाइआ ॥ भगता का अंगीकारु करदा आइआ ॥ करतै अपणा रूपु दिखाइआ ॥१३॥१॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1155) भैरउ महला ३ ॥
गुर सेवा ते अम्रित फलु पाइआ हउमै त्रिसन बुझाई ॥ हरि का नामु ह्रिदै मनि वसिआ मनसा मनहि समाई ॥१॥

हरि जीउ क्रिपा करहु मेरे पिआरे ॥ अनदिनु हरि गुण दीन जनु मांगै गुर कै सबदि उधारे ॥१॥ रहाउ ॥

संत जना कउ जमु जोहि न साकै रती अंच दूख न लाई ॥ आपि तरहि सगले कुल तारहि जो तेरी सरणाई ॥२॥

भगता की पैज रखहि तू आपे एह तेरी वडिआई ॥ जनम जनम के किलविख दुख काटहि दुबिधा रती न राई ॥३॥

हम मूड़ मुगध किछु बूझहि नाही तू आपे देहि बुझाई ॥ जो तुधु भावै सोई करसी अवरु न करणा जाई ॥४॥

जगतु उपाइ तुधु धंधै लाइआ भूंडी कार कमाई ॥ जनमु पदारथु जूऐ हारिआ सबदै सुरति न पाई ॥५॥

मनमुखि मरहि तिन किछू न सूझै दुरमति अगिआन अंधारा ॥ भवजलु पारि न पावहि कब ही डूबि मुए बिनु गुर सिरि भारा ॥६॥

साचै सबदि रते जन साचे हरि प्रभि आपि मिलाए ॥ गुर की बाणी सबदि पछाती साचि रहे लिव लाए ॥७॥

तूं आपि निरमलु तेरे जन है निरमल गुर कै सबदि वीचारे ॥ नानकु तिन कै सद बलिहारै राम नामु उरि धारे ॥८॥२॥३॥

(राग बसंत -- SGGS 1169) बसंतु महला ३ तीजा ॥
बसत्र उतारि दिग्मबरु होगु ॥ जटाधारि किआ कमावै जोगु ॥ मनु निरमलु नही दसवै दुआर ॥ भ्रमि भ्रमि आवै मूड़्हा वारो वार ॥१॥

एकु धिआवहु मूड़्ह मना ॥ पारि उतरि जाहि इक खिनां ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र करहि वखिआण ॥ नादी बेदी पड़्हहि पुराण ॥ पाखंड द्रिसटि मनि कपटु कमाहि ॥ तिन कै रमईआ नेड़ि नाहि ॥२॥

जे को ऐसा संजमी होइ ॥ क्रिआ विसेख पूजा करेइ ॥ अंतरि लोभु मनु बिखिआ माहि ॥ ओइ निरंजनु कैसे पाहि ॥३॥

कीता होआ करे किआ होइ ॥ जिस नो आपि चलाए सोइ ॥ नदरि करे तां भरमु चुकाए ॥ हुकमै बूझै तां साचा पाए ॥४॥

जिसु जीउ अंतरु मैला होइ ॥ तीरथ भवै दिसंतर लोइ ॥ नानक मिलीऐ सतिगुर संग ॥ तउ भवजल के तूटसि बंध ॥५॥४॥

(राग बसंत -- SGGS 1170) बसंतु महला ३ इक तुका ॥
साहिब भावै सेवकु सेवा करै ॥ जीवतु मरै सभि कुल उधरै ॥१॥

तेरी भगति न छोडउ किआ को हसै ॥ साचु नामु मेरै हिरदै वसै ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे माइआ मोहि प्राणी गलतु रहै ॥ तैसे संत जन राम नाम रवत रहै ॥२॥

मै मूरख मुगध ऊपरि करहु दइआ ॥ तउ सरणागति रहउ पइआ ॥३॥

कहतु नानकु संसार के निहफल कामा ॥ गुर प्रसादि को पावै अम्रित नामा ॥४॥८॥

(राग बसंत -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ घरु १ दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माहा रुती महि सद बसंतु ॥ जितु हरिआ सभु जीअ जंतु ॥ किआ हउ आखा किरम जंतु ॥ तेरा किनै न पाइआ आदि अंतु ॥१॥

तै साहिब की करहि सेव ॥ परम सुख पावहि आतम देव ॥१॥ रहाउ ॥

करमु होवै तां सेवा करै ॥ गुर परसादी जीवत मरै ॥ अनदिनु साचु नामु उचरै ॥ इन बिधि प्राणी दुतरु तरै ॥२॥

बिखु अम्रितु करतारि उपाए ॥ संसार बिरख कउ दुइ फल लाए ॥ आपे करता करे कराए ॥ जो तिसु भावै तिसै खवाए ॥३॥

नानक जिस नो नदरि करेइ ॥ अम्रित नामु आपे देइ ॥ बिखिआ की बासना मनहि करेइ ॥ अपणा भाणा आपि करेइ ॥४॥१॥

(राग बसंत -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ ॥
राते साचि हरि नामि निहाला ॥ दइआ करहु प्रभ दीन दइआला ॥ तिसु बिनु अवरु नही मै कोइ ॥ जिउ भावै तिउ राखै सोइ ॥१॥

गुर गोपाल मेरै मनि भाए ॥ रहि न सकउ दरसन देखे बिनु सहजि मिलउ गुरु मेलि मिलाए ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मनु लोभी लोभि लुभाना ॥ राम बिसारि बहुरि पछुताना ॥ बिछुरत मिलाइ गुर सेव रांगे ॥ हरि नामु दीओ मसतकि वडभागे ॥२॥

पउण पाणी की इह देह सरीरा ॥ हउमै रोगु कठिन तनि पीरा ॥ गुरमुखि राम नाम दारू गुण गाइआ ॥ करि किरपा गुरि रोगु गवाइआ ॥३॥

चारि नदीआ अगनी तनि चारे ॥ त्रिसना जलत जले अहंकारे ॥ गुरि राखे वडभागी तारे ॥ जन नानक उरि हरि अम्रितु धारे ॥४॥२॥

(राग बसंत -- SGGS 1172) बसंतु महला ३ ॥
हरि सेवे सो हरि का लोगु ॥ साचु सहजु कदे न होवै सोगु ॥ मनमुख मुए नाही हरि मन माहि ॥ मरि मरि जमहि भी मरि जाहि ॥१॥

से जन जीवे जिन हरि मन माहि ॥ साचु सम्हालहि साचि समाहि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि न सेवहि ते हरि ते दूरि ॥ दिसंतरु भवहि सिरि पावहि धूरि ॥ हरि आपे जन लीए लाइ ॥ तिन सदा सुखु है तिलु न तमाइ ॥२॥

नदरि करे चूकै अभिमानु ॥ साची दरगह पावै मानु ॥ हरि जीउ वेखै सद हजूरि ॥ गुर कै सबदि रहिआ भरपूरि ॥३॥

जीअ जंत की करे प्रतिपाल ॥ गुर परसादी सद सम्हाल ॥ दरि साचै पति सिउ घरि जाइ ॥ नानक नामि वडाई पाइ ॥४॥३॥

(राग बसंत -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
अंतरि पूजा मन ते होइ ॥ एको वेखै अउरु न कोइ ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ ॥१॥

मेरा प्रभु मउलिआ सद बसंतु ॥ इहु मनु मउलिआ गाइ गुण गोबिंद ॥१॥ रहाउ ॥

गुर पूछहु तुम्ह करहु बीचारु ॥ तां प्रभ साचे लगै पिआरु ॥ आपु छोडि होहि दासत भाइ ॥ तउ जगजीवनु वसै मनि आइ ॥२॥

भगति करे सद वेखै हजूरि ॥ मेरा प्रभु सद रहिआ भरपूरि ॥ इसु भगती का कोई जाणै भेउ ॥ सभु मेरा प्रभु आतम देउ ॥३॥

आपे सतिगुरु मेलि मिलाए ॥ जगजीवन सिउ आपि चितु लाए ॥ मनु तनु हरिआ सहजि सुभाए ॥ नानक नामि रहे लिव लाए ॥४॥४॥

(राग बसंत -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
भगति वछलु हरि वसै मनि आइ ॥ गुर किरपा ते सहज सुभाइ ॥ भगति करे विचहु आपु खोइ ॥ तद ही साचि मिलावा होइ ॥१॥

भगत सोहहि सदा हरि प्रभ दुआरि ॥ गुर कै हेति साचै प्रेम पिआरि ॥१॥ रहाउ ॥

भगति करे सो जनु निरमलु होइ ॥ गुर सबदी विचहु हउमै खोइ ॥ हरि जीउ आपि वसै मनि आइ ॥ सदा सांति सुखि सहजि समाइ ॥२॥

साचि रते तिन सद बसंत ॥ मनु तनु हरिआ रवि गुण गुविंद ॥ बिनु नावै सूका संसारु ॥ अगनि त्रिसना जलै वारो वार ॥३॥

सोई करे जि हरि जीउ भावै ॥ सदा सुखु सरीरि भाणै चितु लावै ॥ अपणा प्रभु सेवे सहजि सुभाइ ॥ नानक नामु वसै मनि आइ ॥४॥५॥

(राग बसंत -- SGGS 1173) बसंतु महला ३ ॥
माइआ मोहु सबदि जलाए ॥ मनु तनु हरिआ सतिगुर भाए ॥ सफलिओ बिरखु हरि कै दुआरि ॥ साची बाणी नाम पिआरि ॥१॥

ए मन हरिआ सहज सुभाइ ॥ सच फलु लागै सतिगुर भाइ ॥१॥ रहाउ ॥

आपे नेड़ै आपे दूरि ॥ गुर कै सबदि वेखै सद हजूरि ॥ छाव घणी फूली बनराइ ॥ गुरमुखि बिगसै सहजि सुभाइ ॥२॥

अनदिनु कीरतनु करहि दिन राति ॥ सतिगुरि गवाई विचहु जूठि भरांति ॥ परपंच वेखि रहिआ विसमादु ॥ गुरमुखि पाईऐ नाम प्रसादु ॥३॥

आपे करता सभि रस भोग ॥ जो किछु करे सोई परु होग ॥ वडा दाता तिलु न तमाइ ॥ नानक मिलीऐ सबदु कमाइ ॥४॥६॥

(राग बसंत -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
पूरै भागि सचु कार कमावै ॥ एको चेतै फिरि जोनि न आवै ॥ सफल जनमु इसु जग महि आइआ ॥ साचि नामि सहजि समाइआ ॥१॥

गुरमुखि कार करहु लिव लाइ ॥ हरि नामु सेवहु विचहु आपु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥

तिसु जन की है साची बाणी ॥ गुर कै सबदि जग माहि समाणी ॥ चहु जुग पसरी साची सोइ ॥ नामि रता जनु परगटु होइ ॥२॥

इकि साचै सबदि रहे लिव लाइ ॥ से जन साचे साचै भाइ ॥ साचु धिआइनि देखि हजूरि ॥ संत जना की पग पंकज धूरि ॥३॥

एको करता अवरु न कोइ ॥ गुर सबदी मेलावा होइ ॥ जिनि सचु सेविआ तिनि रसु पाइआ ॥ नानक सहजे नामि समाइआ ॥४॥७॥

(राग बसंत -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
भगति करहि जन देखि हजूरि ॥ संत जना की पग पंकज धूरि ॥ हरि सेती सद रहहि लिव लाइ ॥ पूरै सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥१॥

दासा का दासु विरला कोई होइ ॥ ऊतम पदवी पावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

एको सेवहु अवरु न कोइ ॥ जितु सेविऐ सदा सुखु होइ ॥ ना ओहु मरै न आवै जाइ ॥ तिसु बिनु अवरु सेवी किउ माइ ॥२॥

से जन साचे जिनी साचु पछाणिआ ॥ आपु मारि सहजे नामि समाणिआ ॥ गुरमुखि नामु परापति होइ ॥ मनु निरमलु निरमल सचु सोइ ॥३॥

जिनि गिआनु कीआ तिसु हरि तू जाणु ॥ साच सबदि प्रभु एकु सिञाणु ॥ हरि रसु चाखै तां सुधि होइ ॥ नानक नामि रते सचु सोइ ॥४॥८॥

(राग बसंत -- SGGS 1174) बसंतु महला ३ ॥
नामि रते कुलां का करहि उधारु ॥ साची बाणी नाम पिआरु ॥ मनमुख भूले काहे आए ॥ नामहु भूले जनमु गवाए ॥१॥

जीवत मरै मरि मरणु सवारै ॥ गुर कै सबदि साचु उर धारै ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सचु भोजनु पवितु सरीरा ॥ मनु निरमलु सद गुणी गहीरा ॥ जमै मरै न आवै जाइ ॥ गुर परसादी साचि समाइ ॥२॥

साचा सेवहु साचु पछाणै ॥ गुर कै सबदि हरि दरि नीसाणै ॥ दरि साचै सचु सोभा होइ ॥ निज घरि वासा पावै सोइ ॥३॥

आपि अभुलु सचा सचु सोइ ॥ होरि सभि भूलहि दूजै पति खोइ ॥ साचा सेवहु साची बाणी ॥ नानक नामे साचि समाणी ॥४॥९॥


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